कक्षा 10 – पर्वत प्रदेश में पावस – सुमित्रानंदन पंत (स्पर्श) – वर्षाकालीन पर्वतीय प्रकृति का जीवंत काव्यचित्रण | GPN
📘 पाठ – पर्वत प्रदेश में पावस | कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श) | GPN
📚 कक्षा: 10 | 📖 पुस्तक: स्पर्श भाग 2 | ✍️ कवि: सुमित्रानंदन पंत | 📝 प्रकार: पद्य (प्रकृति कविता) | ⭐⭐⭐ महत्वपूर्ण
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. पद्यांश व्याख्या
- 4. शब्दार्थ
- 5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)
- 6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)
- 7. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 9. हब लिंक
1. परिचय
📝 कवि परिचय
सुमित्रानंदन पंत (1900-1977): जन्म: 20 मई 1900, कौसानी, (बागेश्वर, उत्तराखंड)। वे हिंदी साहित्य के छायावादी युग के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। प्रमुख रचनाएँ: 'पल्लव', 'ग्रंथि', 'गुंजन', 'युगांत', 'युगवाणी', 'लोकायतन' आदि। उन्हें 'पद्मभूषण' और 'ज्ञानपीठ' पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी कविताओं में प्रकृति का सजीव चित्रण, सौंदर्य के प्रति गहरी अनुभूति और दार्शनिक चिंतन मिलता है। उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' भी कहा जाता है।
📖 पाठ की पृष्ठभूमि
'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता में सुमित्रानंदन पंत ने पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का अत्यंत सुंदर चित्रण किया है। यह कविता उनके 'पल्लव' संग्रह से ली गई है। कवि ने अपनी जन्मभूमि कौसानी (उत्तराखंड) के पर्वतीय सौंदर्य को इस कविता में उतारा है। बादलों का आना, पहाड़ों पर वर्षा, नदियों का उफान, हरियाली - सब कुछ इस कविता में जीवंत हो उठा है।
🎯 पाठ का महत्व
बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से कवि परिचय, प्रकृति चित्रण, अलंकारों का प्रयोग, छायावादी शैली, पद्यांशों की व्याख्या और कवि की भाषा शैली पर प्रश्न पूछे जाते हैं। प्रकृति के विभिन्न रूपों का वर्णन करने वाले प्रश्न विशेष रूप से पूछे जाते हैं।
2. सरल सारांश
इस कविता में कवि ने पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु का बहुत ही सुंदर और सजीव चित्रण किया है। कवि कहते हैं कि पर्वतों पर बादल घिर आए हैं, मानो नीले पर्वतों ने श्वेत चादर ओढ़ ली हो। बादल पर्वतों के शिखरों को चूम रहे हैं। वर्षा की बूँदें पर्वतों पर गिर रही हैं। नदियाँ उफान पर हैं, उनका जल प्रवाह तेज हो गया है। झरने और निर्झर बह रहे हैं। चारों ओर हरियाली छा गई है। प्रकृति अपने पूरे सौंदर्य के साथ खिल उठी है। कवि ने वर्षा की बूँदों को मोती, हीरा, मणि जैसी कीमती वस्तुओं से जोड़कर देखा है। पूरी कविता में प्रकृति के विभिन्न रूपों का बहुत ही सुंदर चित्रण है।
3. पद्यांश व्याख्या
📌 पद्यांश 1
पद्यांश: शैल-शिखर-श्रृंखला विकल, हो वर्षा-वर्ष बरस रहे!
ओढ़ तुषार-श्वेत चादर, शैल-शिखर-श्रृंखला ढले।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि पर्वतों के शिखरों की श्रृंखला वर्षा के पानी से भीगकर लगातार बरस रही है। पर्वतों ने बर्फ की सफेद चादर ओढ़ रखी है और उनके शिखर झुके हुए प्रतीत होते हैं। कवि ने यहाँ पर्वतों का मानवीकरण किया है - वे चादर ओढ़ रहे हैं, झुक रहे हैं। वर्षा के कारण पर्वतों का सौंदर्य और भी बढ़ गया है।
📌 पद्यांश 2
पद्यांश: धाराधर झर-झर निर्झर, झरते झर-झर झरते हैं।
मिश्रित पवन-प्रवाह-स्वर से, स्वर उनके भरते हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि बादल (धाराधर) से झरने (निर्झर) लगातार झर-झर की आवाज के साथ बह रहे हैं। हवा के बहने की आवाज के साथ मिलकर इन झरनों का स्वर और भी मधुर हो जाता है। कवि ने यहाँ अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग किया है - 'झर-झर', 'झरते' की पुनरावृत्ति से झरनों के बहने की ध्वनि का अनुभव होता है।
📌 पद्यांश 3
पद्यांश: उतर रहीं नभ से निर्झरिणी, श्वेत शिशिर-तुषार-हिम-रजत-सी,
विस्तृत विपिन-वन-शोभा-खनि, मणि-मुक्ता-मंडित-सी।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि आकाश से नदियाँ (निर्झरिणी) उतर रही हैं, जो बर्फ और हिम की सफेद चाँदी की तरह दिख रही हैं। ये नदियाँ विस्तृत जंगलों की शोभा की खान हैं, मानो मणि और मुक्ताओं से मंडित हों। कवि ने यहाँ नदियों के पानी की स्वच्छता और चमक का वर्णन किया है। वह उसे मणि-मुक्ता से जोड़कर देखते हैं।
📌 पद्यांश 4
पद्यांश: शैल-शिखरों से गिरी जल-बूंदें, मोती-से बिखर रहीं,
श्यामल शिला-तल पर पड़, वे दूध-फेन-सी ठहर रहीं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि पर्वतों के शिखरों से गिरने वाली जल की बूँदें मोतियों की तरह बिखर रही हैं। काली चट्टानों (शिला-तल) पर गिरकर ये बूँदें दूध के फेन (झाग) की तरह सफेद होकर ठहर जाती हैं। कवि ने यहाँ उपमा अलंकार का प्रयोग किया है - जल-बूँदों को मोती और दूध-फेन के समान बताया है।
📌 पद्यांश 5
पद्यांश: श्रृंग-श्रृंग पर मेघ-मालाएँ, मोतिन-से लहराती हैं,
कभी प्रकाश-किरण-सी चमकीं, कभी छाया-सी छाती हैं।
व्याख्या: कवि कहते हैं कि पर्वतों के हर शिखर पर बादलों की कतारें (मेघ-मालाएँ) मोतियों की तरह लहरा रही हैं। कभी ये बादल प्रकाश की किरणों की तरह चमकते हैं और कभी छाया की तरह फैल जाते हैं। कवि ने यहाँ बादलों के बदलते रूपों का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है।
4. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| शैल | पर्वत, पहाड़ |
| शिखर | चोटी, पहाड़ की सबसे ऊँची जगह |
| श्रृंखला | कतार, श्रृंखला |
| विकल | व्याकुल, बेचैन |
| तुषार | हिम, बर्फ |
| धाराधर | बादल (जो धार रखता है) |
| निर्झर | झरना |
| निर्झरिणी | नदी |
| शिशिर | ठंडा, शीतल |
| हिम | बर्फ |
| रजत | चाँदी |
| विपिन | जंगल, वन |
| खनि | खान, भंडार |
| मणि | रत्न |
| मुक्ता | मोती |
| श्यामल | काला, साँवला |
| शिला-तल | चट्टान की सतह |
| फेन | झाग |
| श्रृंग | पर्वत की चोटी |
| मेघ-मालाएँ | बादलों की कतारें |
| प्रकाश-किरण | रोशनी की किरण |
| छाया | परछाई |
| पावस | वर्षा ऋतु |
| प्रदेश | क्षेत्र |
5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)
प्रश्न 1. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता के कवि कौन हैं? उन्हें किस उपाधि से जाना जाता है? [2020]
इस कविता के कवि सुमित्रानंदन पंत हैं। उन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है।
प्रश्न 2. सुमित्रानंदन पंत का जन्म कहाँ और कब हुआ था? [2019]
सुमित्रानंदन पंत का जन्म 20 मई 1900 को उत्तराखंड के कौसानी गाँव में हुआ था।
प्रश्न 3. कवि की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए। [2021]
सुमित्रानंदन पंत की प्रमुख रचनाएँ हैं - 'पल्लव', 'ग्रंथि', 'गुंजन', 'युगांत', 'युगवाणी', 'लोकायतन' आदि।
प्रश्न 4. सुमित्रानंदन पंत को कौन-कौन से पुरस्कार मिले? [2018]
सुमित्रानंदन पंत को 'पद्मभूषण' और 'ज्ञानपीठ' पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
प्रश्न 5. 'शैल-शिखर-श्रृंखला' से कवि का क्या आशय है? [2020]
'शैल-शिखर-श्रृंखला' से कवि का आशय पर्वतों के शिखरों की कतार से है, जो एक के बाद एक सुंदर ढंग से सजे हुए हैं।
प्रश्न 6. 'धाराधर' किसे कहा गया है? [2019]
'धाराधर' बादलों को कहा गया है, क्योंकि वे पानी की धाराएँ धारण करते हैं।
प्रश्न 7. कवि ने पर्वतों पर कैसी चादर बताई है? [2021]
कवि ने पर्वतों पर तुषार (बर्फ) की श्वेत (सफेद) चादर बताई है, जिसे ओढ़कर पर्वत सुंदर लग रहे हैं।
प्रश्न 8. 'निर्झर' और 'निर्झरिणी' किसे कहा गया है? [2018]
'निर्झर' झरने को कहा गया है और 'निर्झरिणी' नदी को कहा गया है।
प्रश्न 9. कवि ने जल-बूंदों को किसके समान बताया है? [2020]
कवि ने जल-बूंदों को मोतियों के समान बताया है और शिला-तल पर गिरकर दूध के फेन के समान बताया है।
प्रश्न 10. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता किस संग्रह से ली गई है? [2019]
यह कविता सुमित्रानंदन पंत के प्रसिद्ध काव्य संग्रह 'पल्लव' से ली गई है।
6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)
प्रश्न 1. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता में कवि ने प्रकृति के किन-किन रूपों का चित्रण किया है? [2020]
सुमित्रानंदन पंत ने इस कविता में प्रकृति के अनेक रूपों का सुंदर चित्रण किया है:
1. पर्वतों का चित्रण: कवि ने पर्वतों के शिखरों की श्रृंखला का वर्णन किया है। पर्वत बर्फ की सफेद चादर ओढ़े हुए हैं और वर्षा के पानी से भीगकर झुके हुए प्रतीत होते हैं।
2. बादलों का चित्रण: बादल (मेघ-मालाएँ) पर्वतों के शिखरों पर मोतियों की तरह लहरा रहे हैं। कभी वे प्रकाश की किरणों की तरह चमकते हैं, कभी छाया की तरह फैल जाते हैं।
3. झरनों का चित्रण: झरने (निर्झर) लगातार झर-झर की आवाज के साथ बह रहे हैं। उनका स्वर हवा की आवाज के साथ मिलकर और मधुर हो जाता है।
4. नदियों का चित्रण: नदियाँ (निर्झरिणी) आकाश से उतर रही हैं, मानो चाँदी की तरह चमक रही हों। वे जंगलों की शोभा की खान हैं।
5. जल-बूंदों का चित्रण: पर्वतों से गिरती जल-बूंदें मोतियों की तरह बिखरती हैं और काली चट्टानों पर दूध के फेन की तरह ठहर जाती हैं।
6. वर्षा का चित्रण: पूरा पर्वतीय क्षेत्र वर्षा से भीगा हुआ है, चारों ओर हरियाली और सौंदर्य छाया हुआ है।
इस प्रकार, कवि ने प्रकृति के विभिन्न रूपों का बहुत ही सजीव और सुंदर चित्रण किया है।
प्रश्न 2. 'शैल-शिखरों से गिरी जल-बूंदें, मोती-से बिखर रहीं' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2019]
इस पंक्ति का भावार्थ निम्नलिखित है:
1. शाब्दिक अर्थ: पर्वतों के शिखरों से गिरने वाली पानी की बूँदें मोतियों की तरह बिखर रही हैं।
2. सौंदर्य चित्रण: कवि ने वर्षा की बूँदों को मोतियों से जोड़कर उनके सौंदर्य को और बढ़ा दिया है। मोती जैसी चमकीली, गोल और कीमती बूँदें पर्वतों से गिर रही हैं।
3. उपमा अलंकार: इस पंक्ति में उपमा अलंकार है - जल-बूंदों की तुलना मोती से की गई है। 'मोती-से' शब्द इस ओर संकेत करता है।
4. प्रकृति की उदारता: यह पंक्ति प्रकृति की उदारता को भी दर्शाती है। वह मोती जैसी कीमती बूँदें बिखेर रही है, जो हमें निःशुल्क मिलती हैं।
5. बूँदों का गिरना और बिखरना: 'बिखर रहीं' शब्द से पता चलता है कि बूँदें एक साथ बहुत सारी गिर रही हैं और अलग-अलग दिशाओं में बिखर रही हैं।
6. दृश्य का सजीव चित्रण: यह पंक्ति पाठक के मन में एक सजीव चित्र खींचती है - हरे-भरे पहाड़ों से गिरती चमकीली बूँदें, जो मानो आकाश से बरसते मोती हों।
इस प्रकार, यह पंक्ति वर्षा की बूँदों के सौंदर्य का अत्यंत सुंदर चित्रण करती है।
प्रश्न 3. कवि ने पर्वतीय वर्षा के सौंदर्य का कैसा चित्रण किया है? [2021]
सुमित्रानंदन पंत ने पर्वतीय वर्षा के सौंदर्य का बहुत ही सुंदर और सजीव चित्रण किया है:
1. बादलों का सौंदर्य: पर्वतों के शिखरों पर बादलों की कतारें मोतियों की तरह लहरा रही हैं। ये बादल कभी प्रकाश की किरणों की तरह चमकते हैं, कभी छाया की तरह फैल जाते हैं।
2. पर्वतों का सौंदर्य: पर्वतों ने बर्फ की सफेद चादर ओढ़ रखी है। वर्षा के पानी से भीगकर वे और भी सुंदर लग रहे हैं। उनके शिखर झुके हुए प्रतीत होते हैं, मानो वे वर्षा का स्वागत कर रहे हों।
3. झरनों का सौंदर्य: झरने लगातार झर-झर की आवाज के साथ बह रहे हैं। हवा की आवाज के साथ मिलकर यह ध्वनि और मधुर हो जाती है।
4. नदियों का सौंदर्य: नदियाँ आकाश से उतरती हुई चाँदी की तरह चमक रही हैं। वे जंगलों की शोभा की खान हैं और मानो मणि-मुक्ताओं से मंडित हों।
5. जल-बूंदों का सौंदर्य: पर्वतों से गिरती जल-बूंदें मोतियों की तरह बिखरती हैं। काली चट्टानों पर गिरकर वे दूध के फेन की तरह सफेद होकर ठहर जाती हैं।
6. समग्र सौंदर्य: पूरा पर्वतीय क्षेत्र वर्षा से भीगा हुआ है। चारों ओर हरियाली, झरनों का संगीत, बादलों की लहराती कतारें - यह सब मिलकर एक अद्भुत सौंदर्य का निर्माण कर रहे हैं।
इस प्रकार, कवि ने पर्वतीय वर्षा के सौंदर्य का बहुत ही सुंदर और सजीव चित्रण किया है।
प्रश्न 4. 'धाराधर झर-झर निर्झर, झरते झर-झर झरते हैं' - इस पंक्ति में प्रयुक्त अलंकारों को स्पष्ट कीजिए। [2018]
इस पंक्ति में निम्नलिखित अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है:
1. अनुप्रास अलंकार:
इस पंक्ति में 'झर-झर', 'झरते', 'झरते' शब्दों की बार-बार आवृत्ति हुई है। यह वर्णों की एक समानता अनुप्रास अलंकार का सुंदर उदाहरण है।
धाराधर, झर-झर, निर्झर - इन शब्दों में 'र' और 'झ' वर्णों की आवृत्ति भी अनुप्रास अलंकार का ही रूप है।
2. ध्वन्यात्मक अलंकार:
'झर-झर' शब्द झरने के बहने की ध्वनि को व्यक्त करता है। यह ध्वन्यात्मक अलंकार (Onomatopoeia) का सुंदर उदाहरण है।
पाठक इस शब्द को पढ़ते ही झरने के बहने की आवाज का अनुभव कर सकता है।
3. पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार:
'झर-झर' शब्द की पुनरावृत्ति हुई है, जिससे अर्थ में निखार आया है। यह पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का उदाहरण है।
4. यमक अलंकार का आभास:
'झरते' शब्द का दो बार प्रयोग हुआ है - पहले 'झरते' क्रिया के रूप में और फिर 'झरते' विशेषण के रूप में। यह यमक अलंकार का आभास देता है।
5. छंद का सौंदर्य:
इस पंक्ति में लय और संगीतात्मकता है। बार-बार 'झर' की आवृत्ति से एक विशेष लय बनती है जो झरने के निरंतर बहने का अनुभव कराती है।
इस प्रकार, इस पंक्ति में अनेक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है, जो कविता के सौंदर्य को और बढ़ा देता है।
प्रश्न 5. सुमित्रानंदन पंत को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' क्यों कहा जाता है? 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए। [2020]
सुमित्रानंदन पंत को 'प्रकृति का सुकुमार कवि' निम्नलिखित कारणों से कहा जाता है:
1. प्रकृति के सूक्ष्म रूपों का चित्रण: पंत जी प्रकृति के बहुत सूक्ष्म रूपों को भी देख पाते हैं। वे केवल बादल या पर्वत ही नहीं, बल्कि जल की बूंदों, झरनों की आवाज, बादलों की लहराती कतारों का भी बारीकी से चित्रण करते हैं।
2. कोमल भावनाओं का चित्रण: उनकी कविता में प्रकृति के प्रति कोमल भावनाएँ व्यक्त हुई हैं। वे पर्वतों को बर्फ की चादर ओढ़े हुए, झुके हुए दिखाते हैं - यह उनकी कोमल दृष्टि का प्रमाण है।
3. सुंदर उपमाओं का प्रयोग: वे प्रकृति के विभिन्न रूपों की तुलना मोती, मणि, मुक्ता, चाँदी, दूध-फेन जैसी कोमल और सुंदर वस्तुओं से करते हैं। यह उनकी सुकुमार दृष्टि को दर्शाता है।
4. ध्वनियों का चित्रण: वे केवल दृश्य ही नहीं, बल्कि ध्वनियों का भी चित्रण करते हैं। 'झर-झर' झरनों की आवाज, हवा के साथ मिलकर बना स्वर - यह सब उनकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
5. प्रकृति का मानवीकरण: वे प्रकृति को मानवीय रूप देते हैं। पर्वत चादर ओढ़ते हैं, झुकते हैं, बादल लहराते हैं - यह सब उनकी सुकुमार कल्पना का परिणाम है।
6. भाव-प्रवणता: उनकी कविता में प्रकृति के प्रति गहरी भाव-प्रवणता है। वे केवल देखते ही नहीं, बल्कि अनुभव भी करते हैं।
इस प्रकार, इस कविता में पंत जी की सुकुमार दृष्टि और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता स्पष्ट झलकती है।
प्रश्न 6. 'श्रृंग-श्रृंग पर मेघ-मालाएँ, मोतिन-से लहराती हैं' - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। [2019]
इस पंक्ति का आशय निम्नलिखित है:
1. शाब्दिक अर्थ: पर्वतों के हर शिखर पर बादलों की कतारें मोतियों की तरह लहरा रही हैं।
2. बादलों का सौंदर्य: कवि ने बादलों की कतारों (मेघ-मालाओं) की तुलना मोतियों की माला से की है। जैसे मोतियों की माला सुंदर और चमकीली होती है, वैसे ही ये बादल भी सुंदर और चमकीले हैं।
3. लहराने का भाव: 'लहराती हैं' शब्द से पता चलता है कि बादल स्थिर नहीं हैं, बल्कि हवा के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं, लहरा रहे हैं। यह गतिशीलता सौंदर्य को और बढ़ा देती है।
4. पर्वतों की शोभा: ये बादल पर्वतों के हर शिखर पर हैं। इससे पर्वतों की शोभा और भी बढ़ गई है। बादल उनके आभूषण की तरह लग रहे हैं।
5. उपमा अलंकार: इस पंक्ति में उपमा अलंकार है - मेघ-मालाओं की तुलना मोतियों से की गई है। 'मोतिन-से' शब्द इस ओर संकेत करता है।
6. मानसिक चित्र: यह पंक्ति पाठक के मन में एक सुंदर चित्र खींचती है - ऊँचे-ऊँचे पर्वत, उनके शिखर, और उन पर सफेद बादलों की लहराती कतारें, मानो किसी ने मोतियों की माला पहना दी हो।
इस प्रकार, यह पंक्ति बादलों और पर्वतों के सौंदर्य का बहुत ही सुंदर चित्रण करती है।
प्रश्न 7. सुमित्रानंदन पंत की भाषा शैली की विशेषताएँ बताइए। [2021]
सुमित्रानंदन पंत की भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
भाषा:
1. संस्कृतनिष्ठ खड़ी बोली: उनकी भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से भरपूर खड़ी बोली है। 'शैल-शिखर', 'तुषार', 'निर्झरिणी', 'विपिन' जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं।
2. प्रवाहपूर्णता: उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है। पढ़ते समय रुकावट महसूस नहीं होती।
3. चित्रात्मकता: उनकी भाषा चित्र खींचती है। पढ़ते हुए हम पर्वत, बादल, झरने सब अपनी आँखों के सामने देख सकते हैं।
4. संगीतात्मकता: उनकी भाषा में संगीत है। 'झर-झर' जैसे शब्द झरने के संगीत को ही शब्द देते हैं।
शैली:
1. प्रकृति चित्रण शैली: वे प्रकृति के विभिन्न रूपों का बहुत ही सुंदर चित्रण करते हैं। इस कविता में पर्वतीय वर्षा का चित्रण इसका उदाहरण है।
2. अलंकारों का प्रयोग: वे अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का सुंदर प्रयोग करते हैं।
3. मानवीकरण शैली: वे प्रकृति के निर्जीव तत्वों में भी जीव डाल देते हैं। पर्वत चादर ओढ़ते हैं, झुकते हैं - यह मानवीकरण है।
4. छायावादी शैली: वे छायावादी युग के कवि हैं, इसलिए उनकी शैली में कल्पनाशीलता और भाव-प्रवणता है।
5. सौंदर्य-चेतना: उनकी शैली में सौंदर्य के प्रति गहरी चेतना है। वे हर चीज़ में सौंदर्य देखते हैं और उसे व्यक्त करते हैं।
इस प्रकार, पंत जी की भाषा शैली अत्यंत सुंदर और प्रभावशाली है।
प्रश्न 8. कवि ने पर्वतों पर पड़ रही वर्षा को किस प्रकार चित्रित किया है? [2018]
कवि ने पर्वतों पर पड़ रही वर्षा का बहुत ही सुंदर चित्रण किया है:
1. पर्वतों की स्थिति: पर्वत वर्षा के पानी से भीगकर झुके हुए प्रतीत होते हैं। उन्होंने बर्फ की सफेद चादर ओढ़ रखी है और वे लगातार बरस रहे हैं। 'शैल-शिखर-श्रृंखला विकल, हो वर्षा-वर्ष बरस रहे' - यह वर्षा के निरंतर होने को दर्शाता है।
2. जल-बूंदों का गिरना: पर्वतों के शिखरों से जल-बूंदें मोतियों की तरह बिखर रही हैं। ये बूँदें काली चट्टानों पर गिरकर दूध के फेन की तरह सफेद होकर ठहर जाती हैं।
3. झरनों का बहना: वर्षा के कारण झरने उफान पर हैं। वे लगातार झर-झर की आवाज के साथ बह रहे हैं और उनका स्वर हवा के साथ मिलकर और मधुर हो गया है।
4. नदियों का उतरना: नदियाँ आकाश से उतरती हुई सी लग रही हैं, चाँदी की तरह चमक रही हैं।
5. बादलों का छाना: पर्वतों के हर शिखर पर बादलों की कतारें लहरा रही हैं, जो कभी प्रकाश की किरणों की तरह चमकती हैं, कभी छाया की तरह फैल जाती हैं।
6. समग्र प्रभाव: वर्षा ने पूरे पर्वतीय क्षेत्र को भिगो दिया है। चारों ओर हरियाली, झरनों का संगीत, बादलों की कतारें - सब मिलकर एक अद्भुत दृश्य का निर्माण कर रहे हैं।
इस प्रकार, कवि ने पर्वतों पर पड़ रही वर्षा का बहुत ही सजीव और सुंदर चित्रण किया है।
प्रश्न 9. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए। [2020]
इस कविता का मूलभाव निम्नलिखित है:
1. प्रकृति के सौंदर्य का चित्रण: इस कविता का प्रमुख भाव पर्वतीय क्षेत्र में वर्षा ऋतु के सौंदर्य का चित्रण है। कवि ने पर्वतों, बादलों, झरनों, नदियों, जल-बूंदों - सब के सौंदर्य को बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है।
2. प्रकृति के प्रति प्रेम: कवि का प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम इस कविता में झलकता है। वे प्रकृति के हर रूप को, हर ध्वनि को, हर दृश्य को प्रेम से देखते और उसका वर्णन करते हैं।
3. प्रकृति का मानवीकरण: कवि ने प्रकृति को मानवीय रूप दिया है। पर्वत चादर ओढ़ते हैं, झुकते हैं, बादल लहराते हैं, झरने गाते हैं - यह सब प्रकृति में जीव डालने का प्रयास है।
4. सौंदर्य के प्रति संवेदनशीलता: कवि की संवेदनशीलता इस कविता में स्पष्ट है। वे जल की एक बूँद में भी मोती जैसा सौंदर्य देखते हैं।
5. ऋतु-चित्रण: यह कविता वर्षा ऋतु का सुंदर ऋतु-चित्रण है। इसमें वर्षा के सभी रूपों - बादल, बूँदें, झरने, नदियाँ - का वर्णन है।
6. आनंद की अनुभूति: पूरी कविता में प्रकृति के सौंदर्य को देखकर होने वाले आनंद की अनुभूति व्यक्त हुई है। कवि स्वयं इस सौंदर्य में डूबा हुआ है।
इस प्रकार, यह कविता पर्वतीय वर्षा के सौंदर्य और उससे उत्पन्न आनंद की अभिव्यक्ति है।
प्रश्न 10. 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता में प्रयुक्त प्रमुख अलंकारों का उल्लेख कीजिए। [2019]
इस कविता में निम्नलिखित प्रमुख अलंकारों का प्रयोग हुआ है:
1. अनुप्रास अलंकार:
'झर-झर निर्झर, झरते झर-झर झरते हैं' - यहाँ 'झ' वर्ण की बार-बार आवृत्ति हुई है।
'शैल-शिखर-श्रृंखला' - यहाँ 'श' वर्ण की आवृत्ति है।
'मिश्रित पवन-प्रवाह-स्वर से' - यहाँ 'प' और 'व' वर्णों की आवृत्ति है।
2. उपमा अलंकार:
'श्वेत शिशिर-तुषार-हिम-रजत-सी' - नदी की तुलना चाँदी से की गई है।
'मणि-मुक्ता-मंडित-सी' - नदी की तुलना मणि-मुक्ता से मंडित से की गई है।
'मोती-से बिखर रहीं' - जल-बूंदों की तुलना मोती से की गई है।
'दूध-फेन-सी' - बूंदों की तुलना दूध के फेन से की गई है।
'मोतिन-से लहराती हैं' - मेघ-मालाओं की तुलना मोतियों से की गई है।
3. रूपक अलंकार:
'विस्तृत विपिन-वन-शोभा-खनि' - नदी को जंगलों की शोभा की खान कहा गया है।
4. मानवीकरण अलंकार:
'ओढ़ तुषार-श्वेत चादर, शैल-शिखर-श्रृंखला ढले' - पर्वतों को चादर ओढ़ते और झुकते हुए दिखाया गया है।
'मेघ-मालाएँ, मोतिन-से लहराती हैं' - बादलों को लहराते हुए दिखाया गया है।
5. उत्प्रेक्षा अलंकार:
'श्वेत शिशिर-तुषार-हिम-रजत-सी' - यहाँ 'सी' के प्रयोग से उत्प्रेक्षा का आभास होता है।
'मणि-मुक्ता-मंडित-सी' - यहाँ भी 'सी' के प्रयोग से उत्प्रेक्षा का आभास होता है।
6. ध्वन्यात्मक अलंकार:
'झर-झर' - झरने के बहने की ध्वनि को व्यक्त करता है।
इस प्रकार, इस कविता में अनेक अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है, जो कविता के सौंदर्य को और बढ़ा देता है।
7. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय
- कवि परिचय: सुमित्रानंदन पंत का जीवन, रचनाएँ, भाषा शैली [2020]
- प्रकृति चित्रण: पर्वत, बादल, झरने, नदियाँ, जल-बूंदों का वर्णन [2020, 2021]
- पद्यांशों की व्याख्या: सभी प्रमुख पंक्तियों का भावार्थ [2018, 2019, 2020, 2021]
- अलंकारों का प्रयोग: अनुप्रास, उपमा, मानवीकरण, उत्प्रेक्षा [2018, 2019]
- प्रकृति का सुकुमार कवि: पंत जी को यह उपाधि क्यों दी गई [2020]
- वर्षा ऋतु का चित्रण: पर्वतीय वर्षा का सौंदर्य [2018]
- भाषा शैली: पंत जी की भाषा और शैली की विशेषताएँ [2021]
- मूलभाव: कविता का केंद्रीय भाव [2020]
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- कवि: सुमित्रानंदन पंत (1900-1977), 'प्रकृति का सुकुमार कवि'
- जन्म: कौसानी, उत्तराखंड
- रचनाएँ: पल्लव, ग्रंथि, गुंजन, युगांत, लोकायतन
- पुरस्कार: पद्मभूषण, ज्ञानपीठ
- युग: छायावाद
- काव्य संग्रह: 'पल्लव' से ली गई है
- मुख्य विषय: पर्वतीय वर्षा का सौंदर्य चित्रण
- प्रमुख अलंकार: अनुप्रास, उपमा, मानवीकरण
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"शैल-शिखर-श्रृंखला विकल, हो वर्षा-वर्ष बरस रहे।"
"धाराधर झर-झर निर्झर, झरते झर-झर झरते हैं।"
"शैल-शिखरों से गिरी जल-बूंदें, मोती-से बिखर रहीं।"
"श्रृंग-श्रृंग पर मेघ-मालाएँ, मोतिन-से लहराती हैं।"
8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न
टिप्स: सीधा और सटीक उत्तर दें। केवल मुख्य बिंदु लिखें। 2-3 वाक्यों में उत्तर पूरा करें।
उदाहरण: प्रश्न: 'पर्वत प्रदेश में पावस' कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर: इस कविता के कवि सुमित्रानंदन पंत हैं, जिन्हें 'प्रकृति का सुकुमार कवि' कहा जाता है।
📝 4-5 अंक प्रश्न
टिप्स: उत्तर को तीन भागों में बाँटें - परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष। पंक्ति की व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें। अलंकारों का उल्लेख करें।
उदाहरण: प्रश्न: 'शैल-शिखरों से गिरी जल-बूंदें, मोती-से बिखर रहीं' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: [जैसा ऊपर दीर्घ प्रश्न 2 में दिया गया है]
9. हब लिंक
संबंधित अध्ययन सामग्री के लिए नीचे दिए गए विषय हब देखें: