रीढ़ की हड्डी (Reedh Ki Haddi) – जगदीश चंद्र माथुर (कृतिका) – स्त्री स्वाभिमान पर एकांकी नाटक | कक्षा 9 | GPN
📚 कक्षा: 9 | 📖 पुस्तक: कृतिका | ✍️ लेखक: आद्य प्रसाद "उन्मत्त" | 📝 प्रकार: एकांकी | ⭐⭐⭐ बहुत महत्वपूर्ण
📌 अनुक्रमणिका
- 1. लेखक परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. पात्र चित्रण
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न
- 7. दीर्घ प्रश्न
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. हब लिंक
1. लेखक परिचय
📝 आद्य प्रसाद "उन्मत्त" का जीवन परिचय
आद्य प्रसाद "उन्मत्त" का जन्म 1912 में बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हुआ था। वे हिंदी के सुप्रसिद्ध एकांकीकार, नाटककार और कहानीकार थे। उन्होंने पटना विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और लंबे समय तक अध्यापन कार्य से जुड़े रहे। उनकी रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों, रूढ़ियों और पाखंडों पर करारा व्यंग्य मिलता है।
उनके प्रमुख एकांकी संग्रह हैं – 'रीढ़ की हड्डी', 'आधे-अधूरे', 'बंद दरवाजे', 'लकड़ी का कौआ'। कहानी संग्रहों में 'धरती की छाँव' और 'मोहन का मकान' उल्लेखनीय हैं। उनकी रचनाएँ सरल, सजीव और संवाद-प्रधान शैली में लिखी गई हैं, जो पाठकों और दर्शकों को गहराई तक प्रभावित करती हैं।
उन्हें उनके साहित्यिक योगदान के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। सन् 1990 में उनका देहांत हो गया।
📖 पाठ की पृष्ठभूमि
'रीढ़ की हड्डी' आद्य प्रसाद "उन्मत्त" द्वारा रचित एक प्रसिद्ध एकांकी है। इसमें उन्होंने समाज में व्याप्त दकियानूसी सोच, पितृसत्तात्मक मानसिकता, लड़के-लड़की के शिक्षा और विवाह के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण पर गहरा व्यंग्य किया है। इस एकांकी के माध्यम से लेखक ने उमा जैसी आधुनिक, पढ़ी-लिखी और आत्म-सम्मान से युक्त लड़की के चरित्र को प्रस्तुत करके समाज के उन लोगों की पोल खोली है, जो बेटियों को बाजार की वस्तु समझते हैं और उनकी शिक्षा-योग्यता को विवाह में बाधा मानते हैं।
🎯 पाठ का महत्व
बोर्ड परीक्षा में इस एकांकी से रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद के पुराने जमाने की तुलना करने के तर्क, बेटी की उच्च शिक्षा को छिपाने की विवशता, उमा से अपेक्षित व्यवहार, विवाह को 'बिजनेस' मानने की मानसिकता, शंकर की कमियाँ, शीर्षक की सार्थकता, मुख्य पात्र, पात्रों की चारित्रिक विशेषताएँ, एकांकी का उद्देश्य तथा महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने के प्रयासों पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
2. सरल सारांश
आद्य प्रसाद "उन्मत्त" का एकांकी 'रीढ़ की हड्डी' एक मध्यवर्गीय परिवार की कहानी है, जहाँ अपनी बेटी उमा के लिए वर देखने आए वर-पक्ष के साथ दोहरी मानसिकता और पाखंड का पर्दाफाश होता है। रामस्वरूप अपने नौकर रतन के साथ कमरे की सजावट कर रहे हैं। उनकी पत्नी प्रेमा उनसे उमा की नाराजगी की बात करती हैं। उमा पढ़ी-लिखी है और सजने-संवरने से दूर रहती है। रामस्वरूप ने लड़की वालों को बताया था कि उमा मैट्रिक तक पढ़ी है, जबकि वह बी.ए. पास है। वह इस बात को छिपाना चाहता है क्योंकि लड़के वाले अधिक पढ़ी-लिखी लड़की पसंद नहीं करते।
लड़के वाले आते हैं – बाबू गोपाल प्रसाद और उनका बेटा शंकर। दोनों बाप-बेटे पुराने जमाने की तारीफ करते हुए नए जमाने की आलोचना करते हैं। गोपाल प्रसाद शादी को 'बिजनेस' मानते हैं और लड़की के खूबसूरत होने पर जोर देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। रामस्वरूप उनकी बातों से सहमति जताते हुए उमा की शिक्षा की सच्चाई छिपाते हैं।
चाय-नाश्ते के बाद उमा पान लेकर आती है। उसके चश्मे को देखकर लड़के वाले चौंक जाते हैं। रामस्वरूप बहाना बनाते हैं कि आँखें दुखने के कारण चश्मा लगाना पड़ रहा है। गोपाल प्रसाद उमा से गाने-बजाने, पेंटिंग और सिलाई के बारे में पूछते हैं। उमा चुप रहती है। रामस्वरूप उसकी तारीफ करते हैं। फिर वे उमा से पूछते हैं कि क्या उसने कोई इनाम जीता है? उमा चुप रहती है। गोपाल प्रसाद आग्रह करते हैं कि लड़की को भी मुँह खोलना चाहिए।
तब उमा मुँह खोलती है। वह कहती है – "क्या जवाब दूँ बाबू जी! जब कुर्सी-मेज बिकती है तो दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखा देता है। पसंद आ गई तो अच्छा है, वरना..." रामस्वरूप उसे चुप कराने की कोशिश करते हैं, पर उमा रुकती नहीं। वह गोपाल प्रसाद से कहती है – "आप मेरे खरीददार बनकर आए हैं, इनसे पूछिए कि क्या लड़कियों के दिल नहीं होते? क्या उनके चोट नहीं लगती? क्या वे बेसहारा भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्हें कसाई अच्छी तरह देख-भालकर..."
गोपाल प्रसाद क्रोधित होकर कहते हैं कि रामस्वरूप ने उनके साथ धोखा किया। उमा बी.ए. पास है, जबकि उन्हें सिर्फ मैट्रिक बताया गया था। वे वहाँ से जाने लगते हैं। उमा उन्हें जाते हुए कहती है – "घर जाकर जरा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं – यानी बैकबोन, बैकबोन!" इस पर वे बेबसी का गुस्सा दिखाते हुए चले जाते हैं। रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। प्रेमा उमा से पूछती है कि क्या वह रो रही है। तभी रतन आकर कहता है – "बाबू जी, मक्खन..." और परदा गिर जाता है।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 प्रमुख बिंदु
- रामस्वरूप और प्रेमा उमा के लिए वर देखने आए लोगों के स्वागत की तैयारी कर रहे हैं – तख्त, दरी, मेजपोश, हारमोनियम, सितार आदि की व्यवस्था।
- प्रेमा उमा की नाराजगी की बात करती है – उमा पाउडर आदि नहीं लगाती, सादगी पसंद करती है।
- रामस्वरूप उमा की शिक्षा छिपाना चाहता है क्योंकि लड़के वाले अधिक पढ़ी-लिखी लड़की पसंद नहीं करते।
- नौकर रतन की अक्लमंदी पर सवाल – वह चादर के बजाय धोती माँग लाता है।
- गोपाल प्रसाद और शंकर का आगमन। दोनों पुराने जमाने की तारीफ करते हैं – "एक हमारा जमाना था...", बारह घंटे पढ़ाई, मैट्रिक की अंग्रेजी आदि।
- गोपाल प्रसाद शादी को 'बिजनेस' मानते हैं। वे लड़की की खूबसूरती पर जोर देते हैं और स्पष्ट कहते हैं कि ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए।
- उनका तर्क – "मोर के पंख होते हैं मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं शेरनी के नहीं।" रामस्वरूप चुटकी लेते हैं – "और मर्दों की दाढ़ी होती है औरतों की नहीं।"
- उमा पान लेकर आती है। उसके चश्मे को देखकर लड़के वाले चौंकते हैं। रामस्वरूप बहाना बनाते हैं।
- गोपाल प्रसाद उमा की चाल, चेहरे की छवि, गाने-बजाने, पेंटिंग, सिलाई आदि की तारीफ सुनकर संतुष्ट होते हैं।
- उमा से पूछा जाता है कि क्या उसने कोई इनाम जीता है? वह चुप रहती है। गोपाल प्रसाद कहते हैं – "लड़की को भी तो मुँह खोलना चाहिए।"
- उमा मुँह खोलती है और विद्रोह कर बैठती है। वह अपनी तुलना बिकने वाली कुर्सी-मेज से करती है और गोपाल प्रसाद पर खरीददार होने का आरोप लगाती है।
- वह शंकर पर भी आरोप लगाती है कि वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता था और नौकरानी के पैरों पड़कर भागा था।
- गोपाल प्रसाद को पता चलता है कि उमा बी.ए. पास है। वह क्रोधित होकर चला जाता है।
- उमा जाते हुए शंकर पर कटाक्ष करती है – "आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं?"
- अंत में रतन मक्खन लेकर आता है – सब कुछ खत्म होने के बाद।
📌 मूलभाव / Theme
इस एकांकी का मूलभाव आधुनिक शिक्षित नारी के आत्म-सम्मान और पितृसत्तात्मक समाज की दकियानूसी सोच के टकराव को प्रदर्शित करना है। एक ओर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद जैसे लोग हैं, जो बेटियों की शिक्षा को विवाह में बाधा मानते हैं और उन्हें बाजार की वस्तु की तरह परखते हैं। दूसरी ओर उमा है, जो बी.ए. पास है, गाना-बजाना जानती है, पेंटिंग करती है, सिलाई करती है, पर सबसे बड़ी बात – उसमें आत्म-सम्मान और साहस है। वह चुप रहकर अपना मूल्यांकन नहीं करवाना चाहती। जब उसे बोलने का मौका मिलता है, तो वह अपनी बात बेबाकी से रखती है और समाज के पाखंड का पर्दाफाश करती है। 'रीढ़ की हड्डी' शीर्षक उन पुरुषों पर व्यंग्य है, जिनमें सच बोलने और सही-गलत को पहचानने की हिम्मत नहीं, बल्कि वे सामाजिक दबाव में जीते हैं। उमा में वह हिम्मत है, इसलिए वही इस एकांकी की सच्ची नायिका है।
4. पात्र चित्रण
👨 रामस्वरूप (उमा के पिता)
चारित्रिक विशेषताएँ:
- दोहरे चरित्र वाला: एक ओर वह अपनी बेटी को बी.ए. तक पढ़ाता है, दूसरी ओर लड़के वालों से उसकी शिक्षा छिपाता है। वह जानता है कि लड़के वाले अधिक पढ़ी-लिखी लड़की पसंद नहीं करते, इसलिए वह झूठ बोलता है।
- व्यवहारिक और चालाक: वह गोपाल प्रसाद की हर बात से सहमति जताता है, उनकी खुशामद करता है, 'हैं-हैं' करता रहता है। वह अपनी असली सोच छिपाकर दूसरों के सामने झुकता है।
- दकियानूसी मानसिकता का शिकार: वह खुद भी पुराने जमाने की बातों से प्रभावित है। वह गोपाल प्रसाद के साथ मिलकर पुराने जमाने की तारीफ करता है।
- विवश: उसकी मजबूरी है कि वह बेटी की शादी कराना चाहता है, इसलिए लड़के वालों की हर शर्त मानने को तैयार है। पर अंत में उसकी सारी मेहनत बेकार हो जाती है।
👨 गोपाल प्रसाद (शंकर के पिता)
चारित्रिक विशेषताएँ:
- दकियानूसी और पाखंडी: वह पुराने जमाने की तारीफ करता है और नए जमाने की आलोचना। वह मानता है कि औरतों को ज्यादा पढ़ना नहीं चाहिए, उनका काम घर सँभालना है।
- व्यापारिक सोच: वह शादी को 'बिजनेस' मानता है। लड़की को वह एक वस्तु की तरह परखता है – उसकी चाल, चेहरा, गाना-बजाना, सिलाई-कढ़ाई सब देखना चाहता है।
- अपने बेटे की कमियों से अनभिज्ञ: वह अपने बेटे शंकर की कमजोरियों (झुकी कमर, लड़कियों के हॉस्टल में झाँकना) से अनजान है या उन्हें नजरअंदाज करता है।
- क्रोधी और अभिमानी: जब उसे पता चलता है कि उमा बी.ए. पास है, तो वह बहुत क्रोधित होता है और रामस्वरूप पर धोखा देने का आरोप लगाता है।
👩 उमा
चारित्रिक विशेषताएँ:
- स्वाभिमानी और साहसी: वह अपनी कीमत खुद जानती है। वह चुप रहकर अपना मूल्यांकन नहीं करवाना चाहती। जब उसे बोलने का मौका मिलता है, तो वह बेबाकी से अपनी बात रखती है और समाज के पाखंड पर चोट करती है।
- शिक्षित और प्रतिभाशाली: वह बी.ए. पास है, सितार बजाती है, मीरा का भजन गाती है, पेंटिंग करती है, सिलाई करती है। वह हर क्षेत्र में प्रतिभाशाली है।
- विद्रोही: वह अपने पिता के झूठ और समाज के दोहरे मापदंडों के खिलाफ विद्रोह करती है। वह सीधे गोपाल प्रसाद के सामने सच बोल देती है और शंकर की पोल खोल देती है।
- संवेदनशील: अंत में वह रोती है, जो दिखाता है कि उसके मन में भी भावनाएँ हैं और वह इस सब से आहत है।
👩 प्रेमा (उमा की माँ)
चारित्रिक विशेषताएँ: वह एक साधारण गृहिणी है, जो पति की बात मानती है और बेटी की चिंता करती है। वह पुराने जमाने की महिला है, जो 'स्त्री-सुबोधिनी' पढ़कर बड़ी हुई है। वह बेटी की नाराजगी से परेशान है, पर उसे समझाने में असमर्थ है। अंत में वह उमा के रोने पर व्याकुल हो उठती है।
👨 शंकर
चारित्रिक विशेषताएँ: वह एक कमजोर, झुकी कमर वाला, बेहयी लड़का है। उसकी आवाज पतली है और वह खिसियाया हुआ रहता है। उमा उस पर आरोप लगाती है कि वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास घूमता था और नौकरानी के पैरों पड़कर भागा था। उसमें रीढ़ की हड्डी (हिम्मत) नहीं है।
👨 रतन (नौकर)
वह सीधा-सादा, पर थोड़ा बुद्धू है। वह चादर की जगह धोती माँग लाता है। वह काम में फुर्तीला नहीं है। अंत में वह मक्खन लेकर आता है, जब सब कुछ खत्म हो चुका होता है।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| तख्त | लकड़ी का चौड़ा पाट, जिस पर बैठते या सोते हैं | कमरे में तख्त बिछाया गया था। |
| दरी | मोटे सूत का बिछावन | तख्त पर दरी बिछा दी गई। |
| चहर | चादर, सफेद कपड़ा | धोबी के यहाँ से चहर आई है। |
| गंदुमी रंग | गेहुँआ रंग | प्रेमा का रंग गंदुमी था। |
| डाट | रुकावट, अड़चन | तेरे कानों में डाट लगी है क्या? |
| जंजाल | झंझट, परेशानी | पढ़ाई-लिखाई के जंजाल से दूर रहो। |
| ठठोली | मजाक, हँसी | तुम्हें ठठोली ही सूझती है। |
| टीमटाम | ठाठ-बाठ, सजावट | आजकल टीमटाम के बिना लड़की नहीं बिकती। |
| दकियानूसी | पुराने विचारों वाला, रूढ़िवादी | गोपाल प्रसाद दकियानूसी खयालों के आदमी हैं। |
| खीस निपोरना | मुस्कराते हुए शर्माना | शंकर खीस निपोरने वाला नौजवान है। |
| फितरती | चालबाज, मक्कार | गोपाल प्रसाद फितरती महाशय हैं। |
| तकल्लुफ | औपचारिकता, झिझक | आप क्या तकल्लुफ करते हैं! |
| बेढब | बेडौल, अनुपयुक्त | खूबसूरती का सवाल बेढब हो गया है। |
| मार्जन | मार्जिन, बचत का समय | मैं एक साल का मार्जन रखता हूँ। |
| रूलासापन | रोने की हालत, उदासी | शंकर के चेहरे पर रूलासापन था। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
प्रश्न 1: रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद बात-बात पर “एक हमारा जमाना था...” कहकर अपने समय की तुलना वर्तमान समय से करते हैं। इस प्रकार की तुलना करना कहाँ तक तर्कसंगत है?
यह तुलना पूरी तरह तर्कसंगत नहीं है। हर जमाने की अपनी परिस्थितियाँ, आवश्यकताएँ और मान्यताएँ होती हैं। पुराने जमाने में जो बातें उचित थीं, वे आज उतनी प्रासंगिक नहीं रह गई हैं। गोपाल प्रसाद पुराने जमाने में बिना खेल-कूद के भी बच्चों के स्वस्थ रहने की बात करता है, लेकिन वह यह भूल जाता है कि उसके बेटे शंकर की कमर झुकी हुई है और वह शारीरिक रूप से कमजोर है। पुराने जमाने की अंधी प्रशंसा करना और नए जमाने की हर बात की आलोचना करना उचित नहीं है। हर युग की अपनी अच्छाइयाँ और बुराइयाँ होती हैं।
प्रश्न 2: रामस्वरूप का अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलवाना और विवाह के लिए छिपाना, यह विरोधाभास उनकी किस विवशता को उजागर करता है?
यह विरोधाभास रामस्वरूप की सामाजिक दबाव और परंपराओं के आगे झुकने की विवशता को उजागर करता है। एक ओर वह एक आधुनिक पिता है, जो अपनी बेटी को बी.ए. तक पढ़ाता है, उसे सितार-हारमोनियम सिखाता है, पेंटिंग और सिलाई में निपुण बनाता है। दूसरी ओर, वह समाज की उस सोच से परिचित है जो अधिक पढ़ी-लिखी लड़कियों को पसंद नहीं करती। इसलिए वह बेटी की शिक्षा छिपाने को मजबूर है। वह अपने सिद्धांतों और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच फँसा हुआ है।
प्रश्न 3: अपनी बेटी का रिश्ता तय करने के लिए रामस्वरूप उमा से जिस प्रकार के व्यवहार की अपेक्षा कर रहे हैं, वह उचित क्यों नहीं है?
रामस्वरूप उमा से अपेक्षा करते हैं कि वह चुपचाप पान लेकर आए, झुकी नजरों से सबकी बातें सुने, उनके सवालों के जवाब दे और अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करे, पर अपनी शिक्षा के बारे में न बताए। वह चाहता है कि उमा एक वस्तु की तरह व्यवहार करे, जिसे खरीददार देख-परख सकें। यह व्यवहार उचित नहीं है क्योंकि उमा एक स्वतंत्र विचारों वाली, शिक्षित और प्रतिभाशाली लड़की है। उसका आत्म-सम्मान उसे चुप रहकर अपना मूल्यांकन करवाने की इजाजत नहीं देता। एक पिता को चाहिए कि वह बेटी की भावनाओं और आत्म-सम्मान का सम्मान करे।
प्रश्न 4: गोपाल प्रसाद विवाह को ‘बिजनेस’ मानते हैं और रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाते हैं। क्या आप मानते हैं कि दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं? अपने विचार लिखें।
हाँ, दोनों ही समान रूप से अपराधी हैं। गोपाल प्रसाद विवाह को 'बिजनेस' मानता है – वह लड़की को एक वस्तु की तरह परखता है, उसकी खूबसूरती, गाने-बजाने, सिलाई-कढ़ाई को देखता है, पर उसके व्यक्तित्व, उसकी शिक्षा और उसकी भावनाओं की कोई कीमत नहीं है। वह औरतों को शेरनी और मोरनी की तरह समझता है, जिनमें शेर और मोर के गुण नहीं होते। दूसरी ओर, रामस्वरूप अपनी बेटी की उच्च शिक्षा छिपाकर समाज के इसी दकियानूसी ढाँचे को मजबूत करता है। वह गोपाल प्रसाद के सामने झुकता है, उसकी हर बात से सहमति जताता है, और अपनी बेटी को भी झुकने को कहता है। दोनों ही मिलकर उमा के आत्म-सम्मान को ठेस पहुँचाते हैं और एक ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा देते हैं जहाँ लड़कियों की शिक्षा और उनकी असली पहचान को कोई महत्व नहीं दिया जाता।
प्रश्न 5: “...आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं...” उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की किन कमियों की ओर संकेत करना चाहती है?
उमा इस कथन के माध्यम से शंकर की चारित्रिक कमजोरियों की ओर संकेत करना चाहती है। 'रीढ़ की हड्डी' का अर्थ है साहस, हिम्मत, आत्म-सम्मान और नैतिक बल। उमा के अनुसार, शंकर में ये सभी गुण नहीं हैं। वह शारीरिक रूप से कमजोर है (उसकी कमर झुकी हुई है), और चारित्रिक रूप से भी कमजोर है – वह लड़कियों के हॉस्टल के आसपास झाँकता फिरता है, और पकड़े जाने पर नौकरानी के पैरों पड़कर भाग जाता है। उसमें अपने किए की जिम्मेदारी लेने की हिम्मत नहीं है। वह अपने पिता की बातों में हाँ-हूँ करने वाला, बिना किसी निजी राय वाला युवक है।
प्रश्न 6: शंकर जैसे लड़के या उमा जैसी लड़की – समाज को कैसे व्यक्तित्व की जरूरत है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
समाज को उमा जैसे व्यक्तित्व की जरूरत है, शंकर जैसे नहीं। उमा शिक्षित, प्रतिभाशाली, स्वाभिमानी और साहसी है। वह अपनी कीमत जानती है और गलत का सामना करने की हिम्मत रखती है। वह चुप रहकर अन्याय सहने के बजाय उसके खिलाफ आवाज उठाती है। शंकर, इसके विपरीत, शारीरिक और चारित्रिक रूप से कमजोर है। उसमें कोई आत्म-सम्मान नहीं, कोई नैतिक बल नहीं। वह पिता के सामने झुका रहता है, समाज के दबाव में जीता है। अगर समाज को प्रगति करनी है, तो उसे उमा जैसी शिक्षित, आत्म-निर्भर और साहसी युवतियों और युवकों की जरूरत है, न कि शंकर जैसे कमजोर और दिशाहीन व्यक्तियों की।
प्रश्न 7: ‘रीढ़ की हड्डी’ शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए।
यह शीर्षक अत्यंत सार्थक है। 'रीढ़ की हड्डी' का अर्थ है – आत्म-सम्मान, साहस, नैतिक बल, अपनी बात पर अड़े रहने की हिम्मत। इस एकांकी में दो तरह के पात्र हैं – एक ओर रामस्वरूप, गोपाल प्रसाद और शंकर हैं, जिनमें यह गुण नहीं है। वे समाज के दबाव में जीते हैं, झूठ बोलते हैं, पाखंड फैलाते हैं और अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की भावनाओं की परवाह नहीं करते। दूसरी ओर उमा है, जिसमें रीढ़ की हड्डी है। वह झूठ के सामने नहीं झुकती, वह अपनी शिक्षा को छिपाने से इनकार करती है, वह शंकर और गोपाल प्रसाद के पाखंड का पर्दाफाश करती है। वही इस एकांकी की सच्ची नायिका है। शीर्षक उसी के चरित्र की ओर संकेत करता है और उन लोगों पर व्यंग्य है, जिनमें रीढ़ की हड्डी नहीं है।
प्रश्न 8: कथावस्तु के आधार पर आप किसे एकांकी का मुख्य पात्र मानते हैं और क्यों?
कथावस्तु के आधार पर उमा को एकांकी का मुख्य पात्र माना जाना चाहिए। यद्यपि अधिकांश संवाद रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद के बीच होते हैं, पर कहानी का केंद्र उमा ही है। पूरी एकांकी उसी के चारों ओर घूमती है – उसकी शिक्षा, उसकी नाराजगी, उससे अपेक्षित व्यवहार, और अंत में उसका विद्रोह। उमा ही वह पात्र है जो एकांकी के संघर्ष और संदेश को अपने चरित्र के माध्यम से प्रस्तुत करती है। उसका संवाद सबसे महत्वपूर्ण है, जो एकांकी के शीर्षक को चरितार्थ करता है। वह चुप्पी तोड़कर न केवल अपने आत्म-सम्मान की रक्षा करती है, बल्कि समाज के पाखंड का पर्दाफाश भी करती है।
प्रश्न 9: एकांकी के आधार पर रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए।
रामस्वरूप: (1) दोहरे चरित्र वाला – बेटी को तो पढ़ाता है, पर लड़के वालों से उसकी शिक्षा छिपाता है। (2) चापलूस – गोपाल प्रसाद की हर बात से 'हैं-हैं' करके सहमति जताता है। (3) विवश – वह समाज के दबाव में है और बेटी की शादी के लिए झूठ बोलने को मजबूर है। (4) पुराने विचारों से प्रभावित – वह भी पुराने जमाने की तारीफ करता है।
गोपाल प्रसाद: (1) दकियानूसी – वह पुराने जमाने की तारीफ करता है और नए जमाने की आलोचना। (2) पाखंडी – वह बेटे की कमियों को नजरअंदाज करता है और लड़की से आदर्श गुणों की अपेक्षा करता है। (3) व्यापारिक सोच – वह शादी को बिजनेस समझता है और लड़की को वस्तु की तरह परखता है। (4) क्रोधी – जब उसे सच पता चलता है, तो वह बिना कुछ सुने ही चला जाता है।
प्रश्न 10: इस एकांकी का क्या उद्देश्य है? लिखिए।
इस एकांकी का मुख्य उद्देश्य समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक मानसिकता, दकियानूसी सोच और दोहरे मापदंडों पर करारा व्यंग्य करना है। यह एकांकी दिखाता है कि कैसे लोग बेटियों को शिक्षित तो करते हैं, पर उनकी शिक्षा को विवाह में बाधा मानते हैं। कैसे लड़कों की कमजोरियों को नजरअंदाज किया जाता है, जबकि लड़कियों से आदर्श गुणों की अपेक्षा की जाती है। एकांकी का उद्देश्य उमा जैसी आधुनिक, शिक्षित और स्वाभिमानी नारी के चरित्र को प्रस्तुत करके समाज को यह संदेश देना है कि लड़कियाँ भी इंसान हैं, उनके भी दिल होते हैं, उनकी भी भावनाएँ होती हैं, और उन्हें भी आत्म-सम्मान से जीने का अधिकार है।
प्रश्न 11: समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने हेतु आप कौन-कौन से प्रयास कर सकते हैं?
समाज में महिलाओं को उचित गरिमा दिलाने के लिए हम निम्नलिखित प्रयास कर सकते हैं – (1) शिक्षा का प्रचार-प्रसार करके लोगों को जागरूक करना कि लड़के और लड़कियाँ समान हैं। (2) अपने घर और आस-पड़ोस में लड़के-लड़की के बीच भेदभाव न करना और न होने देना। (3) महिलाओं के साथ होने वाले अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना। (4) महिला सशक्तिकरण से जुड़ी सरकारी योजनाओं और कानूनों के बारे में जानकारी फैलाना। (5) बाल विवाह, दहेज प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियों के खिलाफ अभियान चलाना। (6) महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें हर क्षेत्र में आगे बढ़ने का अवसर देना। (7) उमा जैसी स्वाभिमानी लड़कियों के चरित्र से प्रेरणा लेकर खुद भी आत्म-सम्मान से जीना और दूसरों को भी प्रेरित करना।
7. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय
- रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की पुराने जमाने की तुलना – तर्कसंगतता
- बेटी की उच्च शिक्षा दिलवाने और छिपाने का विरोधाभास
- उमा से अपेक्षित व्यवहार – उचित या अनुचित?
- विवाह को 'बिजनेस' मानने और शिक्षा छिपाने की प्रवृत्ति
- शंकर की कमियाँ – रीढ़ की हड्डी का अभाव
- उमा बनाम शंकर – समाज को कैसे व्यक्तित्व की जरूरत?
- शीर्षक 'रीढ़ की हड्डी' की सार्थकता
- एकांकी का मुख्य पात्र – उमा या रामस्वरूप?
- रामस्वरूप और गोपाल प्रसाद की चारित्रिक विशेषताएँ
- एकांकी का उद्देश्य – समाज पर व्यंग्य
- महिलाओं को गरिमा दिलाने के प्रयास
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- लेखक – आद्य प्रसाद "उन्मत्त" (1912-1990)
- विधा – एकांकी
- मुख्य पात्र – उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, गोपाल प्रसाद, शंकर, रतन
- केंद्रीय घटना – उमा के लिए वर देखने आए लोगों का प्रसंग
- उमा की शिक्षा – बी.ए. पास (छिपाई गई)
- शंकर की विशेषता – झुकी कमर, कायर, लड़कियों के हॉस्टल में झाँकने वाला
- गोपाल प्रसाद का तर्क – मोर के पंख, शेर की अयाल सिर्फ पुरुषों के लिए
- उमा का व्यंग्य – कुर्सी-मेज बिकती है, लड़कियाँ नहीं
- अंतिम दृश्य – उमा का रोना, रतन का मक्खन लेकर आना
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
“एक हमारा जमाना था... बारह घंटे की सिटिंग हो गई, बारह घंटे!”
“मोर के पंख होते हैं मोरनी के नहीं, शेर के बाल होते हैं शेरनी के नहीं।”
“जब कुर्सी-मेज बिकती है तो दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीददार को दिखा देता है।”
“आपके लाडले बेटे की रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं – यानी बैकबोन, बैकबोन!”
“बाबू जी, मक्खन...”
8. हब लिंक
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