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कक्षा 10 – मनुष्यता – मैथिलीशरण गुप्त (स्पर्श) – परोपकार, एकता और सच्ची मानवता का काव्य संदेश | GPN

📘 पाठ – मनुष्यता | कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श) | GPN

📚 कक्षा: 10 | 📖 पुस्तक: स्पर्श भाग 2 | ✍️ कवि: मैथिलीशरण गुप्त | 📝 प्रकार: पद्य (खंडकाव्य) | ⭐⭐⭐ बहुत महत्वपूर्ण


📌 अनुक्रमणिका

इस पाठ को गहराई से समझने के लिए छात्र कक्षा 10 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवि परिचय

मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964): जन्म: 3 अगस्त 1886, चिरगाँव, झाँसी (उत्तर प्रदेश)। उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया गया। प्रमुख रचनाएँ: 'भारत-भारती', 'पंचवटी', 'साकेत', 'यशोधरा', 'जयद्रथ वध', 'द्वापर' आदि। उनकी रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना, देशभक्ति, सामाजिक सुधार और मानवीय मूल्यों की प्रधानता है। उनकी भाषा संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली है और शैली में ओज और प्रवाह है।

📖 पाठ की पृष्ठभूमि

'मनुष्यता' कविता मैथिलीशरण गुप्त के खंडकाव्य 'पंचवटी' से ली गई है। यह कविता मनुष्य के उच्च आदर्शों और मानवीय मूल्यों पर आधारित है। कवि ने इसमें बताया है कि मनुष्य की पहचान उसके मानवीय गुणों से होती है, न कि केवल मनुष्य जन्म लेने मात्र से। वह सच्चा मनुष्य है जो दूसरों के लिए जीता है, जो त्याग और बलिदान करता है।

🎯 पाठ का महत्व

बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से कवि परिचय, पद्यांशों की व्याख्या, मानवीय मूल्य, त्याग और बलिदान के महत्व, 'मनुष्यता' की अवधारणा और कवि की भाषा शैली पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रत्येक पंक्ति की व्याख्या करने वाले प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।

2. सरल सारांश

इस कविता में कवि मैथिलीशरण गुप्त ने मनुष्यता की वास्तविक परिभाषा बताई है। वे कहते हैं कि केवल मनुष्य जन्म लेने से कोई मनुष्य नहीं हो जाता। सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के लिए जीता है, जो त्याग और बलिदान करता है। उन्होंने मर्यादा और सदाचार को मनुष्य का आभूषण बताया है। कवि कहते हैं कि मनुष्य को क्षमाशील होना चाहिए, पराक्रमी होना चाहिए और अपने सिद्धांतों पर डटा रहना चाहिए। उन्होंने अकेले सुखी रहने से बेहतर सबके साथ सुखी रहना बताया है। कवि के अनुसार जो मनुष्य परोपकार करता है, वही सच्चा मनुष्य है और वही अमर होता है।

3. पद्यांश व्याख्या

📌 पद्यांश 1

पद्यांश: मनुष्य मात्र बंधु है तो यही, विभूति मानवता की है।
अनंत अवनि में आज वही, सफल जनम सार्थकता की है।।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि यदि मनुष्य सभी मनुष्यों को अपना भाई मानता है, तो यही मानवता की सबसे बड़ी विभूति (महानता) है। इस विशाल पृथ्वी पर आज वही मनुष्य सफल और सार्थक जीवन जीता है जो इस भावना को अपनाता है। कवि के अनुसार मानवता का सबसे बड़ा गुण है सबको अपना समझना, सबके प्रति प्रेम और भाईचारे की भावना रखना।

📌 पद्यांश 2

पद्यांश: वही मनुष्य है कि जो मरे नहीं, मर जाने पर भी जग में।
जिसकी कीर्ति अमर है, जो कभी, होता नहीं जड़ के संग में।।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि सच्चा मनुष्य वह है जो मर जाने पर भी इस संसार में अमर हो जाता है। जिसकी कीर्ति (यश) अमर होती है, जो इस नश्वर शरीर के साथ नष्ट नहीं होता। कवि के अनुसार जो मनुष्य अपने अच्छे कर्मों, त्याग और बलिदान से लोगों के दिलों में बस जाता है, वह कभी मरता नहीं। उसकी कीर्ति सदा जीवित रहती है।

📌 पद्यांश 3

पद्यांश: मनुष्य! तू बड़ा नहीं, बड़ा नहीं, जरा-सी जिंदगी है तेरी।
यही यहाँ कि एक दिन, सपूत हो अथवा कि खर ही फिर तेरी।।

व्याख्या: कवि मनुष्य को संबोधित करते हुए कहते हैं कि हे मनुष्य! तू बड़ा नहीं है, तेरी यह जिंदगी बहुत छोटी है। इस छोटी सी जिंदगी में यह तय होगा कि तू सपूत (सच्चा इंसान) बनकर जिएगा या खर (गधा/निकम्मा) बनकर। कवि कहना चाहते हैं कि यह जीवन बहुत छोटा है, इसमें हमें यह सिद्ध करना है कि हम सच्चे मनुष्य हैं या नहीं।

📌 पद्यांश 4

पद्यांश: अकेला चाव भी नहीं, न सुख वहाँ, जहाँ न सबका सुख हो।
यही मनुष्यता की है असल, यही इसकी बड़ी विभूति है।।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि अकेले सुखी रहने की इच्छा भी ठीक नहीं है और वहाँ सुख भी नहीं होता जहाँ सबका सुख न हो। यही मनुष्यता का असली स्वरूप है और यही इसकी सबसे बड़ी महानता है। कवि के अनुसार सच्चा सुख वही है जो सबके साथ बाँटा जाए। केवल अपने सुख की चिंता करना मनुष्यता नहीं है।

📌 पद्यांश 5

पद्यांश: मनुष्य! तू बड़ा नहीं, पर है, बड़ी तेरी क्षमता महान।
नर-हृदय में है अमरत्व का, अटल अभय निधान।।

व्याख्या: कवि कहते हैं कि हे मनुष्य! तू शारीरिक रूप से बड़ा नहीं है, लेकिन तेरी क्षमता बहुत महान है। मनुष्य के हृदय में अमरता का, अटल साहस का और निर्भयता का खजाना भरा है। कवि के अनुसार मनुष्य में असीम शक्तियाँ हैं। वह अपने साहस, पराक्रम और अच्छे कर्मों से अमरत्व प्राप्त कर सकता है।

अन्य अध्यायों को पढ़ने के लिए छात्र कक्षा 9 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 9 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

4. शब्दार्थ

शब्द अर्थ
बंधुभाई, बंधु
विभूतिमहानता, ऐश्वर्य, सम्पदा
अनंतअसीम, अपार
अवनिपृथ्वी
सार्थकतासफलता, अर्थपूर्णता
कीर्तियश, प्रसिद्धि
अमरजो कभी मरे नहीं
जड़निर्जीव, शरीर
सपूतसच्चा वीर, योग्य पुत्र
खरगधा, निकम्मा
चावइच्छा, लालसा
क्षमताशक्ति, सामर्थ्य
अमरत्वअमरता, मृत्यु से परे होना
अटलन टलने वाला, स्थिर
अभयनिर्भय, बिना डर के
निधानखजाना, भंडार
मर्यादासीमा, आदर्श
सदाचारअच्छा आचरण
पराक्रमीबहादुर, वीर
क्षमाशीलक्षमा करने वाला
परोपकारदूसरों का भला करना

5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)

प्रश्न 1. 'मनुष्यता' कविता के कवि कौन हैं? उन्हें किस उपाधि से विभूषित किया गया? [2020]

'मनुष्यता' कविता के कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं। उन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया गया।

प्रश्न 2. मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए। [2019]

मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ हैं - 'भारत-भारती', 'पंचवटी', 'साकेत', 'यशोधरा', 'जयद्रथ वध', 'द्वापर' आदि।

प्रश्न 3. कवि के अनुसार मानवता की सबसे बड़ी विभूति क्या है? [2021]

कवि के अनुसार मानवता की सबसे बड़ी विभूति यह है कि मनुष्य सभी मनुष्यों को अपना भाई समझे और सबके प्रति प्रेम व भाईचारे की भावना रखे।

प्रश्न 4. कवि ने सच्चा मनुष्य किसे कहा है? [2018]

कवि ने सच्चा मनुष्य उसे कहा है जो मर जाने के बाद भी अपने अच्छे कर्मों और कीर्ति के कारण अमर हो जाता है और लोगों के दिलों में जीवित रहता है।

प्रश्न 5. 'जरा-सी जिंदगी है तेरी' - इस पंक्ति में कवि क्या कहना चाहते हैं? [2020]

इस पंक्ति में कवि कहना चाहते हैं कि मनुष्य का जीवन बहुत छोटा है। इस छोटे से जीवन में उसे यह तय करना है कि वह सच्चा मनुष्य बनेगा या निकम्मा बनेगा।

प्रश्न 6. कवि ने सपूत और खर में क्या अंतर बताया है? [2019]

सपूत वह है जो सच्चा मनुष्य बनकर जीता है और अच्छे कर्म करता है, जबकि खर (गधा) वह है जो निकम्मा जीवन जीता है और समाज के लिए कुछ नहीं करता।

प्रश्न 7. 'अकेला चाव भी नहीं' से कवि का क्या आशय है? [2021]

इससे कवि का आशय है कि केवल अपने अकेले के सुख की इच्छा करना भी उचित नहीं है। सच्चा सुख वही है जो सबके साथ बाँटा जाए।

प्रश्न 8. मनुष्य के हृदय में क्या-क्या निहित है? [2018]

मनुष्य के हृदय में अमरता का, अटल साहस का और निर्भयता का खजाना (निधान) निहित है।

प्रश्न 9. कवि ने मनुष्य की क्षमता को कैसा बताया है? [2020]

कवि ने मनुष्य की क्षमता को महान बताया है। वे कहते हैं कि शारीरिक रूप से मनुष्य छोटा है, लेकिन उसकी क्षमता बहुत महान है।

प्रश्न 10. 'मनुष्यता' कविता किस खंडकाव्य से ली गई है? [2019]

'मनुष्यता' कविता मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध खंडकाव्य 'पंचवटी' से ली गई है।

6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)

प्रश्न 1. 'मनुष्यता' कविता के माध्यम से कवि ने मनुष्य की किन विशेषताओं को उजागर किया है? [2020]

कवि मैथिलीशरण गुप्त ने 'मनुष्यता' कविता में मनुष्य की निम्नलिखित विशेषताओं को उजागर किया है:

1. भाईचारा और समानता: कवि के अनुसार सच्चा मनुष्य वह है जो सभी मनुष्यों को अपना भाई समझता है। वह किसी से भेदभाव नहीं करता।

2. अमर कीर्ति: सच्चा मनुष्य अपने अच्छे कर्मों से अमर हो जाता है। मरने के बाद भी उसकी कीर्ति जीवित रहती है।

3. आत्मचिंतन: कवि मनुष्य को यह सोचने की प्रेरणा देते हैं कि वह इस छोटे से जीवन में सपूत बनेगा या खर।

4. सामूहिक सुख: मनुष्य को केवल अपने सुख की नहीं, बल्कि सबके सुख की चिंता करनी चाहिए। सच्चा सुख सबके साथ बाँटने में है।

5. महान क्षमता: मनुष्य में असीम शक्तियाँ हैं। वह अपने साहस, पराक्रम और अच्छे कर्मों से महान बन सकता है।

6. निर्भयता: मनुष्य के हृदय में निर्भयता का खजाना है। उसे निडर होकर जीना चाहिए।

इस प्रकार, कवि ने मनुष्य के उच्च आदर्शों और मानवीय मूल्यों को रेखांकित किया है।

प्रश्न 2. 'वही मनुष्य है कि जो मरे नहीं, मर जाने पर भी जग में' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2019]

यह पंक्ति मनुष्य के अमरत्व की अवधारणा को स्पष्ट करती है:

1. शारीरिक मृत्यु, अमर कीर्ति: कवि कहते हैं कि सच्चा मनुष्य वह है जो शारीरिक रूप से मर जाने के बाद भी इस संसार में अमर हो जाता है। उसकी मृत्यु केवल शारीरिक होती है, आत्मिक नहीं।

2. अच्छे कर्मों का महत्व: मनुष्य अपने अच्छे कर्मों, त्याग और बलिदान से अमरत्व प्राप्त करता है। उसके द्वारा किए गए अच्छे कार्य उसे हमेशा जीवित रखते हैं।

3. लोगों के दिलों में बसना: जो मनुष्य अपने जीवनकाल में लोगों के लिए कुछ करता है, वह उनके दिलों में बस जाता है। ऐसा मनुष्य कभी मरता नहीं।

4. कीर्ति का अमर होना: 'जिसकी कीर्ति अमर है' - जिस मनुष्य की कीर्ति अमर होती है, वह सदा जीवित रहता है। उसकी पहचान युगों-युगों तक बनी रहती है।

5. जड़ के साथ नष्ट न होना: 'होता नहीं जड़ के संग में' - ऐसा मनुष्य इस नश्वर शरीर के साथ नष्ट नहीं होता। उसकी आत्मा और उसकी कीर्ति सदा जीवित रहती है।

6. महापुरुषों का उदाहरण: इस पंक्ति में कवि महापुरुषों की ओर संकेत करते हैं जो अपने अच्छे कर्मों के कारण आज भी हमारे बीच जीवित हैं - जैसे गांधी, बुद्ध, महावीर आदि।

इस प्रकार, यह पंक्ति अच्छे कर्मों और अमर कीर्ति के महत्व को रेखांकित करती है।

प्रश्न 3. 'मनुष्य! तू बड़ा नहीं, बड़ा नहीं, जरा-सी जिंदगी है तेरी' - इस पंक्ति के माध्यम से कवि क्या संदेश देना चाहते हैं? [2021]

इस पंक्ति के माध्यम से कवि मनुष्य को जीवन की क्षणभंगुरता और उसकी जिम्मेदारी का एहसास कराना चाहते हैं:

1. जीवन की नश्वरता: कवि मनुष्य को याद दिलाते हैं कि उसका जीवन बहुत छोटा है। अहंकार में बड़ा बनने की कोशिश करने की बजाय उसे इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए।

2. समय का सदुपयोग: जीवन छोटा है, इसलिए हर पल का सदुपयोग करना चाहिए। समय व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।

3. सार्थक जीवन की आवश्यकता: यह छोटा सा जीवन ही तय करेगा कि मनुष्य सपूत (सच्चा) बनकर जीया या खर (निकम्मा) बनकर। इसलिए जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।

4. विकल्प का महत्व: कवि मनुष्य को यह बताते हैं कि उसके पास दो विकल्प हैं - या तो वह सपूत बने या खर। यह चुनाव उसे स्वयं करना है।

5. अहंकार त्यागने की प्रेरणा: 'तू बड़ा नहीं' कहकर कवि मनुष्य के अहंकार को तोड़ते हैं और उसे विनम्रता का पाठ पढ़ाते हैं।

6. जीवन की कीमत समझना: यह पंक्ति मनुष्य को जीवन की कीमत समझाती है कि यह अनमोल है और इसे व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए।

इस प्रकार, यह पंक्ति मनुष्य को जीवन के वास्तविक अर्थ को समझने और उसे सार्थक बनाने की प्रेरणा देती है।

प्रश्न 4. 'अकेला चाव भी नहीं, न सुख वहाँ, जहाँ न सबका सुख हो' - इस पंक्ति की व्याख्या कीजिए। [2018]

यह पंक्ति सामूहिक सुख और परोपकार के महत्व को रेखांकित करती है:

1. सामूहिक सुख की अवधारणा: कवि कहते हैं कि केवल अपने अकेले के सुख की इच्छा करना भी ठीक नहीं है। सच्चा सुख वही है जो सबको मिले।

2. परोपकार का महत्व: यह पंक्ति परोपकार और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता का महत्व सिखाती है। अपने सुख के साथ-साथ दूसरों के सुख की चिंता करना ही मनुष्यता है।

3. स्वार्थ का त्याग: कवि स्वार्थ का त्याग करके समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करने की प्रेरणा देते हैं। केवल अपने बारे में सोचना स्वार्थ है।

4. सुख की वास्तविक परिभाषा: जहाँ सबका सुख नहीं, वहाँ वास्तव में सुख हो ही नहीं सकता। यदि समाज में असमानता और दुख है, तो कोई भी सच्चे सुख का अनुभव नहीं कर सकता।

5. सहअस्तित्व का दर्शन: यह पंक्ति सहअस्तित्व के दर्शन को प्रस्तुत करती है। हम सब एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए सबका सुख ही सच्चा सुख है।

6. मानवता का मूल मंत्र: कवि के अनुसार यही मनुष्यता का असली स्वरूप है और यही इसकी सबसे बड़ी महानता है।

इस प्रकार, यह पंक्ति मानवता के मूल मंत्र - सबके सुख की कामना - को प्रस्तुत करती है।

प्रश्न 5. 'मनुष्य! तू बड़ा नहीं, पर है, बड़ी तेरी क्षमता महान' - भाव स्पष्ट कीजिए। [2020]

यह पंक्ति मनुष्य की आंतरिक शक्तियों और क्षमताओं को रेखांकित करती है:

1. बाहरी और आंतरिक का अंतर: कवि कहते हैं कि शारीरिक रूप से मनुष्य बड़ा नहीं है, लेकिन उसकी आंतरिक क्षमताएँ बहुत महान हैं।

2. असीम शक्तियाँ: मनुष्य में असीम शक्तियाँ निहित हैं। वह अपनी इच्छाशक्ति और साहस से असंभव कार्य भी कर सकता है।

3. मानवीय क्षमता का विस्तार: मनुष्य ने अपनी क्षमताओं के बल पर आकाश को छुआ, समुद्र को पार किया, पर्वतों को फोड़ा - यह सब उसकी महान क्षमता का प्रमाण है।

4. आत्मविश्वास की प्रेरणा: यह पंक्ति मनुष्य में आत्मविश्वास जगाती है कि वह छोटा जरूर है, लेकिन उसकी क्षमता असीम है। वह जो चाहे, वह कर सकता है।

5. अमरत्व का रहस्य: कवि आगे कहते हैं कि मनुष्य के हृदय में अमरत्व, अटल साहस और निर्भयता का खजाना है। यही उसे महान बनाता है।

6. आध्यात्मिक दृष्टि: इस पंक्ति में आध्यात्मिक दृष्टि भी है - मनुष्य का शरीर नश्वर है, लेकिन उसकी आत्मा अमर है और उसमें असीम शक्तियाँ हैं।

इस प्रकार, यह पंक्ति मनुष्य की आंतरिक महानता और असीम क्षमताओं को रेखांकित करती है।

प्रश्न 6. मैथिलीशरण गुप्त की भाषा शैली पर प्रकाश डालिए। [2019]

मैथिलीशरण गुप्त की भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

भाषा:
1. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली: उनकी भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से भरपूर खड़ी बोली है। 'अनंत अवनि', 'विभूति', 'अमरत्व' जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं।
2. प्रवाहपूर्णता: उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है। पढ़ते समय रुकावट महसूस नहीं होती।
3. ओजस्वी भाषा: उनकी भाषा में ओज है, विशेषकर राष्ट्रीय और प्रेरणादायक विषयों पर।
4. सरलता और सहजता: संस्कृतनिष्ठ होते हुए भी उनकी भाषा सरल और सहज है।

शैली:
1. उपदेशात्मक शैली: 'मनुष्यता' कविता में उपदेशात्मक शैली है। वे मनुष्य को सीधे संबोधित करते हैं - 'मनुष्य! तू बड़ा नहीं'।
2. प्रतीकात्मकता: उन्होंने 'सपूत', 'खर', 'जड़', 'अमरत्व' जैसे प्रतीकों का प्रयोग किया है।
3. अलंकारों का प्रयोग: उनकी रचनाओं में अनुप्रास, उपमा, रूपक आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
4. संवाद शैली: वे सीधे पाठक से संवाद करते हैं, जैसे - 'मनुष्य! तू बड़ा नहीं'।
5. दार्शनिक शैली: उनकी शैली में गहन दार्शनिकता है, जीवन के गूढ़ सत्य को सरलता से समझाने की क्षमता।
6. राष्ट्रीय चेतना: उनकी शैली में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की झलक मिलती है।

इस प्रकार, मैथिलीशरण गुप्त की भाषा और शैली उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण है।

प्रश्न 7. 'मनुष्यता' कविता में कवि ने किन मानवीय मूल्यों पर बल दिया है? [2021]

कवि ने 'मनुष्यता' कविता में निम्नलिखित मानवीय मूल्यों पर बल दिया है:

1. भाईचारा: कवि ने सभी मनुष्यों को भाई समझने और उनके प्रति प्रेम रखने पर बल दिया है। 'मनुष्य मात्र बंधु है' इसी भावना को व्यक्त करता है।

2. परोपकार: कवि ने परोपकार और दूसरों की भलाई के महत्व को रेखांकित किया है। सच्चा मनुष्य वह है जो दूसरों के लिए जीता है।

3. सामूहिक सुख: केवल अपने सुख की चिंता न करके सबके सुख की चिंता करना - यह कवि का मुख्य संदेश है।

4. त्याग और बलिदान: कवि ने त्याग और बलिदान के महत्व को रेखांकित किया है। जो दूसरों के लिए त्याग करता है, वही सच्चा मनुष्य है।

5. अमर कीर्ति की प्राप्ति: अच्छे कर्मों और परोपकार से अमर कीर्ति प्राप्त होती है। यही सच्ची सफलता है।

6. निर्भयता और साहस: कवि ने मनुष्य के हृदय में निहित निर्भयता और साहस के महत्व को भी रेखांकित किया है।

7. आत्मचिंतन: मनुष्य को आत्मचिंतन करना चाहिए कि वह सपूत बनकर जी रहा है या खर बनकर।

8. क्षमाशीलता और सदाचार: यद्यपि इस कविता में सीधे उल्लेख नहीं, किंतु कवि की अन्य रचनाओं के अनुसार ये भी मानवीय मूल्य हैं।

इस प्रकार, कवि ने उच्च मानवीय मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा दी है।

प्रश्न 8. 'मनुष्यता' कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए। [2018]

'मनुष्यता' कविता का मूलभाव बहुआयामी है:

1. सच्चे मनुष्य की पहचान: इस कविता का मुख्य भाव यह है कि केवल दो पैरों पर चलने से कोई मनुष्य नहीं हो जाता। सच्चा मनुष्य वह है जिसमें मानवीय गुण हों - दया, करुणा, परोपकार, त्याग।

2. अमरत्व की प्राप्ति: कवि के अनुसार सच्चा मनुष्य अपने अच्छे कर्मों से अमरत्व प्राप्त करता है। वह मरने के बाद भी अपनी कीर्ति के कारण जीवित रहता है।

3. सामूहिक सुख की अवधारणा: कवि ने सामूहिक सुख के महत्व को रेखांकित किया है। वे कहते हैं कि जहाँ सबका सुख नहीं, वहाँ वास्तविक सुख संभव नहीं।

4. जीवन की सार्थकता: यह कविता जीवन की सार्थकता पर बल देती है। यह छोटा सा जीवन ही तय करता है कि मनुष्य सपूत बना या खर।

5. मानवीय क्षमता: कवि ने मनुष्य की असीम क्षमताओं को भी रेखांकित किया है। शारीरिक रूप से छोटा होते हुए भी वह अपनी आंतरिक शक्तियों से महान बन सकता है।

6. भाईचारा और एकता: सभी मनुष्यों को भाई समझना और उनके प्रति प्रेम रखना - यह भी कविता का मूल भाव है।

7. निर्भयता और साहस: मनुष्य के हृदय में निहित निर्भयता और साहस को पहचानने और उपयोग करने की प्रेरणा।

इस प्रकार, यह कविता मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप और कर्तव्यों का बोध कराती है।

प्रश्न 9. कवि ने मनुष्य की क्षमताओं का कैसा चित्रण किया है? [2020]

कवि ने मनुष्य की क्षमताओं का बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक चित्रण किया है:

1. आंतरिक शक्तियाँ: कवि के अनुसार मनुष्य की असली क्षमता उसके बाहरी शरीर में नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक शक्तियों में निहित है। उसके हृदय में अमरत्व, साहस और निर्भयता का खजाना है।

2. असीम क्षमता: शारीरिक रूप से छोटा होते हुए भी मनुष्य की क्षमता असीम है। वह अपनी इच्छाशक्ति से असंभव कार्य भी कर सकता है।

3. आत्मबल का महत्व: कवि ने आत्मबल और आत्मविश्वास के महत्व को रेखांकित किया है। यदि मनुष्य में आत्मबल हो, तो वह कुछ भी कर सकता है।

4. अमरत्व की क्षमता: मनुष्य में अमर होने की क्षमता है - अपने अच्छे कर्मों और कीर्ति से वह मरने के बाद भी अमर रह सकता है।

5. सृजनात्मक क्षमता: यद्यपि इस कविता में सीधे उल्लेख नहीं, किंतु मनुष्य की सृजनात्मक क्षमता भी उसकी महानता का प्रमाण है।

6. संघर्ष क्षमता: मनुष्य में कठिन से कठिन परिस्थितियों से लड़ने और उन्हें पार करने की क्षमता है।

7. आध्यात्मिक क्षमता: मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है, आत्म-साक्षात्कार कर सकता है - यह उसकी सबसे बड़ी क्षमता है।

इस प्रकार, कवि ने मनुष्य की क्षमताओं का बहुत ही उदात्त चित्रण किया है।

प्रश्न 10. 'मनुष्यता' कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। [2019]

'मनुष्यता' कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है:

1. आज के स्वार्थी युग में: आज का युग स्वार्थ और व्यक्तिवाद का युग है। ऐसे में कविता का सामूहिक सुख और परोपकार का संदेश अत्यंत प्रासंगिक है।

2. सामाजिक समरसता के लिए: आज समाज में जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर विभाजन है। कविता का 'मनुष्य मात्र बंधु है' वाला संदेश सामाजिक समरसता के लिए आवश्यक है।

3. भौतिकवाद के बीच मानवीय मूल्य: आज का भौतिकवादी युग मानवीय मूल्यों को खोता जा रहा है। यह कविता हमें उन मूल्यों की याद दिलाती है।

4. जीवन की सार्थकता का बोध: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मनुष्य यह भूल गया है कि जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है। यह कविता उसे यह बोध कराती है।

5. अमर कीर्ति का महत्व: आज हर कोई भौतिक सफलता के पीछे भाग रहा है। कविता हमें बताती है कि सच्ची सफलता अच्छे कर्मों और अमर कीर्ति में है।

6. आत्मचिंतन की प्रेरणा: यह कविता हमें आत्मचिंतन की प्रेरणा देती है - हम सपूत बनकर जी रहे हैं या खर बनकर।

7. निर्भयता का संदेश: आज के डर और आतंक के माहौल में कविता का निर्भयता का संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है।

8. मानवता का पाठ: जब चारों ओर अमानवीयता बढ़ रही है, यह कविता हमें मानवता का पाठ पढ़ाती है।

इस प्रकार, यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है और हमें सही मानवीय मूल्यों को अपनाने की प्रेरणा देती है।

7. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय

  • कवि परिचय: मैथिलीशरण गुप्त का जीवन, रचनाएँ, भाषा शैली [2020]
  • पद्यांशों की व्याख्या: सभी प्रमुख पंक्तियों का भावार्थ [2018, 2019, 2020, 2021]
  • सच्चे मनुष्य की पहचान: 'वही मनुष्य है कि जो मरे नहीं' पंक्ति की व्याख्या [2019]
  • जीवन की क्षणभंगुरता: 'जरा-सी जिंदगी है तेरी' पंक्ति की व्याख्या [2021]
  • सामूहिक सुख की अवधारणा: 'अकेला चाव भी नहीं' पंक्ति की व्याख्या [2018]
  • मनुष्य की क्षमताएँ: 'बड़ी तेरी क्षमता महान' पंक्ति की व्याख्या [2020]
  • मानवीय मूल्य: कविता में निहित मानवीय मूल्य [2021]
  • मूलभाव: कविता का केंद्रीय भाव [2018]
  • प्रासंगिकता: आज के समय में कविता की प्रासंगिकता [2019]

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवि: मैथिलीशरण गुप्त (1886-1964), 'राष्ट्रकवि'
  • रचनाएँ: भारत-भारती, पंचवटी, साकेत, यशोधरा
  • पुस्तक: 'मनुष्यता' कविता 'पंचवटी' से ली गई है
  • भाषा: संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली
  • मुख्य विषय: मानवीय मूल्य, परोपकार, सामूहिक सुख, अमर कीर्ति
  • प्रमुख प्रतीक: सपूत, खर, अमरत्व, जड़

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"मनुष्य मात्र बंधु है तो यही, विभूति मानवता की है।"

"वही मनुष्य है कि जो मरे नहीं, मर जाने पर भी जग में।"

"अकेला चाव भी नहीं, न सुख वहाँ, जहाँ न सबका सुख हो।"

"मनुष्य! तू बड़ा नहीं, पर है, बड़ी तेरी क्षमता महान।"

8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न

टिप्स: सीधा और सटीक उत्तर दें। केवल मुख्य बिंदु लिखें। 2-3 वाक्यों में उत्तर पूरा करें।

उदाहरण: प्रश्न: 'मनुष्यता' कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर: 'मनुष्यता' कविता के कवि मैथिलीशरण गुप्त हैं, जिन्हें 'राष्ट्रकवि' की उपाधि से विभूषित किया गया।

📝 4-5 अंक प्रश्न

टिप्स: उत्तर को तीन भागों में बाँटें - परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष। पंक्ति की व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें।

उदाहरण: प्रश्न: 'वही मनुष्य है कि जो मरे नहीं, मर जाने पर भी जग में' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: [जैसा ऊपर दीर्घ प्रश्न 2 में दिया गया है]

9. हब लिंक



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