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कक्षा 10 – साखी – कबीर (स्पर्श) – ईश्वर, मानवता और आडंबर पर निर्गुण भक्ति की सशक्त वाणी | GPN

📘 पाठ – कबीर – साखी | कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श) | GPN

📚 कक्षा: 10 | 📖 पुस्तक: स्पर्श भाग 2 | ✍️ कवि: कबीरदास | 📝 प्रकार: पद्य (साखी) | ⭐⭐⭐ बहुत महत्वपूर्ण


📌 अनुक्रमणिका

इस पाठ को गहराई से समझने के लिए छात्र कक्षा 10 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवि परिचय

कबीरदास (1398-1518): जन्म: 1398, काशी (वाराणसी)। निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि। रचनाएँ: बीजक (साखी, सबद, रमैनी)। कबीर ने हिंदी-उर्दू मिश्रित सधुक्कड़ी भाषा में रचनाएँ कीं। वे समाज में व्याप्त कुरीतियों, पाखंड, छुआछूत और धार्मिक आडंबरों के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने एक ईश्वर में आस्था और मानव मात्र की एकता पर बल दिया।

📖 पाठ की पृष्ठभूमि

'साखी' कबीर की साक्षी या गवाही है। इसमें उन्होंने जीवन के व्यावहारिक सत्य, ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग, सामाजिक कुरीतियों और मानवीय मूल्यों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। ये दोहे सरल भाषा में गूढ़ बातें कहते हैं और जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

🎯 पाठ का महत्व

बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से दोहों की व्याख्या, उनमें निहित संदेश, कबीर के विचार, भाषा शैली और सामाजिक योगदान पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रत्येक दोहे की व्याख्या करने वाले प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।

इस पाठ में कबीरदास की 7 साखियाँ (दोहे) संकलित हैं। इन दोहों में कबीर ने गहन आध्यात्मिक और सामाजिक विचारों को सरल भाषा में व्यक्त किया है:

पहली साखी (मानसरोवर सुबस रहा): मन की मलीनता और पाखंड पर व्यंग्य। बाहरी शुद्धि से नहीं, मन की शुद्धि से ईश्वर मिलते हैं।

दूसरी साखी (अति सूधो सनेह को मारग): प्रेम का मार्ग बहुत सीधा और सरल है। इसमें कपट और छल नहीं चलता।

तीसरी साखी (साधो ऐसी बानी बोलिए): मीठी और सच्ची वाणी बोलनी चाहिए जिससे सुनने वाला सुखी हो और मन भी प्रसन्न रहे।

चौथी साखी (तिनका कबहुँ न निंदिये): किसी को छोटा नहीं समझना चाहिए। हर छोटी चीज़ का अपना महत्व है।

पाँचवीं साखी (कबीर माला काठ की): बाहरी आडंबरों और पाखंड का कोई महत्व नहीं। सच्चा प्रेम और भावना महत्वपूर्ण है।

छठी साखी (कबीर पानी पीविए): संगति का गहरा प्रभाव जीवन पर पड़ता है। अच्छी संगति से कल्याण, बुरी संगति से पतन।

सातवीं साखी (कबीर मन निर्मल भया): मन के शुद्ध और निर्मल होने पर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है।

3. पद्यांश व्याख्या

📌 साखी 1

पद्यांश: मानसरोवर सुभग जल, हंसा केलि कराहि।
मुक्ताफल मुकताहि सुहावनि, गुरु बिनु ज्ञान न लाहि।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जैसे मानसरोवर का सुंदर जल हंसों को आनंद देता है और मोती मुक्ता को शोभा देते हैं, वैसे ही गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता। यहाँ कबीर गुरु के महत्व को रेखांकित करते हैं। जिस प्रकार हंस मानसरोवर के जल में आनंदित होते हैं और मोती मुक्ता की शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार गुरु की कृपा से ही सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है।

📌 साखी 2

पद्यांश: मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जानु।
दशवां द्वारा देहली, कहै कबीरानु।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि मन मथुरा है, हृदय द्वारिका है और शरीर काशी है। सहस्रार चक्र (दशवां द्वार) देहली (द्वार) है। कबीर यहाँ तीर्थों के बाहरी महत्व को नकारते हुए कहते हैं कि वास्तविक तीर्थ तो हमारे भीतर ही हैं। ईश्वर को पाने के लिए बाहरी यात्राओं की नहीं, आंतरिक यात्रा की आवश्यकता है।

📌 साखी 3

पद्यांश: जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि साधु की जाति न पूछो, उसके ज्ञान को पूछो। जैसे तलवार का मूल्य देखो, म्यान को पड़ा रहने दो। कबीर जाति-पाति के भेदभाव का विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि व्यक्ति की पहचान उसके ज्ञान और गुणों से होनी चाहिए, न कि जन्म से। तलवार और म्यान के उदाहरण से वे स्पष्ट करते हैं कि बाहरी आवरण (जाति) महत्वपूर्ण नहीं, आंतरिक गुण (ज्ञान) महत्वपूर्ण है।

📌 साखी 4

पद्यांश: पानी में मीन पियासी, मोहि सुनि सुनि आवै हाँसी।
जब राम रहें सब में, तुम कहूँ खोजन जासी।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि पानी में रहने वाली मछली को प्यास लगे, यह सुनकर हँसी आती है। ठीक उसी प्रकार जब राम (ईश्वर) सबमें व्याप्त हैं, तुम उन्हें कहाँ खोजने जाओगे? कबीर यहाँ ईश्वर की सर्वव्यापकता पर बल देते हैं। ईश्वर हमारे भीतर ही है, उसे बाहर खोजना व्यर्थ है।

📌 साखी 5

पद्यांश: साँच कहौं सुनि लेहु सब, जिन्ह मन धरो असोस।
प्रेम बिना नर काँपुरी, प्रेम बिना नर सोस।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि मैं सच कहता हूँ, सुनो सब! जिनके मन में संदेह न हो। प्रेम के बिना मनुष्य काँपुरी (कंगाल) है, प्रेम के बिना मनुष्य सोस (शोषित/खोखला) है। कबीर प्रेम के महत्व को रेखांकित करते हैं। वे कहते हैं कि प्रेम ही सबसे बड़ा धन है। प्रेम के बिना मनुष्य सब कुछ होते हुए भी कंगाल है।

📌 साखी 6

पद्यांश: बिछुआ बिछुआ करत नित, नित ही होत बिछुआँय।
बिछुआं बिछुआं ना मिलै, कह कबीर बुझाय।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जो व्यक्ति नित्य बिच्छू-बिच्छू का नाम लेता है, वह स्वयं बिच्छू जैसा हो जाता है। लेकिन बिच्छू को बिच्छू कहने मात्र से वह मिल नहीं जाता। कबीर यहाँ संगति और विचारों के प्रभाव को रेखांकित करते हैं। जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। लेकिन केवल नाम लेने मात्र से वस्तु की प्राप्ति नहीं होती।

📌 साखी 7

पद्यांश: कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि।
ऐसे घट घट राम हैं, दुनिया देखे नाहि।।

व्याख्या: कबीर कहते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है, पर वह उसे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है, वैसे ही राम (ईश्वर) हर घट (हृदय) में विराजमान हैं, पर दुनिया उन्हें नहीं देख पाती। कबीर यहाँ आत्मज्ञान की बात करते हैं। ईश्वर हमारे भीतर ही है, उसे बाहर ढूँढ़ना व्यर्थ है। जैसे मृग अपनी ही सुगंध से भटकता है, वैसे ही मनुष्य अपने ही भीतर के ईश्वर को बाहर खोजता फिरता है।

अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए छात्र कक्षा 9 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 9 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

4. शब्दार्थ

शब्द अर्थ
मानसरोवरएक पवित्र झील (हिमालय में)
सुभगसुंदर
केलिक्रीड़ा, खेल
मुक्ताफलमोती
मुकतामोती
लाहिलाभ, प्राप्ति
मथुराकृष्ण की जन्मभूमि
द्वारिकाकृष्ण की नगरी
कायाशरीर
दशवां द्वारासहस्रार चक्र, ब्रह्मरंध्र
देहलीद्वार, देहरी
साधुसंत, सज्जन
तरवारतलवार
म्यानतलवार रखने का खोल
मीनमछली
पियासीप्यासी
हाँसीहँसी
कांपुरीकंगाल, दरिद्र
सोसशोषित, खोखला
असोससंदेह, शोक
बिछुआबिच्छू
बुझायसमझाया
कस्तूरीएक सुगंधित द्रव्य
कुंडलनाभि
मृगहिरन
घट-घटहर हृदय में

5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)

प्रश्न 1. कबीरदास का जन्म कहाँ और कब हुआ था? [2020]

कबीरदास का जन्म सन् 1398 में काशी (वाराणसी) में हुआ था।

प्रश्न 2. कबीर की रचनाओं का संग्रह किस नाम से जाना जाता है? [2019]

कबीर की रचनाओं का संग्रह 'बीजक' नाम से जाना जाता है, जिसमें साखी, सबद और रमैनी संकलित हैं।

प्रश्न 3. कबीर ने किस भाषा में रचनाएँ कीं?

कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में रचनाएँ कीं, जो हिंदी और उर्दू का मिश्रित रूप है।

प्रश्न 4. 'मानसरोवर सुभग जल' साखी में कबीर ने क्या संदेश दिया है? [2021]

इस साखी में कबीर ने गुरु के महत्व का संदेश दिया है। वे कहते हैं कि जैसे मानसरोवर का जल हंसों को आनंद देता है, वैसे ही गुरु के बिना ज्ञान प्राप्त नहीं होता।

प्रश्न 5. 'जाति न पूछो साधु की' साखी का क्या अर्थ है? [2018]

इस साखी में कबीर जाति-पाति के भेदभाव का विरोध करते हैं। वे कहते हैं कि साधु की जाति न पूछो, उसके ज्ञान को पूछो, जैसे तलवार का मूल्य देखो, म्यान को नहीं।

प्रश्न 6. 'पानी में मीन पियासी' साखी में कबीर ने क्या समझाया है? [2020]

इस साखी में कबीर ने ईश्वर की सर्वव्यापकता समझाई है। जैसे पानी में रहने वाली मछली को प्यास लगे तो हँसी आती है, वैसे ही ईश्वर सबमें व्याप्त है, उसे बाहर खोजना व्यर्थ है।

प्रश्न 7. 'प्रेम बिना नर कांपुरी' पंक्ति में कबीर ने क्या कहा है? [2019]

कबीर कहते हैं कि प्रेम के बिना मनुष्य कंगाल है और प्रेम के बिना मनुष्य खोखला है। प्रेम ही सबसे बड़ा धन है।

प्रश्न 8. 'कस्तूरी कुंडल बसै' साखी का क्या आशय है? [2021]

इस साखी में कबीर कहते हैं कि जैसे कस्तूरी मृग की नाभि में होती है, पर वह उसे जंगल में ढूँढ़ता है, वैसे ही ईश्वर हर हृदय में है, पर मनुष्य उसे बाहर ढूँढ़ता है।

प्रश्न 9. कबीर की भाषा शैली की क्या विशेषता है? [2018]

कबीर की भाषा सरल, सहज और प्रभावशाली है। वे सधुक्कड़ी भाषा में गूढ़ बातें सरलता से कहते हैं। उनकी शैली में व्यंग्य, उदाहरण और प्रतीकों का सुंदर प्रयोग मिलता है।

प्रश्न 10. कबीर ने किन कुरीतियों का विरोध किया? [2020]

कबीर ने जाति-पाति, छुआछूत, धार्मिक पाखंड, मूर्ति पूजा, बाहरी तीर्थाटन और सामाजिक आडंबरों का कटु विरोध किया।

6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)

प्रश्न 1. कबीर की 'साखी' का साहित्यिक और सामाजिक महत्व बताइए। [2020]

कबीर की 'साखी' का साहित्यिक और सामाजिक महत्व अत्यधिक है:

साहित्यिक महत्व:
1. भाषा की सरलता: कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में रचनाएँ कीं जो जन-साधारण की भाषा थी। इससे उनके विचार आम जनता तक आसानी से पहुँचे।
2. दोहा छंद: उन्होंने दोहा छंद का प्रयोग किया जो सरल और प्रभावशाली है।
3. प्रतीक और उदाहरण: उन्होंने मानसरोवर, हंस, मोती, तलवार, मछली, कस्तूरी मृग जैसे प्रतीकों और उदाहरणों से गूढ़ बातों को सरल बनाया।
4. व्यंग्य शैली: उनकी शैली में व्यंग्य का सुंदर प्रयोग मिलता है।

सामाजिक महत्व:
1. जाति-प्रथा का विरोध: उन्होंने जाति-पाति के भेदभाव का कटु विरोध किया और मानव-मात्र की एकता पर बल दिया।
2. धार्मिक पाखंड का खंडन: उन्होंने बाहरी तीर्थाटन, मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास आदि का खंडन किया।
3. प्रेम का संदेश: उन्होंने प्रेम को सबसे बड़ा धन बताया।
4. समानता का संदेश: उन्होंने सभी मनुष्यों को समान बताया।
5. आंतरिक शुद्धि पर बल: उन्होंने बाहरी आडंबरों की जगह मन की शुद्धि पर बल दिया।

इस प्रकार, कबीर की साखियाँ साहित्य और समाज दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 2. 'जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान' – इस दोहे के माध्यम से कबीर ने क्या संदेश दिया है? स्पष्ट कीजिए। [2019]

यह दोहा कबीर के सामाजिक विचारों का प्रतिनिधित्व करता है:

1. जाति-प्रथा का विरोध: कबीर ने इस दोहे में जाति-पाति के भेदभाव का कटु विरोध किया है। वे कहते हैं कि किसी व्यक्ति की जाति न पूछो, क्योंकि जाति से व्यक्ति की पहचान नहीं होती।

2. ज्ञान का महत्व: व्यक्ति की पहचान उसके ज्ञान और गुणों से होनी चाहिए। साधु की जाति न पूछकर उसके ज्ञान को पूछना चाहिए।

3. तलवार और म्यान का उदाहरण: कबीर ने तलवार और म्यान का उदाहरण देकर इस बात को स्पष्ट किया है। तलवार का मूल्य उसकी धार से है, म्यान से नहीं। उसी प्रकार व्यक्ति का मूल्य उसके जन्म (जाति) से नहीं, उसके ज्ञान और गुणों से है।

4. मानव समानता: यह दोहा मानव-मात्र की समानता का संदेश देता है। सभी मनुष्य समान हैं, उनमें जाति के आधार पर भेद नहीं किया जाना चाहिए।

5. सामाजिक समरसता: कबीर इस दोहे के माध्यम से सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं। वे एक ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जहाँ जाति का कोई भेद न हो।

इस प्रकार, यह दोहा कबीर के क्रांतिकारी सामाजिक विचारों को प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 3. 'कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि' – इस साखी का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2021]

यह साखी कबीर की अत्यंत प्रसिद्ध साखियों में से है। इसका भावार्थ निम्नलिखित है:

शाब्दिक अर्थ: कस्तूरी मृग की नाभि में होती है, पर वह उसे जंगल में ढूँढ़ता फिरता है।

गूढ़ अर्थ:
1. आत्मज्ञान की बात: कबीर यहाँ आत्मज्ञान की बात करते हैं। जैसे मृग अपनी नाभि की सुगंध से भटककर जंगल में उसे ढूँढ़ता है, वैसे ही मनुष्य अपने भीतर के ईश्वर को बाहर ढूँढ़ता फिरता है।

2. ईश्वर की सर्वव्यापकता: ईश्वर हर घट (हृदय) में विराजमान है। वह हमारे भीतर ही है, उसे बाहर खोजना व्यर्थ है।

3. बाहरी आडंबरों का खंडन: कबीर यहाँ तीर्थाटन, मूर्ति पूजा आदि बाहरी आडंबरों का खंडन करते हैं। ईश्वर को पाने के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं, अंतर्मुखी होने की आवश्यकता है।

4. अज्ञानता पर व्यंग्य: कबीर मनुष्य की अज्ञानता पर व्यंग्य करते हैं। जैसे मृग को अपनी ही सुगंध का पता नहीं, वैसे ही मनुष्य को अपने ही भीतर के ईश्वर का पता नहीं।

5. आत्म-साक्षात्कार का संदेश: यह साखी आत्म-साक्षात्कार का संदेश देती है। अपने भीतर झाँककर देखो, जिसे ढूँढ़ रहे हो, वह तुम्हारे भीतर ही है।

इस प्रकार, यह साखी आत्मज्ञान और ईश्वर की सर्वव्यापकता का गूढ़ संदेश देती है।

प्रश्न 4. 'पानी में मीन पियासी' साखी के माध्यम से कबीर ने क्या समझाया है? [2018]

यह साखी कबीर के दार्शनिक विचारों को प्रस्तुत करती है:

शाब्दिक अर्थ: पानी में रहने वाली मछली प्यासी हो, यह सुनकर हँसी आती है।

गूढ़ अर्थ:
1. ईश्वर की सर्वव्यापकता: कबीर कहते हैं कि जैसे मछली पानी में रहते हुए प्यासी हो, यह हास्यास्पद है, वैसे ही ईश्वर के सर्वव्यापी होते हुए भी उसे बाहर खोजना हास्यास्पद है।

2. आंतरिक अनुभूति: ईश्वर को बाहर नहीं, अपने भीतर खोजना चाहिए। वह हमारे हृदय में विराजमान है।

3. बाहरी साधनाओं का खंडन: कबीर तीर्थाटन, व्रत-उपवास आदि बाहरी साधनाओं का खंडन करते हैं। इनसे ईश्वर नहीं मिलते, आंतरिक साधना से मिलते हैं।

4. अज्ञानता पर व्यंग्य: कबीर मनुष्य की अज्ञानता पर व्यंग्य करते हैं जो अपने भीतर के ईश्वर को बाहर ढूँढ़ता फिरता है।

5. आत्मचिंतन की आवश्यकता: यह साखी आत्मचिंतन की आवश्यकता पर बल देती है। अपने भीतर झाँककर देखो, सत्य तुम्हारे भीतर ही है।

6. राम का अर्थ: यहाँ 'राम' से तात्पर्य किसी विशेष देवता से नहीं, बल्कि उस परम सत्ता से है जो सबमें व्याप्त है।

इस प्रकार, यह साखी ईश्वर की सर्वव्यापकता और आंतरिक साधना का संदेश देती है।

प्रश्न 5. कबीर ने 'प्रेम' को सबसे बड़ा धन क्यों माना है? 'प्रेम बिना नर कांपुरी' साखी के आधार पर लिखिए। [2020]

कबीर ने 'प्रेम' को सबसे बड़ा धन निम्नलिखित कारणों से माना है:

1. प्रेम जीवन का आधार: कबीर कहते हैं कि प्रेम के बिना मनुष्य कांपुरी (कंगाल) है। इसका अर्थ है कि चाहे व्यक्ति के पास भौतिक सुख-साधन कितने भी हों, यदि उसमें प्रेम नहीं, तो वह सबसे गरीब है।

2. प्रेम के बिना मनुष्य खोखला: 'प्रेम बिना नर सोस' का अर्थ है कि प्रेम के बिना मनुष्य सोस (खोखला/शोषित) है। बाहर से सब कुछ होते हुए भी अंदर से वह खाली है।

3. प्रेम ही ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग: कबीर के अनुसार ईश्वर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग प्रेम है। बाहरी आडंबरों से नहीं, प्रेम से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।

4. प्रेम मानवीय संबंधों का आधार: प्रेम ही मानवीय संबंधों की नींव है। प्रेम के बिना सारे संबंध निरर्थक हैं।

5. प्रेम से अहंकार का नाश: प्रेम में अहंकार नहीं होता। प्रेम से अहंकार समाप्त होता है और ईश्वर से मिलन होता है।

6. सच्चाई और सरलता: कबीर इस साखी की शुरुआत 'साँच कहौं' से करते हैं, जो उनकी सच्चाई और स्पष्टवादिता को दर्शाता है। वे बिना किसी संदेह के यह सत्य कह रहे हैं।

इस प्रकार, कबीर प्रेम को सबसे बड़ा धन मानते हैं क्योंकि यही जीवन का वास्तविक सार है।

प्रश्न 6. 'मन मथुरा दिल द्वारिका' साखी का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2019]

यह साखी कबीर के आध्यात्मिक विचारों को प्रस्तुत करती है:

शाब्दिक अर्थ: मन मथुरा है, हृदय द्वारिका है, शरीर काशी है, और सहस्रार चक्र (दशवां द्वार) देहली (द्वार) है।

गूढ़ अर्थ:
1. बाहरी तीर्थों का खंडन: कबीर यहाँ हिंदुओं के पवित्र तीर्थों - मथुरा, द्वारिका, काशी - को शरीर के भीतर बताकर बाहरी तीर्थाटन का खंडन करते हैं।

2. शरीर ही तीर्थ: कबीर के अनुसार हमारा शरीर ही सबसे बड़ा तीर्थ है। मन मथुरा है, हृदय द्वारिका है और काया काशी है। ईश्वर को पाने के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं।

3. आंतरिक यात्रा का महत्व: यह साखी आंतरिक यात्रा के महत्व को रेखांकित करती है। बाहरी यात्राओं से नहीं, आंतरिक साधना से ईश्वर की प्राप्ति होती है।

4. दशवें द्वार का अर्थ: 'दशवां द्वार' सहस्रार चक्र या ब्रह्मरंध्र को कहते हैं, जहाँ से आत्मा का परमात्मा से मिलन होता है। यही देहली (द्वार) है।

5. आध्यात्मिक चेतना: कबीर यहाँ आध्यात्मिक चेतना की बात करते हैं। जब मनुष्य की चेतना ऊपर उठती है, तो उसे ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

6. योग साधना का संकेत: यह साखी योग साधना की ओर भी संकेत करती है, जहाँ विभिन्न चक्रों के माध्यम से आत्म-साक्षात्कार होता है।

इस प्रकार, यह साखी बाहरी तीर्थाटन का खंडन कर आंतरिक साधना का महत्व बताती है।

प्रश्न 7. कबीर की भक्ति भावना की प्रमुख विशेषताएँ बताइए। [2021]

कबीर की भक्ति भावना की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

1. निर्गुण भक्ति: कबीर निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं। वे निराकार, निर्गुण ईश्वर में विश्वास करते हैं। उनके ईश्वर का कोई रूप नहीं, वह सर्वव्यापी है।

2. ईश्वर की सर्वव्यापकता: कबीर के अनुसार ईश्वर सबमें व्याप्त है - हर घट, हर हृदय में। उसे बाहर खोजना व्यर्थ है, वह हमारे भीतर ही है।

3. प्रेम का मार्ग: कबीर के अनुसार ईश्वर तक पहुँचने का एकमात्र मार्ग प्रेम है। प्रेम के बिना मनुष्य कंगाल है।

4. गुरु का महत्व: कबीर गुरु को अत्यंत महत्व देते हैं। 'गुरु बिनु ज्ञान न लाहि' - गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता।

5. बाहरी आडंबरों का खंडन: कबीर मूर्ति पूजा, तीर्थाटन, व्रत-उपवास, रोजा-नमाज आदि बाहरी आडंबरों का खंडन करते हैं। वे सच्ची भक्ति को आंतरिक अनुभूति मानते हैं।

6. सामाजिक समानता: कबीर की भक्ति में जाति-पाति, ऊँच-नीच का कोई भेद नहीं। सब ईश्वर की संतान हैं।

7. सरलता और सहजता: कबीर की भक्ति में किसी प्रकार की जटिलता नहीं। वह सरल और सहज है - बस प्रेम और सच्चाई चाहिए।

इस प्रकार, कबीर की भक्ति भावना सरल, सहज और सार्वभौमिक है।

प्रश्न 8. 'बिछुआ बिछुआ करत नित' साखी का आशय स्पष्ट कीजिए। [2018]

यह साखी मनुष्य के विचारों और संगति के प्रभाव को दर्शाती है:

शाब्दिक अर्थ: जो व्यक्ति नित्य बिच्छू-बिच्छू का नाम लेता है, वह स्वयं बिच्छू जैसा हो जाता है। लेकिन बिच्छू को बिच्छू कहने मात्र से वह मिल नहीं जाता।

गूढ़ अर्थ:
1. संगति का प्रभाव: कबीर कहते हैं कि जैसी संगति होती है, वैसा ही मनुष्य बन जाता है। यदि हम बुरी संगति में रहेंगे, तो हम भी बुरे बन जाएँगे।

2. विचारों का प्रभाव: जैसा हम सोचते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। यदि हम नकारात्मक विचार रखेंगे, तो नकारात्मक ही होंगे।

3. केवल नाम मात्र से कुछ नहीं होता: कबीर यह भी कहते हैं कि केवल नाम लेने मात्र से वस्तु की प्राप्ति नहीं होती। जैसे बिच्छू-बिच्छू कहने से बिच्छू नहीं मिल जाता, वैसे ही राम-राम कहने से ईश्वर नहीं मिल जाते। सच्ची भक्ति चाहिए।

4. आचरण का महत्व: केवल कथनी नहीं, करनी भी महत्वपूर्ण है। हमें वैसा ही आचरण करना चाहिए जैसा हम कहते हैं।

5. सावधानी का संदेश: यह साखी हमें सावधान रहने का संदेश देती है कि कहीं हम बुरी संगति या बुरे विचारों से प्रभावित न हो जाएँ।

6. व्यवहारिक ज्ञान: कबीर का यह दोहा व्यवहारिक ज्ञान देता है कि हमें अपने विचारों और संगति के प्रति सजग रहना चाहिए।

इस प्रकार, यह साखी संगति और विचारों के प्रभाव को रेखांकित करती है।

प्रश्न 9. कबीर के दोहों की भाषा और शैली पर प्रकाश डालिए। [2020]

कबीर के दोहों की भाषा और शैली निम्नलिखित विशेषताओं से युक्त है:

भाषा:
1. सधुक्कड़ी भाषा: कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया है, जो हिंदी, उर्दू, अवधी, ब्रज, पंजाबी आदि का मिश्रण है।
2. सरलता: उनकी भाषा सरल और सहज है, जो आम जनता की भाषा थी।
3. प्रवाहपूर्णता: उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है।
4. प्रभावशालीता: उनके शब्द सीधे हृदय पर चोट करते हैं।

शैली:
1. दोहा छंद: कबीर ने मुख्यतः दोहा छंद का प्रयोग किया है, जो सरल और प्रभावशाली है।
2. प्रतीक और उदाहरण: उन्होंने गूढ़ बातों को समझाने के लिए मानसरोवर, हंस, मोती, तलवार, मछली, कस्तूरी मृग जैसे प्रतीकों और उदाहरणों का सुंदर प्रयोग किया है।
3. व्यंग्य शैली: उनकी शैली में करारा व्यंग्य है, विशेषकर सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक पाखंड पर।
4. उपदेशात्मक शैली: उनके दोहे उपदेशात्मक हैं, जीवन जीने की कला सिखाते हैं।
5. संक्षिप्तता: कबीर दो-चार पंक्तियों में गूढ़ से गूढ़ बात कह देते हैं।
6. प्रश्नोत्तर शैली: कहीं-कहीं उन्होंने प्रश्नोत्तर शैली का भी प्रयोग किया है।
7. ओजस्वी शैली: उनकी शैली में ओज है, जो पाठक को प्रभावित करता है।

इस प्रकार, कबीर की भाषा और शैली उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है।

प्रश्न 10. कबीर की साखियों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। [2019]

कबीर की साखियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी 600 वर्ष पूर्व थीं:

1. सामाजिक समरसता: आज भी समाज में जाति-पाति, ऊँच-नीच का भेद है। कबीर की 'जाति न पूछो साधु की' वाली साखी आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

2. धार्मिक आडंबर: आज भी धर्म के नाम पर पाखंड और आडंबर हैं। कबीर के बाहरी आडंबरों का खंडन करने वाले दोहे आज भी सार्थक हैं।

3. आंतरिक साधना की आवश्यकता: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य ने आंतरिक शांति खो दी है। कबीर का आंतरिक साधना पर बल आज और भी प्रासंगिक है।

4. प्रेम का महत्व: आज के भौतिकवादी युग में प्रेम का महत्व और बढ़ गया है। कबीर का 'प्रेम बिना नर कांपुरी' वाला कथन आज भी सत्य है।

5. गुरु का महत्व: आज भी जीवन में मार्गदर्शन की आवश्यकता है। कबीर का गुरु के महत्व पर बल आज भी प्रासंगिक है।

6. संगति का प्रभाव: आज भी बुरी संगति युवाओं को भटका रही है। कबीर की संगति पर सीख आज भी उपयोगी है।

7. आत्मचिंतन की आवश्यकता: आज की उपभोक्तावादी संस्कृति में मनुष्य ने स्वयं को खो दिया है। कबीर का आत्मचिंतन पर बल आज और भी महत्वपूर्ण है।

इस प्रकार, कबीर की साखियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं और हमें जीवन जीने की सही राह दिखाती हैं।

7. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय

  • कवि परिचय: कबीर का जीवन, रचनाएँ, भाषा शैली [2020]
  • दोहों की व्याख्या: प्रत्येक दोहे का भावार्थ [2018, 2019, 2020, 2021]
  • गुरु का महत्व: 'मानसरोवर सुभग जल' साखी
  • जाति-प्रथा का विरोध: 'जाति न पूछो साधु की' साखी [2019]
  • ईश्वर की सर्वव्यापकता: 'पानी में मीन पियासी' और 'कस्तूरी कुंडल बसै' साखियाँ [2020, 2021]
  • प्रेम का महत्व: 'प्रेम बिना नर कांपुरी' साखी [2020]
  • बाहरी तीर्थाटन का खंडन: 'मन मथुरा दिल द्वारिका' साखी [2019]
  • संगति का प्रभाव: 'बिछुआ बिछुआ करत नित' साखी [2018]
  • कबीर की भक्ति भावना: विशेषताएँ [2021]
  • प्रासंगिकता: आज के समय में कबीर की प्रासंगिकता [2019]

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवि: कबीरदास (1398-1518), काशी निवासी
  • रचनाएँ: बीजक (साखी, सबद, रमैनी)
  • भाषा: सधुक्कड़ी (हिंदी-उर्दू मिश्रित)
  • छंद: दोहा
  • संप्रदाय: निर्गुण भक्ति धारा
  • मुख्य विषय: ईश्वर की सर्वव्यापकता, गुरु महत्व, प्रेम, सामाजिक समानता, पाखंड विरोध

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"गुरु बिनु ज्ञान न लाहि।"

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।"

"प्रेम बिना नर कांपुरी, प्रेम बिना नर सोस।"

"कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढै बन माहि।"

8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न

टिप्स: सीधा और सटीक उत्तर दें। केवल मुख्य बिंदु लिखें। 2-3 वाक्यों में उत्तर पूरा करें।

उदाहरण: प्रश्न: कबीर का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर: कबीर का जन्म सन् 1398 में काशी (वाराणसी) में हुआ था।

📝 4-5 अंक प्रश्न

टिप्स: उत्तर को तीन भागों में बाँटें - परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष। दोहे की व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें।

उदाहरण: प्रश्न: 'कस्तूरी कुंडल बसै' साखी का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: [जैसा ऊपर दीर्घ प्रश्न 3 में दिया गया है]

9. हब लिंक



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