📝 विस्तृत निबंध लेखन - कक्षा 11-12
वर्ष 2019 से 2024 तक CBSE बोर्ड परीक्षाओं में पूछे गए वास्तविक निबंध प्रश्न। प्रत्येक निबंध 400-450 शब्दों में।
🎯 CBSE निबंध लेखन (2019–2024) — 20 प्रश्न
1. "विज्ञान के चमत्कार" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2024, Set 1)
उत्तर:
विज्ञान के चमत्कार
विज्ञान ने मानव सभ्यता को वह गति दी है, जिसकी कल्पना सदियों पहले नहीं की जा सकती थी। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के चमत्कार हमारे जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त हैं। चिकित्सा, कृषि, यातायात, संचार, शिक्षा, मनोरंजन, रक्षा — सभी क्षेत्रों में विज्ञान ने अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने मानव जीवन को अमूल्य वरदान दिए हैं। पहले जहाँ छोटी-छोटी बीमारियाँ जानलेवा हो जाती थीं, वहीं आज गंभीर से गंभीर रोगों का उपचार संभव है। पोलियो, चेचक, क्षय रोग जैसी महामारियों पर विजय प्राप्त हुई है। अंग प्रत्यारोपण, हृदय की बाईपास सर्जरी, मस्तिष्क की जटिल शल्यक्रियाएँ आज सामान्य हो गई हैं। कोरोना काल में वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड समय में वैक्सीन विकसित कर करोड़ों जीवन बचाए। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई, सीटी स्कैन जैसी तकनीकों ने रोग निदान को सटीक और सरल बना दिया है।
संचार के क्षेत्र में विज्ञान ने क्रांति ला दी है। आज हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने से जुड़ सकते हैं। मोबाइल फोन, इंटरनेट, ईमेल, वीडियो कॉलिंग, सोशल मीडिया ने दूरियों को समाप्त कर दिया है। कोरोना काल में डिजिटल तकनीक ने शिक्षा, व्यवसाय और अर्थव्यवस्था को संचालित रखा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, 3D प्रिंटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स अब हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
यातायात के साधनों ने दूरियाँ समेट दी हैं। बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन, साइकिल से हवाई जहाज तक का सफर विज्ञान ने संभव बनाया है। मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम रखा, मंगल पर यान भेजा। अंतरिक्ष में उपग्रह हमारे संचार, मौसम पूर्वानुमान, नौवहन और रक्षा को सशक्त बना रहे हैं।
कृषि में विज्ञान ने हरित क्रांति का सूत्रपात किया। उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, आधुनिक सिंचाई पद्धतियाँ, ट्रैक्टर और कंबाइन हार्वेस्टर ने उत्पादन कई गुना बढ़ाया। भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है। बिजली ने अंधकार मिटाकर जीवन को रोशन किया।
किंतु विज्ञान का दुरुपयोग भी हो रहा है। परमाणु बम, रासायनिक हथियार, जैविक हथियार — विज्ञान का यह विकृत रूप मानवता के लिए अभिशाप है। पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण — ये विज्ञान के अविवेकपूर्ण उपयोग के परिणाम हैं।
विज्ञान न तो वरदान है, न अभिशाप। वह एक शक्ति है। उसका उपयोग कैसे किया जाए, यह मानव के हाथ में है। विज्ञान के चमत्कारों का सदुपयोग ही मानवता का कल्याण कर सकता है।
(लगभग 430 शब्द)
विज्ञान के चमत्कार
विज्ञान ने मानव सभ्यता को वह गति दी है, जिसकी कल्पना सदियों पहले नहीं की जा सकती थी। आज का युग विज्ञान का युग है। विज्ञान के चमत्कार हमारे जीवन के हर क्षेत्र में व्याप्त हैं। चिकित्सा, कृषि, यातायात, संचार, शिक्षा, मनोरंजन, रक्षा — सभी क्षेत्रों में विज्ञान ने अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं।
चिकित्सा के क्षेत्र में विज्ञान ने मानव जीवन को अमूल्य वरदान दिए हैं। पहले जहाँ छोटी-छोटी बीमारियाँ जानलेवा हो जाती थीं, वहीं आज गंभीर से गंभीर रोगों का उपचार संभव है। पोलियो, चेचक, क्षय रोग जैसी महामारियों पर विजय प्राप्त हुई है। अंग प्रत्यारोपण, हृदय की बाईपास सर्जरी, मस्तिष्क की जटिल शल्यक्रियाएँ आज सामान्य हो गई हैं। कोरोना काल में वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड समय में वैक्सीन विकसित कर करोड़ों जीवन बचाए। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड, एमआरआई, सीटी स्कैन जैसी तकनीकों ने रोग निदान को सटीक और सरल बना दिया है।
संचार के क्षेत्र में विज्ञान ने क्रांति ला दी है। आज हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने से जुड़ सकते हैं। मोबाइल फोन, इंटरनेट, ईमेल, वीडियो कॉलिंग, सोशल मीडिया ने दूरियों को समाप्त कर दिया है। कोरोना काल में डिजिटल तकनीक ने शिक्षा, व्यवसाय और अर्थव्यवस्था को संचालित रखा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स, 3D प्रिंटिंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स अब हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं।
यातायात के साधनों ने दूरियाँ समेट दी हैं। बैलगाड़ी से बुलेट ट्रेन, साइकिल से हवाई जहाज तक का सफर विज्ञान ने संभव बनाया है। मनुष्य ने चंद्रमा पर कदम रखा, मंगल पर यान भेजा। अंतरिक्ष में उपग्रह हमारे संचार, मौसम पूर्वानुमान, नौवहन और रक्षा को सशक्त बना रहे हैं।
कृषि में विज्ञान ने हरित क्रांति का सूत्रपात किया। उन्नत बीज, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, आधुनिक सिंचाई पद्धतियाँ, ट्रैक्टर और कंबाइन हार्वेस्टर ने उत्पादन कई गुना बढ़ाया। भारत आज खाद्यान्न में आत्मनिर्भर है। बिजली ने अंधकार मिटाकर जीवन को रोशन किया।
किंतु विज्ञान का दुरुपयोग भी हो रहा है। परमाणु बम, रासायनिक हथियार, जैविक हथियार — विज्ञान का यह विकृत रूप मानवता के लिए अभिशाप है। पर्यावरण प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, ओजोन परत का क्षरण — ये विज्ञान के अविवेकपूर्ण उपयोग के परिणाम हैं।
विज्ञान न तो वरदान है, न अभिशाप। वह एक शक्ति है। उसका उपयोग कैसे किया जाए, यह मानव के हाथ में है। विज्ञान के चमत्कारों का सदुपयोग ही मानवता का कल्याण कर सकता है।
(लगभग 430 शब्द)
2. "जल संरक्षण : आवश्यकता एवं उपाय" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2024, Set 2)
उत्तर:
जल संरक्षण : आवश्यकता एवं उपाय
जल ही जीवन है। यह केवल एक कथन नहीं, वरन् वैज्ञानिक सत्य है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल से हुई और आज भी जीवन का अस्तित्व जल पर ही टिका है। मानव शरीर का लगभग 70% भाग जल है। फिर भी हम इस अमूल्य संसाधन के महत्व को अनदेखा कर रहे हैं। आज जल संकट विश्व की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है।
पृथ्वी का 71% भाग जल से ढका है, किंतु इसमें से मात्र 2.5% जल ही पीने योग्य मीठा जल है। यह अल्प मात्रा भी समान रूप से वितरित नहीं है। अधिकांश मीठा जल हिमनदों और ध्रुवीय क्षेत्रों में जमा है। शेष जल का बड़ा भाग भूगर्भ में है, जिसे निकालना सरल नहीं। इस प्रकार उपलब्ध जल की मात्रा अत्यंत सीमित है।
जल संरक्षण की आवश्यकता अनेक कारणों से अनिवार्य है। बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की माँग निरंतर बढ़ रही है। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने जल स्रोतों को प्रदूषित कर दिया है। कृषि में अत्यधिक जल दोहन से भूजल स्तर तीव्र गति से गिर रहा है। वनों की कटाई से वर्षा जल के प्राकृतिक भंडारण की क्षमता कम हुई है। चेन्नई जल संकट 2019, कैपटाउन का डे जीरो संकट, लातूर में पानी के लिए हाहाकार — ये घटनाएँ गंभीर संकेत हैं।
जल संरक्षण के अनेक प्रभावी उपाय हैं। वर्षा जल संचयन सबसे कारगर उपाय है। घरों की छतों से वर्षा जल सीधे भूमिगत टैंकों या कुओं में संग्रहित किया जा सकता है। तमिलनाडु में वर्षा जल संचयन अनिवार्य करने के बाद भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
कृषि क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई और फव्वारा सिंचाई से 70% तक जल बचाया जा सकता है। कम पानी वाली फसलें — बाजरा, ज्वार, मक्का — को बढ़ावा देना चाहिए। धान और गन्ना जैसी अधिक जल वाली फसलों के लिए वैकल्पिक तकनीकें अपनानी होंगी।
घरेलू स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। नलों की मरम्मत, रिसाव रोकना, नहाने में बाल्टी का उपयोग, ब्रश करते समय नल बंद रखना, वाहन धोने में पाइप की जगह बाल्टी का प्रयोग — ये साधारण आदतें बहुमूल्य जल बचा सकती हैं।
उद्योगों में जल पुनर्चक्रण अनिवार्य किया जाना चाहिए। प्रदूषित जल को शोधित कर पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। नमामि गंगे, जल शक्ति अभियान जैसी सरकारी योजनाओं को जन-आंदोलन बनाना होगा। विद्यालयों में जल संरक्षण शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।
जल संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं का दायित्व नहीं है। यह हम सबका सामूहिक दायित्व है। जल की एक-एक बूँद अनमोल है। जल है तो कल है। आइए, संकल्प लें कि हम जल का सदुपयोग करेंगे, व्यर्थ नहीं बहने देंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमृत को सुरक्षित रखेंगे।
(लगभग 445 शब्द)
जल संरक्षण : आवश्यकता एवं उपाय
जल ही जीवन है। यह केवल एक कथन नहीं, वरन् वैज्ञानिक सत्य है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति जल से हुई और आज भी जीवन का अस्तित्व जल पर ही टिका है। मानव शरीर का लगभग 70% भाग जल है। फिर भी हम इस अमूल्य संसाधन के महत्व को अनदेखा कर रहे हैं। आज जल संकट विश्व की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक है।
पृथ्वी का 71% भाग जल से ढका है, किंतु इसमें से मात्र 2.5% जल ही पीने योग्य मीठा जल है। यह अल्प मात्रा भी समान रूप से वितरित नहीं है। अधिकांश मीठा जल हिमनदों और ध्रुवीय क्षेत्रों में जमा है। शेष जल का बड़ा भाग भूगर्भ में है, जिसे निकालना सरल नहीं। इस प्रकार उपलब्ध जल की मात्रा अत्यंत सीमित है।
जल संरक्षण की आवश्यकता अनेक कारणों से अनिवार्य है। बढ़ती जनसंख्या के कारण जल की माँग निरंतर बढ़ रही है। औद्योगीकरण और शहरीकरण ने जल स्रोतों को प्रदूषित कर दिया है। कृषि में अत्यधिक जल दोहन से भूजल स्तर तीव्र गति से गिर रहा है। वनों की कटाई से वर्षा जल के प्राकृतिक भंडारण की क्षमता कम हुई है। चेन्नई जल संकट 2019, कैपटाउन का डे जीरो संकट, लातूर में पानी के लिए हाहाकार — ये घटनाएँ गंभीर संकेत हैं।
जल संरक्षण के अनेक प्रभावी उपाय हैं। वर्षा जल संचयन सबसे कारगर उपाय है। घरों की छतों से वर्षा जल सीधे भूमिगत टैंकों या कुओं में संग्रहित किया जा सकता है। तमिलनाडु में वर्षा जल संचयन अनिवार्य करने के बाद भूजल स्तर में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
कृषि क्षेत्र में ड्रिप सिंचाई और फव्वारा सिंचाई से 70% तक जल बचाया जा सकता है। कम पानी वाली फसलें — बाजरा, ज्वार, मक्का — को बढ़ावा देना चाहिए। धान और गन्ना जैसी अधिक जल वाली फसलों के लिए वैकल्पिक तकनीकें अपनानी होंगी।
घरेलू स्तर पर छोटे-छोटे प्रयास बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं। नलों की मरम्मत, रिसाव रोकना, नहाने में बाल्टी का उपयोग, ब्रश करते समय नल बंद रखना, वाहन धोने में पाइप की जगह बाल्टी का प्रयोग — ये साधारण आदतें बहुमूल्य जल बचा सकती हैं।
उद्योगों में जल पुनर्चक्रण अनिवार्य किया जाना चाहिए। प्रदूषित जल को शोधित कर पुनः उपयोग में लाया जा सकता है। नमामि गंगे, जल शक्ति अभियान जैसी सरकारी योजनाओं को जन-आंदोलन बनाना होगा। विद्यालयों में जल संरक्षण शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए।
जल संरक्षण केवल सरकार या संस्थाओं का दायित्व नहीं है। यह हम सबका सामूहिक दायित्व है। जल की एक-एक बूँद अनमोल है। जल है तो कल है। आइए, संकल्प लें कि हम जल का सदुपयोग करेंगे, व्यर्थ नहीं बहने देंगे और आने वाली पीढ़ियों के लिए इस अमृत को सुरक्षित रखेंगे।
(लगभग 445 शब्द)
3. "डिजिटल इंडिया : लाभ एवं चुनौतियाँ" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2023, Set 1)
उत्तर:
डिजिटल इंडिया : लाभ एवं चुनौतियाँ
1 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ 'डिजिटल इंडिया' अभियान भारत की डिजिटल क्रांति का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसका उद्देश्य भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करना है। यह अभियान तीन मुख्य लक्ष्यों — डिजिटल अवसंरचना, डिजिटल साक्षरता और डिजिटल सेवाओं — पर केंद्रित है।
डिजिटल इंडिया के अनेक लाभ हैं। इसने शासन व्यवस्था में पारदर्शिता लाई है। आधार कार्ड, डिजिलॉकर, ई-साइन, यूपीआई, भीम ऐप ने डिजिटल लेनदेन को सरल, सुरक्षित और सस्ता बनाया है। सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुँच रहा है, जिससे बिचौलियों का खेल समाप्त हुआ है। ई-गवर्नेंस से पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार में कमी आई है।
शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति ने दूरस्थ शिक्षा को संभव बनाया है। कोरोना काल में ऑनलाइन कक्षाओं, डिजिटल पुस्तकालयों, ई-पाठशाला, दीक्षा प्लेटफॉर्म ने शिक्षा की गाड़ी रुकने नहीं दी। स्वास्थ्य सेवाओं में ई-हॉस्पिटल, टेलीमेडिसिन, ई-संजीवनी ने गाँवों तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाई हैं।
डिजिटल पेमेंट ने अर्थव्यवस्था को गति दी है। नोटबंदी के बाद यूपीई ने कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दिया। आज गली-मोहल्ले की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक, रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर पाँच सितारा होटल तक — सब जगह डिजिटल पेमेंट स्वीकार किए जा रहे हैं।
किंतु डिजिटल इंडिया के समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी हैं। डिजिटल साक्षरता का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, वृद्धजनों में, महिलाओं में डिजिटल जागरूकता अभी भी अपर्याप्त है। इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी दूरस्थ क्षेत्रों में सुदृढ़ नहीं है। बिजली की अनियमित आपूर्ति भी बाधक है।
साइबर सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय है। फिशिंग, वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, हैकिंग, रैंसमवेयर अटैक — ये डिजिटल इंडिया की बढ़ती चुनौतियाँ हैं। डिजिटल विभाजन भी एक बड़ी समस्या है। शहर और गाँव, अमीर और गरीब, पढ़े-लिखे और अनपढ़ के बीच डिजिटल पहुँच का अंतर चिंताजनक है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं। डिजिटल साक्षरता अभियान को व्यापक बनाना होगा। सस्ता इंटरनेट, सुदृढ़ अवसंरचना, साइबर सुरक्षा के कड़े कानून — ये डिजिटल इंडिया की सफलता के लिए अनिवार्य हैं।
डिजिटल इंडिया केवल एक सरकारी योजना नहीं, वरन् एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। इसके लक्ष्य तभी साकार होंगे जब हर नागरिक इसमें सहभागी बनेगा। डिजिटल सशक्तीकरण ही सशक्त भारत का मार्ग है।
(लगभग 440 शब्द)
डिजिटल इंडिया : लाभ एवं चुनौतियाँ
1 जुलाई 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ 'डिजिटल इंडिया' अभियान भारत की डिजिटल क्रांति का महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसका उद्देश्य भारत को डिजिटल रूप से सशक्त समाज और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित करना है। यह अभियान तीन मुख्य लक्ष्यों — डिजिटल अवसंरचना, डिजिटल साक्षरता और डिजिटल सेवाओं — पर केंद्रित है।
डिजिटल इंडिया के अनेक लाभ हैं। इसने शासन व्यवस्था में पारदर्शिता लाई है। आधार कार्ड, डिजिलॉकर, ई-साइन, यूपीआई, भीम ऐप ने डिजिटल लेनदेन को सरल, सुरक्षित और सस्ता बनाया है। सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के खाते में पहुँच रहा है, जिससे बिचौलियों का खेल समाप्त हुआ है। ई-गवर्नेंस से पारदर्शिता बढ़ी है और भ्रष्टाचार में कमी आई है।
शिक्षा के क्षेत्र में डिजिटल क्रांति ने दूरस्थ शिक्षा को संभव बनाया है। कोरोना काल में ऑनलाइन कक्षाओं, डिजिटल पुस्तकालयों, ई-पाठशाला, दीक्षा प्लेटफॉर्म ने शिक्षा की गाड़ी रुकने नहीं दी। स्वास्थ्य सेवाओं में ई-हॉस्पिटल, टेलीमेडिसिन, ई-संजीवनी ने गाँवों तक स्वास्थ्य सुविधाएँ पहुँचाई हैं।
डिजिटल पेमेंट ने अर्थव्यवस्था को गति दी है। नोटबंदी के बाद यूपीई ने कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दिया। आज गली-मोहल्ले की दुकान से लेकर बड़े मॉल तक, रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर पाँच सितारा होटल तक — सब जगह डिजिटल पेमेंट स्वीकार किए जा रहे हैं।
किंतु डिजिटल इंडिया के समक्ष अनेक चुनौतियाँ भी हैं। डिजिटल साक्षरता का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में, वृद्धजनों में, महिलाओं में डिजिटल जागरूकता अभी भी अपर्याप्त है। इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी दूरस्थ क्षेत्रों में सुदृढ़ नहीं है। बिजली की अनियमित आपूर्ति भी बाधक है।
साइबर सुरक्षा एक गंभीर चिंता का विषय है। फिशिंग, वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, हैकिंग, रैंसमवेयर अटैक — ये डिजिटल इंडिया की बढ़ती चुनौतियाँ हैं। डिजिटल विभाजन भी एक बड़ी समस्या है। शहर और गाँव, अमीर और गरीब, पढ़े-लिखे और अनपढ़ के बीच डिजिटल पहुँच का अंतर चिंताजनक है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए ठोस प्रयास आवश्यक हैं। डिजिटल साक्षरता अभियान को व्यापक बनाना होगा। सस्ता इंटरनेट, सुदृढ़ अवसंरचना, साइबर सुरक्षा के कड़े कानून — ये डिजिटल इंडिया की सफलता के लिए अनिवार्य हैं।
डिजिटल इंडिया केवल एक सरकारी योजना नहीं, वरन् एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण है। इसके लक्ष्य तभी साकार होंगे जब हर नागरिक इसमें सहभागी बनेगा। डिजिटल सशक्तीकरण ही सशक्त भारत का मार्ग है।
(लगभग 440 शब्द)
4. "मेरा प्रिय साहित्यकार" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2023, Set 2)
उत्तर:
मेरा प्रिय साहित्यकार : मुंशी प्रेमचंद
हिंदी साहित्य के आकाश में जितने भी नक्षत्र चमके हैं, उनमें मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे उज्ज्वल है। वे मेरे प्रिय साहित्यकार हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, किंतु 'प्रेमचंद' के नाम से वे अमर हुए। उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, अनुवाद, संपादन — सभी विधाओं में लेखन किया और हर विधा को समृद्ध किया।
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ। उनका बाल्यकाल अभावों में बीता। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया और पिता के देहांत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। इन संघर्षों ने उनके लेखन को गहराई और यथार्थवाद दिया।
प्रेमचंद की रचनाएँ भारतीय ग्रामीण जीवन का दर्पण हैं। 'गोदान' उनका अमर उपन्यास है, जिसमें किसान होरी की त्रासदी को अमर बना दिया। 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'सेवासदन', 'निर्मला' उनके अन्य प्रसिद्ध उपन्यास हैं। 'कफन', 'पूस की रात', 'ईदगाह', 'बड़े भाई साहब', 'शतरंज के खिलाड़ी' उनकी अविस्मरणीय कहानियाँ हैं।
प्रेमचंद के साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है यथार्थवाद। वे जीवन को वैसा ही चित्रित करते हैं, जैसा वह है — न उसे सजाते हैं, न संवारते हैं। उनके पात्र हमारे आसपास ही रहते हैं — होरी, ईश्वर, आलोपी, हामिद, बुढ़िया कफन वाली। ये पात्र जीवंत हैं, संघर्षशील हैं, और अपनी त्रासदी के बावजूद जीने की चाह रखते हैं।
प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं, विचारक भी थे। वे सामाजिक कुरीतियों — छुआछूत, दहेज प्रथा, बाल विवाह, स्त्री शोषण, जमींदारी शोषण — के घोर विरोधी थे। उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, वरन् सामाजिक चेतना जगाने का माध्यम हैं। वे लिखते थे — 'साहित्य समाज का दर्पण होता है।'
प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज, संप्रेषणीय है। वे उर्दू-हिंदी के सम्मिश्रण से एक ऐसी भाषा का निर्माण करते हैं, जो जन-साधारण की भाषा है। उनका लेखन गाँवों की माटी की सुगंध बिखेरता है।
आज भी प्रेमचंद प्रासंगिक हैं। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही ताजा हैं, जितनी अपने समय में थीं। क्योंकि वे जिन समस्याओं को उठाते हैं, वे आज भी विद्यमान हैं। वे हिंदी हृदय की आवाज़ थे, हैं, और रहेंगे। उन्हें पढ़ना मेरे लिए सुखद यात्रा है।
(लगभग 435 शब्द)
मेरा प्रिय साहित्यकार : मुंशी प्रेमचंद
हिंदी साहित्य के आकाश में जितने भी नक्षत्र चमके हैं, उनमें मुंशी प्रेमचंद का नाम सबसे उज्ज्वल है। वे मेरे प्रिय साहित्यकार हैं। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, किंतु 'प्रेमचंद' के नाम से वे अमर हुए। उन्होंने उपन्यास, कहानी, निबंध, अनुवाद, संपादन — सभी विधाओं में लेखन किया और हर विधा को समृद्ध किया।
प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ। उनका बाल्यकाल अभावों में बीता। मात्र 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह हो गया और पिता के देहांत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। इन संघर्षों ने उनके लेखन को गहराई और यथार्थवाद दिया।
प्रेमचंद की रचनाएँ भारतीय ग्रामीण जीवन का दर्पण हैं। 'गोदान' उनका अमर उपन्यास है, जिसमें किसान होरी की त्रासदी को अमर बना दिया। 'गबन', 'कर्मभूमि', 'रंगभूमि', 'सेवासदन', 'निर्मला' उनके अन्य प्रसिद्ध उपन्यास हैं। 'कफन', 'पूस की रात', 'ईदगाह', 'बड़े भाई साहब', 'शतरंज के खिलाड़ी' उनकी अविस्मरणीय कहानियाँ हैं।
प्रेमचंद के साहित्य की सबसे बड़ी विशेषता है यथार्थवाद। वे जीवन को वैसा ही चित्रित करते हैं, जैसा वह है — न उसे सजाते हैं, न संवारते हैं। उनके पात्र हमारे आसपास ही रहते हैं — होरी, ईश्वर, आलोपी, हामिद, बुढ़िया कफन वाली। ये पात्र जीवंत हैं, संघर्षशील हैं, और अपनी त्रासदी के बावजूद जीने की चाह रखते हैं।
प्रेमचंद केवल कथाकार नहीं, विचारक भी थे। वे सामाजिक कुरीतियों — छुआछूत, दहेज प्रथा, बाल विवाह, स्त्री शोषण, जमींदारी शोषण — के घोर विरोधी थे। उनकी रचनाएँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं, वरन् सामाजिक चेतना जगाने का माध्यम हैं। वे लिखते थे — 'साहित्य समाज का दर्पण होता है।'
प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज, संप्रेषणीय है। वे उर्दू-हिंदी के सम्मिश्रण से एक ऐसी भाषा का निर्माण करते हैं, जो जन-साधारण की भाषा है। उनका लेखन गाँवों की माटी की सुगंध बिखेरता है।
आज भी प्रेमचंद प्रासंगिक हैं। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही ताजा हैं, जितनी अपने समय में थीं। क्योंकि वे जिन समस्याओं को उठाते हैं, वे आज भी विद्यमान हैं। वे हिंदी हृदय की आवाज़ थे, हैं, और रहेंगे। उन्हें पढ़ना मेरे लिए सुखद यात्रा है।
(लगभग 435 शब्द)
5. "जलवायु परिवर्तन : कारण एवं निवारण" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2022, Term 2)
उत्तर:
जलवायु परिवर्तन : कारण एवं निवारण
जलवायु परिवर्तन इक्कीसवीं सदी की सबसे गंभीर वैश्विक चुनौती है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, वरन् आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट भी है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़-सूखा, चक्रवात, हिमनदों का पिघलना, समुद्र जलस्तर में वृद्धि — ये सब जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण मानवीय गतिविधियाँ ही हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद से कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस का अंधाधुंध उपयोग बढ़ा है। इनके जलने से कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। ये गैसें सूर्य की गर्मी को पृथ्वी पर रोक लेती हैं, जिससे तापमान बढ़ता है। इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
वनों की अंधाधुंध कटाई जलवायु परिवर्तन का दूसरा बड़ा कारण है। वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पृथ्वी का तापमान संतुलित रखते हैं। किंतु बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण के कारण वन तीव्र गति से काटे जा रहे हैं। अमेजन के वन, जिन्हें 'पृथ्वी के फेफड़े' कहा जाता है, तेजी से सिकुड़ रहे हैं।
कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, पशुपालन से मीथेन उत्सर्जन, औद्योगिक उत्पादन, परिवहन के साधन — ये सब जलवायु परिवर्तन में सहायक हैं। विकसित देश, जहाँ विश्व की केवल 20% जनसंख्या निवास करती है, 75% से अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।
जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम भयावह हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालय के ग्लेशियर सदी के अंत तक समाप्त हो सकते हैं। इससे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। समुद्र जलस्तर बढ़ने से मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे तटीय शहर डूब सकते हैं। मालदीव, तुवालू जैसे देश पूरी तरह समुद्र में समा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन के निवारण के लिए ठोस कदम आवश्यक हैं। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों — सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, बायोमास — को बढ़ावा देना होगा। पेरिस समझौता, कोप सम्मेलन, क्योटो प्रोटोकॉल जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को सफल बनाना होगा।
व्यक्तिगत स्तर पर हम भी योगदान दे सकते हैं। बिजली-पानी की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, प्लास्टिक का कम प्रयोग, वृक्षारोपण, कचरे का पृथक्करण — ये छोटे कदम बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन कोई दूर की समस्या नहीं है। यह यहीं और अभी है। देर न करें, अभी जागें। पृथ्वी हमारी माँ है, उसे बचाना हमारा नैतिक दायित्व है।
(लगभग 445 शब्द)
जलवायु परिवर्तन : कारण एवं निवारण
जलवायु परिवर्तन इक्कीसवीं सदी की सबसे गंभीर वैश्विक चुनौती है। यह केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं, वरन् आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट भी है। पृथ्वी का बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, बाढ़-सूखा, चक्रवात, हिमनदों का पिघलना, समुद्र जलस्तर में वृद्धि — ये सब जलवायु परिवर्तन के स्पष्ट संकेत हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण मानवीय गतिविधियाँ ही हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद से कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस का अंधाधुंध उपयोग बढ़ा है। इनके जलने से कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। ये गैसें सूर्य की गर्मी को पृथ्वी पर रोक लेती हैं, जिससे तापमान बढ़ता है। इसे ही ग्लोबल वार्मिंग कहते हैं।
वनों की अंधाधुंध कटाई जलवायु परिवर्तन का दूसरा बड़ा कारण है। वन कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर पृथ्वी का तापमान संतुलित रखते हैं। किंतु बढ़ती जनसंख्या, शहरीकरण, औद्योगीकरण के कारण वन तीव्र गति से काटे जा रहे हैं। अमेजन के वन, जिन्हें 'पृथ्वी के फेफड़े' कहा जाता है, तेजी से सिकुड़ रहे हैं।
कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग, पशुपालन से मीथेन उत्सर्जन, औद्योगिक उत्पादन, परिवहन के साधन — ये सब जलवायु परिवर्तन में सहायक हैं। विकसित देश, जहाँ विश्व की केवल 20% जनसंख्या निवास करती है, 75% से अधिक कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं।
जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम भयावह हैं। ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। हिमालय के ग्लेशियर सदी के अंत तक समाप्त हो सकते हैं। इससे गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। समुद्र जलस्तर बढ़ने से मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे तटीय शहर डूब सकते हैं। मालदीव, तुवालू जैसे देश पूरी तरह समुद्र में समा सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन के निवारण के लिए ठोस कदम आवश्यक हैं। नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों — सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत, बायोमास — को बढ़ावा देना होगा। पेरिस समझौता, कोप सम्मेलन, क्योटो प्रोटोकॉल जैसे अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को सफल बनाना होगा।
व्यक्तिगत स्तर पर हम भी योगदान दे सकते हैं। बिजली-पानी की बचत, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, प्लास्टिक का कम प्रयोग, वृक्षारोपण, कचरे का पृथक्करण — ये छोटे कदम बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन कोई दूर की समस्या नहीं है। यह यहीं और अभी है। देर न करें, अभी जागें। पृथ्वी हमारी माँ है, उसे बचाना हमारा नैतिक दायित्व है।
(लगभग 445 शब्द)
6. "शिक्षा में खेलों का महत्व" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2022, Term 1)
उत्तर:
शिक्षा में खेलों का महत्व
'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।' यह प्राचीन सूक्ति खेलों के महत्व को स्पष्ट करती है। शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का नाम नहीं है। शिक्षा का अर्थ है — व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास। और इस सर्वांगीण विकास में खेलों का योगदान उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अकादमिक शिक्षा का।
खेल शारीरिक विकास के लिए अनिवार्य हैं। दौड़, कूद, तैराकी, क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, कबड्डी, बैडमिंटन — ये सभी खेल शारीरिक क्षमता बढ़ाते हैं। नियमित खेलों से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, हड्डियाँ सुदृढ़ होती हैं, हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग जैसी जीवनशैली रोगों से बचाव होता है।
खेल मानसिक विकास में भी सहायक हैं। खिलाड़ी मैदान पर त्वरित निर्णय लेना सीखते हैं। एकाग्रता, धैर्य, आत्मविश्वास, अनुशासन — ये गुण खेलों से स्वतः विकसित होते हैं। हार को सहज भाव से स्वीकार करना और जीत में अहंकार न करना — यह सीख खेल के मैदान में ही मिलती है। यही गुण जीवन में सफलता का मूल मंत्र है।
खेल सामाजिक गुणों का विकास करते हैं। टीम भावना, सहयोग, सहानुभूति, नेतृत्व क्षमता, परिश्रम का महत्व — ये सब खेल के मैदान में सीखे जाते हैं। एक टीम खिलाड़ी ही समाज का एक अच्छा नागरिक बन सकता है।
दुर्भाग्यवश, भारतीय शिक्षा प्रणाली में खेलों को द्वितीय श्रेणी का दर्जा दिया गया है। अभिभावक और शिक्षक बच्चों को केवल पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करते हैं। खेलों को समय की बर्बादी समझा जाता है। यह सोच बदलनी होगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। इसमें खेलों को पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाया गया है। खेलों को मुख्यधारा में लाने के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं — खेलो इंडिया, फिट इंडिया मूवमेंट, राष्ट्रीय खेल विकास कोष।
खेल अब करियर के रूप में भी स्थापित हो चुके हैं। सचिन तेंदुलकर, पीवी सिंधु, नीरज चोपड़ा, मेरी कॉम, साइना नेहवाल — इन खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया है और करोड़ों युवाओं को प्रेरित किया है।
पढ़ाई के साथ खेल भी जरूरी है। खेलेंगे-कूदेंगे, तभी तो बढ़ेंगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल डॉक्टर, इंजीनियर, वकील बनाना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य अच्छा इंसान बनाना है। और अच्छा इंसान वही बन सकता है, जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ हो।
(लगभग 430 शब्द)
शिक्षा में खेलों का महत्व
'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।' यह प्राचीन सूक्ति खेलों के महत्व को स्पष्ट करती है। शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान का नाम नहीं है। शिक्षा का अर्थ है — व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास। और इस सर्वांगीण विकास में खेलों का योगदान उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना अकादमिक शिक्षा का।
खेल शारीरिक विकास के लिए अनिवार्य हैं। दौड़, कूद, तैराकी, क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, कबड्डी, बैडमिंटन — ये सभी खेल शारीरिक क्षमता बढ़ाते हैं। नियमित खेलों से मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं, हड्डियाँ सुदृढ़ होती हैं, हृदय और फेफड़ों की कार्यक्षमता बढ़ती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग जैसी जीवनशैली रोगों से बचाव होता है।
खेल मानसिक विकास में भी सहायक हैं। खिलाड़ी मैदान पर त्वरित निर्णय लेना सीखते हैं। एकाग्रता, धैर्य, आत्मविश्वास, अनुशासन — ये गुण खेलों से स्वतः विकसित होते हैं। हार को सहज भाव से स्वीकार करना और जीत में अहंकार न करना — यह सीख खेल के मैदान में ही मिलती है। यही गुण जीवन में सफलता का मूल मंत्र है।
खेल सामाजिक गुणों का विकास करते हैं। टीम भावना, सहयोग, सहानुभूति, नेतृत्व क्षमता, परिश्रम का महत्व — ये सब खेल के मैदान में सीखे जाते हैं। एक टीम खिलाड़ी ही समाज का एक अच्छा नागरिक बन सकता है।
दुर्भाग्यवश, भारतीय शिक्षा प्रणाली में खेलों को द्वितीय श्रेणी का दर्जा दिया गया है। अभिभावक और शिक्षक बच्चों को केवल पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित करते हैं। खेलों को समय की बर्बादी समझा जाता है। यह सोच बदलनी होगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाए हैं। इसमें खेलों को पाठ्यक्रम का अनिवार्य अंग बनाया गया है। खेलों को मुख्यधारा में लाने के लिए कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं — खेलो इंडिया, फिट इंडिया मूवमेंट, राष्ट्रीय खेल विकास कोष।
खेल अब करियर के रूप में भी स्थापित हो चुके हैं। सचिन तेंदुलकर, पीवी सिंधु, नीरज चोपड़ा, मेरी कॉम, साइना नेहवाल — इन खिलाड़ियों ने देश का नाम रोशन किया है और करोड़ों युवाओं को प्रेरित किया है।
पढ़ाई के साथ खेल भी जरूरी है। खेलेंगे-कूदेंगे, तभी तो बढ़ेंगे। शिक्षा का उद्देश्य केवल डॉक्टर, इंजीनियर, वकील बनाना नहीं है। शिक्षा का उद्देश्य अच्छा इंसान बनाना है। और अच्छा इंसान वही बन सकता है, जो शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से स्वस्थ हो।
(लगभग 430 शब्द)
7. "महिला सशक्तीकरण : बदलता परिदृश्य" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2021, Set 3)
उत्तर:
महिला सशक्तीकरण : बदलता परिदृश्य
महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल महिलाओं को शक्ति प्रदान करना नहीं है। इसका अर्थ है — महिलाओं में पहले से विद्यमान असीम शक्ति को पहचानना, उसे अभिव्यक्ति का माध्यम देना, और समाज के हर क्षेत्र में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करना। भारत में महिला सशक्तीकरण का परिदृश्य तीव्र गति से बदल रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' योजना ने देशभर में जागरूकता फैलाई है। आज लड़कियों का स्कूली शिक्षा में नामांकन लड़कों के बराबर पहुँच गया है। उच्च शिक्षा में तो लड़कियाँ लड़कों से आगे निकल गई हैं। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, प्रशासनिक सेवाएँ, विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान — हर क्षेत्र में लड़कियाँ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।
आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में भी प्रगति हुई है। स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन दिया है। आज देश में लाखों महिला उद्यमी हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़ रही हैं। स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। लखपति दीदी योजना से लाखों महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं।
राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है। पंचायती राज संस्थाओं में 33% आरक्षण, नगर निगमों में महिला अध्यक्ष, विधानसभाओं और संसद में बढ़ता प्रतिनिधित्व। द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक का सफर प्रेरणादायक है। प्रतिभा पाटिल, सुषमा स्वराज, मीरा कुमार, निर्मला सीतारमण — ये नाम बता रहे हैं कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं।
सामाजिक क्षेत्र में भी बदलाव दिख रहा है। दहेज प्रथा, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून सख्त हुए हैं। जागरूकता बढ़ी है। महिलाएँ अब अपने अधिकारों के प्रति सचेत हैं। मी टू आंदोलन ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद की।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। बाल विवाह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। दहेज के लिए प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर भेदभाव, असमान वेतन — ये समस्याएँ अभी भी विद्यमान हैं।
महिला सशक्तीकरण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए समाज की मानसिकता बदलनी होगी। बेटा-बेटी में भेदभाव समाप्त करना होगा। लड़कियों को सपने देखने की आजादी देनी होगी। महिला सशक्तीकरण पुरुषों का विरोध नहीं है। यह पुरुषों और महिलाओं के बीच सहयोग है। सशक्त महिला, सशक्त राष्ट्र।
(लगभग 440 शब्द)
महिला सशक्तीकरण : बदलता परिदृश्य
महिला सशक्तीकरण का अर्थ केवल महिलाओं को शक्ति प्रदान करना नहीं है। इसका अर्थ है — महिलाओं में पहले से विद्यमान असीम शक्ति को पहचानना, उसे अभिव्यक्ति का माध्यम देना, और समाज के हर क्षेत्र में उनकी समान भागीदारी सुनिश्चित करना। भारत में महिला सशक्तीकरण का परिदृश्य तीव्र गति से बदल रहा है।
शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' योजना ने देशभर में जागरूकता फैलाई है। आज लड़कियों का स्कूली शिक्षा में नामांकन लड़कों के बराबर पहुँच गया है। उच्च शिक्षा में तो लड़कियाँ लड़कों से आगे निकल गई हैं। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, प्रशासनिक सेवाएँ, विज्ञान, अंतरिक्ष अनुसंधान — हर क्षेत्र में लड़कियाँ अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।
आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में भी प्रगति हुई है। स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया जैसी योजनाओं ने महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन दिया है। आज देश में लाखों महिला उद्यमी हैं, जो विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के झंडे गाड़ रही हैं। स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। लखपति दीदी योजना से लाखों महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं।
राजनीतिक भागीदारी बढ़ी है। पंचायती राज संस्थाओं में 33% आरक्षण, नगर निगमों में महिला अध्यक्ष, विधानसभाओं और संसद में बढ़ता प्रतिनिधित्व। द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति पद तक का सफर प्रेरणादायक है। प्रतिभा पाटिल, सुषमा स्वराज, मीरा कुमार, निर्मला सीतारमण — ये नाम बता रहे हैं कि महिलाएँ किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं।
सामाजिक क्षेत्र में भी बदलाव दिख रहा है। दहेज प्रथा, बाल विवाह, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून सख्त हुए हैं। जागरूकता बढ़ी है। महिलाएँ अब अपने अधिकारों के प्रति सचेत हैं। मी टू आंदोलन ने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलंद की।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। बाल विवाह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। दहेज के लिए प्रताड़ना, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर भेदभाव, असमान वेतन — ये समस्याएँ अभी भी विद्यमान हैं।
महिला सशक्तीकरण केवल सरकारी योजनाओं से संभव नहीं है। इसके लिए समाज की मानसिकता बदलनी होगी। बेटा-बेटी में भेदभाव समाप्त करना होगा। लड़कियों को सपने देखने की आजादी देनी होगी। महिला सशक्तीकरण पुरुषों का विरोध नहीं है। यह पुरुषों और महिलाओं के बीच सहयोग है। सशक्त महिला, सशक्त राष्ट्र।
(लगभग 440 शब्द)
8. "प्रदूषण : समस्या एवं समाधान" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2021, Set 1)
उत्तर:
प्रदूषण : समस्या एवं समाधान
प्रदूषण आधुनिक सभ्यता की वह अभिशाप है, जो हमारे अस्तित्व को ही संकट में डाल रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति के साथ अन्याय किया है और अब वह अन्याय हमारे सामने भयावह समस्या के रूप में खड़ा है। वायु, जल, भूमि, ध्वनि — सभी प्रदूषित हो चुके हैं।
वायु प्रदूषण सबसे गंभीर समस्या है। कारखानों, वाहनों, बिजली संयंत्रों से निकलने वाला धुआँ, जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक उपयोग, पराली जलाना — ये वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगर विषैली हवा में साँस लेने को मजबूर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 13 भारत में हैं। वायु प्रदूषण से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, हृदय रोग जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
जल प्रदूषण भी उतनी ही गंभीर समस्या है। कारखानों का रासायनिक कचरा, सीवरेज का अनुपचारित जल, कृषि में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक, प्लास्टिक कचरा — ये नदियों, झीलों, समुद्रों को प्रदूषित कर रहे हैं। गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियाँ आज जहरीली हो चुकी हैं। जल प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड, पीलिया, डायरिया जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।
ध्वनि प्रदूषण भी गंभीर समस्या है। वाहनों के हॉर्न, लाउडस्पीकर, कारखानों की मशीनें, निर्माण कार्य — ये ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं। अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता कम होना, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ होती हैं।
भूमि प्रदूषण भी कम चिंताजनक नहीं है। प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट, ई-कचरा, रासायनिक उर्वरक — ये भूमि को बंजर बना रहे हैं। प्लास्टिक, जो सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता, भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहा है।
प्रदूषण की इस समस्या का समाधान संभव है। सबसे पहले हमें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों — सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत — को बढ़ावा देना होगा। सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, साइकिल का उपयोग — ये वायु प्रदूषण कम करने के कारगर उपाय हैं।
जल प्रदूषण रोकने के लिए औद्योगिक कचरे के शोधन को अनिवार्य करना होगा। नमामि गंगे जैसी योजनाओं को और प्रभावी बनाना होगा। वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, वेटलैंड का संरक्षण — ये जल स्रोतों को स्वच्छ रखने में सहायक हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर हम भी प्रदूषण कम कर सकते हैं। प्लास्टिक का उपयोग न करें। कचरे का पृथक्करण करें। वृक्षारोपण करें। बिजली-पानी की बचत करें। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें।
प्रदूषण कोई दूर की समस्या नहीं है। यह हमारे घरों में, हमारे शहरों में, हमारे देश में है। इसे अनदेखा करना आत्मघाती होगा। प्रदूषण मुक्त पर्यावरण हमारा मौलिक अधिकार है और इसे बचाना हमारा कर्तव्य है।
(लगभग 445 शब्द)
प्रदूषण : समस्या एवं समाधान
प्रदूषण आधुनिक सभ्यता की वह अभिशाप है, जो हमारे अस्तित्व को ही संकट में डाल रहा है। विकास की अंधी दौड़ में हमने प्रकृति के साथ अन्याय किया है और अब वह अन्याय हमारे सामने भयावह समस्या के रूप में खड़ा है। वायु, जल, भूमि, ध्वनि — सभी प्रदूषित हो चुके हैं।
वायु प्रदूषण सबसे गंभीर समस्या है। कारखानों, वाहनों, बिजली संयंत्रों से निकलने वाला धुआँ, जीवाश्म ईंधन का अत्यधिक उपयोग, पराली जलाना — ये वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई जैसे महानगर विषैली हवा में साँस लेने को मजबूर हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 13 भारत में हैं। वायु प्रदूषण से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, फेफड़ों का कैंसर, हृदय रोग जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।
जल प्रदूषण भी उतनी ही गंभीर समस्या है। कारखानों का रासायनिक कचरा, सीवरेज का अनुपचारित जल, कृषि में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक, प्लास्टिक कचरा — ये नदियों, झीलों, समुद्रों को प्रदूषित कर रहे हैं। गंगा, यमुना जैसी पवित्र नदियाँ आज जहरीली हो चुकी हैं। जल प्रदूषण से हैजा, टाइफाइड, पीलिया, डायरिया जैसी बीमारियाँ फैलती हैं।
ध्वनि प्रदूषण भी गंभीर समस्या है। वाहनों के हॉर्न, लाउडस्पीकर, कारखानों की मशीनें, निर्माण कार्य — ये ध्वनि प्रदूषण के मुख्य स्रोत हैं। अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण से सुनने की क्षमता कम होना, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, मानसिक तनाव जैसी समस्याएँ होती हैं।
भूमि प्रदूषण भी कम चिंताजनक नहीं है। प्लास्टिक कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट, ई-कचरा, रासायनिक उर्वरक — ये भूमि को बंजर बना रहे हैं। प्लास्टिक, जो सैकड़ों वर्षों तक नष्ट नहीं होता, भूमि की उर्वरा शक्ति को नष्ट कर रहा है।
प्रदूषण की इस समस्या का समाधान संभव है। सबसे पहले हमें नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों — सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत — को बढ़ावा देना होगा। सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करना, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, साइकिल का उपयोग — ये वायु प्रदूषण कम करने के कारगर उपाय हैं।
जल प्रदूषण रोकने के लिए औद्योगिक कचरे के शोधन को अनिवार्य करना होगा। नमामि गंगे जैसी योजनाओं को और प्रभावी बनाना होगा। वर्षा जल संचयन, तालाबों का पुनर्जीवन, वेटलैंड का संरक्षण — ये जल स्रोतों को स्वच्छ रखने में सहायक हैं।
व्यक्तिगत स्तर पर हम भी प्रदूषण कम कर सकते हैं। प्लास्टिक का उपयोग न करें। कचरे का पृथक्करण करें। वृक्षारोपण करें। बिजली-पानी की बचत करें। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें।
प्रदूषण कोई दूर की समस्या नहीं है। यह हमारे घरों में, हमारे शहरों में, हमारे देश में है। इसे अनदेखा करना आत्मघाती होगा। प्रदूषण मुक्त पर्यावरण हमारा मौलिक अधिकार है और इसे बचाना हमारा कर्तव्य है।
(लगभग 445 शब्द)
9. "भारतीय किसान : समस्याएँ एवं समाधान" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2020, Set 2)
उत्तर:
भारतीय किसान : समस्याएँ एवं समाधान
भारत किसानों का देश है। हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। लगभग 55% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। फिर भी, भारतीय किसान आज अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। कर्ज, बेमौसम बारिश, सूखा, बाढ़, बिचौलिए, मंडी व्यवस्था की विफलता — ये उसकी दैनिक समस्याएँ हैं।
भारतीय किसान की सबसे बड़ी समस्या है — जोतों का छोटा और बिखरा होना। औसत कृषि जोत मात्र 1.08 हेक्टेयर है। छोटी जोत में आधुनिक मशीनरी का उपयोग संभव नहीं है। उत्पादन लागत अधिक आती है और आय कम।
सिंचाई की अपर्याप्त सुविधा दूसरी बड़ी समस्या है। आज भी 52% कृषि वर्षा पर निर्भर है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ — ये किसान की फसल बर्बाद कर देते हैं। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। बिजली की अनियमित आपूर्ति सिंचाई में बाधक है।
उचित बाजार व्यवस्था का अभाव तीसरी बड़ी समस्या है। किसान अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं पा पाता। बिचौलिए, आढ़ती, व्यापारी फसल का अधिकांश लाभ हड़प लेते हैं। मंडी व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। ई-नाम जैसी योजनाएँ अभी व्यापक रूप से सफल नहीं हुई हैं।
कर्ज की समस्या सबसे विकट है। किसान महाजनों और साहूकारों से ऊँची ब्याज दरों पर कर्ज लेने को मजबूर है। फसल बर्बाद होने पर कर्ज चुकाना असंभव हो जाता है। यही कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्या जैसे चरम कदम तक ले जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने किसानों की समस्याएँ और बढ़ा दी हैं। अनियमित वर्षा, अकाल, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात — ये फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। परंपरागत फसल चक्र बदल गया है।
इन समस्याओं का समाधान संभव है। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना होगा। ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई को बढ़ावा देना होगा। बिजली की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।
कृषि विविधीकरण आवश्यक है। केवल गेहूँ-धान पर निर्भरता समाप्त करनी होगी। बागवानी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, डेयरी, मुर्गी पालन — इनसे किसान की आय बढ़ सकती है।
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, यह सुनिश्चित करना होगा। एमएसपी व्यवस्था को और प्रभावी बनाना होगा। सहकारी समितियों को मजबूत करना होगा। किसान उत्पादक संगठनों को प्रोत्साहित करना होगा।
कर्ज समस्या के समाधान के लिए सस्ता किसान कर्ज, फसल बीमा योजना, कर्ज माफी — ये कदम उठाए गए हैं। इन्हें और प्रभावी बनाना होगा।
भारतीय किसान अन्नदाता है। वह देश का पेट भरता है। उसकी समस्याओं का समाधान करना हम सबका कर्तव्य है। समृद्ध किसान, समृद्ध भारत।
(लगभग 440 शब्द)
भारतीय किसान : समस्याएँ एवं समाधान
भारत किसानों का देश है। हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ कृषि है। लगभग 55% जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। फिर भी, भारतीय किसान आज अनेक समस्याओं से जूझ रहा है। कर्ज, बेमौसम बारिश, सूखा, बाढ़, बिचौलिए, मंडी व्यवस्था की विफलता — ये उसकी दैनिक समस्याएँ हैं।
भारतीय किसान की सबसे बड़ी समस्या है — जोतों का छोटा और बिखरा होना। औसत कृषि जोत मात्र 1.08 हेक्टेयर है। छोटी जोत में आधुनिक मशीनरी का उपयोग संभव नहीं है। उत्पादन लागत अधिक आती है और आय कम।
सिंचाई की अपर्याप्त सुविधा दूसरी बड़ी समस्या है। आज भी 52% कृषि वर्षा पर निर्भर है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ — ये किसान की फसल बर्बाद कर देते हैं। भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। बिजली की अनियमित आपूर्ति सिंचाई में बाधक है।
उचित बाजार व्यवस्था का अभाव तीसरी बड़ी समस्या है। किसान अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं पा पाता। बिचौलिए, आढ़ती, व्यापारी फसल का अधिकांश लाभ हड़प लेते हैं। मंडी व्यवस्था पारदर्शी नहीं है। ई-नाम जैसी योजनाएँ अभी व्यापक रूप से सफल नहीं हुई हैं।
कर्ज की समस्या सबसे विकट है। किसान महाजनों और साहूकारों से ऊँची ब्याज दरों पर कर्ज लेने को मजबूर है। फसल बर्बाद होने पर कर्ज चुकाना असंभव हो जाता है। यही कर्ज का बोझ किसानों को आत्महत्या जैसे चरम कदम तक ले जाता है।
जलवायु परिवर्तन ने किसानों की समस्याएँ और बढ़ा दी हैं। अनियमित वर्षा, अकाल, बाढ़, ओलावृष्टि, चक्रवात — ये फसल को नुकसान पहुँचाते हैं। परंपरागत फसल चक्र बदल गया है।
इन समस्याओं का समाधान संभव है। सिंचाई सुविधाओं का विस्तार करना होगा। ड्रिप सिंचाई, फव्वारा सिंचाई को बढ़ावा देना होगा। बिजली की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी।
कृषि विविधीकरण आवश्यक है। केवल गेहूँ-धान पर निर्भरता समाप्त करनी होगी। बागवानी, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, डेयरी, मुर्गी पालन — इनसे किसान की आय बढ़ सकती है।
किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, यह सुनिश्चित करना होगा। एमएसपी व्यवस्था को और प्रभावी बनाना होगा। सहकारी समितियों को मजबूत करना होगा। किसान उत्पादक संगठनों को प्रोत्साहित करना होगा।
कर्ज समस्या के समाधान के लिए सस्ता किसान कर्ज, फसल बीमा योजना, कर्ज माफी — ये कदम उठाए गए हैं। इन्हें और प्रभावी बनाना होगा।
भारतीय किसान अन्नदाता है। वह देश का पेट भरता है। उसकी समस्याओं का समाधान करना हम सबका कर्तव्य है। समृद्ध किसान, समृद्ध भारत।
(लगभग 440 शब्द)
10. "स्वच्छ भारत अभियान : उपलब्धियाँ एवं चुनौतियाँ" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2020, Set 1)
उत्तर:
स्वच्छ भारत अभियान : उपलब्धियाँ एवं चुनौतियाँ
2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ 'स्वच्छ भारत अभियान' महात्मा गांधी की स्वच्छता की अवधारणा को साकार करने का राष्ट्रव्यापी प्रयास है। यह अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, वरन् एक जन-आंदोलन है। इसका उद्देश्य वर्ष 2019 तक भारत को खुले में शौच मुक्त बनाना और स्वच्छता की संस्कृति विकसित करना था।
स्वच्छ भारत अभियान की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं। देश में 10 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच की दर 2014 में 55% थी, जो घटकर 2019 में मात्र 1% रह गई। लाखों गाँव और सैकड़ों जिले खुले में शौच मुक्त घोषित किए गए।
इस अभियान ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। स्कूली बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, फिल्म सितारों से लेकर खिलाड़ियों तक — सभी ने इस अभियान में भागीदारी की। स्वच्छता को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा गया। 'स्वच्छ भारत मिशन' अब 'स्वच्छ भारत मिशन 2.0' के रूप में आगे बढ़ रहा है, जिसमें ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
स्वच्छता का स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वच्छ भारत अभियान के कारण 3 लाख से अधिक मौतें रोकी गईं। डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियों में कमी आई है। बच्चों के कुपोषण में भी कमी आई है।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। केवल शौचालय निर्माण से काम नहीं चलेगा। उनके उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। कई गाँवों में शौचालय तो बने, किंतु उपयोग नहीं हो रहे। पानी की कमी, जागरूकता का अभाव, पुरानी आदतें — ये बाधाएँ हैं।
ठोस कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती है। शहरों में प्रतिदिन 1.5 लाख टन कचरा निकलता है, जिसमें से मात्र 30% का ही वैज्ञानिक निपटान हो पाता है। प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, निर्माण अपशिष्ट — ये गंभीर समस्या हैं। कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण, खाद बनाने की सुविधाएँ अभी अपर्याप्त हैं।
गंदे नालों का शोधन, औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार, नदियों की सफाई — ये चुनौतियाँ अभी शेष हैं। गंगा, यमुना जैसी नदियाँ आज भी प्रदूषित हैं। शहरी क्षेत्रों में सीवरेज व्यवस्था अपर्याप्त है।
स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए इन चुनौतियों से निपटना होगा। जागरूकता अभियान जारी रखने होंगे। शौचालय उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। कचरा प्रबंधन की आधुनिक तकनीक अपनानी होगी।
स्वच्छता केवल सरकार का दायित्व नहीं है। यह हम सबका दायित्व है। गांधी जी ने कहा था — 'स्वच्छता सेवा है।' आइए, हम सब इस सेवा में अपना योगदान दें। स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत।
(लगभग 445 शब्द)
स्वच्छ भारत अभियान : उपलब्धियाँ एवं चुनौतियाँ
2 अक्टूबर 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ 'स्वच्छ भारत अभियान' महात्मा गांधी की स्वच्छता की अवधारणा को साकार करने का राष्ट्रव्यापी प्रयास है। यह अभियान केवल सरकारी योजना नहीं, वरन् एक जन-आंदोलन है। इसका उद्देश्य वर्ष 2019 तक भारत को खुले में शौच मुक्त बनाना और स्वच्छता की संस्कृति विकसित करना था।
स्वच्छ भारत अभियान की उपलब्धियाँ उल्लेखनीय हैं। देश में 10 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण किया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में शौच की दर 2014 में 55% थी, जो घटकर 2019 में मात्र 1% रह गई। लाखों गाँव और सैकड़ों जिले खुले में शौच मुक्त घोषित किए गए।
इस अभियान ने स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई है। स्कूली बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, फिल्म सितारों से लेकर खिलाड़ियों तक — सभी ने इस अभियान में भागीदारी की। स्वच्छता को सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़ा गया। 'स्वच्छ भारत मिशन' अब 'स्वच्छ भारत मिशन 2.0' के रूप में आगे बढ़ रहा है, जिसमें ठोस और तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
स्वच्छता का स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, स्वच्छ भारत अभियान के कारण 3 लाख से अधिक मौतें रोकी गईं। डायरिया, हैजा, टाइफाइड जैसी बीमारियों में कमी आई है। बच्चों के कुपोषण में भी कमी आई है।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। केवल शौचालय निर्माण से काम नहीं चलेगा। उनके उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। कई गाँवों में शौचालय तो बने, किंतु उपयोग नहीं हो रहे। पानी की कमी, जागरूकता का अभाव, पुरानी आदतें — ये बाधाएँ हैं।
ठोस कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती है। शहरों में प्रतिदिन 1.5 लाख टन कचरा निकलता है, जिसमें से मात्र 30% का ही वैज्ञानिक निपटान हो पाता है। प्लास्टिक कचरा, ई-कचरा, निर्माण अपशिष्ट — ये गंभीर समस्या हैं। कचरे का पृथक्करण, पुनर्चक्रण, खाद बनाने की सुविधाएँ अभी अपर्याप्त हैं।
गंदे नालों का शोधन, औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार, नदियों की सफाई — ये चुनौतियाँ अभी शेष हैं। गंगा, यमुना जैसी नदियाँ आज भी प्रदूषित हैं। शहरी क्षेत्रों में सीवरेज व्यवस्था अपर्याप्त है।
स्वच्छ भारत अभियान को सफल बनाने के लिए इन चुनौतियों से निपटना होगा। जागरूकता अभियान जारी रखने होंगे। शौचालय उपयोग की आदत विकसित करनी होगी। कचरा प्रबंधन की आधुनिक तकनीक अपनानी होगी।
स्वच्छता केवल सरकार का दायित्व नहीं है। यह हम सबका दायित्व है। गांधी जी ने कहा था — 'स्वच्छता सेवा है।' आइए, हम सब इस सेवा में अपना योगदान दें। स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत।
(लगभग 445 शब्द)
11. "नारी शिक्षा का महत्व" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2019, Set 3)
उत्तर:
नारी शिक्षा का महत्व
'यदि एक पुरुष शिक्षित होता है, तो वह एक व्यक्ति शिक्षित होता है। यदि एक महिला शिक्षित होती है, तो वह एक परिवार शिक्षित होता है।' यह कथन नारी शिक्षा के महत्व को स्पष्ट करता है। नारी शिक्षा केवल एक व्यक्ति की शिक्षा नहीं है। यह पूरे समाज, पूरे राष्ट्र की शिक्षा है।
नारी शिक्षा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि शिक्षित महिला अपने परिवार को शिक्षित करती है। वह अपने बच्चों का पहला गुरु होती है। एक शिक्षित माँ अपने बच्चों को संस्कार, ज्ञान और अच्छी आदतें देती है। वह बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करती। वह बेटियों को भी सपने देखना सिखाती है।
नारी शिक्षा से महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त बनती हैं। वे नौकरी, व्यवसाय, उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ती हैं। वे परिवार की आय में योगदान देती हैं। आत्मनिर्भर महिला समाज में सम्मान पाती है। वह किसी पर निर्भर नहीं रहती।
शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है। वह दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाती है। वह कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती है। वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकती है।
नारी शिक्षा से जनसंख्या नियंत्रण में सहायता मिलती है। शिक्षित महिलाएँ परिवार नियोजन के प्रति जागरूक होती हैं। वे छोटे परिवार के लाभों को समझती हैं। वे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं।
नारी शिक्षा से बाल मृत्यु दर में कमी आती है। शिक्षित माँएँ स्वच्छता, पोषण, टीकाकरण के प्रति सचेत रहती हैं। वे बीमारी के लक्षण पहचान सकती हैं। वे समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त करती हैं।
नारी शिक्षा राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य है। कोई भी देश तब तक विकास नहीं कर सकता, जब तक उसकी आधी आबादी शिक्षा से वंचित हो। राष्ट्र की प्रगति और नारी शिक्षा का सीधा संबंध है।
दुर्भाग्यवश, आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। गरीबी, सामाजिक कुरीतियाँ, बाल विवाह, भेदभाव — ये बाधाएँ हैं। हमें इन बाधाओं को दूर करना होगा।
सरकार ने नारी शिक्षा के लिए अनेक योजनाएँ चलाई हैं — बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, निःशुल्क शिक्षा। इन योजनाओं का लाभ हर लड़की तक पहुँचाना होगा।
नारी शिक्षा केवल सरकार का दायित्व नहीं है। यह समाज का, परिवार का, हर नागरिक का दायित्व है। आइए, हम सब संकल्प लें कि हर लड़की को शिक्षा का अधिकार देंगे। शिक्षित नारी, सशक्त राष्ट्र।
(लगभग 435 शब्द)
नारी शिक्षा का महत्व
'यदि एक पुरुष शिक्षित होता है, तो वह एक व्यक्ति शिक्षित होता है। यदि एक महिला शिक्षित होती है, तो वह एक परिवार शिक्षित होता है।' यह कथन नारी शिक्षा के महत्व को स्पष्ट करता है। नारी शिक्षा केवल एक व्यक्ति की शिक्षा नहीं है। यह पूरे समाज, पूरे राष्ट्र की शिक्षा है।
नारी शिक्षा का सबसे बड़ा महत्व यह है कि शिक्षित महिला अपने परिवार को शिक्षित करती है। वह अपने बच्चों का पहला गुरु होती है। एक शिक्षित माँ अपने बच्चों को संस्कार, ज्ञान और अच्छी आदतें देती है। वह बेटा-बेटी में भेदभाव नहीं करती। वह बेटियों को भी सपने देखना सिखाती है।
नारी शिक्षा से महिलाएँ आर्थिक रूप से सशक्त बनती हैं। वे नौकरी, व्यवसाय, उद्यमिता के क्षेत्र में आगे बढ़ती हैं। वे परिवार की आय में योगदान देती हैं। आत्मनिर्भर महिला समाज में सम्मान पाती है। वह किसी पर निर्भर नहीं रहती।
शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है। वह दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाती है। वह कानूनी सहायता प्राप्त कर सकती है। वह अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकती है।
नारी शिक्षा से जनसंख्या नियंत्रण में सहायता मिलती है। शिक्षित महिलाएँ परिवार नियोजन के प्रति जागरूक होती हैं। वे छोटे परिवार के लाभों को समझती हैं। वे अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखती हैं।
नारी शिक्षा से बाल मृत्यु दर में कमी आती है। शिक्षित माँएँ स्वच्छता, पोषण, टीकाकरण के प्रति सचेत रहती हैं। वे बीमारी के लक्षण पहचान सकती हैं। वे समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त करती हैं।
नारी शिक्षा राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य है। कोई भी देश तब तक विकास नहीं कर सकता, जब तक उसकी आधी आबादी शिक्षा से वंचित हो। राष्ट्र की प्रगति और नारी शिक्षा का सीधा संबंध है।
दुर्भाग्यवश, आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। गरीबी, सामाजिक कुरीतियाँ, बाल विवाह, भेदभाव — ये बाधाएँ हैं। हमें इन बाधाओं को दूर करना होगा।
सरकार ने नारी शिक्षा के लिए अनेक योजनाएँ चलाई हैं — बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, लड़कियों के लिए छात्रवृत्ति, निःशुल्क शिक्षा। इन योजनाओं का लाभ हर लड़की तक पहुँचाना होगा।
नारी शिक्षा केवल सरकार का दायित्व नहीं है। यह समाज का, परिवार का, हर नागरिक का दायित्व है। आइए, हम सब संकल्प लें कि हर लड़की को शिक्षा का अधिकार देंगे। शिक्षित नारी, सशक्त राष्ट्र।
(लगभग 435 शब्द)
12. "आत्मनिर्भर भारत : संकल्प से सिद्धि" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2021, Special Set)
उत्तर:
आत्मनिर्भर भारत : संकल्प से सिद्धि
12 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी के कठिन समय में देश को 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' का मंत्र दिया। यह केवल एक आर्थिक पैकेज नहीं था, वरन् एक नई सोच, एक नई दृष्टि थी। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ है — भारत का आत्मविश्वास से भरा भारत, जो अपने पैरों पर खड़ा हो, जो दुनिया को कुछ दे सके।
आत्मनिर्भर भारत का पहला आयाम है — अर्थव्यवस्था। कोरोना काल में वैश्विक आपूर्ति शृंखला चरमरा गई थी। भारत को एपीआई, मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा। इस अनुभव ने सिखाया कि आत्मनिर्भरता आवश्यक है। आज भारत वैक्सीन, मेडिकल उपकरण, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो रहा है।
दूसरा आयाम है — रक्षा। भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया। 101 हथियारों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया। स्वदेशी राइफल, तोप, हेलीकॉप्टर, मिसाइल, विमानवाहक पोत — भारत अब इनका निर्माण स्वयं कर रहा है।
तीसरा आयाम है — प्रौद्योगिकी। डिजिटल इंडिया ने भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है। यूपीआई, आधार, कोविन, आरोग्य सेतु — ये भारत की तकनीकी क्षमता के प्रमाण हैं। आज भारत दुनिया को डिजिटल पेमेंट की तकनीक निर्यात कर रहा है।
चौथा आयाम है — कृषि और खाद्य सुरक्षा। भारत हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुका है। आज हम चावल, गेहूँ, दूध, अंडा, मछली, फल-सब्जी के उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं। हम विश्व को खाद्यान्न निर्यात भी कर रहे हैं।
पाँचवाँ आयाम है — ऊर्जा। भारत अभी भी 80% कच्चा तेल आयात करता है। यह हमारी अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत नवीकरणीय ऊर्जा — सौर, पवन, जैव ऊर्जा — को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य है।
आत्मनिर्भर भारत का अर्थ आत्मकेंद्रित भारत नहीं है। इसका अर्थ है — एक ऐसा भारत जो दुनिया से जुड़ा हो, किंतु अपने पैरों पर खड़ा हो। वोकल फॉर लोकल, लोकल फॉर ग्लोबल — यही आत्मनिर्भर भारत का मंत्र है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा। हमें स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना होगा। छोटे उद्योगों, स्टार्टअप, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करना होगा। कौशल विकास, नवाचार, अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा।
आत्मनिर्भर भारत केवल एक सरकारी योजना नहीं है। यह एक राष्ट्रीय भावना है। यह संकल्प है। और इस संकल्प को सिद्धि तक पहुँचाना हम सबका दायित्व है।
(लगभग 440 शब्द)
आत्मनिर्भर भारत : संकल्प से सिद्धि
12 मई 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना महामारी के कठिन समय में देश को 'आत्मनिर्भर भारत अभियान' का मंत्र दिया। यह केवल एक आर्थिक पैकेज नहीं था, वरन् एक नई सोच, एक नई दृष्टि थी। आत्मनिर्भर भारत का अर्थ है — भारत का आत्मविश्वास से भरा भारत, जो अपने पैरों पर खड़ा हो, जो दुनिया को कुछ दे सके।
आत्मनिर्भर भारत का पहला आयाम है — अर्थव्यवस्था। कोरोना काल में वैश्विक आपूर्ति शृंखला चरमरा गई थी। भारत को एपीआई, मेडिकल उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भर रहना पड़ा। इस अनुभव ने सिखाया कि आत्मनिर्भरता आवश्यक है। आज भारत वैक्सीन, मेडिकल उपकरण, मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स के उत्पादन में आत्मनिर्भर हो रहा है।
दूसरा आयाम है — रक्षा। भारत विश्व का सबसे बड़ा हथियार आयातक रहा है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता पर जोर दिया गया। 101 हथियारों के आयात पर प्रतिबंध लगाया गया। स्वदेशी राइफल, तोप, हेलीकॉप्टर, मिसाइल, विमानवाहक पोत — भारत अब इनका निर्माण स्वयं कर रहा है।
तीसरा आयाम है — प्रौद्योगिकी। डिजिटल इंडिया ने भारत को तकनीकी रूप से सशक्त बनाया है। यूपीआई, आधार, कोविन, आरोग्य सेतु — ये भारत की तकनीकी क्षमता के प्रमाण हैं। आज भारत दुनिया को डिजिटल पेमेंट की तकनीक निर्यात कर रहा है।
चौथा आयाम है — कृषि और खाद्य सुरक्षा। भारत हरित क्रांति के बाद खाद्यान्न में आत्मनिर्भर हो चुका है। आज हम चावल, गेहूँ, दूध, अंडा, मछली, फल-सब्जी के उत्पादन में आत्मनिर्भर हैं। हम विश्व को खाद्यान्न निर्यात भी कर रहे हैं।
पाँचवाँ आयाम है — ऊर्जा। भारत अभी भी 80% कच्चा तेल आयात करता है। यह हमारी अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ है। आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत नवीकरणीय ऊर्जा — सौर, पवन, जैव ऊर्जा — को बढ़ावा दिया जा रहा है। 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य है।
आत्मनिर्भर भारत का अर्थ आत्मकेंद्रित भारत नहीं है। इसका अर्थ है — एक ऐसा भारत जो दुनिया से जुड़ा हो, किंतु अपने पैरों पर खड़ा हो। वोकल फॉर लोकल, लोकल फॉर ग्लोबल — यही आत्मनिर्भर भारत का मंत्र है।
आत्मनिर्भर भारत अभियान को सफल बनाने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा। हमें स्वदेशी वस्तुओं को अपनाना होगा। छोटे उद्योगों, स्टार्टअप, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहित करना होगा। कौशल विकास, नवाचार, अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा।
आत्मनिर्भर भारत केवल एक सरकारी योजना नहीं है। यह एक राष्ट्रीय भावना है। यह संकल्प है। और इस संकल्प को सिद्धि तक पहुँचाना हम सबका दायित्व है।
(लगभग 440 शब्द)
13. "साइबर सुरक्षा : आवश्यकता एवं उपाय" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2022, Set 3)
उत्तर:
साइबर सुरक्षा : आवश्यकता एवं उपाय
डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा केवल एक तकनीकी आवश्यकता नहीं, वरन् राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग बन चुकी है। भारत तीव्र गति से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यूपीआई लेनदेन में हम विश्व में अग्रणी हैं। किंतु इस डिजिटल क्रांति के साथ साइबर अपराधों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
साइबर सुरक्षा की आवश्यकता आज क्यों अनिवार्य हो गई है? इसके अनेक कारण हैं। प्रथम, डिजिटल लेनदेन में भारी वृद्धि हुई है। वित्तीय धोखाधड़ी, फिशिंग, क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, ऑनलाइन ठगी — ये आम समस्या बन गई हैं। द्वितीय, डेटा का विशाल भंडारण। आधार, पैन, बैंक खाते, स्वास्थ्य रिकॉर्ड — ये संवेदनशील डेटा सुरक्षित नहीं हैं। डेटा चोरी और डेटा लीक की घटनाएँ बढ़ी हैं।
तृतीय, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा। पड़ोसी देशों द्वारा साइबर हमले, सरकारी वेबसाइटों की हैकिंग, रेलवे, बैंकिंग, रक्षा प्रतिष्ठानों पर साइबर अटैक — ये गंभीर चिंता के विषय हैं। चतुर्थ, सोशल मीडिया के दुरुपयोग से सामाजिक सद्भाव भंग हो रहा है। फेक न्यूज, अफवाहें, धार्मिक उन्माद, साइबर बुलिंग — ये समाज के लिए खतरा हैं।
साइबर सुरक्षा के उपाय अनेक स्तरों पर आवश्यक हैं। तकनीकी स्तर पर, सुरक्षित सॉफ्टवेयर, एन्क्रिप्शन, फायरवॉल, एंटीवायरस, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन अनिवार्य हैं। सरकारी स्तर पर, साइबर कानूनों को सख्त बनाना होगा। साइबर अपराधियों की त्वरित गिरफ्तारी और कड़ी सजा सुनिश्चित करनी होगी।
व्यक्तिगत स्तर पर, हमें साइबर स्वच्छता अपनानी होगी। मजबूत पासवर्ड, नियमित बदलाव, अनजान लिंक पर क्लिक न करना, ओटीपी साझा न करना, सार्वजनिक वाई-फाई से बचना — ये सावधानियाँ बरतनी होंगी।
संस्थागत स्तर पर, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, ई-कॉमर्स कंपनियों को अपनी सुरक्षा प्रणाली मजबूत करनी होगी। ग्राहकों को जागरूक करना होगा। साइबर हमले की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करना होगा।
शैक्षिक स्तर पर, साइबर सुरक्षा शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता अनिवार्य करनी होगी। साइबर सुरक्षा में करियर के अवसरों को बढ़ावा देना होगा।
सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। साइबर स्वच्छता केंद्र, CERT-In, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, साइबर दोस्त, साइबर जागरूकता अभियान — ये प्रयास जारी हैं।
साइबर सुरक्षा केवल सरकार या तकनीकी विशेषज्ञों का काम नहीं है। यह हर नागरिक का दायित्व है। सतर्क नागरिक, सुरक्षित भारत।
(लगभग 430 शब्द)
साइबर सुरक्षा : आवश्यकता एवं उपाय
डिजिटल युग में साइबर सुरक्षा केवल एक तकनीकी आवश्यकता नहीं, वरन् राष्ट्रीय सुरक्षा का अभिन्न अंग बन चुकी है। भारत तीव्र गति से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यूपीआई लेनदेन में हम विश्व में अग्रणी हैं। किंतु इस डिजिटल क्रांति के साथ साइबर अपराधों में भी अभूतपूर्व वृद्धि हुई है।
साइबर सुरक्षा की आवश्यकता आज क्यों अनिवार्य हो गई है? इसके अनेक कारण हैं। प्रथम, डिजिटल लेनदेन में भारी वृद्धि हुई है। वित्तीय धोखाधड़ी, फिशिंग, क्रेडिट कार्ड फ्रॉड, ऑनलाइन ठगी — ये आम समस्या बन गई हैं। द्वितीय, डेटा का विशाल भंडारण। आधार, पैन, बैंक खाते, स्वास्थ्य रिकॉर्ड — ये संवेदनशील डेटा सुरक्षित नहीं हैं। डेटा चोरी और डेटा लीक की घटनाएँ बढ़ी हैं।
तृतीय, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा। पड़ोसी देशों द्वारा साइबर हमले, सरकारी वेबसाइटों की हैकिंग, रेलवे, बैंकिंग, रक्षा प्रतिष्ठानों पर साइबर अटैक — ये गंभीर चिंता के विषय हैं। चतुर्थ, सोशल मीडिया के दुरुपयोग से सामाजिक सद्भाव भंग हो रहा है। फेक न्यूज, अफवाहें, धार्मिक उन्माद, साइबर बुलिंग — ये समाज के लिए खतरा हैं।
साइबर सुरक्षा के उपाय अनेक स्तरों पर आवश्यक हैं। तकनीकी स्तर पर, सुरक्षित सॉफ्टवेयर, एन्क्रिप्शन, फायरवॉल, एंटीवायरस, टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन अनिवार्य हैं। सरकारी स्तर पर, साइबर कानूनों को सख्त बनाना होगा। साइबर अपराधियों की त्वरित गिरफ्तारी और कड़ी सजा सुनिश्चित करनी होगी।
व्यक्तिगत स्तर पर, हमें साइबर स्वच्छता अपनानी होगी। मजबूत पासवर्ड, नियमित बदलाव, अनजान लिंक पर क्लिक न करना, ओटीपी साझा न करना, सार्वजनिक वाई-फाई से बचना — ये सावधानियाँ बरतनी होंगी।
संस्थागत स्तर पर, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, ई-कॉमर्स कंपनियों को अपनी सुरक्षा प्रणाली मजबूत करनी होगी। ग्राहकों को जागरूक करना होगा। साइबर हमले की स्थिति में त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र विकसित करना होगा।
शैक्षिक स्तर पर, साइबर सुरक्षा शिक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। स्कूलों में डिजिटल साक्षरता अनिवार्य करनी होगी। साइबर सुरक्षा में करियर के अवसरों को बढ़ावा देना होगा।
सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं। साइबर स्वच्छता केंद्र, CERT-In, राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति, साइबर दोस्त, साइबर जागरूकता अभियान — ये प्रयास जारी हैं।
साइबर सुरक्षा केवल सरकार या तकनीकी विशेषज्ञों का काम नहीं है। यह हर नागरिक का दायित्व है। सतर्क नागरिक, सुरक्षित भारत।
(लगभग 430 शब्द)
14. "युवा पीढ़ी और नशे की समस्या" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2019, Set 2)
उत्तर:
युवा पीढ़ी और नशे की समस्या
नशे की समस्या आज के युवाओं के लिए अभिशाप बन चुकी है। जो युवा शक्ति देश की रीढ़ है, वही नशे की गर्त में डूबती जा रही है। स्कूल-कॉलेज के छात्र हों या युवा पेशेवर, नशे की चपेट में सभी आ रहे हैं। यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, वरन् सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
युवाओं में नशे की लत के अनेक कारण हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण है — मानसिक तनाव। प्रतिस्पर्धा का दबाव, परीक्षा का भय, करियर की अनिश्चितता, बेरोजगारी — ये युवाओं को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। नशा उन्हें इस तनाव से अस्थायी मुक्ति देता है।
दूसरा कारण है — पारिवारिक विघटन। एकल परिवार, कामकाजी माता-पिता, माता-पिता के बीच कलह, संस्कारों का अभाव — ये बच्चों को भटका देते हैं। वे परिवार में प्यार और अपनापन न पाकर नशे में सुकून तलाशते हैं।
तीसरा कारण है — पीयर प्रेशर। दोस्तों के दबाव में आकर युवा नशे की शुरुआत करते हैं। 'कूल' दिखने का फैशन, समूह में स्वीकार्यता की चाह — ये उन्हें नशे की ओर धकेलते हैं।
चौथा कारण है — आसान उपलब्धता। शहरों में तो दूर, अब गाँवों में भी आसानी से नशा उपलब्ध है। तस्कर युवाओं को अपना शिकार बना रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से भी नशे की आसान पहुँच है।
नशे के दुष्परिणाम भयावह हैं। स्वास्थ्य पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है। फेफड़े, यकृत, हृदय, मस्तिष्क — सभी अंग प्रभावित होते हैं। युवावस्था में ही शरीर बूढ़ा हो जाता है। मानसिक संतुलन बिगड़ता है। अवसाद, आत्महत्या के विचार, हिंसक प्रवृत्ति — ये नशे के परिणाम हैं।
आर्थिक क्षति भी कम नहीं। नशे पर होने वाला खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति को चरमरा देता है। चोरी, ठगी, लूटपाट — नशेड़ी अपराध की ओर बढ़ जाते हैं।
नशे की समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। परिवार में संस्कार और संवाद आवश्यक है। माता-पिता बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करें। उनकी समस्याओं को सुनें। उन्हें समय दें।
शिक्षण संस्थानों में नशे के दुष्परिणामों की जानकारी दी जाए। काउंसलिंग की सुविधा हो। खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। सरकार को नशे के तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। नशा मुक्त भारत अभियान को जन-आंदोलन बनाना होगा।
युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। नशा मुक्त युवा ही सशक्त भारत का निर्माण कर सकता है। आइए, हम सब संकल्प लें — नशा नहीं, जीवन चुनेंगे।
(लगभग 445 शब्द)
युवा पीढ़ी और नशे की समस्या
नशे की समस्या आज के युवाओं के लिए अभिशाप बन चुकी है। जो युवा शक्ति देश की रीढ़ है, वही नशे की गर्त में डूबती जा रही है। स्कूल-कॉलेज के छात्र हों या युवा पेशेवर, नशे की चपेट में सभी आ रहे हैं। यह समस्या केवल व्यक्तिगत नहीं, वरन् सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय है।
युवाओं में नशे की लत के अनेक कारण हैं। पहला और सबसे बड़ा कारण है — मानसिक तनाव। प्रतिस्पर्धा का दबाव, परीक्षा का भय, करियर की अनिश्चितता, बेरोजगारी — ये युवाओं को मानसिक रूप से तोड़ देते हैं। नशा उन्हें इस तनाव से अस्थायी मुक्ति देता है।
दूसरा कारण है — पारिवारिक विघटन। एकल परिवार, कामकाजी माता-पिता, माता-पिता के बीच कलह, संस्कारों का अभाव — ये बच्चों को भटका देते हैं। वे परिवार में प्यार और अपनापन न पाकर नशे में सुकून तलाशते हैं।
तीसरा कारण है — पीयर प्रेशर। दोस्तों के दबाव में आकर युवा नशे की शुरुआत करते हैं। 'कूल' दिखने का फैशन, समूह में स्वीकार्यता की चाह — ये उन्हें नशे की ओर धकेलते हैं।
चौथा कारण है — आसान उपलब्धता। शहरों में तो दूर, अब गाँवों में भी आसानी से नशा उपलब्ध है। तस्कर युवाओं को अपना शिकार बना रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से भी नशे की आसान पहुँच है।
नशे के दुष्परिणाम भयावह हैं। स्वास्थ्य पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ता है। फेफड़े, यकृत, हृदय, मस्तिष्क — सभी अंग प्रभावित होते हैं। युवावस्था में ही शरीर बूढ़ा हो जाता है। मानसिक संतुलन बिगड़ता है। अवसाद, आत्महत्या के विचार, हिंसक प्रवृत्ति — ये नशे के परिणाम हैं।
आर्थिक क्षति भी कम नहीं। नशे पर होने वाला खर्च परिवार की आर्थिक स्थिति को चरमरा देता है। चोरी, ठगी, लूटपाट — नशेड़ी अपराध की ओर बढ़ जाते हैं।
नशे की समस्या के समाधान के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। परिवार में संस्कार और संवाद आवश्यक है। माता-पिता बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार करें। उनकी समस्याओं को सुनें। उन्हें समय दें।
शिक्षण संस्थानों में नशे के दुष्परिणामों की जानकारी दी जाए। काउंसलिंग की सुविधा हो। खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। सरकार को नशे के तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी होगी। नशा मुक्त भारत अभियान को जन-आंदोलन बनाना होगा।
युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है। नशा मुक्त युवा ही सशक्त भारत का निर्माण कर सकता है। आइए, हम सब संकल्प लें — नशा नहीं, जीवन चुनेंगे।
(लगभग 445 शब्द)
15. "भारतीय संस्कृति और परंपरा" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2020, Set 3)
उत्तर:
भारतीय संस्कृति और परंपरा
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक है। यह पाँच हजार वर्षों से अधिक समय से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहमान है। अनेक आक्रमण, अनेक परिवर्तन, अनेक संघर्ष — सबके बावजूद भारतीय संस्कृति अपनी मूल आत्मा को बचाए हुए है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है — विविधता में एकता। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक धर्म हैं, अनेक जातियाँ हैं, अनेक रीति-रिवाज हैं। फिर भी, सब भारतीय हैं। गंगा-यमुना की इस धरती ने सबको अपनाया है। पारसी, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम — सबको यहाँ स्थान मिला है। 'सर्व धर्म समभाव' हमारी संस्कृति का मूल मंत्र है।
दूसरी विशेषता है — 'अतिथि देवो भवः'। अतिथि को भगवान का रूप मानना भारतीय संस्कृति की अनूठी परंपरा है। बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी अपेक्षा के अतिथि का स्वागत-सत्कार — यह हमें दुनिया में अलग बनाता है।
तीसरी विशेषता है — परिवार व्यवस्था। भारत में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। दादा-दादी, चाचा-चाची, चचेरे भाई-बहन — सब एक साथ रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देते हैं। बुजुर्गों का सम्मान, बच्चों का लाड़-प्यार — यह परिवार व्यवस्था हमें संस्कार देती है।
चौथी विशेषता है — त्योहारों की रंगीन दुनिया। दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, बैसाखी, पोंगल — यह त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं। रंगों का त्योहार होली मिलन का प्रतीक है। रोशनी का त्योहार दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
पाँचवीं विशेषता है — योग और आयुर्वेद। भारत ने दुनिया को योग का ज्ञान दिया। आज विश्व योग दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति आज वैश्विक स्तर पर स्वीकार की जा रही है।
किंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण, भाषा का ह्रास, संस्कारों का क्षरण — ये चिंता के विषय हैं।
भारतीय संस्कृति और परंपरा हमारी पहचान है। यह हमारी जड़ें हैं। जड़ें मजबूत होंगी, तभी वृक्ष फलेगा-फूलेगा। हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। उसे संजोना चाहिए, संरक्षित करना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहिए।
(लगभग 435 शब्द)
भारतीय संस्कृति और परंपरा
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम जीवंत संस्कृतियों में से एक है। यह पाँच हजार वर्षों से अधिक समय से अविच्छिन्न रूप से प्रवाहमान है। अनेक आक्रमण, अनेक परिवर्तन, अनेक संघर्ष — सबके बावजूद भारतीय संस्कृति अपनी मूल आत्मा को बचाए हुए है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है — विविधता में एकता। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक धर्म हैं, अनेक जातियाँ हैं, अनेक रीति-रिवाज हैं। फिर भी, सब भारतीय हैं। गंगा-यमुना की इस धरती ने सबको अपनाया है। पारसी, यहूदी, ईसाई, मुस्लिम — सबको यहाँ स्थान मिला है। 'सर्व धर्म समभाव' हमारी संस्कृति का मूल मंत्र है।
दूसरी विशेषता है — 'अतिथि देवो भवः'। अतिथि को भगवान का रूप मानना भारतीय संस्कृति की अनूठी परंपरा है। बिना किसी भेदभाव के, बिना किसी अपेक्षा के अतिथि का स्वागत-सत्कार — यह हमें दुनिया में अलग बनाता है।
तीसरी विशेषता है — परिवार व्यवस्था। भारत में संयुक्त परिवार की परंपरा रही है। दादा-दादी, चाचा-चाची, चचेरे भाई-बहन — सब एक साथ रहते हैं। एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ देते हैं। बुजुर्गों का सम्मान, बच्चों का लाड़-प्यार — यह परिवार व्यवस्था हमें संस्कार देती है।
चौथी विशेषता है — त्योहारों की रंगीन दुनिया। दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन, ईद, क्रिसमस, गुरुपर्व, बैसाखी, पोंगल — यह त्योहार हमें आपस में जोड़ते हैं। रंगों का त्योहार होली मिलन का प्रतीक है। रोशनी का त्योहार दीपावली अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है।
पाँचवीं विशेषता है — योग और आयुर्वेद। भारत ने दुनिया को योग का ज्ञान दिया। आज विश्व योग दिवस पूरी दुनिया में मनाया जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति आज वैश्विक स्तर पर स्वीकार की जा रही है।
किंतु आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण, भाषा का ह्रास, संस्कारों का क्षरण — ये चिंता के विषय हैं।
भारतीय संस्कृति और परंपरा हमारी पहचान है। यह हमारी जड़ें हैं। जड़ें मजबूत होंगी, तभी वृक्ष फलेगा-फूलेगा। हमें अपनी संस्कृति पर गर्व होना चाहिए। उसे संजोना चाहिए, संरक्षित करना चाहिए और आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहिए।
(लगभग 435 शब्द)
16. "व्यायाम का महत्व" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2019, Set 1)
उत्तर:
व्यायाम का महत्व
'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।' यह सूक्ति व्यायाम के महत्व को स्पष्ट करती है। व्यायाम केवल शरीर को सुडौल बनाने का साधन नहीं है। यह स्वस्थ जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। आधुनिक जीवनशैली ने हमें गतिहीन बना दिया है। हम चलते कम हैं, बैठते अधिक हैं। इस गतिहीन जीवनशैली ने अनेक रोगों को जन्म दिया है।
व्यायाम के शारीरिक लाभ असंख्य हैं। नियमित व्यायाम से हृदय मजबूत होता है। रक्त संचार सुचारु रहता है। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। हड्डियाँ सुदृढ़ होती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया जैसे रोगों से बचाव होता है।
व्यायाम के मानसिक लाभ भी कम नहीं हैं। व्यायाम से तनाव कम होता है। चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है। मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक रसायन का स्राव होता है, जो हमें प्रसन्न रखता है। नींद अच्छी आती है। एकाग्रता बढ़ती है। स्मरण शक्ति तीव्र होती है।
व्यायाम के अनेक प्रकार हैं। दौड़ना, तैरना, साइकिल चलाना, योग, प्राणायाम, क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, टेनिस — हर आयु और क्षमता के अनुसार व्यायाम का विकल्प चुना जा सकता है। योग तो भारत की अनमोल देन है। प्राणायाम से श्वसन तंत्र मजबूत होता है। आसनों से शरीर लचीला बनता है।
दुर्भाग्यवश, आज की युवा पीढ़ी व्यायाम से दूर होती जा रही है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, इंटरनेट ने उन्हें घरों में कैद कर दिया है। खेल के मैदान सिमटते जा रहे हैं। स्कूलों में खेलकूद को द्वितीय श्रेणी का दर्जा दिया जाता है।
व्यायाम को दिनचर्या का अनिवार्य अंग बनाना होगा। प्रातःकाल उठकर टहलना, योग करना, खेलना — यह आदत बचपन से ही डालनी चाहिए। कार्यालयों में भी व्यायाम की सुविधा होनी चाहिए।
सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं — फिट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, योग दिवस। किंतु यह तभी सफल होगा, जब हर नागरिक इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएगा।
व्यायाम कोई विकल्प नहीं है। यह अनिवार्यता है। स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ी संपत्ति है। व्यायाम को अपनाएँ, स्वस्थ जीवन पाएँ।
(लगभग 425 शब्द)
व्यायाम का महत्व
'स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।' यह सूक्ति व्यायाम के महत्व को स्पष्ट करती है। व्यायाम केवल शरीर को सुडौल बनाने का साधन नहीं है। यह स्वस्थ जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। आधुनिक जीवनशैली ने हमें गतिहीन बना दिया है। हम चलते कम हैं, बैठते अधिक हैं। इस गतिहीन जीवनशैली ने अनेक रोगों को जन्म दिया है।
व्यायाम के शारीरिक लाभ असंख्य हैं। नियमित व्यायाम से हृदय मजबूत होता है। रक्त संचार सुचारु रहता है। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है। मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं। हड्डियाँ सुदृढ़ होती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होती है। मोटापा, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, गठिया जैसे रोगों से बचाव होता है।
व्यायाम के मानसिक लाभ भी कम नहीं हैं। व्यायाम से तनाव कम होता है। चिंता और अवसाद से मुक्ति मिलती है। मस्तिष्क में एंडोर्फिन नामक रसायन का स्राव होता है, जो हमें प्रसन्न रखता है। नींद अच्छी आती है। एकाग्रता बढ़ती है। स्मरण शक्ति तीव्र होती है।
व्यायाम के अनेक प्रकार हैं। दौड़ना, तैरना, साइकिल चलाना, योग, प्राणायाम, क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, टेनिस — हर आयु और क्षमता के अनुसार व्यायाम का विकल्प चुना जा सकता है। योग तो भारत की अनमोल देन है। प्राणायाम से श्वसन तंत्र मजबूत होता है। आसनों से शरीर लचीला बनता है।
दुर्भाग्यवश, आज की युवा पीढ़ी व्यायाम से दूर होती जा रही है। मोबाइल फोन, वीडियो गेम, इंटरनेट ने उन्हें घरों में कैद कर दिया है। खेल के मैदान सिमटते जा रहे हैं। स्कूलों में खेलकूद को द्वितीय श्रेणी का दर्जा दिया जाता है।
व्यायाम को दिनचर्या का अनिवार्य अंग बनाना होगा। प्रातःकाल उठकर टहलना, योग करना, खेलना — यह आदत बचपन से ही डालनी चाहिए। कार्यालयों में भी व्यायाम की सुविधा होनी चाहिए।
सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए हैं — फिट इंडिया मूवमेंट, खेलो इंडिया, योग दिवस। किंतु यह तभी सफल होगा, जब हर नागरिक इसे अपने जीवन का हिस्सा बनाएगा।
व्यायाम कोई विकल्प नहीं है। यह अनिवार्यता है। स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ी संपत्ति है। व्यायाम को अपनाएँ, स्वस्थ जीवन पाएँ।
(लगभग 425 शब्द)
17. "कंप्यूटर और इंटरनेट का बढ़ता प्रभाव" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2021, Set 2)
उत्तर:
कंप्यूटर और इंटरनेट का बढ़ता प्रभाव
कंप्यूटर और इंटरनेट ने 21वीं सदी में मानव जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। आज ये केवल तकनीकी उपकरण नहीं, वरन् जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक, हम कहीं न कहीं कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े रहते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में कंप्यूटर और इंटरनेट ने क्रांति ला दी है। आज ऑनलाइन कक्षाएँ, डिजिटल पुस्तकालय, ई-बुक्स, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, वर्चुअल लैब — ये सब संभव हो पाए हैं। कोरोना काल में जब स्कूल-कॉलेज बंद थे, तब ऑनलाइन शिक्षा ने ही शिक्षा की गाड़ी रोकने नहीं दी। दीक्षा, स्वयं, नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी जैसे प्लेटफॉर्म ने शिक्षा को घर-घर पहुँचाया।
संचार के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। ईमेल, सोशल मीडिया, वीडियो कॉलिंग, व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम — इन्होंने दूरियों को समाप्त कर दिया है। आज हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से जुड़ सकते हैं।
व्यवसाय और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। ई-कॉमर्स ने खरीदारी को सरल बना दिया है। अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसी वेबसाइट से घर बैठे सामान मँगवाया जा सकता है। डिजिटल पेमेंट ने नकदी का लेनदेन लगभग समाप्त कर दिया है। यूपीआई, भीम, पेटीएम, गूगल पे — ये आज हर दुकान पर स्वीकार किए जाते हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में भी क्रांति आई है। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉटस्टार, यूट्यूब — इन्होंने मनोरंजन के तरीके बदल दिए हैं। गाने, फिल्में, वेब सीरीज, गेम — सब ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
किंतु इसके दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। साइबर अपराध बढ़े हैं। फिशिंग, वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, हैकिंग — ये आम समस्या बन गई हैं। सोशल मीडिया के दुरुपयोग से सामाजिक सद्भाव भंग हो रहा है। फेक न्यूज, अफवाहें, धार्मिक उन्माद — ये खतरनाक हैं।
युवा पीढ़ी पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है। वे घंटों मोबाइल फोन और इंटरनेट पर समय बिताते हैं। खेलकूद, पढ़ाई, पारिवारिक संवाद — सब प्रभावित हुए हैं। इंटरनेट एडिक्शन एक गंभीर समस्या बन चुकी है।
कंप्यूटर और इंटरनेट वरदान हैं या अभिशाप — यह हमारे उपयोग पर निर्भर करता है। सीमित और सार्थक उपयोग वरदान है। अंधाधुंध और अनियंत्रित उपयोग अभिशाप। हमें इस तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा।
(लगभग 440 शब्द)
कंप्यूटर और इंटरनेट का बढ़ता प्रभाव
कंप्यूटर और इंटरनेट ने 21वीं सदी में मानव जीवन को पूरी तरह बदल कर रख दिया है। आज ये केवल तकनीकी उपकरण नहीं, वरन् जीवन का अभिन्न अंग बन चुके हैं। सुबह उठने से लेकर रात सोने तक, हम कहीं न कहीं कंप्यूटर और इंटरनेट से जुड़े रहते हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में कंप्यूटर और इंटरनेट ने क्रांति ला दी है। आज ऑनलाइन कक्षाएँ, डिजिटल पुस्तकालय, ई-बुक्स, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, वर्चुअल लैब — ये सब संभव हो पाए हैं। कोरोना काल में जब स्कूल-कॉलेज बंद थे, तब ऑनलाइन शिक्षा ने ही शिक्षा की गाड़ी रोकने नहीं दी। दीक्षा, स्वयं, नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी जैसे प्लेटफॉर्म ने शिक्षा को घर-घर पहुँचाया।
संचार के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व परिवर्तन आया है। ईमेल, सोशल मीडिया, वीडियो कॉलिंग, व्हाट्सएप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम — इन्होंने दूरियों को समाप्त कर दिया है। आज हम पल भर में दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से जुड़ सकते हैं।
व्यवसाय और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है। ई-कॉमर्स ने खरीदारी को सरल बना दिया है। अमेजन, फ्लिपकार्ट जैसी वेबसाइट से घर बैठे सामान मँगवाया जा सकता है। डिजिटल पेमेंट ने नकदी का लेनदेन लगभग समाप्त कर दिया है। यूपीआई, भीम, पेटीएम, गूगल पे — ये आज हर दुकान पर स्वीकार किए जाते हैं।
मनोरंजन के क्षेत्र में भी क्रांति आई है। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, हॉटस्टार, यूट्यूब — इन्होंने मनोरंजन के तरीके बदल दिए हैं। गाने, फिल्में, वेब सीरीज, गेम — सब ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
किंतु इसके दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। साइबर अपराध बढ़े हैं। फिशिंग, वित्तीय धोखाधड़ी, डेटा चोरी, हैकिंग — ये आम समस्या बन गई हैं। सोशल मीडिया के दुरुपयोग से सामाजिक सद्भाव भंग हो रहा है। फेक न्यूज, अफवाहें, धार्मिक उन्माद — ये खतरनाक हैं।
युवा पीढ़ी पर सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है। वे घंटों मोबाइल फोन और इंटरनेट पर समय बिताते हैं। खेलकूद, पढ़ाई, पारिवारिक संवाद — सब प्रभावित हुए हैं। इंटरनेट एडिक्शन एक गंभीर समस्या बन चुकी है।
कंप्यूटर और इंटरनेट वरदान हैं या अभिशाप — यह हमारे उपयोग पर निर्भर करता है। सीमित और सार्थक उपयोग वरदान है। अंधाधुंध और अनियंत्रित उपयोग अभिशाप। हमें इस तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा।
(लगभग 440 शब्द)
18. "बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2019, Set 4)
उत्तर:
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना
22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानीपत, हरियाणा से 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' योजना का शुभारंभ किया। यह योजना देश में घटते लिंगानुपात की गंभीर समस्या के समाधान और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई थी।
भारत में लिंगानुपात की स्थिति चिंताजनक रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, प्रति 1000 लड़कों पर मात्र 918 लड़कियाँ थीं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली जैसे राज्यों में स्थिति और विकट थी। कन्या भ्रूण हत्या, लिंग जांच, दहेज प्रथा, बेटियों के प्रति सामाजिक भेदभाव — ये इसके मुख्य कारण थे।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना के तीन मुख्य लक्ष्य हैं — प्रथम, बालिका भ्रूण हत्या पर रोकथाम। द्वितीय, बालिकाओं का अस्तित्व सुनिश्चित करना। तृतीय, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना। यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय के समन्वय से संचालित की जा रही है।
इस योजना के अंतर्गत अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। जागरूकता अभियान, बालिका जन्मोत्सव, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ कड़े कानून, पीसीपीएनडीटी एक्ट का सख्ती से पालन, बालिकाओं के लिए छात्रवृत्ति, निःशुल्क शिक्षा, सुकन्या समृद्धि खाता — ये महत्वपूर्ण कदम हैं।
इस योजना के सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देश का लिंगानुपात सुधरा है। हरियाणा जैसे राज्यों में बेटियों के जन्म में वृद्धि हुई है। बालिका शिक्षा का प्रतिशत बढ़ा है। उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन लड़कों से अधिक हो गया है।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना ने समाज की मानसिकता बदलने का काम किया है। आज बेटियाँ हर क्षेत्र में आगे हैं — चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, प्रशासनिक सेवाएँ, खेल, रक्षा, अंतरिक्ष। अंतरिक्ष में कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स; खेल में पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, मेरी कॉम; प्रशासन में द्रौपदी मुर्मू — ये नाम प्रेरणा हैं।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। बाल विवाह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, भेदभाव — ये समस्याएँ अभी भी हैं।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ केवल एक सरकारी योजना नहीं है। यह एक सामाजिक आंदोलन है। इसे सफल बनाने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा। अपनी बेटियों को पढ़ाएँ, उन्हें सपने देखने दें, उन्हें आगे बढ़ने दें। क्योंकि बेटी बचेगी, तभी तो देश बचेगा।
(लगभग 445 शब्द)
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना
22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पानीपत, हरियाणा से 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' योजना का शुभारंभ किया। यह योजना देश में घटते लिंगानुपात की गंभीर समस्या के समाधान और बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से प्रारंभ की गई थी।
भारत में लिंगानुपात की स्थिति चिंताजनक रही है। 2011 की जनगणना के अनुसार, प्रति 1000 लड़कों पर मात्र 918 लड़कियाँ थीं। हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली जैसे राज्यों में स्थिति और विकट थी। कन्या भ्रूण हत्या, लिंग जांच, दहेज प्रथा, बेटियों के प्रति सामाजिक भेदभाव — ये इसके मुख्य कारण थे।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना के तीन मुख्य लक्ष्य हैं — प्रथम, बालिका भ्रूण हत्या पर रोकथाम। द्वितीय, बालिकाओं का अस्तित्व सुनिश्चित करना। तृतीय, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना। यह योजना महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और मानव संसाधन मंत्रालय के समन्वय से संचालित की जा रही है।
इस योजना के अंतर्गत अनेक कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। जागरूकता अभियान, बालिका जन्मोत्सव, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ कड़े कानून, पीसीपीएनडीटी एक्ट का सख्ती से पालन, बालिकाओं के लिए छात्रवृत्ति, निःशुल्क शिक्षा, सुकन्या समृद्धि खाता — ये महत्वपूर्ण कदम हैं।
इस योजना के सकारात्मक परिणाम दिखने लगे हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, देश का लिंगानुपात सुधरा है। हरियाणा जैसे राज्यों में बेटियों के जन्म में वृद्धि हुई है। बालिका शिक्षा का प्रतिशत बढ़ा है। उच्च शिक्षा में लड़कियों का नामांकन लड़कों से अधिक हो गया है।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ योजना ने समाज की मानसिकता बदलने का काम किया है। आज बेटियाँ हर क्षेत्र में आगे हैं — चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, प्रशासनिक सेवाएँ, खेल, रक्षा, अंतरिक्ष। अंतरिक्ष में कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स; खेल में पीवी सिंधु, साइना नेहवाल, मेरी कॉम; प्रशासन में द्रौपदी मुर्मू — ये नाम प्रेरणा हैं।
किंतु चुनौतियाँ अभी समाप्त नहीं हुई हैं। आज भी लाखों लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पातीं। बाल विवाह अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा, भेदभाव — ये समस्याएँ अभी भी हैं।
बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ केवल एक सरकारी योजना नहीं है। यह एक सामाजिक आंदोलन है। इसे सफल बनाने के लिए हर नागरिक को आगे आना होगा। अपनी बेटियों को पढ़ाएँ, उन्हें सपने देखने दें, उन्हें आगे बढ़ने दें। क्योंकि बेटी बचेगी, तभी तो देश बचेगा।
(लगभग 445 शब्द)
19. "समय का सदुपयोग" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2020, Set 4)
उत्तर:
समय का सदुपयोग
'समय नदी की धारा के समान है, जो कभी रुकती नहीं, कभी लौटती नहीं।' समय का महत्व समझना और उसका सदुपयोग करना जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। समय का सदुपयोग ही मनुष्य को महान बनाता है। समय का दुरुपयोग पतन की ओर ले जाता है।
समय के सदुपयोग का अर्थ है — हर पल का सार्थक उपयोग। इसका अर्थ यह नहीं कि हमेशा काम में व्यस्त रहा जाए। इसका अर्थ है — आवश्यक कार्यों को समय पर करना, प्राथमिकता तय करना, अनावश्यक कार्यों से बचना, और जीवन को संतुलित रखना।
समय के सदुपयोग के लिए सबसे पहली आवश्यकता है — अनुशासन। नियमित दिनचर्या, समय पर सोना और जागना, समय पर भोजन, समय पर पढ़ाई — यह आदत बचपन से डालनी चाहिए। अनुशासित जीवन ही समय का सदुपयोग करना सिखाता है।
दूसरी आवश्यकता है — प्राथमिकता का निर्धारण। सभी कार्य समान महत्व के नहीं होते। जरूरी और अनजरूरी, महत्वपूर्ण और अमहत्वपूर्ण — इनमें अंतर करना सीखना होगा। पहले महत्वपूर्ण कार्य करें, फिर अन्य।
तीसरी आवश्यकता है — योजना। बिना योजना के किया गया कार्य अधूरा और अव्यवस्थित रहता है। दिन की शुरुआत में योजना बनाएँ, लक्ष्य निर्धारित करें, समय-सीमा तय करें। योजनाबद्ध कार्य ही सफल होता है।
चौथी आवश्यकता है — एकाग्रता। एक समय में एक ही कार्य करें। बीच-बीच में मोबाइल चेक करना, सोशल मीडिया देखना, बातचीत करना — ये आदतें समय की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। एकाग्रचित्त होकर किया गया कार्य कम समय में अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है।
पाँचवीं आवश्यकता है — आलस्य का त्याग। आलस्य समय का सबसे बड़ा चोर है। 'आज करेंगे, कल करेंगे' — यह सोच जीवन भर कुछ न करने की सोच है। टालने की आदत छोड़ें। जो कार्य आज कर सकते हैं, उसे कल पर न टालें।
समय का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है। महान वैज्ञानिक, साहित्यकार, समाज सुधारक, राजनेता — सभी ने समय का सदुपयोग करके ही महानता प्राप्त की है। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, एपीजे अब्दुल कलाम — इनका जीवन समय के सदुपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। जो समय का सदुपयोग करता है, समय उसका सदुपयोग करता है। जो समय को खोता है, वह जीवन को खोता है।
आइए, संकल्प लें — समय का सदुपयोग करेंगे, हर पल सार्थक जिएंगे।
(लगभग 430 शब्द)
समय का सदुपयोग
'समय नदी की धारा के समान है, जो कभी रुकती नहीं, कभी लौटती नहीं।' समय का महत्व समझना और उसका सदुपयोग करना जीवन में सफलता का मूल मंत्र है। समय का सदुपयोग ही मनुष्य को महान बनाता है। समय का दुरुपयोग पतन की ओर ले जाता है।
समय के सदुपयोग का अर्थ है — हर पल का सार्थक उपयोग। इसका अर्थ यह नहीं कि हमेशा काम में व्यस्त रहा जाए। इसका अर्थ है — आवश्यक कार्यों को समय पर करना, प्राथमिकता तय करना, अनावश्यक कार्यों से बचना, और जीवन को संतुलित रखना।
समय के सदुपयोग के लिए सबसे पहली आवश्यकता है — अनुशासन। नियमित दिनचर्या, समय पर सोना और जागना, समय पर भोजन, समय पर पढ़ाई — यह आदत बचपन से डालनी चाहिए। अनुशासित जीवन ही समय का सदुपयोग करना सिखाता है।
दूसरी आवश्यकता है — प्राथमिकता का निर्धारण। सभी कार्य समान महत्व के नहीं होते। जरूरी और अनजरूरी, महत्वपूर्ण और अमहत्वपूर्ण — इनमें अंतर करना सीखना होगा। पहले महत्वपूर्ण कार्य करें, फिर अन्य।
तीसरी आवश्यकता है — योजना। बिना योजना के किया गया कार्य अधूरा और अव्यवस्थित रहता है। दिन की शुरुआत में योजना बनाएँ, लक्ष्य निर्धारित करें, समय-सीमा तय करें। योजनाबद्ध कार्य ही सफल होता है।
चौथी आवश्यकता है — एकाग्रता। एक समय में एक ही कार्य करें। बीच-बीच में मोबाइल चेक करना, सोशल मीडिया देखना, बातचीत करना — ये आदतें समय की सबसे बड़ी दुश्मन हैं। एकाग्रचित्त होकर किया गया कार्य कम समय में अधिक गुणवत्तापूर्ण होता है।
पाँचवीं आवश्यकता है — आलस्य का त्याग। आलस्य समय का सबसे बड़ा चोर है। 'आज करेंगे, कल करेंगे' — यह सोच जीवन भर कुछ न करने की सोच है। टालने की आदत छोड़ें। जो कार्य आज कर सकते हैं, उसे कल पर न टालें।
समय का सदुपयोग ही सफलता की कुंजी है। महान वैज्ञानिक, साहित्यकार, समाज सुधारक, राजनेता — सभी ने समय का सदुपयोग करके ही महानता प्राप्त की है। महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अंबेडकर, एपीजे अब्दुल कलाम — इनका जीवन समय के सदुपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है।
समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। बीता हुआ समय कभी लौटकर नहीं आता। जो समय का सदुपयोग करता है, समय उसका सदुपयोग करता है। जो समय को खोता है, वह जीवन को खोता है।
आइए, संकल्प लें — समय का सदुपयोग करेंगे, हर पल सार्थक जिएंगे।
(लगभग 430 शब्द)
20. "राष्ट्र निर्माण में युवाओं का योगदान" विषय पर निबंध लिखिए। (CBSE 2023, Set 4)
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण में युवाओं का योगदान
'युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है।' भारत विश्व का सबसे युवा देश है। हमारी 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी संपत्ति है। यदि इस शक्ति का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो भारत विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं का योगदान अनेक क्षेत्रों में है। प्रथम, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में। युवा उद्यमी, स्टार्टअप संस्थापक, नवाचारक — ये देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ दे रहे हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, दिल्ली-एनसीआर — यहाँ के युवा टेक्नोलॉजी, आईटी, ई-कॉमर्स, फिनटेक में विश्व स्तर पर धाक जमा रहे हैं।
द्वितीय, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में। भारतीय युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन, ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। इसरो के युवा वैज्ञानिकों ने चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य एल-1 जैसे अभियानों को सफल बनाया।
तृतीय, खेल के क्षेत्र में। नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु, मनु भाकर, लवलीना बोरगोहेन, मीराबाई चानू — इन युवा खिलाड़ियों ने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स में देश का नाम रोशन किया है।
चतुर्थ, समाज सेवा के क्षेत्र में। युवा स्वयंसेवक शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, महिला सशक्तीकरण, स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। एनएसएस, एनसीसी, स्काउट एंड गाइड, युवा रेड क्रॉस — ये संगठन युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ रहे हैं।
पंचम, राजनीति और शासन के क्षेत्र में। युवा सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच — ये शासन व्यवस्था में नई सोच, नई ऊर्जा ला रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका को सशक्त बनाने के लिए सरकार अनेक योजनाएँ चला रही है — स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, नेशनल यूथ पॉलिसी।
किंतु चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, कौशल की कमी, उच्च शिक्षा की अपर्याप्त सुविधाएँ, नशे की समस्या, साइबर अपराध — ये युवाओं को पीछे धकेल रहे हैं।
युवा शक्ति देश की अमूल्य निधि है। इसे संरक्षित करना, इसे सशक्त बनाना, इसे सही दिशा देना — यह हम सबका दायित्व है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था — 'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।' आइए, युवा शक्ति को इसी मंत्र के साथ राष्ट्र निर्माण में लगाएँ।
(लगभग 445 शब्द)
राष्ट्र निर्माण में युवाओं का योगदान
'युवा शक्ति ही राष्ट्र शक्ति है।' भारत विश्व का सबसे युवा देश है। हमारी 65% से अधिक जनसंख्या 35 वर्ष से कम आयु की है। यह युवा शक्ति देश की सबसे बड़ी संपत्ति है। यदि इस शक्ति का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो भारत विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं का योगदान अनेक क्षेत्रों में है। प्रथम, अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में। युवा उद्यमी, स्टार्टअप संस्थापक, नवाचारक — ये देश की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ दे रहे हैं। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, दिल्ली-एनसीआर — यहाँ के युवा टेक्नोलॉजी, आईटी, ई-कॉमर्स, फिनटेक में विश्व स्तर पर धाक जमा रहे हैं।
द्वितीय, प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में। भारतीय युवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन, ड्रोन तकनीक, साइबर सुरक्षा में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। इसरो के युवा वैज्ञानिकों ने चंद्रयान, मंगलयान, आदित्य एल-1 जैसे अभियानों को सफल बनाया।
तृतीय, खेल के क्षेत्र में। नीरज चोपड़ा, पीवी सिंधु, मनु भाकर, लवलीना बोरगोहेन, मीराबाई चानू — इन युवा खिलाड़ियों ने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स में देश का नाम रोशन किया है।
चतुर्थ, समाज सेवा के क्षेत्र में। युवा स्वयंसेवक शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, महिला सशक्तीकरण, स्वच्छता के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। एनएसएस, एनसीसी, स्काउट एंड गाइड, युवा रेड क्रॉस — ये संगठन युवाओं को राष्ट्र निर्माण से जोड़ रहे हैं।
पंचम, राजनीति और शासन के क्षेत्र में। युवा सांसद, विधायक, पार्षद, सरपंच — ये शासन व्यवस्था में नई सोच, नई ऊर्जा ला रहे हैं। पंचायती राज संस्थाओं में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है।
राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका को सशक्त बनाने के लिए सरकार अनेक योजनाएँ चला रही है — स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया, नेशनल यूथ पॉलिसी।
किंतु चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, कौशल की कमी, उच्च शिक्षा की अपर्याप्त सुविधाएँ, नशे की समस्या, साइबर अपराध — ये युवाओं को पीछे धकेल रहे हैं।
युवा शक्ति देश की अमूल्य निधि है। इसे संरक्षित करना, इसे सशक्त बनाना, इसे सही दिशा देना — यह हम सबका दायित्व है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था — 'उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।' आइए, युवा शक्ति को इसी मंत्र के साथ राष्ट्र निर्माण में लगाएँ।
(लगभग 445 शब्द)