📌 शीर्षक एवं कथानक ● कक्षा 9-10 ● CBSE पैटर्न
यह वर्कशीट कक्षा 9-10 के विद्यार्थियों के लिए शीर्षक एवं कथानक लेखन के 20 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर आधारित है। दी गई रूपरेखा के आधार पर कहानी का उचित शीर्षक एवं विस्तृत कथानक विकसित करना है। प्रत्येक कथानक में पात्र, घटनाक्रम, चरमोत्कर्ष एवं बोध स्पष्ट रूप से दिया गया है। पहले स्वयं लिखें, फिर उत्तर जाँचें।
🎭 शीर्षक एवं कथानक — 20 प्रश्न
1. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
गाँव में भयंकर सूखा - किसान परेशान - एक बूढ़ा किसान अपना आखिरी बैल बेचने शहर जाता है - रास्ते में भूखा-प्यासा व्यक्ति मिलता है - किसान उसे अपना भोजन देता है - व्यक्ति आशीर्वाद देता है - शहर में बैल अच्छे दामों पर बिकता है - वापसी पर उसे खेत में पानी का स्रोत मिलता है - सूखा समाप्त - किसान समृद्ध होता है।
गाँव में भयंकर सूखा - किसान परेशान - एक बूढ़ा किसान अपना आखिरी बैल बेचने शहर जाता है - रास्ते में भूखा-प्यासा व्यक्ति मिलता है - किसान उसे अपना भोजन देता है - व्यक्ति आशीर्वाद देता है - शहर में बैल अच्छे दामों पर बिकता है - वापसी पर उसे खेत में पानी का स्रोत मिलता है - सूखा समाप्त - किसान समृद्ध होता है।
उत्तर:
शीर्षक: दया का फल
रामू गाँव का एक गरीब किसान था। उसके गाँव में तीन वर्षों से भयंकर सूखा पड़ा था। खेतों में दरारें पड़ गई थीं, तालाब सूख गए थे। सारे किसान परेशान थे। कई तो रोजगार की तलाश में शहर चले गए थे।
रामू के पास अब केवल एक ही बैल बचा था। मजबूरी में उसने उसे बेचने का निर्णय लिया। अगले दिन वह सुबह-सुबह बैल लेकर शहर की ओर चल दिया। रास्ता लंबा था और धूप तेज थी। वह एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा और अपने साथ लाई रोटी खाने लगा।
तभी वहाँ एक वृद्ध व्यक्ति आया। वह बहुत कमजोर और भूखा लग रहा था। उसने रामू से भोजन माँगा। रामू ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी आधी रोटी उसे दे दी। वह व्यक्ति खाकर तृप्त हुआ और बोला, "बेटा, तू बहुत दयालु है। तेरा भला होगा।"
रामू शहर पहुँचा। उसका बैल देखकर एक व्यापारी बहुत प्रभावित हुआ। उसने बैल का भाव पूछा। रामू ने पाँच हजार कहा, पर व्यापारी ने दस हजार रुपये दे दिए। रामू बहुत खुश हुआ।
वापस गाँव लौटते समय वह उसी पेड़ के नीचे रुका। उसे आश्चर्य हुआ — वहाँ एक छोटा-सा जलस्रोत बह रहा था! उसने वहाँ खुदाई की तो पानी की धार फूट पड़ी।
रामू ने उस पानी से अपने खेत की सिंचाई की। फसल लहलहा उठी। धीरे-धीरे गाँव में भी पानी आ गया। सूखा समाप्त हुआ। रामू ने वहाँ एक कुआँ बनवाया और गाँव वालों के लिए पानी की व्यवस्था की।
बोध: दया और परोपकार का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। दूसरों की मदद करने वाले की ईश्वर स्वयं सहायता करता है।
शीर्षक: दया का फल
रामू गाँव का एक गरीब किसान था। उसके गाँव में तीन वर्षों से भयंकर सूखा पड़ा था। खेतों में दरारें पड़ गई थीं, तालाब सूख गए थे। सारे किसान परेशान थे। कई तो रोजगार की तलाश में शहर चले गए थे।
रामू के पास अब केवल एक ही बैल बचा था। मजबूरी में उसने उसे बेचने का निर्णय लिया। अगले दिन वह सुबह-सुबह बैल लेकर शहर की ओर चल दिया। रास्ता लंबा था और धूप तेज थी। वह एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा और अपने साथ लाई रोटी खाने लगा।
तभी वहाँ एक वृद्ध व्यक्ति आया। वह बहुत कमजोर और भूखा लग रहा था। उसने रामू से भोजन माँगा। रामू ने बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी आधी रोटी उसे दे दी। वह व्यक्ति खाकर तृप्त हुआ और बोला, "बेटा, तू बहुत दयालु है। तेरा भला होगा।"
रामू शहर पहुँचा। उसका बैल देखकर एक व्यापारी बहुत प्रभावित हुआ। उसने बैल का भाव पूछा। रामू ने पाँच हजार कहा, पर व्यापारी ने दस हजार रुपये दे दिए। रामू बहुत खुश हुआ।
वापस गाँव लौटते समय वह उसी पेड़ के नीचे रुका। उसे आश्चर्य हुआ — वहाँ एक छोटा-सा जलस्रोत बह रहा था! उसने वहाँ खुदाई की तो पानी की धार फूट पड़ी।
रामू ने उस पानी से अपने खेत की सिंचाई की। फसल लहलहा उठी। धीरे-धीरे गाँव में भी पानी आ गया। सूखा समाप्त हुआ। रामू ने वहाँ एक कुआँ बनवाया और गाँव वालों के लिए पानी की व्यवस्था की।
बोध: दया और परोपकार का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। दूसरों की मदद करने वाले की ईश्वर स्वयं सहायता करता है।
2. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
दो मित्र — एक मेहनती, दूसरा आलसी — दोनों की नौकरी लगती है — मेहनती मित्र समय पर पहुँचता है, पूरी लगन से काम करता है — आलसी मित्र देर से आता है, काम चोरी करता है — बॉस दोनों को परखता है — कुछ दिनों बाद मेहनती मित्र को पदोन्नति मिलती है — आलसी मित्र को निकाला जाता है — उसे अपनी गलती का एहसास होता है।
दो मित्र — एक मेहनती, दूसरा आलसी — दोनों की नौकरी लगती है — मेहनती मित्र समय पर पहुँचता है, पूरी लगन से काम करता है — आलसी मित्र देर से आता है, काम चोरी करता है — बॉस दोनों को परखता है — कुछ दिनों बाद मेहनती मित्र को पदोन्नति मिलती है — आलसी मित्र को निकाला जाता है — उसे अपनी गलती का एहसास होता है।
उत्तर:
शीर्षक: परिश्रम की जीत
अजय और विजय घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की और एक ही कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन किया। दोनों का चयन हो गया। अजय बहुत मेहनती और अनुशासनप्रिय था। विजय स्वभाव से आलसी था और काम टालने की आदत रखता था।
नौकरी शुरू हुई। अजय प्रतिदिन सुबह 9 बजे से पहले कार्यालय पहुँच जाता। वह अपना काम समय पर पूरा करता, वरिष्ठों का सम्मान करता और हर काम को पूरी लगन से करता। वह कार्यालय के कामों के अलावा नई-नई चीजें सीखता रहता।
विजय प्रायः देर से आता। वह काम टालता और बॉस की अनुपस्थिति में समय बर्बाद करता। वह सोचता, "इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है? सब ठीक चल रहा है।"
कंपनी के निदेशक श्री वर्मा दोनों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने एक योजना बनाई। एक दिन उन्होंने दोनों को एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट सौंपा और तीन दिन का समय दिया।
अजय ने रात-दिन मेहनत की। उसने पूरे विस्तार से प्रोजेक्ट तैयार किया। विजय ने काम टाला और अंतिम दिन जल्दबाजी में अधूरा काम जमा कर दिया।
निदेशक ने सभी कर्मचारियों के सामने दोनों के काम की तुलना की। "अजय ने साबित कर दिया कि मेहनत और लगन से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। विजय, तुम्हारा काम अधूरा और गलतियों से भरा है।"
कुछ दिनों बाद अजय को पदोन्नति मिली और विजय को नौकरी से निकाल दिया गया। विजय को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने अजय से कहा, "मुझे समझ में आ गया कि परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।"
बोध: परिश्रम और अनुशासन ही सफलता के मूल मंत्र हैं। आलस्य और काम चोरी करने वाला कभी सफल नहीं हो सकता।
शीर्षक: परिश्रम की जीत
अजय और विजय घनिष्ठ मित्र थे। दोनों ने एक साथ शिक्षा प्राप्त की और एक ही कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन किया। दोनों का चयन हो गया। अजय बहुत मेहनती और अनुशासनप्रिय था। विजय स्वभाव से आलसी था और काम टालने की आदत रखता था।
नौकरी शुरू हुई। अजय प्रतिदिन सुबह 9 बजे से पहले कार्यालय पहुँच जाता। वह अपना काम समय पर पूरा करता, वरिष्ठों का सम्मान करता और हर काम को पूरी लगन से करता। वह कार्यालय के कामों के अलावा नई-नई चीजें सीखता रहता।
विजय प्रायः देर से आता। वह काम टालता और बॉस की अनुपस्थिति में समय बर्बाद करता। वह सोचता, "इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है? सब ठीक चल रहा है।"
कंपनी के निदेशक श्री वर्मा दोनों को ध्यान से देख रहे थे। उन्होंने एक योजना बनाई। एक दिन उन्होंने दोनों को एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट सौंपा और तीन दिन का समय दिया।
अजय ने रात-दिन मेहनत की। उसने पूरे विस्तार से प्रोजेक्ट तैयार किया। विजय ने काम टाला और अंतिम दिन जल्दबाजी में अधूरा काम जमा कर दिया।
निदेशक ने सभी कर्मचारियों के सामने दोनों के काम की तुलना की। "अजय ने साबित कर दिया कि मेहनत और लगन से कोई भी लक्ष्य हासिल किया जा सकता है। विजय, तुम्हारा काम अधूरा और गलतियों से भरा है।"
कुछ दिनों बाद अजय को पदोन्नति मिली और विजय को नौकरी से निकाल दिया गया। विजय को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने अजय से कहा, "मुझे समझ में आ गया कि परिश्रम ही सफलता की कुंजी है।"
बोध: परिश्रम और अनुशासन ही सफलता के मूल मंत्र हैं। आलस्य और काम चोरी करने वाला कभी सफल नहीं हो सकता।
3. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
जंगल में शेर राजा — सभी जानवर डरे रहते — छोटा खरगोश शेर के पास जाता है — शेर को चुनौती देता है — दूसरा शेर कुएँ में दिखाता है — शेर कुएँ में कूदता है — जंगल में शांति — खरगोश की बुद्धिमानी।
जंगल में शेर राजा — सभी जानवर डरे रहते — छोटा खरगोश शेर के पास जाता है — शेर को चुनौती देता है — दूसरा शेर कुएँ में दिखाता है — शेर कुएँ में कूदता है — जंगल में शांति — खरगोश की बुद्धिमानी।
उत्तर:
शीर्षक: बुद्धिमान खरगोश
एक घने जंगल में एक भयंकर शेर रहता था। वह बहुत बलशाली था, पर अत्यंत क्रूर भी। वह प्रतिदिन एक जानवर का शिकार करता। सभी जानवर डरे-सहमे रहते। कोई उसके सामने बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
एक दिन सभी जानवरों ने सभा बुलाई। हाथी, बाघ, भालू — सब चिंतित थे। तभी एक छोटे खरगोश ने कहा, "मैं इस शेर का अंत कर सकता हूँ।" सभी जानवर हैरान हुए। "तुम जैसा छोटा जीव क्या कर सकता है?" उन्होंने पूछा। खरगोश ने मुस्कुराते हुए कहा, "बुद्धि बल से बड़ी होती है, कद से नहीं।"
अगले दिन खरगोश शेर के पास गया। शेर ने गरजकर कहा, "इतनी देर से आए हो! मैं भूखा हूँ।" खरगोश ने विनम्रता से कहा, "महाराज, रास्ते में दूसरा शेर मिल गया। उसने कहा कि वह इस जंगल का असली राजा है। वह आपसे लड़ने की चुनौती दे रहा है।"
शेर क्रोधित हो उठा। "कहाँ है वह दूसरा शेर? मुझे ले चलो उसके पास!" खरगोश उसे एक पुराने कुएँ के पास ले गया। "महाराज, वह इसी कुएँ में रहता है," खरगोश ने कहा।
शेर ने कुएँ में झाँका। पानी में उसे अपनी ही परछाई दिखाई दी। वह समझा कि दूसरा शेर उसे गुर्राकर देख रहा है। वह गुस्से में जोर से दहाड़ा। कुएँ से गूँज आई। शेर ने समझा कि दूसरा शेर भी दहाड़ रहा है।
क्रोध में अंधा शेर कुएँ में कूद गया और डूब मरा। जंगल के सारे जानवर खुश हुए। उन्होंने खरगोश की बुद्धिमानी की प्रशंसा की।
बोध: बुद्धि बल से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। समस्या का समाधान हमेशा बल से नहीं, विवेक से किया जाना चाहिए।
शीर्षक: बुद्धिमान खरगोश
एक घने जंगल में एक भयंकर शेर रहता था। वह बहुत बलशाली था, पर अत्यंत क्रूर भी। वह प्रतिदिन एक जानवर का शिकार करता। सभी जानवर डरे-सहमे रहते। कोई उसके सामने बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
एक दिन सभी जानवरों ने सभा बुलाई। हाथी, बाघ, भालू — सब चिंतित थे। तभी एक छोटे खरगोश ने कहा, "मैं इस शेर का अंत कर सकता हूँ।" सभी जानवर हैरान हुए। "तुम जैसा छोटा जीव क्या कर सकता है?" उन्होंने पूछा। खरगोश ने मुस्कुराते हुए कहा, "बुद्धि बल से बड़ी होती है, कद से नहीं।"
अगले दिन खरगोश शेर के पास गया। शेर ने गरजकर कहा, "इतनी देर से आए हो! मैं भूखा हूँ।" खरगोश ने विनम्रता से कहा, "महाराज, रास्ते में दूसरा शेर मिल गया। उसने कहा कि वह इस जंगल का असली राजा है। वह आपसे लड़ने की चुनौती दे रहा है।"
शेर क्रोधित हो उठा। "कहाँ है वह दूसरा शेर? मुझे ले चलो उसके पास!" खरगोश उसे एक पुराने कुएँ के पास ले गया। "महाराज, वह इसी कुएँ में रहता है," खरगोश ने कहा।
शेर ने कुएँ में झाँका। पानी में उसे अपनी ही परछाई दिखाई दी। वह समझा कि दूसरा शेर उसे गुर्राकर देख रहा है। वह गुस्से में जोर से दहाड़ा। कुएँ से गूँज आई। शेर ने समझा कि दूसरा शेर भी दहाड़ रहा है।
क्रोध में अंधा शेर कुएँ में कूद गया और डूब मरा। जंगल के सारे जानवर खुश हुए। उन्होंने खरगोश की बुद्धिमानी की प्रशंसा की।
बोध: बुद्धि बल से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। समस्या का समाधान हमेशा बल से नहीं, विवेक से किया जाना चाहिए।
4. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
विद्यालय में निबंध प्रतियोगिता — रजत प्रथम आता है — उसका मित्र अरुण द्वितीय — रजत अभिमानी हो जाता है — अरुण से बात करना बंद कर देता है — वार्षिक परीक्षा आती है — रजत पढ़ाई में पिछड़ जाता है — अरुण उसकी मदद करता है — रजत को अपनी गलती का एहसास — दोनों की मित्रता और गहरी होती है।
विद्यालय में निबंध प्रतियोगिता — रजत प्रथम आता है — उसका मित्र अरुण द्वितीय — रजत अभिमानी हो जाता है — अरुण से बात करना बंद कर देता है — वार्षिक परीक्षा आती है — रजत पढ़ाई में पिछड़ जाता है — अरुण उसकी मदद करता है — रजत को अपनी गलती का एहसास — दोनों की मित्रता और गहरी होती है।
उत्तर:
शीर्षक: सच्ची मित्रता
रजत और अरुण एक ही विद्यालय में पढ़ते थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। वे साथ पढ़ते, साथ खेलते, एक-दूसरे की हर समस्या का समाधान करते।
एक दिन विद्यालय में निबंध प्रतियोगिता हुई। रजत ने परिश्रम किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। अरुण द्वितीय स्थान पर रहा। इस जीत के बाद रजत के मन में अहंकार आ गया। वह स्वयं को अरुण से अधिक योग्य समझने लगा।
धीरे-धीरे उसने अरुण से बात करना बंद कर दिया। वह उसकी सलाह नहीं लेता, उसके साथ नहीं बैठता। अरुण दुखी तो हुआ, पर उसने रजत से कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगा रहा।
अब वार्षिक परीक्षाएँ निकट थीं। रजत ने पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा कि वह पहले की तरह बिना अधिक मेहनत के भी सफल हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह कठिन विषयों में पिछड़ने लगा। वह घबरा गया।
एक दिन वह अकेला बैठा परेशान था। अरुण उसके पास आया। "रजत, मैं जानता हूँ तुम परेशान हो। चाहो तो साथ पढ़ सकते हैं," उसने सहज भाव से कहा। रजत की आँखें भर आईं। "मैंने तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार किया, फिर भी तुम..." अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा, "मित्र वही है जो मुसीबत में काम आए।"
दोनों ने साथ मिलकर पढ़ाई की। रजत ने अपना अहंकार त्याग दिया। परीक्षा में दोनों ने अच्छे अंक प्राप्त किए। उनकी मित्रता पहले से अधिक गहरी हो गई।
बोध: सफलता का अहंकार नहीं करना चाहिए। सच्चा मित्र वही है जो कठिन समय में साथ निभाए।
शीर्षक: सच्ची मित्रता
रजत और अरुण एक ही विद्यालय में पढ़ते थे। दोनों में गहरी मित्रता थी। वे साथ पढ़ते, साथ खेलते, एक-दूसरे की हर समस्या का समाधान करते।
एक दिन विद्यालय में निबंध प्रतियोगिता हुई। रजत ने परिश्रम किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। अरुण द्वितीय स्थान पर रहा। इस जीत के बाद रजत के मन में अहंकार आ गया। वह स्वयं को अरुण से अधिक योग्य समझने लगा।
धीरे-धीरे उसने अरुण से बात करना बंद कर दिया। वह उसकी सलाह नहीं लेता, उसके साथ नहीं बैठता। अरुण दुखी तो हुआ, पर उसने रजत से कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप अपनी पढ़ाई में लगा रहा।
अब वार्षिक परीक्षाएँ निकट थीं। रजत ने पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा कि वह पहले की तरह बिना अधिक मेहनत के भी सफल हो जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह कठिन विषयों में पिछड़ने लगा। वह घबरा गया।
एक दिन वह अकेला बैठा परेशान था। अरुण उसके पास आया। "रजत, मैं जानता हूँ तुम परेशान हो। चाहो तो साथ पढ़ सकते हैं," उसने सहज भाव से कहा। रजत की आँखें भर आईं। "मैंने तुम्हारे साथ इतना बुरा व्यवहार किया, फिर भी तुम..." अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा, "मित्र वही है जो मुसीबत में काम आए।"
दोनों ने साथ मिलकर पढ़ाई की। रजत ने अपना अहंकार त्याग दिया। परीक्षा में दोनों ने अच्छे अंक प्राप्त किए। उनकी मित्रता पहले से अधिक गहरी हो गई।
बोध: सफलता का अहंकार नहीं करना चाहिए। सच्चा मित्र वही है जो कठिन समय में साथ निभाए।
5. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक नेत्रहीन व्यक्ति — रात में हाथ में दीपक लेकर चलता है — लोग हँसते हैं — दीपक से उन्हें क्या लाभ, तुम तो देख नहीं सकते — नेत्रहीन का उत्तर — ताकि दूसरे मुझे देख सकें और टकरा न जाएँ — सबकी सोच बदल जाती है।
एक नेत्रहीन व्यक्ति — रात में हाथ में दीपक लेकर चलता है — लोग हँसते हैं — दीपक से उन्हें क्या लाभ, तुम तो देख नहीं सकते — नेत्रहीन का उत्तर — ताकि दूसरे मुझे देख सकें और टकरा न जाएँ — सबकी सोच बदल जाती है।
उत्तर:
शीर्षक: दीपक का संदेश
एक छोटे से नगर में एक नेत्रहीन व्यक्ति रहता था। वह प्रतिदिन रात के समय हाथ में एक दीपक लेकर सड़क पर चलता था। लोग यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित होते और हँसते।
एक दिन एक युवक ने उससे पूछा, "तुम नेत्रहीन हो। तुम्हें दीपक से क्या लाभ? तुम तो देख ही नहीं सकते। रात हो या दिन, तुम्हारे लिए सब समान है। फिर यह दीपक क्यों?"
नेत्रहीन व्यक्ति ने शांति से उत्तर दिया, "बेटा, यह दीपक मेरे लिए नहीं है। यह दूसरों के लिए है।"
युवक ने हैरानी से पूछा, "दूसरों के लिए? इसका क्या अर्थ?"
नेत्रहीन व्यक्ति ने कहा, "इस दीपक के कारण लोग मुझे देख सकते हैं। वे समझ जाते हैं कि सामने कोई व्यक्ति आ रहा है। वे स्वतः ही किनारे हो जाते हैं। न तो वे मुझसे टकराते हैं, न मैं उनसे। यह दीपक मेरी नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए है।"
युवक स्तब्ध रह गया। उसने कभी इस दृष्टिकोण से नहीं सोचा था। उसकी आँखों के सामने एक नया दृष्टिकोण खुल गया। उसने कहा, "आप नेत्रहीन हैं, परंतु आपकी सोच हम देखने वालों से कहीं अधिक दूरदर्शी है।"
यह घटना नगर में फैल गई। लोगों की सोच बदल गई। वे नेत्रहीन व्यक्ति का सम्मान करने लगे। उस छोटे से दीपक ने सभी को जीवन का एक बड़ा सबक सिखा दिया।
बोध: सच्चा ज्ञान आँखों से नहीं, विवेक से आता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता ही मानवता की पहचान है।
शीर्षक: दीपक का संदेश
एक छोटे से नगर में एक नेत्रहीन व्यक्ति रहता था। वह प्रतिदिन रात के समय हाथ में एक दीपक लेकर सड़क पर चलता था। लोग यह दृश्य देखकर आश्चर्यचकित होते और हँसते।
एक दिन एक युवक ने उससे पूछा, "तुम नेत्रहीन हो। तुम्हें दीपक से क्या लाभ? तुम तो देख ही नहीं सकते। रात हो या दिन, तुम्हारे लिए सब समान है। फिर यह दीपक क्यों?"
नेत्रहीन व्यक्ति ने शांति से उत्तर दिया, "बेटा, यह दीपक मेरे लिए नहीं है। यह दूसरों के लिए है।"
युवक ने हैरानी से पूछा, "दूसरों के लिए? इसका क्या अर्थ?"
नेत्रहीन व्यक्ति ने कहा, "इस दीपक के कारण लोग मुझे देख सकते हैं। वे समझ जाते हैं कि सामने कोई व्यक्ति आ रहा है। वे स्वतः ही किनारे हो जाते हैं। न तो वे मुझसे टकराते हैं, न मैं उनसे। यह दीपक मेरी नहीं, उनकी सुरक्षा के लिए है।"
युवक स्तब्ध रह गया। उसने कभी इस दृष्टिकोण से नहीं सोचा था। उसकी आँखों के सामने एक नया दृष्टिकोण खुल गया। उसने कहा, "आप नेत्रहीन हैं, परंतु आपकी सोच हम देखने वालों से कहीं अधिक दूरदर्शी है।"
यह घटना नगर में फैल गई। लोगों की सोच बदल गई। वे नेत्रहीन व्यक्ति का सम्मान करने लगे। उस छोटे से दीपक ने सभी को जीवन का एक बड़ा सबक सिखा दिया।
बोध: सच्चा ज्ञान आँखों से नहीं, विवेक से आता है। दूसरों के प्रति संवेदनशीलता ही मानवता की पहचान है।
6. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
राजा का सवाल — सबसे बड़ा दान क्या है — दरबारी अलग-अलग उत्तर देते हैं — कोई कहता है सोना, कोई कहता है अन्न, कोई कहता है वस्त्र — एक छोटा बालक दरबार में आता है — कहता है ज्ञान सबसे बड़ा दान — राजा प्रसन्न — बालक को पुरस्कृत करता है।
राजा का सवाल — सबसे बड़ा दान क्या है — दरबारी अलग-अलग उत्तर देते हैं — कोई कहता है सोना, कोई कहता है अन्न, कोई कहता है वस्त्र — एक छोटा बालक दरबार में आता है — कहता है ज्ञान सबसे बड़ा दान — राजा प्रसन्न — बालक को पुरस्कृत करता है।
उत्तर:
शीर्षक: सबसे बड़ा दान
एक प्रतापी राजा था। वह न्यायप्रिय और दानी था। एक दिन उसने अपने दरबार में एक प्रश्न रखा — "सबसे बड़ा दान क्या है?"
प्रथम मंत्री ने कहा, "महाराज, धन सबसे बड़ा दान है। धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है।"
दूसरे दरबारी ने कहा, "अन्न सबसे बड़ा दान है। भूखे को भोजन मिले तो उसका पेट भरता है, प्राण बचते हैं।"
सेनापति ने कहा, "वस्त्र सबसे बड़ा दान है। नंगे को वस्त्र मिले तो उसकी लाज बचती है।"
राजा किसी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ। उसे लगा कि अभी कुछ कमी है।
तभी दरबार में एक छोटा बालक आया। उसने विनम्रता से कहा, "महाराज, मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ।" राजा ने अनुमति दी।
बालक बोला, "महाराज, सबसे बड़ा दान ज्ञान है। धन, अन्न, वस्त्र — ये सब नाशवान हैं। ज्ञान अमर है। ज्ञान मिलने पर व्यक्ति स्वयं धन कमा सकता है, अन्न उगा सकता है, वस्त्र बना सकता है। ज्ञान ही एक ऐसा दान है जो बँटने से बढ़ता है।"
राजा बालक का उत्तर सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, "तूने सच कहा। ज्ञान ही सबसे बड़ा दान है। मैं तुझे राज्य का मुख्य सलाहकार नियुक्त करता हूँ।"
राजा ने पूरे राज्य में शिक्षा का प्रसार किया। अनेक विद्यालय खोले गए। राज्य समृद्ध और ज्ञानवान बना।
बोध: ज्ञान सबसे बड़ा धन है। यह एकमात्र ऐसा दान है जो देने से कम नहीं, बल्कि बढ़ता है।
शीर्षक: सबसे बड़ा दान
एक प्रतापी राजा था। वह न्यायप्रिय और दानी था। एक दिन उसने अपने दरबार में एक प्रश्न रखा — "सबसे बड़ा दान क्या है?"
प्रथम मंत्री ने कहा, "महाराज, धन सबसे बड़ा दान है। धन से सब कुछ खरीदा जा सकता है।"
दूसरे दरबारी ने कहा, "अन्न सबसे बड़ा दान है। भूखे को भोजन मिले तो उसका पेट भरता है, प्राण बचते हैं।"
सेनापति ने कहा, "वस्त्र सबसे बड़ा दान है। नंगे को वस्त्र मिले तो उसकी लाज बचती है।"
राजा किसी उत्तर से संतुष्ट नहीं हुआ। उसे लगा कि अभी कुछ कमी है।
तभी दरबार में एक छोटा बालक आया। उसने विनम्रता से कहा, "महाराज, मैं भी कुछ कहना चाहता हूँ।" राजा ने अनुमति दी।
बालक बोला, "महाराज, सबसे बड़ा दान ज्ञान है। धन, अन्न, वस्त्र — ये सब नाशवान हैं। ज्ञान अमर है। ज्ञान मिलने पर व्यक्ति स्वयं धन कमा सकता है, अन्न उगा सकता है, वस्त्र बना सकता है। ज्ञान ही एक ऐसा दान है जो बँटने से बढ़ता है।"
राजा बालक का उत्तर सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसने कहा, "तूने सच कहा। ज्ञान ही सबसे बड़ा दान है। मैं तुझे राज्य का मुख्य सलाहकार नियुक्त करता हूँ।"
राजा ने पूरे राज्य में शिक्षा का प्रसार किया। अनेक विद्यालय खोले गए। राज्य समृद्ध और ज्ञानवान बना।
बोध: ज्ञान सबसे बड़ा धन है। यह एकमात्र ऐसा दान है जो देने से कम नहीं, बल्कि बढ़ता है।
7. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
गाँव में बाढ़ — सब अपनी-अपनी जान बचाने में लगे — एक व्यक्ति अपने पड़ोसी के बूढ़े पिता को बचाने जाता है — स्वयं फँस जाता है — ग्रामीण मिलकर दोनों को बचाते हैं — एकता की शक्ति का प्रदर्शन।
गाँव में बाढ़ — सब अपनी-अपनी जान बचाने में लगे — एक व्यक्ति अपने पड़ोसी के बूढ़े पिता को बचाने जाता है — स्वयं फँस जाता है — ग्रामीण मिलकर दोनों को बचाते हैं — एकता की शक्ति का प्रदर्शन।
उत्तर:
शीर्षक: एकता में शक्ति
बिहार के एक गाँव में भयंकर बाढ़ आई। नदी का जलस्तर बढ़ गया था। प्रशासन ने सभी को सुरक्षित स्थानों पर जाने का निर्देश दिया। हर कोई अपनी-अपनी जान बचाने में व्यस्त था।
भागदौड़ के बीच एक व्यक्ति को याद आया — उसके पड़ोसी का बूढ़ा पिता घर में अकेला है। वह लकवाग्रस्त हैं, चल-फिर नहीं सकते। उस व्यक्ति ने एक पल भी नहीं सोचा। वह तेज बहते पानी के बीच अपने पड़ोसी के घर की ओर दौड़ा।
उसने बूढ़े व्यक्ति को अपने कंधे पर उठाया और सुरक्षित स्थान की ओर बढ़ा। लेकिन तभी पानी का बहाव इतना तेज हो गया कि वह स्वयं फँस गया। दोनों एक ऊँचे स्थान पर खड़े थे, चारों ओर पानी ही पानी था।
यह देखकर अन्य ग्रामीण ठिठक गए। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। तभी एक युवक बोला, "हम सब मिलकर कोशिश करें। एकता में ही शक्ति है।"
सभी ने एक-दूसरे का हाथ थामा। उन्होंने रस्सी और बाँस की सहायता से एक मानव शृंखला बनाई। धीरे-धीरे वे फँसे हुए व्यक्ति और बूढ़े पिता के पास पहुँचे। सबने मिलकर दोनों को सुरक्षित बाहर निकाला।
बूढ़े व्यक्ति की आँखों में आँसू थे। "बेटा, तूने मेरी जान बचाई।" उस व्यक्ति ने कहा, "चाचा, आप भी मेरे परिवार की तरह हैं।"
उस दिन गाँव वालों ने सीखा कि मुसीबत के समय एकता ही सबसे बड़ा हथियार है।
बोध: आपदा के समय एकता ही सबसे बड़ी ताकत है। परोपकार और सामूहिक प्रयास से कोई भी संकट टाला जा सकता है।
शीर्षक: एकता में शक्ति
बिहार के एक गाँव में भयंकर बाढ़ आई। नदी का जलस्तर बढ़ गया था। प्रशासन ने सभी को सुरक्षित स्थानों पर जाने का निर्देश दिया। हर कोई अपनी-अपनी जान बचाने में व्यस्त था।
भागदौड़ के बीच एक व्यक्ति को याद आया — उसके पड़ोसी का बूढ़ा पिता घर में अकेला है। वह लकवाग्रस्त हैं, चल-फिर नहीं सकते। उस व्यक्ति ने एक पल भी नहीं सोचा। वह तेज बहते पानी के बीच अपने पड़ोसी के घर की ओर दौड़ा।
उसने बूढ़े व्यक्ति को अपने कंधे पर उठाया और सुरक्षित स्थान की ओर बढ़ा। लेकिन तभी पानी का बहाव इतना तेज हो गया कि वह स्वयं फँस गया। दोनों एक ऊँचे स्थान पर खड़े थे, चारों ओर पानी ही पानी था।
यह देखकर अन्य ग्रामीण ठिठक गए। कोई आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। तभी एक युवक बोला, "हम सब मिलकर कोशिश करें। एकता में ही शक्ति है।"
सभी ने एक-दूसरे का हाथ थामा। उन्होंने रस्सी और बाँस की सहायता से एक मानव शृंखला बनाई। धीरे-धीरे वे फँसे हुए व्यक्ति और बूढ़े पिता के पास पहुँचे। सबने मिलकर दोनों को सुरक्षित बाहर निकाला।
बूढ़े व्यक्ति की आँखों में आँसू थे। "बेटा, तूने मेरी जान बचाई।" उस व्यक्ति ने कहा, "चाचा, आप भी मेरे परिवार की तरह हैं।"
उस दिन गाँव वालों ने सीखा कि मुसीबत के समय एकता ही सबसे बड़ा हथियार है।
बोध: आपदा के समय एकता ही सबसे बड़ी ताकत है। परोपकार और सामूहिक प्रयास से कोई भी संकट टाला जा सकता है।
8. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक अमीर व्यापारी — उसकी तीन बेटियाँ — व्यापारी व्यापार के सिलसिले में विदेश जाता है — बेटियों से पूछता है क्या लाऊँ — पहली दो सोना-चाँदी, वस्त्र माँगती हैं — तीसरी कहती है पिता जी का प्यार और आशीर्वाद — व्यापारी की आँखें खुलती हैं।
एक अमीर व्यापारी — उसकी तीन बेटियाँ — व्यापारी व्यापार के सिलसिले में विदेश जाता है — बेटियों से पूछता है क्या लाऊँ — पहली दो सोना-चाँदी, वस्त्र माँगती हैं — तीसरी कहती है पिता जी का प्यार और आशीर्वाद — व्यापारी की आँखें खुलती हैं।
उत्तर:
शीर्षक: अनमोल उपहार
सेठ धनपत राय एक संपन्न व्यापारी थे। उनकी तीन बेटियाँ थीं — कमला, विमला और निर्मला। तीनों में बहुत प्यार था।
एक दिन सेठ जी को व्यापार के सिलसिले में विदेश जाना था। प्रस्थान से पूर्व उन्होंने तीनों बेटियों से पूछा, "बेटियों, बताओ विदेश से तुम्हारे लिए क्या लाऊँ?"
बड़ी बेटी कमला बोली, "पिता जी, मेरे लिए सोने का हार लाना।"
मँझली बेटी विमला बोली, "पिता जी, मेरे लिए रेशमी वस्त्र लाना।"
छोटी बेटी निर्मला चुप रही। पिता ने पूछा, "बेटा, तू क्या लाने को कहती है?"
निर्मला ने पिता के पैर छुए और कहा, "पिता जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप सुरक्षित वापस लौट आइए। आपका प्यार और आशीर्वाद ही मेरे लिए सबसे अनमोल उपहार है।"
सेठ जी की आँखें भर आईं। उन्हें एहसास हुआ कि बड़ी बेटियाँ उपहार चाहती हैं, पर छोटी बेटी तो उन्हें चाहती है। उन्होंने निर्मला को गले लगा लिया।
विदेश यात्रा के दौरान सेठ जी अक्सर निर्मला की बात सोचते। वे समय से पहले ही वापस लौट आए। उन्होंने तीनों बेटियों के लिए उपहार लाए, पर सबसे अनमोल उपहार निर्मला के लिए था — एक पत्र, जिसमें लिखा था, "तूने मुझे सिखाया कि संपत्ति से बढ़कर संबंध होते हैं।"
बोध: धन-दौलत से बड़ा कुछ नहीं, यह सोच गलत है। परिवार का प्यार, आशीर्वाद और अपनापन ही सबसे बड़ी पूंजी है।
शीर्षक: अनमोल उपहार
सेठ धनपत राय एक संपन्न व्यापारी थे। उनकी तीन बेटियाँ थीं — कमला, विमला और निर्मला। तीनों में बहुत प्यार था।
एक दिन सेठ जी को व्यापार के सिलसिले में विदेश जाना था। प्रस्थान से पूर्व उन्होंने तीनों बेटियों से पूछा, "बेटियों, बताओ विदेश से तुम्हारे लिए क्या लाऊँ?"
बड़ी बेटी कमला बोली, "पिता जी, मेरे लिए सोने का हार लाना।"
मँझली बेटी विमला बोली, "पिता जी, मेरे लिए रेशमी वस्त्र लाना।"
छोटी बेटी निर्मला चुप रही। पिता ने पूछा, "बेटा, तू क्या लाने को कहती है?"
निर्मला ने पिता के पैर छुए और कहा, "पिता जी, मुझे कुछ नहीं चाहिए। बस आप सुरक्षित वापस लौट आइए। आपका प्यार और आशीर्वाद ही मेरे लिए सबसे अनमोल उपहार है।"
सेठ जी की आँखें भर आईं। उन्हें एहसास हुआ कि बड़ी बेटियाँ उपहार चाहती हैं, पर छोटी बेटी तो उन्हें चाहती है। उन्होंने निर्मला को गले लगा लिया।
विदेश यात्रा के दौरान सेठ जी अक्सर निर्मला की बात सोचते। वे समय से पहले ही वापस लौट आए। उन्होंने तीनों बेटियों के लिए उपहार लाए, पर सबसे अनमोल उपहार निर्मला के लिए था — एक पत्र, जिसमें लिखा था, "तूने मुझे सिखाया कि संपत्ति से बढ़कर संबंध होते हैं।"
बोध: धन-दौलत से बड़ा कुछ नहीं, यह सोच गलत है। परिवार का प्यार, आशीर्वाद और अपनापन ही सबसे बड़ी पूंजी है।
9. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
रवि और सविता — दोनों अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं — एक राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में दोनों का चयन — शुरू में एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी समझते हैं — धीरे-धीरे सहयोग करना सीखते हैं — मिलकर अनूठा मॉडल बनाते हैं — प्रथम पुरस्कार जीतते हैं — मित्रता हो जाती है।
रवि और सविता — दोनों अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते हैं — एक राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी में दोनों का चयन — शुरू में एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी समझते हैं — धीरे-धीरे सहयोग करना सीखते हैं — मिलकर अनूठा मॉडल बनाते हैं — प्रथम पुरस्कार जीतते हैं — मित्रता हो जाती है।
उत्तर:
शीर्षक: प्रतिद्वंद्वी से सहयोगी
रवि और सविता अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे। दोनों विज्ञान में अत्यधिक रुचि रखते थे। दोनों का चयन राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी के लिए हुआ।
प्रदर्शनी का विषय था — जल संरक्षण। रवि ने वर्षा जल संचयन का मॉडल बनाया था। सविता ने जल पुनर्चक्रण की तकनीक विकसित की थी। दोनों एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी समझ रहे थे। न तो कोई किसी से बात करता, न ही मॉडल दिखाता।
प्रदर्शनी का पहला दिन था। रवि का मॉडल देखकर सविता हैरान रह गई — उसकी तकनीक अद्भुत थी। सविता का मॉडल देखकर रवि भी प्रभावित हुआ — उसकी सोच बहुत व्यावहारिक थी।
दोनों ने सोचा — क्यों न दोनों मॉडलों को मिलाकर एक नया मॉडल बनाया जाए? शुरू में संकोच था, फिर दोनों राजी हो गए। उन्होंने रात-दिन मेहनत की। रवि के संचयन मॉडल और सविता के पुनर्चक्रण मॉडल को मिलाकर एक अनूठा मॉडल तैयार किया — जो बारिश के पानी को स्टोर करने के साथ-साथ उसे पुनः उपयोग योग्य बनाता था।
निर्णायक मंडल चकित रह गया। इतने कम समय में इतना सटीक और उपयोगी मॉडल! उन्होंने रवि और सविता को संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार घोषित किया।
दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने एक-दूसरे को बधाई दी। प्रतिद्वंद्विता मित्रता में बदल गई।
बोध: प्रतिस्पर्धा अच्छी है, पर सहयोग से बेहतर परिणाम मिलते हैं। मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है।
शीर्षक: प्रतिद्वंद्वी से सहयोगी
रवि और सविता अलग-अलग स्कूलों में पढ़ते थे। दोनों विज्ञान में अत्यधिक रुचि रखते थे। दोनों का चयन राष्ट्रीय स्तर की विज्ञान प्रदर्शनी के लिए हुआ।
प्रदर्शनी का विषय था — जल संरक्षण। रवि ने वर्षा जल संचयन का मॉडल बनाया था। सविता ने जल पुनर्चक्रण की तकनीक विकसित की थी। दोनों एक-दूसरे को प्रतिद्वंद्वी समझ रहे थे। न तो कोई किसी से बात करता, न ही मॉडल दिखाता।
प्रदर्शनी का पहला दिन था। रवि का मॉडल देखकर सविता हैरान रह गई — उसकी तकनीक अद्भुत थी। सविता का मॉडल देखकर रवि भी प्रभावित हुआ — उसकी सोच बहुत व्यावहारिक थी।
दोनों ने सोचा — क्यों न दोनों मॉडलों को मिलाकर एक नया मॉडल बनाया जाए? शुरू में संकोच था, फिर दोनों राजी हो गए। उन्होंने रात-दिन मेहनत की। रवि के संचयन मॉडल और सविता के पुनर्चक्रण मॉडल को मिलाकर एक अनूठा मॉडल तैयार किया — जो बारिश के पानी को स्टोर करने के साथ-साथ उसे पुनः उपयोग योग्य बनाता था।
निर्णायक मंडल चकित रह गया। इतने कम समय में इतना सटीक और उपयोगी मॉडल! उन्होंने रवि और सविता को संयुक्त रूप से प्रथम पुरस्कार घोषित किया।
दोनों की आँखों में खुशी के आँसू थे। उन्होंने एक-दूसरे को बधाई दी। प्रतिद्वंद्विता मित्रता में बदल गई।
बोध: प्रतिस्पर्धा अच्छी है, पर सहयोग से बेहतर परिणाम मिलते हैं। मिलकर काम करने से असंभव भी संभव हो जाता है।
10. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
गाँव में एक पुराना पीपल का पेड़ — ग्रामीण उसे पूजते हैं — सरकार सड़क चौड़ीकरण के लिए पेड़ काटने का आदेश देती है — गाँव वाले परेशान — एक बच्चा अपनी मासूमियत से अधिकारियों को समझाता है — पेड़ बच जाता है — सड़क का नक्शा बदलता है।
गाँव में एक पुराना पीपल का पेड़ — ग्रामीण उसे पूजते हैं — सरकार सड़क चौड़ीकरण के लिए पेड़ काटने का आदेश देती है — गाँव वाले परेशान — एक बच्चा अपनी मासूमियत से अधिकारियों को समझाता है — पेड़ बच जाता है — सड़क का नक्शा बदलता है।
उत्तर:
शीर्षक: पीपल का पेड़
एक छोटे-से गाँव के बीचों-बीच एक विशाल पीपल का पेड़ था। वह सैकड़ों वर्ष पुराना था। ग्रामीण उसे देवता की तरह पूजते थे। बच्चे उसकी छाँव में खेलते, बुजुर्ग उसके नीचे बैठकर गपशप करते, पंछी उसकी डालियों पर घोंसला बनाते।
एक दिन गाँव में सूचना आई — सरकार सड़क चौड़ीकरण का कार्य कर रही है। उस योजना में पीपल का पेड़ काटना अनिवार्य था। गाँव वालों में हड़कंप मच गया। उन्होंने अधिकारियों से विनती की, पर कोई नहीं सुन रहा था। "विकास के लिए कुछ त्याग तो करना ही पड़ता है," अधिकारी ने कहा।
सब निराश थे। तभी आठ वर्ष का एक बच्चा — राजू — अधिकारी के पास गया। उसने मासूमियत से पूछा, "सर, यह पेड़ कब से है?"
अधिकारी ने कहा, "बहुत पुराना है, शायद सौ साल से भी ज्यादा।"
राजू बोला, "सर, इस पेड़ को हमारे परदादा ने लगाया था। वे कहते थे कि पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वे हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद होते हैं। क्या विकास के नाम पर हम आशीर्वाद को काट सकते हैं?"
अधिकारी स्तब्ध रह गया। उसने राजू के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, तूने आज मुझे बड़ा सबक सिखाया।"
उसने तुरंत अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात की। सड़क का नक्शा बदल दिया गया। पीपल का पेड़ बच गया।
गाँव वालों ने राजू को गले लगा लिया। उस दिन पूरे गाँव में उत्सव था।
बोध: विकास और पर्यावरण में संतुलन आवश्यक है। एक बच्चे की मासूमियत भी बड़े-बड़े फैसले बदल सकती है।
शीर्षक: पीपल का पेड़
एक छोटे-से गाँव के बीचों-बीच एक विशाल पीपल का पेड़ था। वह सैकड़ों वर्ष पुराना था। ग्रामीण उसे देवता की तरह पूजते थे। बच्चे उसकी छाँव में खेलते, बुजुर्ग उसके नीचे बैठकर गपशप करते, पंछी उसकी डालियों पर घोंसला बनाते।
एक दिन गाँव में सूचना आई — सरकार सड़क चौड़ीकरण का कार्य कर रही है। उस योजना में पीपल का पेड़ काटना अनिवार्य था। गाँव वालों में हड़कंप मच गया। उन्होंने अधिकारियों से विनती की, पर कोई नहीं सुन रहा था। "विकास के लिए कुछ त्याग तो करना ही पड़ता है," अधिकारी ने कहा।
सब निराश थे। तभी आठ वर्ष का एक बच्चा — राजू — अधिकारी के पास गया। उसने मासूमियत से पूछा, "सर, यह पेड़ कब से है?"
अधिकारी ने कहा, "बहुत पुराना है, शायद सौ साल से भी ज्यादा।"
राजू बोला, "सर, इस पेड़ को हमारे परदादा ने लगाया था। वे कहते थे कि पेड़ सिर्फ ऑक्सीजन नहीं देते, वे हमारे पूर्वजों का आशीर्वाद होते हैं। क्या विकास के नाम पर हम आशीर्वाद को काट सकते हैं?"
अधिकारी स्तब्ध रह गया। उसने राजू के कंधे पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, तूने आज मुझे बड़ा सबक सिखाया।"
उसने तुरंत अपने वरिष्ठ अधिकारियों से बात की। सड़क का नक्शा बदल दिया गया। पीपल का पेड़ बच गया।
गाँव वालों ने राजू को गले लगा लिया। उस दिन पूरे गाँव में उत्सव था।
बोध: विकास और पर्यावरण में संतुलन आवश्यक है। एक बच्चे की मासूमियत भी बड़े-बड़े फैसले बदल सकती है।
11. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक गरीब विद्यार्थी — पढ़ने का बहुत शौक — पास में ही एक धनी व्यक्ति का पुस्तकालय — प्रतिदिन चुपके से बैठकर पढ़ता — धनी व्यक्ति देख लेता है — क्रोधित होता है — विद्यार्थी की लगन देखकर प्रभावित होता है — उसे पुस्तकालय की सदस्यता देता है — आगे चलकर विद्यार्थी बड़ा वैज्ञानिक बनता है।
एक गरीब विद्यार्थी — पढ़ने का बहुत शौक — पास में ही एक धनी व्यक्ति का पुस्तकालय — प्रतिदिन चुपके से बैठकर पढ़ता — धनी व्यक्ति देख लेता है — क्रोधित होता है — विद्यार्थी की लगन देखकर प्रभावित होता है — उसे पुस्तकालय की सदस्यता देता है — आगे चलकर विद्यार्थी बड़ा वैज्ञानिक बनता है।
उत्तर:
शीर्षक: ज्ञान की भूख
कमलेश एक गरीब परिवार का लड़का था। उसके पिता मजदूरी करते थे। कमलेश पढ़ने में बहुत होशियार था, पर गरीबी के कारण अतिरिक्त किताबें नहीं खरीद पाता था।
उसके घर के पास ही सेठ जी का विशाल पुस्तकालय था। हज़ारों किताबें थीं वहाँ — विज्ञान, गणित, इतिहास, साहित्य। कमलेश रोज शाम को चुपके से पुस्तकालय में घुस जाता और कोने में बैठकर घंटों पढ़ता। कोई उसे देख न पाता।
एक दिन सेठ जी अचानक पुस्तकालय आ गए। उन्होंने कमलेश को देख लिया। वे क्रोधित हो गए। "यहाँ चोरी-छिपे क्या कर रहे हो? यह सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं है!"
कमलेश डर गया। उसने काँपते हुए कहा, "सेठ जी, मैं चोरी नहीं कर रहा था। मैं बस पढ़ रहा था। मेरे पास पैसे नहीं हैं किताबें खरीदने के लिए। आपके पुस्तकालय में बहुत ज्ञान है, मैं बस वह ज्ञान लेना चाहता हूँ।"
सेठ जी ने गौर से देखा। लड़के के हाथ में विज्ञान की एक उन्नत पुस्तक थी। उन्होंने पूछा, "यह किताब समझ में आती है?"
कमलेश ने उत्साह से कहा, "जी, यह भौतिकी की किताब है। मुझे विज्ञान में बहुत रुचि है। मैं बड़ा होकर वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ।"
सेठ जी प्रभावित हुए। उन्होंने कमलेश के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, आज से तुम इस पुस्तकालय के सदस्य हो। जब चाहो आ सकते हो, जितनी चाहो किताबें पढ़ सकते हो।"
कमलेश की आँखों में आँसू थे। उसने सेठ जी के चरण छुए।
वर्षों बाद कमलेश एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना। उसने अपनी सफलता का श्रेय सेठ जी के पुस्तकालय को दिया।
बोध: ज्ञान की भूख किसी भी बाधा को पार कर सकती है। सही अवसर मिलने पर प्रतिभा निखर ही जाती है।
शीर्षक: ज्ञान की भूख
कमलेश एक गरीब परिवार का लड़का था। उसके पिता मजदूरी करते थे। कमलेश पढ़ने में बहुत होशियार था, पर गरीबी के कारण अतिरिक्त किताबें नहीं खरीद पाता था।
उसके घर के पास ही सेठ जी का विशाल पुस्तकालय था। हज़ारों किताबें थीं वहाँ — विज्ञान, गणित, इतिहास, साहित्य। कमलेश रोज शाम को चुपके से पुस्तकालय में घुस जाता और कोने में बैठकर घंटों पढ़ता। कोई उसे देख न पाता।
एक दिन सेठ जी अचानक पुस्तकालय आ गए। उन्होंने कमलेश को देख लिया। वे क्रोधित हो गए। "यहाँ चोरी-छिपे क्या कर रहे हो? यह सार्वजनिक पुस्तकालय नहीं है!"
कमलेश डर गया। उसने काँपते हुए कहा, "सेठ जी, मैं चोरी नहीं कर रहा था। मैं बस पढ़ रहा था। मेरे पास पैसे नहीं हैं किताबें खरीदने के लिए। आपके पुस्तकालय में बहुत ज्ञान है, मैं बस वह ज्ञान लेना चाहता हूँ।"
सेठ जी ने गौर से देखा। लड़के के हाथ में विज्ञान की एक उन्नत पुस्तक थी। उन्होंने पूछा, "यह किताब समझ में आती है?"
कमलेश ने उत्साह से कहा, "जी, यह भौतिकी की किताब है। मुझे विज्ञान में बहुत रुचि है। मैं बड़ा होकर वैज्ञानिक बनना चाहता हूँ।"
सेठ जी प्रभावित हुए। उन्होंने कमलेश के सिर पर हाथ रखा और कहा, "बेटा, आज से तुम इस पुस्तकालय के सदस्य हो। जब चाहो आ सकते हो, जितनी चाहो किताबें पढ़ सकते हो।"
कमलेश की आँखों में आँसू थे। उसने सेठ जी के चरण छुए।
वर्षों बाद कमलेश एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक बना। उसने अपनी सफलता का श्रेय सेठ जी के पुस्तकालय को दिया।
बोध: ज्ञान की भूख किसी भी बाधा को पार कर सकती है। सही अवसर मिलने पर प्रतिभा निखर ही जाती है।
12. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक छोटा बच्चा — समुद्र किनारे रेत पर सितारे बना रहा है — लहरें आकर मिटा देती हैं — वह फिर बनाता है — लहरें फिर मिटा देती हैं — एक व्यक्ति यह देखता है — बच्चे से पूछता है — बच्चा कहता है — बनाने में आनंद आता है, मिटने से क्या — व्यक्ति को जीवन का सबक मिलता है।
एक छोटा बच्चा — समुद्र किनारे रेत पर सितारे बना रहा है — लहरें आकर मिटा देती हैं — वह फिर बनाता है — लहरें फिर मिटा देती हैं — एक व्यक्ति यह देखता है — बच्चे से पूछता है — बच्चा कहता है — बनाने में आनंद आता है, मिटने से क्या — व्यक्ति को जीवन का सबक मिलता है।
उत्तर:
शीर्षक: रेत के सितारे
गर्मी की छुट्टियाँ थीं। एक व्यक्ति अपने व्यवसाय में असफल होने के कारण बहुत निराश था। वह मन हल्का करने समुद्र किनारे आया।
वहाँ उसने एक छोटे बच्चे को देखा। बच्चा रेत पर सितारे बना रहा था। वह बड़े मन से सितारे बनाता, फिर एक लहर आती और उन्हें मिटा देती। बच्चा फिर से सितारे बनाने लगता। लहरें आतीं और मिटा देतीं। यह सिलसिला चलता रहा।
व्यक्ति बच्चे के पास गया और बोला, "बेटा, तुम्हें नहीं दिखता? लहरें तुम्हारी मेहनत को बार-बार मिटा रही हैं। फिर भी तुम बार-बार बना रहे हो।"
बच्चा मुस्कुराया और बोला, "अंकल, मिटने से क्या? मुझे बनाने में आनंद आता है। जब तक मैं बना रहता हूँ, सितारे रहते हैं। लहरें आती हैं, मिटाती हैं, फिर मैं नए बनाता हूँ। हर बार पहले से सुंदर बनाता हूँ।"
व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसने सोचा — यह बच्चा कितना सच कह रहा है। असफलताएँ लहरों की तरह हैं। वे आती हैं, हमारी मेहनत मिटाती हैं, पर हमें हार नहीं माननी चाहिए। हर बार नए सिरे से शुरू करना चाहिए।
उस दिन उस व्यक्ति ने ठान लिया कि वह फिर से प्रयास करेगा। बच्चे के रेत के सितारों ने उसे जीवन की नई राह दिखा दी थी।
बोध: असफलता अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। हार न मानने वाला अंततः सफल होता है।
शीर्षक: रेत के सितारे
गर्मी की छुट्टियाँ थीं। एक व्यक्ति अपने व्यवसाय में असफल होने के कारण बहुत निराश था। वह मन हल्का करने समुद्र किनारे आया।
वहाँ उसने एक छोटे बच्चे को देखा। बच्चा रेत पर सितारे बना रहा था। वह बड़े मन से सितारे बनाता, फिर एक लहर आती और उन्हें मिटा देती। बच्चा फिर से सितारे बनाने लगता। लहरें आतीं और मिटा देतीं। यह सिलसिला चलता रहा।
व्यक्ति बच्चे के पास गया और बोला, "बेटा, तुम्हें नहीं दिखता? लहरें तुम्हारी मेहनत को बार-बार मिटा रही हैं। फिर भी तुम बार-बार बना रहे हो।"
बच्चा मुस्कुराया और बोला, "अंकल, मिटने से क्या? मुझे बनाने में आनंद आता है। जब तक मैं बना रहता हूँ, सितारे रहते हैं। लहरें आती हैं, मिटाती हैं, फिर मैं नए बनाता हूँ। हर बार पहले से सुंदर बनाता हूँ।"
व्यक्ति स्तब्ध रह गया। उसने सोचा — यह बच्चा कितना सच कह रहा है। असफलताएँ लहरों की तरह हैं। वे आती हैं, हमारी मेहनत मिटाती हैं, पर हमें हार नहीं माननी चाहिए। हर बार नए सिरे से शुरू करना चाहिए।
उस दिन उस व्यक्ति ने ठान लिया कि वह फिर से प्रयास करेगा। बच्चे के रेत के सितारों ने उसे जीवन की नई राह दिखा दी थी।
बोध: असफलता अंत नहीं, बल्कि नई शुरुआत है। हार न मानने वाला अंततः सफल होता है।
13. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक गाँव में अकाल — लोग परेशान — एक बुजुर्ग महिला पास के जंगल में जाती है — वहाँ एक विशाल पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या करती है — कई दिनों बाद पेड़ पर फल लगते हैं — वह फल ग्रामीणों में बाँटती है — फल के बीज बोने को कहती है — धीरे-धीरे पूरा गाँव हरा-भरा हो जाता है।
एक गाँव में अकाल — लोग परेशान — एक बुजुर्ग महिला पास के जंगल में जाती है — वहाँ एक विशाल पेड़ के नीचे बैठकर तपस्या करती है — कई दिनों बाद पेड़ पर फल लगते हैं — वह फल ग्रामीणों में बाँटती है — फल के बीज बोने को कहती है — धीरे-धीरे पूरा गाँव हरा-भरा हो जाता है।
उत्तर:
शीर्षक: हरियाली का वरदान
राजस्थान के एक गाँव में तीन साल से अकाल पड़ा था। नदी-तालाब सूख गए थे। फसलें बर्बाद हो गई थीं। लोग भूखे थे, प्यासे थे। कई परिवार गाँव छोड़कर जा चुके थे।
गाँव में एक बूढ़ी दादी माँ रहती थीं — गंगा बाई। वह अस्सी वर्ष की थीं, पर उनका हौसला बुलंद था। एक दिन उन्होंने गाँव वालों से कहा, "मैं जंगल जा रही हूँ। जब तक इस गाँव की समस्या का हल नहीं मिलता, वापस नहीं आऊँगी।"
गंगा बाई पास के जंगल में गईं। वहाँ एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे उन्होंने आसन लगाया और तपस्या में लीन हो गईं। वह प्रतिदिन वहीं बैठतीं, ध्यान करतीं। गाँव वाले उनके लिए भोजन रख जाते।
सात दिन बीत गए। आठवें दिन सुबह गाँव वालों ने देखा — उस बरगद के पेड़ पर आम के फल लगे थे! यह असंभव था, क्योंकि बरगद में आम नहीं लगते। लेकिन वह चमत्कार था।
गंगा बाई ने वे फल तोड़े और गाँव वालों में बाँटे। उन्होंने कहा, "इन फलों को खाओ और बीजों को मत फेंको। उन्हें अपने खेतों में, अपने घरों के आसपास बोओ।"
ग्रामीणों ने वैसा ही किया। धीरे-धीरे वे बीज अंकुरित हुए, पौधे बने, फिर वृक्ष। कुछ ही वर्षों में पूरा गाँव हरा-भरा हो गया। फलों की बहार आ गई। अकाल समाप्त हुआ।
गाँव वालों ने गंगा बाई को 'हरियाली की देवी' का दर्जा दिया। उन्होंने सिखाया कि पेड़-पौधे ही जीवन का आधार हैं।
बोध: प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है। एक व्यक्ति का संकल्प पूरे गाँव की तकदीर बदल सकता है।
शीर्षक: हरियाली का वरदान
राजस्थान के एक गाँव में तीन साल से अकाल पड़ा था। नदी-तालाब सूख गए थे। फसलें बर्बाद हो गई थीं। लोग भूखे थे, प्यासे थे। कई परिवार गाँव छोड़कर जा चुके थे।
गाँव में एक बूढ़ी दादी माँ रहती थीं — गंगा बाई। वह अस्सी वर्ष की थीं, पर उनका हौसला बुलंद था। एक दिन उन्होंने गाँव वालों से कहा, "मैं जंगल जा रही हूँ। जब तक इस गाँव की समस्या का हल नहीं मिलता, वापस नहीं आऊँगी।"
गंगा बाई पास के जंगल में गईं। वहाँ एक विशाल बरगद के पेड़ के नीचे उन्होंने आसन लगाया और तपस्या में लीन हो गईं। वह प्रतिदिन वहीं बैठतीं, ध्यान करतीं। गाँव वाले उनके लिए भोजन रख जाते।
सात दिन बीत गए। आठवें दिन सुबह गाँव वालों ने देखा — उस बरगद के पेड़ पर आम के फल लगे थे! यह असंभव था, क्योंकि बरगद में आम नहीं लगते। लेकिन वह चमत्कार था।
गंगा बाई ने वे फल तोड़े और गाँव वालों में बाँटे। उन्होंने कहा, "इन फलों को खाओ और बीजों को मत फेंको। उन्हें अपने खेतों में, अपने घरों के आसपास बोओ।"
ग्रामीणों ने वैसा ही किया। धीरे-धीरे वे बीज अंकुरित हुए, पौधे बने, फिर वृक्ष। कुछ ही वर्षों में पूरा गाँव हरा-भरा हो गया। फलों की बहार आ गई। अकाल समाप्त हुआ।
गाँव वालों ने गंगा बाई को 'हरियाली की देवी' का दर्जा दिया। उन्होंने सिखाया कि पेड़-पौधे ही जीवन का आधार हैं।
बोध: प्रकृति की रक्षा ही मानवता की रक्षा है। एक व्यक्ति का संकल्प पूरे गाँव की तकदीर बदल सकता है।
14. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन — तीन उम्मीदवार अंतिम चरण में — कंपनी का टेस्ट — सबसे पहले लिफ्ट में चढ़ना है — दो उम्मीदवार बिना किसी की मदद किए चढ़ जाते हैं — तीसरा उम्मीदवार विकलांग व्यक्ति को लिफ्ट चढ़ने में मदद करता है — उसका चयन होता है — संवेदनशीलता और मानवीय मूल्य सबसे बड़ी योग्यता।
एक कंपनी में नौकरी के लिए आवेदन — तीन उम्मीदवार अंतिम चरण में — कंपनी का टेस्ट — सबसे पहले लिफ्ट में चढ़ना है — दो उम्मीदवार बिना किसी की मदद किए चढ़ जाते हैं — तीसरा उम्मीदवार विकलांग व्यक्ति को लिफ्ट चढ़ने में मदद करता है — उसका चयन होता है — संवेदनशीलता और मानवीय मूल्य सबसे बड़ी योग्यता।
उत्तर:
शीर्षक: मानवीय मूल्य
एक प्रतिष्ठित कंपनी में प्रबंधक पद के लिए साक्षात्कार था। हज़ारों आवेदकों में से तीन उम्मीदवार अंतिम चरण में पहुँचे — अमित, राजेश और सुमन। तीनों योग्य थे, तीनों आत्मविश्वासी थे।
साक्षात्कार का अंतिम दौर था। कंपनी के निदेशक ने तीनों से कहा, "आप सबसे बड़ी मंजिल पर जाना है। हमारी लिफ्ट भूतल पर खड़ी है। जो पहले लिफ्ट में चढ़ेगा, उसका साक्षात्कार पहले होगा।"
तीनों लिफ्ट की ओर बढ़े। तभी उन्होंने देखा — एक विकलांग व्यक्ति बैसाखी के सहारे लिफ्ट तक पहुँचने का प्रयास कर रहा था। वह बहुत मुश्किल से चल पा रहा था।
अमित और राजेश ने उसकी ओर देखा, पर रुके नहीं। वे तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़े और उसमें चढ़ गए।
सुमन ने एक पल भी नहीं सोचा। वह उस विकलांग व्यक्ति के पास गया। "आइए, मैं आपकी मदद करता हूँ," उसने कहा। उसने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे उसे लिफ्ट तक ले गया। फिर उसे लिफ्ट में चढ़ने में मदद की।
तब तक अमित और राजेश ऊपर जा चुके थे। सुमन अकेला भूतल पर रह गया। उसे लगा कि अब उसका चयन नहीं होगा।
कुछ देर बाद निदेशक ने घोषणा की — "सुमन का चयन हुआ है।"
सब हैरान थे। निदेशक ने कहा, "हमें केवल योग्य ही नहीं, संवेदनशील व्यक्ति भी चाहिए। सुमन ने साबित कर दिया कि उसमें मानवीय मूल्य हैं। योग्यता तो सीखी जा सकती है, पर मानवता नहीं।"
बोध: सच्ची योग्यता डिग्री में नहीं, संवेदनशीलता में है। मानवीय मूल्य ही व्यक्ति को महान बनाते हैं।
शीर्षक: मानवीय मूल्य
एक प्रतिष्ठित कंपनी में प्रबंधक पद के लिए साक्षात्कार था। हज़ारों आवेदकों में से तीन उम्मीदवार अंतिम चरण में पहुँचे — अमित, राजेश और सुमन। तीनों योग्य थे, तीनों आत्मविश्वासी थे।
साक्षात्कार का अंतिम दौर था। कंपनी के निदेशक ने तीनों से कहा, "आप सबसे बड़ी मंजिल पर जाना है। हमारी लिफ्ट भूतल पर खड़ी है। जो पहले लिफ्ट में चढ़ेगा, उसका साक्षात्कार पहले होगा।"
तीनों लिफ्ट की ओर बढ़े। तभी उन्होंने देखा — एक विकलांग व्यक्ति बैसाखी के सहारे लिफ्ट तक पहुँचने का प्रयास कर रहा था। वह बहुत मुश्किल से चल पा रहा था।
अमित और राजेश ने उसकी ओर देखा, पर रुके नहीं। वे तेजी से लिफ्ट की ओर बढ़े और उसमें चढ़ गए।
सुमन ने एक पल भी नहीं सोचा। वह उस विकलांग व्यक्ति के पास गया। "आइए, मैं आपकी मदद करता हूँ," उसने कहा। उसने उस व्यक्ति का हाथ पकड़ा और धीरे-धीरे उसे लिफ्ट तक ले गया। फिर उसे लिफ्ट में चढ़ने में मदद की।
तब तक अमित और राजेश ऊपर जा चुके थे। सुमन अकेला भूतल पर रह गया। उसे लगा कि अब उसका चयन नहीं होगा।
कुछ देर बाद निदेशक ने घोषणा की — "सुमन का चयन हुआ है।"
सब हैरान थे। निदेशक ने कहा, "हमें केवल योग्य ही नहीं, संवेदनशील व्यक्ति भी चाहिए। सुमन ने साबित कर दिया कि उसमें मानवीय मूल्य हैं। योग्यता तो सीखी जा सकती है, पर मानवता नहीं।"
बोध: सच्ची योग्यता डिग्री में नहीं, संवेदनशीलता में है। मानवीय मूल्य ही व्यक्ति को महान बनाते हैं।
15. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक बूढ़ा पिता और उसका युवा बेटा — पिता की याददाश्त कमजोर हो गई है — वह बार-बार वही बातें पूछता है — बेटा चिढ़ जाता है — एक दिन पिता पक्षियों के घोंसले के बारे में पूछता है — बेटा गुस्से में कहता है — पिता अपनी डायरी निकालते हैं — उसमें बेटे के बचपन के सवालों के जवाब लिखे हैं — बेटे को अपनी गलती का एहसास होता है।
एक बूढ़ा पिता और उसका युवा बेटा — पिता की याददाश्त कमजोर हो गई है — वह बार-बार वही बातें पूछता है — बेटा चिढ़ जाता है — एक दिन पिता पक्षियों के घोंसले के बारे में पूछता है — बेटा गुस्से में कहता है — पिता अपनी डायरी निकालते हैं — उसमें बेटे के बचपन के सवालों के जवाब लिखे हैं — बेटे को अपनी गलती का एहसास होता है।
उत्तर:
शीर्षक: पिता की डायरी
आकाश अपने बूढ़े पिता के साथ रहता था। पिता की उम्र अस्सी वर्ष थी। उनकी याददाश्त अब कमजोर हो गई थी। वह बार-बार एक ही बात पूछ लेते।
"बेटा, खाना खा लिया?" — पाँच मिनट बाद फिर — "बेटा, खाना खा लिया?"
"बेटा, तुम्हारी नौकरी कैसी है?" — थोड़ी देर बाद फिर — "बेटा, तुम्हारी नौकरी कैसी है?"
आकाश को चिढ़ होने लगी। वह ऊँची आवाज़ में जवाब देता। कभी-कभी तो अनसुना ही कर देता।
एक दिन पिता और बेटा बालकनी में बैठे थे। पिता ने एक पक्षी के घोंसले की ओर देखा और पूछा, "बेटा, यह पक्षी अपना घोंसला कैसे बनाता है?"
आकाश ने झुंझलाकर कहा, "पिता जी, आप रोज एक ही बात पूछते हैं। मैंने सौ बार बताया। अब और नहीं बताऊँगा!"
पिता की आँखें नम हो गईं। वे धीरे-धीरे उठे, अपने कमरे में गए और एक पुरानी डायरी ले आए। उन्होंने वह डायरी आकाश को दी।
आकाश ने डायरी खोली। वह उसके बचपन की डायरी थी — पिता ने लिखी थी। पन्ने पलटे तो देखा —
"आज आकाश ने पूछा — पिता जी, पक्षी अपना घोंसला कैसे बनाता है? मैंने उसे बहुत प्यार से समझाया। उसने दस बार पूछा, मैंने दस बार समझाया।"
"आज आकाश ने पूछा — पिता जी, चाँद क्यों बदलता है? मैंने उसे गोद में बिठाकर समझाया। उसने बार-बार पूछा, मैंने बार-बार समझाया।"
आकाश की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे एहसास हुआ कि पिता ने उसके बचपन के हर सवाल का कितने धैर्य से जवाब दिया था। आज वही पिता उससे थोड़ा धैर्य चाहते हैं।
उसने पिता के पैर छुए और कहा, "पिता जी, मुझे माफ कर दीजिए।"
बोध: माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। बचपन में उन्होंने जो धैर्य हम पर किया, बुढ़ापे में हमें उन पर करना चाहिए।
शीर्षक: पिता की डायरी
आकाश अपने बूढ़े पिता के साथ रहता था। पिता की उम्र अस्सी वर्ष थी। उनकी याददाश्त अब कमजोर हो गई थी। वह बार-बार एक ही बात पूछ लेते।
"बेटा, खाना खा लिया?" — पाँच मिनट बाद फिर — "बेटा, खाना खा लिया?"
"बेटा, तुम्हारी नौकरी कैसी है?" — थोड़ी देर बाद फिर — "बेटा, तुम्हारी नौकरी कैसी है?"
आकाश को चिढ़ होने लगी। वह ऊँची आवाज़ में जवाब देता। कभी-कभी तो अनसुना ही कर देता।
एक दिन पिता और बेटा बालकनी में बैठे थे। पिता ने एक पक्षी के घोंसले की ओर देखा और पूछा, "बेटा, यह पक्षी अपना घोंसला कैसे बनाता है?"
आकाश ने झुंझलाकर कहा, "पिता जी, आप रोज एक ही बात पूछते हैं। मैंने सौ बार बताया। अब और नहीं बताऊँगा!"
पिता की आँखें नम हो गईं। वे धीरे-धीरे उठे, अपने कमरे में गए और एक पुरानी डायरी ले आए। उन्होंने वह डायरी आकाश को दी।
आकाश ने डायरी खोली। वह उसके बचपन की डायरी थी — पिता ने लिखी थी। पन्ने पलटे तो देखा —
"आज आकाश ने पूछा — पिता जी, पक्षी अपना घोंसला कैसे बनाता है? मैंने उसे बहुत प्यार से समझाया। उसने दस बार पूछा, मैंने दस बार समझाया।"
"आज आकाश ने पूछा — पिता जी, चाँद क्यों बदलता है? मैंने उसे गोद में बिठाकर समझाया। उसने बार-बार पूछा, मैंने बार-बार समझाया।"
आकाश की आँखों से आँसू बहने लगे। उसे एहसास हुआ कि पिता ने उसके बचपन के हर सवाल का कितने धैर्य से जवाब दिया था। आज वही पिता उससे थोड़ा धैर्य चाहते हैं।
उसने पिता के पैर छुए और कहा, "पिता जी, मुझे माफ कर दीजिए।"
बोध: माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। बचपन में उन्होंने जो धैर्य हम पर किया, बुढ़ापे में हमें उन पर करना चाहिए।
16. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक छोटा गाँव — वहाँ कोई डॉक्टर नहीं — लोगों को इलाज के लिए 20 किमी दूर जाना पड़ता — एक युवक डॉक्टर बनने का निर्णय लेता है — परिवार वाले शहर में नौकरी करने को कहते हैं — वह गाँव लौटता है — वहाँ अस्पताल खोलता है — गाँव वालों की मदद करता है।
एक छोटा गाँव — वहाँ कोई डॉक्टर नहीं — लोगों को इलाज के लिए 20 किमी दूर जाना पड़ता — एक युवक डॉक्टर बनने का निर्णय लेता है — परिवार वाले शहर में नौकरी करने को कहते हैं — वह गाँव लौटता है — वहाँ अस्पताल खोलता है — गाँव वालों की मदद करता है।
उत्तर:
शीर्षक: मिट्टी का डॉक्टर
बिहार के एक छोटे-से गाँव में कोई डॉक्टर नहीं था। न कोई अस्पताल था, न दवा की दुकान। अगर किसी को तेज बुखार आ जाए या कोई गंभीर बीमारी हो, तो उसे बीस किलोमीटर दूर शहर जाना पड़ता। कई बार तो समय पर इलाज न मिलने से मरीज की जान चली जाती।
गाँव में एक होशियार लड़का था — राकेश। उसने ठान लिया कि वह डॉक्टर बनेगा और अपने गाँव लौटकर लोगों का इलाज करेगा। उसने खूब मेहनत की, पढ़ाई की और एमबीबीएस की डिग्री हासिल की।
अब राकेश के सामने दो रास्ते थे। शहर की बड़ी कंपनियाँ लाखों के पैकेज पर नौकरी दे रही थीं। परिवार वालों ने कहा, "बेटा, इतनी पढ़ाई के बाद अब शहर में नौकरी करो। अच्छा जीवन बीतेगा।"
राकेश ने सबकी बात सुनी, फिर बोला, "मैं डॉक्टर इसलिए बना हूँ ताकि अपने गाँव की सेवा कर सकूँ। मेरा गाँव मुझे बुला रहा है।"
वह अपने गाँव लौट आया। वहाँ उसने एक छोटा-सा क्लिनिक खोला। शुरू में मुश्किलें थीं — संसाधन नहीं थे, अच्छी दवाइयाँ नहीं थीं। पर राकेश ने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उसका क्लिनिक अस्पताल बन गया। गाँव वालों को अब शहर नहीं भागना पड़ता। राकेश उनका इलाज करता, कभी-कभी तो मुफ्त में दवा भी दे देता।
लोग उसे प्यार से 'मिट्टी का डॉक्टर' बुलाते। राकेश कहता, "डॉक्टर बनना मेरा लक्ष्य नहीं, सेवा मेरा लक्ष्य है।"
बोध: सच्ची सफलता पैसे में नहीं, समाज सेवा में है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही सबसे बड़ी पूंजी है।
शीर्षक: मिट्टी का डॉक्टर
बिहार के एक छोटे-से गाँव में कोई डॉक्टर नहीं था। न कोई अस्पताल था, न दवा की दुकान। अगर किसी को तेज बुखार आ जाए या कोई गंभीर बीमारी हो, तो उसे बीस किलोमीटर दूर शहर जाना पड़ता। कई बार तो समय पर इलाज न मिलने से मरीज की जान चली जाती।
गाँव में एक होशियार लड़का था — राकेश। उसने ठान लिया कि वह डॉक्टर बनेगा और अपने गाँव लौटकर लोगों का इलाज करेगा। उसने खूब मेहनत की, पढ़ाई की और एमबीबीएस की डिग्री हासिल की।
अब राकेश के सामने दो रास्ते थे। शहर की बड़ी कंपनियाँ लाखों के पैकेज पर नौकरी दे रही थीं। परिवार वालों ने कहा, "बेटा, इतनी पढ़ाई के बाद अब शहर में नौकरी करो। अच्छा जीवन बीतेगा।"
राकेश ने सबकी बात सुनी, फिर बोला, "मैं डॉक्टर इसलिए बना हूँ ताकि अपने गाँव की सेवा कर सकूँ। मेरा गाँव मुझे बुला रहा है।"
वह अपने गाँव लौट आया। वहाँ उसने एक छोटा-सा क्लिनिक खोला। शुरू में मुश्किलें थीं — संसाधन नहीं थे, अच्छी दवाइयाँ नहीं थीं। पर राकेश ने हार नहीं मानी।
धीरे-धीरे उसका क्लिनिक अस्पताल बन गया। गाँव वालों को अब शहर नहीं भागना पड़ता। राकेश उनका इलाज करता, कभी-कभी तो मुफ्त में दवा भी दे देता।
लोग उसे प्यार से 'मिट्टी का डॉक्टर' बुलाते। राकेश कहता, "डॉक्टर बनना मेरा लक्ष्य नहीं, सेवा मेरा लक्ष्य है।"
बोध: सच्ची सफलता पैसे में नहीं, समाज सेवा में है। अपनी जड़ों से जुड़े रहना ही सबसे बड़ी पूंजी है।
17. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक राजा — उसकी रानी बहुत सुंदर — रानी के गहने चोरी हो जाते हैं — राजा का आदेश — जो भी चोर पकड़ेगा, उसे इनाम मिलेगा — एक बूढ़ी महिला आती है — कहती है चोर कोई और नहीं, स्वयं रानी के आलस्य और फिजूलखर्ची के कारण गहने गायब हुए — राजा को सीख मिलती है।
एक राजा — उसकी रानी बहुत सुंदर — रानी के गहने चोरी हो जाते हैं — राजा का आदेश — जो भी चोर पकड़ेगा, उसे इनाम मिलेगा — एक बूढ़ी महिला आती है — कहती है चोर कोई और नहीं, स्वयं रानी के आलस्य और फिजूलखर्ची के कारण गहने गायब हुए — राजा को सीख मिलती है।
उत्तर:
शीर्षक: असली चोर
विजयगढ़ के राजा विक्रम सिंह बहुत न्यायप्रिय थे। उनकी रानी रत्नावती अत्यंत सुंदर थीं, पर उन्हें आलस्य और फिजूलखर्ची की आदत थी। उनके पास सैकड़ों गहने थे, फिर भी हर महीने नए गहने बनवाती थीं।
एक दिन रानी के मुख्य आभूषण चोरी हो गए। राजा ने घोषणा की — जो कोई भी चोर को पकड़ेगा, उसे पचास हजार स्वर्ण मुद्राएँ इनाम दी जाएँगी। राज्य भर में खोजबीन हुई, पर चोर का कोई पता नहीं चला।
तीन दिन बाद एक बूढ़ी महिला राजदरबार में आई। उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं चोर को पकड़ लाई हूँ।"
राजा ने उत्सुकता से पूछा, "कहाँ है वह चोर?"
बूढ़ी महिला ने रानी की ओर इशारा किया। "यही हैं असली चोर, महाराज।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा क्रोधित हो गए। बूढ़ी महिला ने शांति से कहा, "महाराज, मैं आपको समझाती हूँ। रानी के पास हजारों गहने हैं, फिर भी वे हर महीने नए गहने बनवाती हैं। पुराने गहने कहाँ जाते हैं? वे या तो टूट-फूट जाते हैं, या कहीं खो जाते हैं। यह चोरी नहीं, आलस्य और फिजूलखर्ची का परिणाम है।"
राजा सोच में पड़ गए। उन्होंने रानी से पूछा तो पता चला कि पिछले एक वर्ष में चार बार गहने खो चुके थे, पर रानी ने कभी बताया नहीं। वह बस नए बनवा लेती थीं।
राजा को समझ आ गया। उन्होंने रानी को समझाया, "धन की रक्षा करना भी धन कमाने के समान ही महत्वपूर्ण है। फिजूलखर्ची और आलस्य ही असली चोर हैं।"
रानी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उस दिन से उन्होंने अनावश्यक खर्च करना बंद कर दिया और अपने गहनों की सुरक्षा का उचित प्रबंध किया।
बोध: असली चोर बाहर नहीं, हमारी बुरी आदतें होती हैं। फिजूलखर्ची और आलस्य ही सबसे बड़े चोर हैं।
शीर्षक: असली चोर
विजयगढ़ के राजा विक्रम सिंह बहुत न्यायप्रिय थे। उनकी रानी रत्नावती अत्यंत सुंदर थीं, पर उन्हें आलस्य और फिजूलखर्ची की आदत थी। उनके पास सैकड़ों गहने थे, फिर भी हर महीने नए गहने बनवाती थीं।
एक दिन रानी के मुख्य आभूषण चोरी हो गए। राजा ने घोषणा की — जो कोई भी चोर को पकड़ेगा, उसे पचास हजार स्वर्ण मुद्राएँ इनाम दी जाएँगी। राज्य भर में खोजबीन हुई, पर चोर का कोई पता नहीं चला।
तीन दिन बाद एक बूढ़ी महिला राजदरबार में आई। उसने राजा से कहा, "महाराज, मैं चोर को पकड़ लाई हूँ।"
राजा ने उत्सुकता से पूछा, "कहाँ है वह चोर?"
बूढ़ी महिला ने रानी की ओर इशारा किया। "यही हैं असली चोर, महाराज।"
दरबार में सन्नाटा छा गया। राजा क्रोधित हो गए। बूढ़ी महिला ने शांति से कहा, "महाराज, मैं आपको समझाती हूँ। रानी के पास हजारों गहने हैं, फिर भी वे हर महीने नए गहने बनवाती हैं। पुराने गहने कहाँ जाते हैं? वे या तो टूट-फूट जाते हैं, या कहीं खो जाते हैं। यह चोरी नहीं, आलस्य और फिजूलखर्ची का परिणाम है।"
राजा सोच में पड़ गए। उन्होंने रानी से पूछा तो पता चला कि पिछले एक वर्ष में चार बार गहने खो चुके थे, पर रानी ने कभी बताया नहीं। वह बस नए बनवा लेती थीं।
राजा को समझ आ गया। उन्होंने रानी को समझाया, "धन की रक्षा करना भी धन कमाने के समान ही महत्वपूर्ण है। फिजूलखर्ची और आलस्य ही असली चोर हैं।"
रानी को अपनी गलती का एहसास हुआ। उस दिन से उन्होंने अनावश्यक खर्च करना बंद कर दिया और अपने गहनों की सुरक्षा का उचित प्रबंध किया।
बोध: असली चोर बाहर नहीं, हमारी बुरी आदतें होती हैं। फिजूलखर्ची और आलस्य ही सबसे बड़े चोर हैं।
18. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
दो गाँवों के बीच पानी को लेकर विवाद — नदी का पानी दोनों चाहते हैं — झगड़ा बढ़ता है — एक बुजुर्ग सुझाव देता है — दोनों गाँव मिलकर नदी पर बाँध बनाएँ — पानी का समान वितरण हो — सहयोग से दोनों गाँव समृद्ध होते हैं — विवाद समाप्त होता है।
दो गाँवों के बीच पानी को लेकर विवाद — नदी का पानी दोनों चाहते हैं — झगड़ा बढ़ता है — एक बुजुर्ग सुझाव देता है — दोनों गाँव मिलकर नदी पर बाँध बनाएँ — पानी का समान वितरण हो — सहयोग से दोनों गाँव समृद्ध होते हैं — विवाद समाप्त होता है।
उत्तर:
शीर्षक: नदी का संकल्प
पहाड़ों से निकलकर एक छोटी नदी मैदानी क्षेत्रों में आती थी। नदी के दोनों ओर दो गाँव बसे थे — पूरनपुर और गोपालपुर। दोनों गाँवों के खेत उसी नदी के पानी से सिंचित होते थे।
गर्मियों में पानी कम हो जाता। दोनों गाँव एक-दूसरे पर पानी चुराने का आरोप लगाते। पूरनपुर वाले कहते, "पहले हमारी फसल सींचेंगे, नदी हमारी तरफ पहले आती है।" गोपालपुर वाले कहते, "हमें भी पानी चाहिए, नदी किसी की निजी संपत्ति नहीं।"
झगड़ा बढ़ता गया। कई बार मारपीट तक हो गई। प्रशासन ने समझाने की कोशिश की, पर दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे।
एक दिन गाँव के एक बुजुर्ग — सौ वर्षीय बाबा भीखन — ने दोनों गाँव वालों को बुलाया। उन्होंने कहा, "बेटों, इस नदी ने हमारे पूर्वजों को सदियों पाला है। आपस में लड़कर तुम इसका अपमान कर रहे हो।"
"तो क्या करें बाबा?" दोनों ने पूछा।
बाबा भीखन ने कहा, "नदी पर एक बाँध बनाओ। दोनों गाँव मिलकर श्रमदान करो। बाँध से दोनों ओर नहरें निकालो। पानी का बँटवारा नहीं, समान वितरण होगा।"
दोनों गाँव राजी हो गए। उन्होंने मिलकर बाँध बनाया। पूरनपुर वालों ने सीमेंट-पत्थर दिए, गोपालपुर वालों ने मजदूरी की। महिलाओं ने भोजन बनाया, बच्चों ने पानी पहुँचाया।
तीन महीने में बाँध तैयार हो गया। अब सूखे मौसम में भी नदी में पानी रहता। दोनों गाँवों को पर्याप्त पानी मिलने लगा। फसलें लहलहा उठीं।
झगड़ा समाप्त हुआ, मित्रता बढ़ी। लोग कहते — नदी ने पानी नहीं, एकता का पाठ पढ़ाया।
बोध: संघर्ष से समाधान नहीं, सहयोग से समाधान निकलता है। एकता और सामूहिक प्रयास से बड़ी-से-बड़ी समस्या हल हो सकती है।
शीर्षक: नदी का संकल्प
पहाड़ों से निकलकर एक छोटी नदी मैदानी क्षेत्रों में आती थी। नदी के दोनों ओर दो गाँव बसे थे — पूरनपुर और गोपालपुर। दोनों गाँवों के खेत उसी नदी के पानी से सिंचित होते थे।
गर्मियों में पानी कम हो जाता। दोनों गाँव एक-दूसरे पर पानी चुराने का आरोप लगाते। पूरनपुर वाले कहते, "पहले हमारी फसल सींचेंगे, नदी हमारी तरफ पहले आती है।" गोपालपुर वाले कहते, "हमें भी पानी चाहिए, नदी किसी की निजी संपत्ति नहीं।"
झगड़ा बढ़ता गया। कई बार मारपीट तक हो गई। प्रशासन ने समझाने की कोशिश की, पर दोनों अपनी-अपनी जिद पर अड़े रहे।
एक दिन गाँव के एक बुजुर्ग — सौ वर्षीय बाबा भीखन — ने दोनों गाँव वालों को बुलाया। उन्होंने कहा, "बेटों, इस नदी ने हमारे पूर्वजों को सदियों पाला है। आपस में लड़कर तुम इसका अपमान कर रहे हो।"
"तो क्या करें बाबा?" दोनों ने पूछा।
बाबा भीखन ने कहा, "नदी पर एक बाँध बनाओ। दोनों गाँव मिलकर श्रमदान करो। बाँध से दोनों ओर नहरें निकालो। पानी का बँटवारा नहीं, समान वितरण होगा।"
दोनों गाँव राजी हो गए। उन्होंने मिलकर बाँध बनाया। पूरनपुर वालों ने सीमेंट-पत्थर दिए, गोपालपुर वालों ने मजदूरी की। महिलाओं ने भोजन बनाया, बच्चों ने पानी पहुँचाया।
तीन महीने में बाँध तैयार हो गया। अब सूखे मौसम में भी नदी में पानी रहता। दोनों गाँवों को पर्याप्त पानी मिलने लगा। फसलें लहलहा उठीं।
झगड़ा समाप्त हुआ, मित्रता बढ़ी। लोग कहते — नदी ने पानी नहीं, एकता का पाठ पढ़ाया।
बोध: संघर्ष से समाधान नहीं, सहयोग से समाधान निकलता है। एकता और सामूहिक प्रयास से बड़ी-से-बड़ी समस्या हल हो सकती है।
19. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक प्रसिद्ध चित्रकार — उसकी नकल करने वाला एक युवक — चित्रकार के चित्रों की हूबहू नकल करता है — उन्हें अपने नाम से बेचता है — एक दिन चित्रकार उस युवक के स्टूडियो में जाता है — नकल देखकर क्रोधित नहीं होता, बल्कि सराहना करता है — युवक लज्जित होता है — चित्रकार उसे सिखाता है कि नकल से बड़ा कुछ नहीं, अपनी मौलिक रचना करो।
एक प्रसिद्ध चित्रकार — उसकी नकल करने वाला एक युवक — चित्रकार के चित्रों की हूबहू नकल करता है — उन्हें अपने नाम से बेचता है — एक दिन चित्रकार उस युवक के स्टूडियो में जाता है — नकल देखकर क्रोधित नहीं होता, बल्कि सराहना करता है — युवक लज्जित होता है — चित्रकार उसे सिखाता है कि नकल से बड़ा कुछ नहीं, अपनी मौलिक रचना करो।
उत्तर:
शीर्षक: नकल से रचना तक
उदयपुर के महान चित्रकार मोहनलाल जी की कला की धाक पूरे देश में थी। उनके चित्रों की हूबहू नकल करने वाला एक युवक था — विक्रम। वह मोहनलाल जी के चित्र देखता, ठीक वैसे ही चित्र बना लेता और उन्हें अपने नाम से बेचता।
लोग उसकी नकल को भी मूल चित्र समझकर खरीद लेते। विक्रम को कभी कोई पकड़ नहीं पाता।
एक दिन विक्रम अपने स्टूडियो में बैठा था। सामने मोहनलाल जी आ खड़े हुए। विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे लगा, अब उसे जेल जाना पड़ेगा।
मोहनलाल जी ने दीवार पर टंगे अपने ही चित्रों की नकल को गौर से देखा। फिर वे मुस्कुराए और बोले, "बहुत सुंदर नकल है। रेखाएँ बिल्कुल साफ हैं, रंगों का मेल भी ठीक है। तुममें अपार प्रतिभा है।"
विक्रम हैरान था। उसने घबराते हुए कहा, "आप... आप मुझे क्षमा कर रहे हैं?"
मोहनलाल जी ने कहा, "क्षमा करने की बात नहीं है। तुम मेरे चित्रों की नकल करते हो, इसका अर्थ है तुम मेरे काम को सराहते हो। पर क्या तुम सिर्फ नकल करके ही संतुष्ट रहोगे?"
उन्होंने विक्रम को समझाया, "नकल में प्रतिभा होती है, पर रचना में आत्मा होती है। तुम अपने मन के चित्र बनाओ। वह चित्र तुम्हारे होंगे, मेरे नहीं।"
विक्रम की आँखें खुल गईं। उसने मोहनलाल जी से क्षमा माँगी और नकल करना छोड़ दिया। उसने अपनी शैली विकसित की। वर्षों बाद वह स्वयं एक प्रसिद्ध चित्रकार बना।
बोध: नकल सीखने का पहला चरण है, पर असली सफलता मौलिकता में है। अपनी पहचान खुद बनानी पड़ती है।
शीर्षक: नकल से रचना तक
उदयपुर के महान चित्रकार मोहनलाल जी की कला की धाक पूरे देश में थी। उनके चित्रों की हूबहू नकल करने वाला एक युवक था — विक्रम। वह मोहनलाल जी के चित्र देखता, ठीक वैसे ही चित्र बना लेता और उन्हें अपने नाम से बेचता।
लोग उसकी नकल को भी मूल चित्र समझकर खरीद लेते। विक्रम को कभी कोई पकड़ नहीं पाता।
एक दिन विक्रम अपने स्टूडियो में बैठा था। सामने मोहनलाल जी आ खड़े हुए। विक्रम के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसे लगा, अब उसे जेल जाना पड़ेगा।
मोहनलाल जी ने दीवार पर टंगे अपने ही चित्रों की नकल को गौर से देखा। फिर वे मुस्कुराए और बोले, "बहुत सुंदर नकल है। रेखाएँ बिल्कुल साफ हैं, रंगों का मेल भी ठीक है। तुममें अपार प्रतिभा है।"
विक्रम हैरान था। उसने घबराते हुए कहा, "आप... आप मुझे क्षमा कर रहे हैं?"
मोहनलाल जी ने कहा, "क्षमा करने की बात नहीं है। तुम मेरे चित्रों की नकल करते हो, इसका अर्थ है तुम मेरे काम को सराहते हो। पर क्या तुम सिर्फ नकल करके ही संतुष्ट रहोगे?"
उन्होंने विक्रम को समझाया, "नकल में प्रतिभा होती है, पर रचना में आत्मा होती है। तुम अपने मन के चित्र बनाओ। वह चित्र तुम्हारे होंगे, मेरे नहीं।"
विक्रम की आँखें खुल गईं। उसने मोहनलाल जी से क्षमा माँगी और नकल करना छोड़ दिया। उसने अपनी शैली विकसित की। वर्षों बाद वह स्वयं एक प्रसिद्ध चित्रकार बना।
बोध: नकल सीखने का पहला चरण है, पर असली सफलता मौलिकता में है। अपनी पहचान खुद बनानी पड़ती है।
20. निम्नलिखित रूपरेखा के आधार पर उचित शीर्षक देते हुए कथानक लिखिए:
एक छोटा बच्चा — उसे स्कूल जाने से डर लगता है — माँ उसे हर दिन समझाती है — एक दिन बच्चा स्कूल से भाग आता है — माँ उसे बिना डाँटे फिर स्कूल ले जाती है — रास्ते में एक तितली दिखती है — तितली कोकून से बाहर निकल रही होती है — माँ बच्चे को समझाती है — कठिनाई से बाहर निकलना ही जीवन है — बच्चा समझता है और स्कूल जाने लगता है।
एक छोटा बच्चा — उसे स्कूल जाने से डर लगता है — माँ उसे हर दिन समझाती है — एक दिन बच्चा स्कूल से भाग आता है — माँ उसे बिना डाँटे फिर स्कूल ले जाती है — रास्ते में एक तितली दिखती है — तितली कोकून से बाहर निकल रही होती है — माँ बच्चे को समझाती है — कठिनाई से बाहर निकलना ही जीवन है — बच्चा समझता है और स्कूल जाने लगता है।
उत्तर:
शीर्षक: तितली का सबक
छोटा गोलू अभी-अभी पहली कक्षा में आया था। उसे स्कूल जाने से बहुत डर लगता था। हर सुबह वह रोता, पेट में दर्द बताता, कोई न कोई बहाना बनाता।
उसकी माँ रजनी उसे हर दिन बड़े प्यार से समझाती, "बेटा, स्कूल में कितने दोस्त हैं। खेलोगे, पढ़ोगे, मस्ती करोगे।" पर गोलू का डर नहीं जाता था।
एक दिन गोलू स्कूल से भाग आया। वह रोता हुआ घर पहुँचा, "माँ, मुझे वहाँ अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं जाऊँगा स्कूल।"
रजनी ने कुछ नहीं कहा। उसने गोलू का हाथ पकड़ा और कहा, "चल, फिर साथ चलते हैं।"
रास्ते में एक बगीचा था। वहाँ उन्होंने देखा — एक तितली अपने कोकून से बाहर निकलने का प्रयास कर रही थी। वह बहुत मेहनत कर रही थी। धीरे-धीरे उसके पंख बाहर आ रहे थे।
गोलू वहाँ ठिठक गया। उसने कहा, "माँ, तितली को बहुत तकलीफ हो रही है। चलो उसकी मदद करें।"
माँ ने कहा, "नहीं बेटा, अगर हम तितली की मदद करेंगे तो उसके पंख कमजोर हो जाएँगे। वह उड़ नहीं पाएगी। इस कठिनाई से निकलकर ही उसके पंख मजबूत बनते हैं।"
गोलू ने ध्यान से देखा। तितली ने हार नहीं मानी। वह संघर्ष करती रही। आखिरकार वह पूरी तरह बाहर आ गई और उड़ चली।
गोलू समझ गया। उसने माँ से कहा, "माँ, स्कूल का डर भी कोकून की तरह है, है ना? थोड़ा कठिन लगता है, पर मैं हार नहीं मानूँगा।"
माँ ने उसे गले लगा लिया। उस दिन गोलू खुद ही स्कूल गया। उसने तितली की तरह उड़ना सीख लिया था।
बोध: कठिनाइयों से भागना नहीं, उनका सामना करना सीखना चाहिए। संघर्ष ही हमें मजबूत बनाता है।
शीर्षक: तितली का सबक
छोटा गोलू अभी-अभी पहली कक्षा में आया था। उसे स्कूल जाने से बहुत डर लगता था। हर सुबह वह रोता, पेट में दर्द बताता, कोई न कोई बहाना बनाता।
उसकी माँ रजनी उसे हर दिन बड़े प्यार से समझाती, "बेटा, स्कूल में कितने दोस्त हैं। खेलोगे, पढ़ोगे, मस्ती करोगे।" पर गोलू का डर नहीं जाता था।
एक दिन गोलू स्कूल से भाग आया। वह रोता हुआ घर पहुँचा, "माँ, मुझे वहाँ अच्छा नहीं लगता। मैं नहीं जाऊँगा स्कूल।"
रजनी ने कुछ नहीं कहा। उसने गोलू का हाथ पकड़ा और कहा, "चल, फिर साथ चलते हैं।"
रास्ते में एक बगीचा था। वहाँ उन्होंने देखा — एक तितली अपने कोकून से बाहर निकलने का प्रयास कर रही थी। वह बहुत मेहनत कर रही थी। धीरे-धीरे उसके पंख बाहर आ रहे थे।
गोलू वहाँ ठिठक गया। उसने कहा, "माँ, तितली को बहुत तकलीफ हो रही है। चलो उसकी मदद करें।"
माँ ने कहा, "नहीं बेटा, अगर हम तितली की मदद करेंगे तो उसके पंख कमजोर हो जाएँगे। वह उड़ नहीं पाएगी। इस कठिनाई से निकलकर ही उसके पंख मजबूत बनते हैं।"
गोलू ने ध्यान से देखा। तितली ने हार नहीं मानी। वह संघर्ष करती रही। आखिरकार वह पूरी तरह बाहर आ गई और उड़ चली।
गोलू समझ गया। उसने माँ से कहा, "माँ, स्कूल का डर भी कोकून की तरह है, है ना? थोड़ा कठिन लगता है, पर मैं हार नहीं मानूँगा।"
माँ ने उसे गले लगा लिया। उस दिन गोलू खुद ही स्कूल गया। उसने तितली की तरह उड़ना सीख लिया था।
बोध: कठिनाइयों से भागना नहीं, उनका सामना करना सीखना चाहिए। संघर्ष ही हमें मजबूत बनाता है।