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कक्षा 10 – पद – मीरा (स्पर्श) – कृष्णभक्ति, विरह-वेदना और समर्पण की अमर काव्य अभिव्यक्ति | GPN

📘 पाठ – मीरा – पद | कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श) | GPN

📚 कक्षा: 10 | 📖 पुस्तक: स्पर्श भाग 2 | ✍️ कवयित्री: मीराबाई | 📝 प्रकार: पद्य (भक्ति पद) | ⭐⭐⭐ बहुत महत्वपूर्ण


📌 अनुक्रमणिका

इस पाठ को गहराई से समझने के लिए छात्र कक्षा 10 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवयित्री परिचय

मीराबाई (1498-1546): जन्म: 1498, कुड़की गाँव, मेवाड़ (राजस्थान)। भक्ति काल की प्रमुख कवयित्री। कृष्ण भक्ति शाखा की प्रतिनिधि कवयित्री। रचनाएँ: मीरा की पदावली, गीत गोविंद टीका, राग गोविंद आदि। मीरा का विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ था। कम उम्र में ही पति की मृत्यु के बाद उन्होंने कृष्ण भक्ति में जीवन बिताया। उन पर अनेक आरोप लगे, विष दिया गया लेकिन कृष्ण भक्ति के बल पर सबसे उबर गईं। अंत में द्वारिका में कृष्ण मूर्ति में विलीन हो गईं (कहा जाता है कि वे मूर्ति में समा गईं)।

📖 पाठ की पृष्ठभूमि

मीरा के पद कृष्ण भक्ति से परिपूर्ण हैं। उन्होंने अपने पदों में कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम, विरह व्यथा और समर्पण भाव को व्यक्त किया है। इस पाठ में मीरा के तीन पद संकलित हैं। पहले पद में मीरा कृष्ण के प्रति अपने समर्पण और विरह की पीड़ा व्यक्त करती हैं। दूसरे पद में वे कृष्ण के प्रति अपने प्रेम का वर्णन करती हैं और तीसरे पद में वे कृष्ण से मिलन की आकुलता व्यक्त करती हैं।

🎯 पाठ का महत्व

बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से पदों की व्याख्या, मीरा के भक्ति भाव, विरह व्यथा, समर्पण भाव, भाषा शैली और कृष्ण के प्रति उनके अनन्य प्रेम पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रत्येक पद की व्याख्या करने वाले प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।

2. सरल सारांश

इस पाठ में मीरा के तीन भक्ति पद संकलित हैं:

पहला पद: 'माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो' - इस पद में मीरा कृष्ण के दर्शन की आकुलता व्यक्त करती हैं। वे कहती हैं कि उनका मन कृष्ण के दर्शन के लिए व्याकुल है। वे अपनी सखी से कहती हैं कि उन्हें कृष्ण के दर्शन कराओ।

दूसरा पद: 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' - इस पद में मीरा कृष्ण से उनकी आँखों में बस जाने की प्रार्थना करती हैं। वे कहती हैं कि वे कृष्ण के बिना नहीं रह सकतीं।

तीसरा पद: 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो' - इस पद में मीरा कृष्ण रूपी रत्न को पाने के आनंद का वर्णन करती हैं। वे कहती हैं कि उन्हें कृष्ण रूपी धन मिल गया है, अब उन्हें किसी और की चाह नहीं।

3. पद्यांश व्याख्या

📌 पद 1

पद्यांश: माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो।
जनम-जनम की बिरह जलतियाँ, निस-दिन जीवौं भीजो॥

व्याख्या: मीरा अपनी सखी से कहती हैं - हे माई! मुझे हरि (कृष्ण) के दर्शन कराओ। मैं जन्म-जन्म से विरह की आग में जल रही हूँ। इस पीड़ा में दिन-रात किसी तरह जी रही हूँ। मीरा यहाँ अपने विरह की व्याकुलता को व्यक्त कर रही हैं। वे जन्मों से कृष्ण के विरह में जल रही हैं और अब उनके दर्शन चाहती हैं।

📌 पद 1 (आगे)

पद्यांश: हरि बिनु तनु बिरहानल तापै, सास-सास ह्वै छीजो॥
जल बूँद ज्यों चातक ताकौं, तू मोहि दरसन दीजो॥

व्याख्या: मीरा कहती हैं - हरि (कृष्ण) के बिना मेरा शरीर विरह की आग में तप रहा है। हर साँस के साथ यह शरीर क्षीण हो रहा है। जैसे चातक पक्षी पानी की एक बूँद के लिए तरसता है, वैसे ही मैं तुमसे कृष्ण के दर्शन की याचना करती हूँ। मीरा ने यहाँ चातक पक्षी का सुंदर उदाहरण दिया है। चातक को केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद ही स्वीकार होती है, उसी प्रकार मीरा को केवल कृष्ण के दर्शन ही चाहिए।

📌 पद 2

पद्यांश: बसो मोरे नैनन में नंदलाल।
मोहन मूरति साँवरि सूरति, नैना बसो गोपाल॥

व्याख्या: मीरा कृष्ण से प्रार्थना करती हैं - हे नंदलाल! मेरी आँखों में बस जाओ। हे मोहन! तुम्हारी साँवली सूरत, तुम्हारी मनमोहक मूर्ति मेरी आँखों में बस जाओ। मीरा यहाँ कृष्ण से उनकी आँखों में स्थायी रूप से बस जाने की प्रार्थना कर रही हैं। वे चाहती हैं कि कृष्ण उनकी आँखों से ओझल न हों।

📌 पद 2 (आगे)

पद्यांश: अनत कहाँ को ध्यावौं री, मैं तो अब ध्यान लीन लौ लीनो।
अब तो ब्रज के लाल मोरे, हियरे में हुलास उपज्यो॥

व्याख्या: मीरा कहती हैं - अब मैं किसी और का ध्यान कहाँ करूँ? मैं तो केवल कृष्ण के ध्यान में लीन हो गई हूँ। अब ब्रज के लाल (कृष्ण) मेरे हो गए हैं, मेरे हृदय में उत्साह और आनंद का संचार हो गया है। मीरा यहाँ कृष्ण के प्रति अपनी एकनिष्ठ भक्ति को व्यक्त कर रही हैं। उनके लिए अब कृष्ण के अलावा और कोई नहीं।

📌 पद 3

पद्यांश: पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो।
वरषण के दिन थे तरुन तमाल, बरसन लागो मेह पायो॥

व्याख्या: मीरा आनंदित होकर कहती हैं - मैंने राम (कृष्ण) रूपी रत्न धन पा लिया। वर्षा के दिन थे, तरुण तमाल के पेड़ थे, बादल बरसने लगे, तब मैंने इस रत्न को पाया। मीरा यहाँ कृष्ण की प्राप्ति के आनंद का वर्णन कर रही हैं। वर्षा ऋतु का वर्णन करते हुए वे कहती हैं कि इस सुंदर वातावरण में उन्हें कृष्ण रूपी धन मिल गया।

📌 पद 3 (आगे)

पद्यांश: जनम जनम की पूँजी पाई, जाको कोई न चुराई।
मीरा के प्रभु गिरधरनागर, सब विधि आनंद बढ़ायो॥

व्याख्या: मीरा कहती हैं - यह वह धन है जो जन्म-जन्म की पूँजी है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता। मीरा के प्रभु गिरधरनागर (कृष्ण) ने सब प्रकार से आनंद बढ़ा दिया। मीरा यहाँ कृष्ण की प्राप्ति को जन्मों-जन्मों की पूँजी बता रही हैं। यह धन ऐसा है जिसे कोई चुरा नहीं सकता, जो सदा स्थायी है। कृष्ण की प्राप्ति ने उनके जीवन में सब प्रकार का आनंद बढ़ा दिया है।

अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए छात्र कक्षा 9 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 9 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

4. शब्दार्थ

शब्द अर्थ
म्हानेमुझे
दरसनदर्शन
बिरहविरह, वियोग
जलतियाँजलती हुई
भीजोभीगना
तापैतपना
छीजोक्षीण होना
चातकएक पक्षी जो स्वाति नक्षत्र की बूँद ही पीता है
ताकौंताकना, प्रतीक्षा करना
मोहनकृष्ण का एक नाम
मूरतिमूर्ति, आकृति
साँवरिसाँवली, श्याम वर्ण
सूरतिसूरत, रूप
गोपालकृष्ण का एक नाम
अनतअन्यत्र, कहीं और
ध्यावौंध्यान करूँ
लीनतल्लीन
हुलासउल्लास, आनंद
उपज्योउत्पन्न हुआ
पायोपाया
वरषणवर्षा
तरुनयुवा
तमालएक प्रकार का पेड़
मेहबादल, वर्षा
पूँजीपूँजी, धन
गिरधरनागरगिरधर नाम के कृष्ण

5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)

प्रश्न 1. मीराबाई का जन्म कहाँ और कब हुआ था? [2020]

मीराबाई का जन्म सन् 1498 में राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के कुड़की गाँव में हुआ था।

प्रश्न 2. मीराबाई किस भक्ति शाखा की कवयित्री हैं? [2019]

मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की प्रमुख कवयित्री हैं। वे भक्ति काल की निर्गुण भक्ति धारा से जुड़ी हैं।

प्रश्न 3. मीरा के पदों का मुख्य विषय क्या है? [2021]

मीरा के पदों का मुख्य विषय कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम, विरह व्यथा, समर्पण भाव और मिलन का आनंद है।

प्रश्न 4. 'माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो' पंक्ति में मीरा क्या कह रही हैं? [2018]

इस पंक्ति में मीरा अपनी सखी से कह रही हैं कि वे उन्हें कृष्ण के दर्शन कराएँ। वे कृष्ण के दर्शन के लिए व्याकुल हैं।

प्रश्न 5. मीरा ने किस पक्षी का उदाहरण दिया है और क्यों? [2020]

मीरा ने चातक पक्षी का उदाहरण दिया है। जैसे चातक केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद के लिए तरसता है, वैसे ही मीरा केवल कृष्ण के दर्शन के लिए तरस रही हैं।

प्रश्न 6. 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' में मीरा की क्या भावना है? [2019]

इस पंक्ति में मीरा की यह भावना है कि कृष्ण सदा उनकी आँखों में बसे रहें। वे चाहती हैं कि कृष्ण उनकी आँखों से कभी ओझल न हों।

प्रश्न 7. 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो' में मीरा ने किस धन की बात की है? [2021]

इसमें मीरा ने कृष्ण रूपी धन की बात की है। उन्हें कृष्ण रूपी रत्न मिल गया है, जो सबसे कीमती धन है।

प्रश्न 8. मीरा ने कृष्ण की प्राप्ति को जन्म-जन्म की पूँजी क्यों कहा है? [2018]

मीरा ने कृष्ण की प्राप्ति को जन्म-जन्म की पूँजी इसलिए कहा है क्योंकि यह धन स्थायी है, इसे कोई चुरा नहीं सकता और यह जन्मों के पुण्य से मिलता है।

प्रश्न 9. मीरा की भाषा शैली की क्या विशेषता है? [2020]

मीरा की भाषा राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। उनकी शैली सरल, सहज, भावप्रवण और संगीतमय है।

प्रश्न 10. मीरा के जीवन की प्रमुख घटनाएँ कौन-सी हैं? [2019]

मीरा के जीवन की प्रमुख घटनाएँ हैं - कम उम्र में पति की मृत्यु, कृष्ण भक्ति में लीन होना, समाज द्वारा विरोध, विष देने का प्रयास, और अंत में द्वारिका में कृष्ण मूर्ति में विलीन हो जाना।

6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)

प्रश्न 1. मीरा के पहले पद 'माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो' का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2020]

यह पद मीरा के विरह व्यथा और कृष्ण दर्शन की आकुलता को व्यक्त करता है:

1. दर्शन की आकुलता: मीरा अपनी सखी से कहती हैं कि वे उन्हें कृष्ण के दर्शन कराएँ। 'म्हाने हरि दरसन दीजो' की पुनरावृत्ति उनकी व्याकुलता को दर्शाती है।

2. विरह की पीड़ा: मीरा कहती हैं कि वे जन्म-जन्म से कृष्ण के विरह की आग में जल रही हैं। यह केवल इस जन्म की नहीं, अनेक जन्मों की पीड़ा है।

3. शरीर का क्षीण होना: कृष्ण के बिना उनका शरीर विरह की आग में तप रहा है और हर साँस के साथ क्षीण हो रहा है।

4. चातक का उदाहरण: मीरा ने चातक पक्षी का सुंदर उदाहरण दिया है। जैसे चातक केवल स्वाति नक्षत्र की बूँद के लिए तरसता है, उसी प्रकार मीरा केवल कृष्ण के दर्शन के लिए तरस रही हैं। उन्हें और कुछ नहीं चाहिए।

5. समर्पण भाव: पूरा पद मीरा के कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण को दर्शाता है। उनके लिए कृष्ण के दर्शन ही सब कुछ हैं।

इस प्रकार, यह पद मीरा की विरह व्यथा और कृष्ण के प्रति उनके गहन प्रेम को अभिव्यक्त करता है।

प्रश्न 2. 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' पद के माध्यम से मीरा ने क्या कहा है? [2019]

यह पद मीरा के कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम और समर्पण को व्यक्त करता है:

1. आँखों में बसने की प्रार्थना: मीरा कृष्ण से प्रार्थना करती हैं कि वे उनकी आँखों में बस जाएँ। वे चाहती हैं कि कृष्ण उनकी आँखों से कभी ओझल न हों।

2. कृष्ण के रूप का वर्णन: मीरा ने कृष्ण के रूप का वर्णन किया है - 'मोहन मूरति', 'साँवरि सूरति', 'गोपाल'। वे कृष्ण के साँवले रंग और मनमोहक रूप को अपनी आँखों में बसाना चाहती हैं।

3. एकनिष्ठ भक्ति: मीरा कहती हैं कि अब वे किसी और का ध्यान नहीं करेंगी। वे केवल कृष्ण के ध्यान में लीन हो गई हैं। 'अनत कहाँ को ध्यावौं' उनकी एकनिष्ठता को दर्शाता है।

4. आनंद की अनुभूति: कृष्ण के ध्यान में लीन होकर मीरा के हृदय में उल्लास उत्पन्न हो गया है। 'हियरे में हुलास उपज्यो' उनके आनंद की अनुभूति को व्यक्त करता है।

5. ब्रज के लाल: मीरा कृष्ण को 'ब्रज के लाल' कहकर संबोधित करती हैं, जो उनके आत्मीयता को दर्शाता है।

इस प्रकार, यह पद मीरा की कृष्ण के प्रति गहन भक्ति और समर्पण का सुंदर चित्रण है।

प्रश्न 3. 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो' पद में मीरा ने किस आनंद की अनुभूति की है? [2021]

यह पद मीरा के मिलन के आनंद को व्यक्त करता है:

1. कृष्ण रूपी धन की प्राप्ति: मीरा को कृष्ण रूपी रत्न धन मिल गया है। यह सबसे कीमती धन है, जिसकी तुलना किसी भौतिक धन से नहीं की जा सकती।

2. वर्षा ऋतु का सुंदर चित्रण: मीरा ने वर्षा ऋतु का सुंदर चित्रण किया है - 'वरषण के दिन', 'तरुन तमाल', 'बरसन लागो मेह'। इस सुंदर वातावरण में उन्हें कृष्ण की प्राप्ति हुई।

3. जन्म-जन्म की पूँजी: मीरा कृष्ण की प्राप्ति को जन्म-जन्म की पूँजी बताती हैं। यह धन स्थायी है, जन्मों के पुण्य से मिलता है, और इसे कोई चुरा नहीं सकता।

4. स्थायी धन: 'जाको कोई न चुराई' - यह धन ऐसा है जिसे कोई चुरा नहीं सकता। भौतिक धन चोरी हो सकता है, नष्ट हो सकता है, लेकिन कृष्ण की भक्ति का धन सदा स्थायी है।

5. आनंद की वृद्धि: कृष्ण की प्राप्ति ने मीरा के जीवन में सब प्रकार का आनंद बढ़ा दिया है। 'सब विधि आनंद बढ़ायो' उनकी पूर्ण तृप्ति और आनंद को व्यक्त करता है।

इस प्रकार, यह पद मीरा के मिलन के आनंद और परम तृप्ति की अनुभूति को व्यक्त करता है।

प्रश्न 4. मीरा के पदों में व्यक्त विरह व्यथा का वर्णन कीजिए। [2018]

मीरा के पदों में विरह व्यथा का अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलता है:

1. विरह की अग्नि: मीरा अपने विरह को 'बिरहानल' (विरह की आग) कहती हैं। यह आग उन्हें जन्म-जन्म से जला रही है। वे कहती हैं - 'जनम-जनम की बिरह जलतियाँ'।

2. शरीर का क्षीण होना: इस विरह की आग में उनका शरीर हर साँस के साथ क्षीण हो रहा है - 'सास-सास ह्वै छीजो'। वे दिन-रात इसी पीड़ा में जी रही हैं।

3. दर्शन की आकुलता: विरह के कारण उनमें कृष्ण के दर्शन की तीव्र आकुलता है। वे बार-बार सखी से दर्शन कराने की याचना करती हैं।

4. चातक का उदाहरण: मीरा ने चातक पक्षी का उदाहरण देकर अपनी विरह व्यथा को और गहरा किया है। जैसे चातक पानी की एक बूँद के लिए तरसता है, वैसे ही मीरा कृष्ण के एक दर्शन के लिए तरस रही हैं।

5. जन्मों का विरह: मीरा का विरह केवल इस जन्म का नहीं, बल्कि जन्म-जन्मान्तरों का है। यह उनके प्रेम की गहराई को दर्शाता है।

6. व्याकुलता की चरम सीमा: उनकी व्याकुलता इतनी अधिक है कि वे किसी भी प्रकार से कृष्ण के दर्शन चाहती हैं। 'तू मोहि दरसन दीजो' में यह व्याकुलता स्पष्ट है।

इस प्रकार, मीरा ने अपने पदों में विरह व्यथा का अत्यंत मार्मिक चित्रण किया है।

प्रश्न 5. मीरा के पदों में प्रकृति चित्रण का सौंदर्य स्पष्ट कीजिए। [2020]

मीरा के पदों में प्रकृति चित्रण का सुंदर सौंदर्य देखने को मिलता है:

1. वर्षा ऋतु का चित्रण: तीसरे पद में मीरा ने वर्षा ऋतु का सुंदर चित्रण किया है - 'वरषण के दिन थे तरुन तमाल, बरसन लागो मेह पायो'। वर्षा के दिन, तरुण तमाल के पेड़, बरसते बादल - यह सब एक सुंदर परिदृश्य रचते हैं।

2. चातक पक्षी का चित्रण: पहले पद में मीरा ने चातक पक्षी का चित्रण किया है - 'जल बूँद ज्यों चातक ताकौं'। चातक पक्षी की जल बूँद के लिए ताक-झाँक का चित्र अत्यंत सजीव है।

3. प्रकृति और भावनाओं का सहचर्य: मीरा ने प्रकृति के चित्रों को अपनी भावनाओं से जोड़ा है। चातक की जल बूँद के लिए ताक-झाँक उनके कृष्ण दर्शन की ताक-झाँक का प्रतीक है।

4. साँवले रूप का चित्रण: दूसरे पद में उन्होंने कृष्ण के साँवले रूप का चित्रण किया है - 'साँवरि सूरति'। यह साँवलापन प्रकृति के रंगों से जुड़ता है।

5. भावपूर्ण प्रकृति चित्रण: मीरा का प्रकृति चित्रण केवल बाहरी नहीं, बल्कि भावपूर्ण है। उनकी भावनाएँ प्रकृति के चित्रों में झलकती हैं।

6. संगीतमयता: उनके प्रकृति चित्रण में एक संगीतमयता है, जो पदों को और भी सुंदर बना देती है।

इस प्रकार, मीरा के पदों में प्रकृति चित्रण का सुंदर सौंदर्य देखने को मिलता है।

प्रश्न 6. मीरा की भक्ति भावना की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। [2019]

मीरा की भक्ति भावना की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. दांपत्य प्रेम का रूप: मीरा की भक्ति में दांपत्य प्रेम की झलक है। वे कृष्ण को अपना पति मानती हैं। उनका प्रेम पत्नी का पति के प्रति प्रेम है।

2. विरह व्यथा: मीरा की भक्ति का प्रमुख स्वर विरह का है। वे कृष्ण के वियोग में व्याकुल रहती हैं और उनके दर्शन के लिए तरसती हैं।

3. समर्पण भाव: मीरा का कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण है। वे उनके लिए सब कुछ त्याग देती हैं। 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' उनके समर्पण को दर्शाता है।

4. एकनिष्ठता: मीरा की भक्ति एकनिष्ठ है। उनके लिए कृष्ण के अलावा और कोई नहीं। 'अनत कहाँ को ध्यावौं' उनकी एकनिष्ठता को दर्शाता है।

5. मिलन का आनंद: विरह के साथ-साथ मीरा मिलन के आनंद का भी वर्णन करती हैं। 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो' में यह आनंद स्पष्ट है।

6. निर्भीकता: मीरा की भक्ति में निर्भीकता है। वे समाज के तिरस्कार और विरोध की परवाह नहीं करतीं, केवल कृष्ण में लीन रहती हैं।

7. सहजता और सरलता: मीरा की भक्ति में किसी प्रकार की जटिलता नहीं। यह सहज और सरल है - बस कृष्ण के प्रति प्रेम।

इस प्रकार, मीरा की भक्ति भावना प्रेम, समर्पण और विरह की अद्भुत संगम है।

प्रश्न 7. मीरा ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को किन-किन रूपों में अभिव्यक्त किया है? [2021]

मीरा ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को अनेक रूपों में अभिव्यक्त किया है:

1. विरह के रूप में: मीरा का प्रेम विरह के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। वे कृष्ण के वियोग में जलती हैं, तड़पती हैं - 'जनम-जनम की बिरह जलतियाँ'।

2. दर्शन की आकुलता के रूप में: उनका प्रेम कृष्ण के दर्शन की आकुलता में प्रकट होता है। वे बार-बार सखी से दर्शन कराने की याचना करती हैं।

3. आँखों में बसाने की इच्छा के रूप में: मीरा कृष्ण को अपनी आँखों में बसाना चाहती हैं - 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल'। यह उनके प्रेम की गहनता को दर्शाता है।

4. ध्यान के रूप में: मीरा का प्रेम ध्यान के रूप में अभिव्यक्त होता है। वे कृष्ण के ध्यान में लीन रहती हैं - 'ध्यान लीन लौ लीनो'।

5. मिलन के आनंद के रूप में: जब कृष्ण मिलते हैं, तो मीरा का प्रेम आनंद के रूप में अभिव्यक्त होता है - 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो'।

6. चातक के उदाहरण में: चातक पक्षी के उदाहरण में उनका प्रेम एकनिष्ठ और आतुर रूप में अभिव्यक्त हुआ है।

7. समर्पण के रूप में: मीरा का प्रेम पूर्ण समर्पण के रूप में अभिव्यक्त होता है। वे अपना सब कुछ कृष्ण पर न्योछावर कर देती हैं।

इस प्रकार, मीरा ने अपने प्रेम को अनेक मार्मिक रूपों में अभिव्यक्त किया है।

प्रश्न 8. मीरा के पदों की भाषा और शैली पर प्रकाश डालिए। [2018]

मीरा के पदों की भाषा और शैली निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त है:

भाषा:
1. मिश्रित भाषा: मीरा की भाषा राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का सुंदर मिश्रण है। इसमें 'म्हाने', 'ताकौं', 'पायो' जैसे शब्द राजस्थानी के हैं।
2. सरलता: उनकी भाषा सरल और सहज है, जो जन-साधारण की भाषा थी।
3. प्रवाहपूर्णता: उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है।
4. भावानुकूल भाषा: उनकी भाषा भावों के अनुकूल है - विरह में करुण, मिलन में आनंदमय।

शैली:
1. पद शैली: मीरा ने गेय पद शैली का प्रयोग किया है। उनके पद गाए जाने के लिए हैं।
2. संगीतमयता: उनकी शैली में संगीतात्मकता है। इसमें लय, ताल और गेयता है।
3. उदाहरणों का प्रयोग: उन्होंने चातक, बादल, तमाल जैसे उदाहरणों का सुंदर प्रयोग किया है।
4. दोहा और पद का प्रयोग: उन्होंने मुख्यतः पद शैली का प्रयोग किया है।
5. भावप्रवणता: उनकी शैली भावप्रवण है - भावनाएँ शब्दों में झलकती हैं।
6. स्वगत कथन शैली: कहीं-कहीं उन्होंने स्वगत कथन शैली का प्रयोग किया है।
7. प्रार्थना शैली: कई पदों में प्रार्थना शैली है - 'बसो मोरे नैनन में'।

इस प्रकार, मीरा की भाषा और शैली उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है।

प्रश्न 9. मीरा के पदों में प्रयुक्त प्रतीकों और उदाहरणों का उल्लेख कीजिए। [2020]

मीरा के पदों में अनेक सुंदर प्रतीकों और उदाहरणों का प्रयोग हुआ है:

प्रतीक:
1. चातक का प्रतीक: चातक पक्षी उनके विरह और कृष्ण दर्शन की आकुलता का प्रतीक है। जैसे चातक केवल स्वाति की बूँद के लिए तरसता है, वैसे ही मीरा केवल कृष्ण के दर्शन के लिए तरसती हैं।
2. बिरहानल का प्रतीक: विरह को आग के रूप में प्रस्तुत किया गया है - 'बिरहानल'। यह उनकी पीड़ा की तीव्रता को दर्शाता है।
3. रतन धन का प्रतीक: कृष्ण को रतन धन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह उनके कीमती होने और स्थायित्व को दर्शाता है।
4. नैनों का प्रतीक: नैन (आँखें) उनके प्रेम और समर्पण का प्रतीक हैं। वे कृष्ण को अपनी आँखों में बसाना चाहती हैं।

उदाहरण:
1. चातक का उदाहरण: 'जल बूँद ज्यों चातक ताकौं' - जल बूँद के लिए चातक की ताक-झाँक का उदाहरण।
2. वर्षा ऋतु का उदाहरण: 'वरषण के दिन थे तरुन तमाल' - वर्षा ऋतु और तमाल के पेड़ों का उदाहरण।
3. बादल का उदाहरण: 'बरसन लागो मेह' - बरसते बादल का उदाहरण।

इन प्रतीकों और उदाहरणों ने मीरा के पदों को और अधिक प्रभावशाली और सजीव बना दिया है।

प्रश्न 10. मीरा के पदों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। [2019]

मीरा के पद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं:

1. प्रेम की अमरता: मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम सच्चे प्रेम का आदर्श है। आज भी सच्चा प्रेम उसी तरह व्याकुल करता है, उसी तरह तड़पाता है।

2. समर्पण की प्रेरणा: मीरा का पूर्ण समर्पण हमें किसी भी कार्य में पूर्ण समर्पण की प्रेरणा देता है। चाहे वह भक्ति हो, प्रेम हो या कोई अन्य कार्य।

3. विरह की अनुभूति: विरह की पीड़ा मानवीय अनुभूति है। आज भी लोग अपने प्रियजनों के वियोग में उसी तरह तड़पते हैं।

4. सामाजिक बंधनों की अवहेलना: मीरा ने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों की परवाह नहीं की। यह आज की महिलाओं को साहस और स्वतंत्रता की प्रेरणा देता है।

5. आध्यात्मिक मार्गदर्शन: मीरा के पद आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रेम है।

6. संगीतमयता: मीरा के पद आज भी गाए जाते हैं। उनकी संगीतमयता उन्हें सदाबहार बनाती है।

7. महिला सशक्तीकरण: मीरा का जीवन महिला सशक्तीकरण का प्रतीक है। उन्होंने अपनी इच्छा से जीवन जीया और समाज के सामने झुकने से इनकार कर दिया।

इस प्रकार, मीरा के पद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं और हमें जीवन जीने की सही राह दिखाते हैं।

7. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय

  • कवयित्री परिचय: मीरा का जीवन, रचनाएँ, भक्ति भावना [2020]
  • पदों की व्याख्या: तीनों पदों का भावार्थ [2018, 2019, 2020, 2021]
  • विरह व्यथा: 'माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो' पद [2020]
  • समर्पण भाव: 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' पद [2019]
  • मिलन का आनंद: 'पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो' पद [2021]
  • प्रकृति चित्रण: मीरा के पदों में प्रकृति का सौंदर्य [2020]
  • भक्ति भावना: मीरा की भक्ति की विशेषताएँ [2019]
  • प्रतीक और उदाहरण: चातक, रतन धन, बिरहानल [2020]
  • भाषा शैली: मीरा की भाषा और शैली की विशेषताएँ [2018]
  • प्रासंगिकता: आज के समय में मीरा की प्रासंगिकता [2019]

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवयित्री: मीराबाई (1498-1546), मेवाड़, राजस्थान
  • भक्ति शाखा: कृष्ण भक्ति शाखा
  • रचनाएँ: मीरा की पदावली, गीत गोविंद टीका
  • भाषा: राजस्थानी, ब्रज, गुजराती मिश्रित
  • मुख्य विषय: कृष्ण प्रेम, विरह व्यथा, समर्पण, मिलन आनंद
  • प्रमुख प्रतीक: चातक, बिरहानल, रतन धन

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"माई री, म्हाने हरि दरसन दीजो।"

"बसो मोरे नैनन में नंदलाल।"

"पायो जी म्हारे राम रतन धन पायो।"

"जल बूँद ज्यों चातक ताकौं।"

8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न

टिप्स: सीधा और सटीक उत्तर दें। केवल मुख्य बिंदु लिखें। 2-3 वाक्यों में उत्तर पूरा करें।

उदाहरण: प्रश्न: मीरा का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: मीरा का जन्म राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र के कुड़की गाँव में हुआ था।

📝 4-5 अंक प्रश्न

टिप्स: उत्तर को तीन भागों में बाँटें - परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष। पद की व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें।

उदाहरण: प्रश्न: 'बसो मोरे नैनन में नंदलाल' पद का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: [जैसा ऊपर दीर्घ प्रश्न 2 में दिया गया है]

9. हब लिंक



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