कर्मधारय समास वह विशेष प्रकार है जहाँ पहला पद विशेषण और दूसरा पद विशेष्य होता है, या फिर दोनों पदों में उपमान-उपमेय (तुलना) का संबंध होता है। 'नीलकमल', 'महात्मा', 'पीतांबर' जैसे सुंदर और अर्थपूर्ण शब्द इसी समास की देन हैं। यह तत्पुरुष समास का ही एक रूप है, पर अपनी विशिष्ट पहचान के कारण अलग माना जाता है।
✅ उपयुक्त कक्षाएँ: कक्षा 8–9 (परिचय व अभ्यास) | कक्षा 9–10 (उच्च स्तर प्रयोग)
1. कर्मधारय समास का परिचय
सोचिए, अगर आपको "नीला है जो कमल" कहने की बजाय सिर्फ "नीलकमल" कहना हो। या "महान है जो आत्मा" के लिए "महात्मा" बोलना हो। ये शब्द सुनने में ही सुंदर लगते हैं, है न? कर्मधारय समास ऐसे ही शब्द बनाता है जहाँ एक शब्द दूसरे की विशेषता बताता है या दोनों के बीच तुलना का संबंध होता है। यह समास वास्तव में एक ख़ास तरह का तत्पुरुष समास ही है, लेकिन क्योंकि इसमें विशेषण-विशेष्य या उपमा का संबंध साफ़ दिखता है, इसलिए इसे अलग नाम दे दिया गया है। 'कर्मधारय' नाम भी बताता है कि इसमें 'धारण करने वाला' (विशेषण) और 'जिसमें धारण किया जाए' (विशेष्य) का संबंध है।
रोज़मर्रा की भाषा में भी हम इसका खूब प्रयोग करते हैं। जब आप किसी को 'महोदय' (महान उदय वाला) कहते हैं, या 'चंद्रमुखी' (चंद्रमा जैसा मुख वाली) कहते हैं, तो आप कर्मधारय समास के ही शब्द बोल रहे होते हैं।
2. परिभाषा
परिभाषा: वह तत्पुरुष समास जिसमें पूर्वपद (पहला पद) विशेषण और उत्तरपद (दूसरा पद) विशेष्य हो अथवा दोनों पदों में उपमान-उपमेय का संबंध हो, कर्मधारय समास कहलाता है। इसमें भी उत्तर पद प्रधान ही रहता है, और विभक्ति चिह्न ('है', 'जैसा', 'के समान') का लोप होता है।
3. मुख्य बिंदु / पहचान
कर्मधारय समास को पहचानने के लिए ये सरल तरीके अपनाएँ:
- विशेषण-विशेष्य संबंध: सबसे आसान पहचान। पहला शब्द (पूर्वपद) किसी गुण, रंग, संख्या आदि को बताता है और दूसरा शब्द (उत्तरपद) उस गुण वाली वस्तु या व्यक्ति है। जैसे: लाल + फूल = लालफूल (लाल है जो फूल)।
- उपमा (तुलना) का भाव: अगर पहला या दूसरा पद किसी की तुलना कर रहा हो, तो भी वह कर्मधारय है। जैसे: चंद्र + मुख = चंद्रमुख (चंद्र के समान मुख)। यहाँ 'जैसा' शब्द लुप्त हुआ।
- विग्रह में 'है जो', 'के समान', 'जैसा' आता है: जब आप विग्रह करेंगे तो इनमें से कोई शब्द अवश्य मिलेगा। 'महात्मा' = महान है जो आत्मा। 'पुरुषोत्तम' = पुरुषों में उत्तम (है जो)।
- उत्तर पद प्रधान: तत्पुरुष की तरह इसमें भी दूसरा पद प्रधान होता है। 'नीलकमल' में 'कमल' प्रधान है, नील उसका गुण बता रहा है।
4. कर्मधारय समास के प्रमुख प्रकार
कर्मधारय समास के दो स्पष्ट प्रकार माने जाते हैं, जो इस बात पर निर्भर करते हैं कि पदों के बीच संबंध कैसा है:
| क्रम | प्रकार का नाम | संबंध / पहचान | उदाहरण | विग्रह |
|---|---|---|---|---|
| 1 | विशेषण-विशेष्य कर्मधारय | पूर्वपद विशेषण, उत्तरपद विशेष्य। गुण, रंग, संख्या आदि का बोध। | नीलकमल, त्रिभुवन, सज्जन | नीला है जो कमल, तीन हैं जो भुवन, सत् (अच्छा) है जो जन |
| 2 | उपमान-उपमेय कर्मधारय | एक पद दूसरे पद की उपमा (तुलना) देता है। 'सा', 'जैसा', 'समान' का भाव। | चंद्रमुख, मृगनयनी, कमलनयन | चंद्र के समान मुख, मृग (हिरण) के समान नयन, कमल के समान नयन |
नोट: कई बार एक ही शब्द दोनों प्रकार में फिट हो सकता है। जैसे 'पीतांबर' – पीला है जो अंबर (वस्त्र) – विशेषण-विशेष्य। इसे 'पीले के समान अंबर' भी कह सकते हैं – उपमान-उपमेय। अर्थ के अनुसार विग्रह तय होता है।
5. उदाहरण
विभिन्न प्रकार के कर्मधारय समास के उदाहरण:
- विशेषण-विशेष्य वाले: महादेव (महान हैं जो देव), सप्तर्षि (सात हैं जो ऋषि), सत्संग (सत् (अच्छा) है जो संग), दुर्वासना (दुःखद है जो वासना)।
- उपमान-उपमेय वाले: घनश्याम (घन (बादल) के समान श्याम), करकमल (कर (हाथ) जो कमल के समान हैं), कुसुमकोमल (कुसुम (फूल) के समान कोमल)।
- रोजमर्रा के: नवविवाहित (नया है जो विवाहित), द्विचक्र (दो हैं जो चक्र), महानगर (महान (बड़ा) है जो नगर)।
- व्यक्तिवाचक नाम: लंबोदर (लंबा है उदर जिसका – गणेशजी), विष्णुभगत (विष्णु के भगत – भक्त)।
6. वाक्य में प्रयोग
कर्मधारय समास से बने शब्द वाक्य में संज्ञा या विशेषण की भूमिका निभाते हैं। जब ये संज्ञा होते हैं (जैसे नीलकमल, महात्मा) तो लिंग, वचन और कारक के अनुसार इनका रूप बदल सकता है, और यह परिवर्तन उत्तर पद (विशेष्य) के अनुसार होगा। जब ये विशेषण होते हैं (जैसे दयालु, कमलनयन) तो ये विशेष्य के लिंग-वचन के अनुसार बदलते हैं।
उदाहरण (संज्ञा): "उस नीलकमल की सुंदरता देखते ही बनती थी।" यहाँ 'नीलकमल' पुल्लिंग, एकवचन में है क्योंकि 'कमल' पुल्लिंग है।
उदाहरण (विशेषण): "वह कमलनयनी युवती गाना गा रही थी।" यहाँ 'कमलनयनी' विशेषण, स्त्रीलिंग, एकवचन में है क्योंकि 'युवती' स्त्रीलिंग है।
7. सामान्य भ्रम व सावधानियाँ
कर्मधारय को तत्पुरुष के अन्य भेदों या बहुव्रीहि से अलग पहचानना ज़रूरी है:
- कर्मधारय vs अन्य तत्पुरुष: सभी कर्मधारय, तत्पुरुष हैं, लेकिन सभी तत्पुरुष, कर्मधारय नहीं। अगर संबंध सिर्फ 'का, के, की' (राजपुत्र) या 'से' (भयभीत) का है, तो वह साधारण तत्पुरुष है। अगर संबंध 'है जो' या 'के समान' का है, तभी वह कर्मधारय है।
- कर्मधारय vs बहुव्रीहि: यह सबसे बड़ा भ्रम है। अंतर स्पष्ट है: कर्मधारय में उत्तर पद प्रधान और सीधा अर्थ देता है। बहुव्रीहि में कोई भी पद प्रधान नहीं होता और अर्थ पूरी तरह नया/अप्रत्यक्ष होता है। 'नीलकमल' (नीला कमल) – कर्मधारय। 'लंबोदर' (लंबा पेट वाला – गणेश) – यहाँ 'लंब' या 'उदर' प्रधान नहीं, बल्कि एक तीसरा अर्थ (गणेश) निकल रहा है, तो यह बहुव्रीहि है।
- 'महात्मा' और 'महामना': 'महात्मा' = महान आत्मा (कर्मधारय, क्योंकि 'आत्मा' प्रधान, सीधा अर्थ)। 'महामना' = महान मन वाला (बहुव्रीहि, क्योंकि 'महा' या 'मना' प्रधान नहीं, बल्कि एक व्यक्ति विशेष का बोध हो रहा है)।
8. परीक्षा उपयोगी तथ्य
- कर्मधारय की परिभाषा में "विशेषण-विशेष्य" और "उपमान-उपमेय" – ये दोनों पद अवश्य लिखें। यह भी स्पष्ट करें कि यह "तत्पुरुष समास का एक भेद है"।
- MCQ में अक्सर दिए गए शब्दों में से कर्मधारय पहचानने को कहा जाता है। नीलकमल, महात्मा, पुरुषोत्तम, चंद्रमुखी जैसे शब्द इसके स्पष्ट उदाहरण हैं।
- विग्रह करने वाले प्रश्नों में, यदि विग्रह में 'है जो', 'के समान', 'जैसा' आता है, तो समास कर्मधारय ही होगा।
- कर्मधारय और बहुव्रीहि में अंतर पूछा जा सकता है। याद रखें: कर्मधारय में उत्तर पद का अर्थ सीधा मिलता है, बहुव्रीहि में नहीं।
9. 🎯 कर्मधारय समास आधारित चुनौती
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर देकर देखें कि आप इस समास को कितना समझ पाए हैं।
1. "महात्मा गांधी" में 'महात्मा' शब्द का विग्रह कीजिए और बताइए कि यह किस प्रकार का कर्मधारय समास है?
2. "चंद्रमुखी" और "चंद्रशेखर" – क्या ये दोनों कर्मधारय समास हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
चंद्रमुखी: विग्रह - चंद्र के समान मुख वाली। इसमें उपमा ('के समान') का भाव है। अतः यह उपमान-उपमेय कर्मधारय समास है।
चंद्रशेखर: विग्रह - चंद्र को शेखर (मुकुट) के रूप में धारण करने वाला (शिव)। यहाँ कोई विशेषण-विशेष्य या उपमा नहीं, बल्कि एक तीसरा अर्थ (शिव) निकल रहा है। अतः यह बहुव्रीहि समास है, कर्मधारय नहीं।
3. "त्रिभुवन" शब्द में प्रधान पद कौन-सा है? यह कर्मधारय के किस प्रकार में आता है?
4. "पुरुषोत्तम" शब्द का विग्रह 'पुरुषों में उत्तम' है। क्या यह कर्मधारय समास है? यदि हाँ, तो किस प्रकार का?
5. "करकमल" शब्द के दो संभावित विग्रह बताइए और हर विग्रह के लिए समास का नाम बताइए।
1. विग्रह: कमल के समान कर (हाथ)। यहाँ उपमा ('के समान') का भाव है। अतः यह उपमान-उपमेय कर्मधारय समास होगा।
2. विग्रह: कर रूपी कमल। यह भी उपमा का ही भाव है, इसलिए यह भी कर्मधारय समास ही रहेगा। (ध्यान रहे, यदि विग्रह 'कमल जैसे हाथ वाला' होता, तो यह बहुव्रीहि हो सकता था)।
6. "सज्जन" और "दुर्जन" – क्या ये दोनों कर्मधारय समास के उदाहरण हैं? दोनों का विग्रह करके सिद्ध कीजिए।
सज्जन: विग्रह - सत् (अच्छा/श्रेष्ठ) है जो जन। (सत् + जन)
दुर्जन: विग्रह - दुः (बुरा) है जो जन। (दुः + जन)
दोनों में पहला पद विशेषण (सत्/दुः) और दूसरा पद विशेष्य (जन) है। अतः दोनों विशेषण-विशेष्य कर्मधारय समास हैं।
7. "मृगनयनी" शब्द का विग्रह 'मृग के समान नयन वाली' है। इस आधार पर बताइए कि इसमें उत्तर पद प्रधान है या नहीं? यह समास क्यों कर्मधारय है?
8. "नीलकंठ" (शिव) और "नीलकमल" – इनमें अंतर स्पष्ट कीजिए। कौन-सा कर्मधारय है और कौन-सा नहीं?
नीलकमल: विग्रह - नीला है जो कमल। 'कमल' प्रधान है, सीधा अर्थ मिलता है। अतः यह कर्मधारय समास है।
नीलकंठ: विग्रह - नीला है कंठ जिसका। यहाँ 'नील' या 'कंठ' प्रधान नहीं है, बल्कि एक तीसरे व्यक्ति (शिव) का बोध हो रहा है जिसका कंठ नीला है। अतः यह बहुव्रीहि समास है, कर्मधारय नहीं।
9. "नवरत्न" शब्द का विग्रह कीजिए। क्या इसे कर्मधारय और बहुव्रीहि दोनों माना जा सकता है? कारण बताइए।
इसे बहुव्रीहि तभी माना जाएगा यदि अर्थ 'नौ रत्नों वाली (कोई वस्तु या उपाधि)' निकले। लेकिन सामान्य प्रयोग में यह कर्मधारय ही है।
10. अपने आस-पास या पाठ्यपुस्तक से ऐसे दो शब्द ढूँढिए जो कर्मधारय समास के हों। उनका विग्रह और समास का प्रकार लिखिए।
1. सुंदरवन: विग्रह - सुंदर है जो वन। प्रकार: विशेषण-विशेष्य कर्मधारय।
2. कुसुमकोमल: विग्रह - कुसुम (फूल) के समान कोमल। प्रकार: उपमान-उपमेय कर्मधारय।
10. सारांश
कर्मधारय समास तत्पुरुष समास का ही एक विशिष्ट रूप है, जिसमें पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य होता है या फिर दोनों में उपमान-उपमेय (तुलना) का संबंध होता है। 'नीलकमल', 'महात्मा', 'चंद्रमुखी' जैसे शब्द इसकी सुंदरता के प्रतीक हैं। इसमें भी उत्तर पद प्रधान रहता है और विग्रह करने पर 'है जो', 'के समान' जैसे शब्द मिलते हैं। इसे बहुव्रीहि समास से अलग पहचानने का सबसे सरल तरीका यह है कि कर्मधारय में समस्त पद का अर्थ उत्तर पद से सीधा मिल जाता है, जबकि बहुव्रीहि में एक तीसरा, नया अर्थ निकलता है।
11. संबंधित विषय संकेत
कर्मधारय के बाद अब समझिए समास का वह प्रकार जहाँ दोनों पद समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं: कक्षा 8-9 • द्वंद्व समास (Dwandwa Samas)
📝 कर्मधारय समास - अभ्यास कार्यपत्रक
कर्मधारय समास की पहचान, भेद और विग्रह पर आधारित विस्तृत अभ्यास प्रश्न।
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