इस जल प्रलय में (Is Jal Pralay Mein) – फणीश्वरनाथ रेणु (कृतिका) – बाढ़ का जीवंत संस्मरण | कक्षा 9 | GPN
📚 कक्षा: 9 | 📖 पुस्तक: कृतिका | ✍️ लेखक: फणीश्वरनाथ रेणु | 📝 प्रकार: रिपोर्ताज | ⭐⭐⭐ बहुत महत्वपूर्ण
📌 अनुक्रमणिका
- 1. लेखक परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. पात्र चित्रण
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न
- 7. दीर्घ प्रश्न
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. हब लिंक
1. लेखक परिचय
📝 फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय
फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री फणीश्वर ठाकुर था। वे हिंदी साहित्य में आंचलिक कथा साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर माने जाते हैं। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। सन् 1977 में उनका देहांत हो गया।
रेणु जी की रचनाओं में ग्रामीण जीवन और समस्याओं का सजीव चित्रण मिलता है। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं – 'मैला आँचल' (उपन्यास), 'परती परिकथा', 'जुलूस', 'दीर्घतपा', 'पहलवान की ढोलक' (कहानी संग्रह)। 'मैला आँचल' को हिंदी का पहला आंचलिक उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है। उनकी रचनाओं में अंचल की बोली, वहाँ की संस्कृति, रीति-रिवाज और सामाजिक विसंगतियाँ स्वाभाविक रूप से उभरकर आती हैं।
उन्हें उनकी साहित्यिक सेवाओं के लिए पद्मश्री (1970) से सम्मानित किया गया। 'मैला आँचल' पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।
📖 पाठ की पृष्ठभूमि
'इस जल प्रलय में' फणीश्वरनाथ रेणु द्वारा लिखित एक रिपोर्ताज है, जिसमें उन्होंने सन् 1975 में पटना में आई प्रलयंकारी बाढ़ का आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया है। इस पाठ में लेखक ने बाढ़ के दौरान समाज के विभिन्न वर्गों के व्यवहार, राहत प्रयासों की स्थिति और मानवीय संवेदनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। साथ ही, 1947 और 1949 की बाढ़ की घटनाओं का स्मरण करके वे बाढ़ से जुड़े अपने पुराने अनुभवों को भी पाठकों से साझा करते हैं।
🎯 पाठ का महत्व
बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से बाढ़ के समय लोगों की प्रतिक्रियाओं, लेखक की उत्सुकता, 'मृत्यु का तरल दूत' जैसे प्रतीकात्मक कथनों का अर्थ, आपदा प्रबंधन के उपाय, समाज की संवेदनहीनता, पान की दुकान पर बढ़ती बिक्री के कारण, लेखक द्वारा किए गए प्रबंध, बाढ़ से होने वाली बीमारियाँ, कुत्ते-मालिक के प्रेम प्रसंग और मीडिया की भूमिका पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
2. सरल सारांश
फणीश्वरनाथ रेणु का यह रिपोर्ताज 1975 में पटना में आई भीषण बाढ़ की आपबीती है। लेखक का गाँव बाढ़-प्रभावित क्षेत्र में था, जहाँ हर साल कोसी, पनार, महानंदा और गंगा की बाढ़ से पीड़ित लोग और पशु शरण लेते थे। लेखक ने बचपन से बाढ़-पीड़ितों की सेवा की थी, किंतु स्वयं कभी बाढ़ में नहीं फँसा था। सन् 1967 में पटना में अठारह घंटे लगातार वर्षा के कारण पुनपुन नदी का पानी राजेंद्रनगर, कंकड़बाग आदि क्षेत्रों में घुस गया। उस दिन लेखक ने शहर में बाढ़ को करीब से देखा और भोगा।
बाढ़ की खबर सुनते ही पूरे शहर में हड़कंप मच गया। लोग निचली मंजिलों से सामान ऊपर ले जाने लगे, दुकानदार अपना माल रिक्शा, टमटम, ट्रकों पर लादकर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने लगे। कुछ लोग घरों में ईंधन, मोमबत्ती, माचिस, पीने का पानी आदि जमा करने लगे। लेखक स्वयं भी यह देखने के लिए उत्सुक था कि बाढ़ का पानी कैसे बढ़ता है। वह अपने एक कवि मित्र के साथ रिक्शे पर सवार होकर बाढ़ का दृश्य देखने निकल पड़ा।
कॉफी हाउस के पास पानी तेजी से आता दिखा। लेखक ने उसे 'मृत्यु का तरल दूत' कहा। वहाँ से वे गांधी मैदान की ओर गए, जहाँ हज़ारों लोग बाढ़ का दृश्य देख रहे थे। वहाँ एक व्यक्ति ने व्यंग्य किया कि जब दानापुर डूब रहा था, तब पटना के लोग देखने भी नहीं गए, अब खुद की बारी आई तो समझ में आया। शाम को आकाशवाणी से समाचार आया कि पानी स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुँच गया है। यह सुनकर सभी चिंतित हुए, किंतु वातावरण में उतनी गंभीरता नहीं थी। लोग पान की दुकानों पर खड़े होकर बातें कर रहे थे, मानो कोई उत्सव हो। लेखक ने कुछ फिल्मी पत्रिकाएँ खरीदीं और घर लौट आया।
रात में घोषणा हुई कि पानी लोहानीपुर, कंकड़बाग और राजेंद्रनगर में घुस सकता है। लोग सतर्क हो गए। लेखक सोने की कोशिश कर रहा था, किंतु नींद नहीं आ रही थी। तभी उसे बाढ़ से जुड़ी पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। 1947 में मनिहारी में बाढ़ के समय लेखक अपने गुरु के साथ नाव पर राहत सामग्री लेकर गया था। वहाँ उसने देखा कि बाढ़ से बचे एक टीले पर चींटी-चींटे से लेकर साँप-बिच्छू और लोमड़ी-सियार तक सब शरण लिए हुए थे। 1949 में महानंदा की बाढ़ के समय एक बीमार नौजवान को नाव पर ले जाते समय उसका कुत्ता भी नाव पर चढ़ गया। डॉक्टर ने कुत्ते को भगाने को कहा तो नौजवान नाव से उतर गया और कुत्ता भी उसके पीछे कूद पड़ा। यह दृश्य मनुष्य और पशु के अटूट प्रेम का प्रतीक है। एक अन्य अवसर पर मुसहरी बस्ती में राहत बाँटने गए तो वहाँ बाढ़ के बीच भी 'बलवाही' नाच हो रहा था और लोग खिलखिला रहे थे।
1967 की बाढ़ में कुछ युवक-युवतियाँ नाव पर स्टोव, केतली, बिस्कुट लेकर जल-विहार करने निकले थे। राजेंद्रनगर के युवकों ने उनकी खिल्ली उड़ाई तो वे लज्जित होकर वापस लौट गए। उस रात ढाई बजे तक पानी नहीं आया। लेखक सोचता रहा कि शायद इंजीनियरों ने तटबंध ठीक कर दिया। सुबह साढ़े पाँच बजे उसे जगाया गया। सड़क पर झागदार पानी तेजी से बढ़ रहा था। लेखक छत पर दौड़ा गया। देखते ही देखते गोलंबर पार्क डूब गया, हरियाली समाप्त हो गई, चारों ओर पानी ही पानी नाच रहा था। लेखक के मन में कैमरे या टेप रिकॉर्डर से इस दृश्य को कैद करने की इच्छा हुई, किंतु उसके पास कुछ नहीं था। उसे लगा कि शायद अच्छा ही हुआ, कलम भी चोरी चली गई, वरना वह इस त्रासदी को लिखने में व्यस्त हो जाता और उसे सीधे अनुभव न कर पाता।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 प्रमुख बिंदु
- लेखक का गाँव बाढ़-प्रभावित क्षेत्र में था, जहाँ हर साल बाढ़-पीड़ित लोग और पशु शरण लेते थे।
- लेखक ने बचपन से बाढ़-पीड़ितों की सेवा की थी, किंतु स्वयं कभी बाढ़ में नहीं फँसा था।
- सन् 1967 में पटना में भीषण बाढ़ आई, जिसे लेखक ने प्रत्यक्ष अनुभव किया।
- बाढ़ की सूचना पर लोग सामान सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे और आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करने लगे।
- लेखक और उनके मित्र बाढ़ का दृश्य देखने निकले – कॉफी हाउस बंद, सड़क पर पानी, नियन विज्ञापनों की परछाइयाँ, गांधी मैदान पर भीड़।
- लेखक ने बाढ़ के पानी को 'मृत्यु का तरल दूत' कहा।
- आकाशवाणी की घोषणा – पानी स्टूडियो की सीढ़ियों तक पहुँच गया है।
- बाढ़ की गंभीर स्थिति में भी लोगों में उत्साह और बेफिक्री थी – पान की दुकानों पर भीड़, फिल्मी पत्रिकाओं की खरीद, ताश खेलने की तैयारी।
- रात में जनसंपर्क विभाग की गाड़ी से सतर्क रहने की घोषणा।
- 1947 की बाढ़ – मनिहारी में बाढ़ से बचे टीले पर जीव-जंतुओं का एक साथ शरण लेना।
- 1949 की बाढ़ – बीमार नौजवान और उसके कुत्ते की अटूट आत्मीयता।
- 1949 में ही मुसहरी बस्ती में बाढ़ के बीच 'बलवाही' नाच का आयोजन – मानवीय संवेदनाओं की अद्भुत तस्वीर।
- 1967 की बाढ़ में युवक-युवतियों का जल-विहार करना और स्थानीय लड़कों द्वारा उनकी खिल्ली उड़ाना।
- रात में पानी न आने पर लेखक की चिंता और प्रतीक्षा।
- सुबह पानी के आगमन का वर्णन – तेज धारा, बढ़ता जलस्तर, चारों ओर पानी का नृत्य।
- लेखक की कैमरे, टेप रिकॉर्डर की इच्छा और अंत में कथन – 'अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं – मेरे पास।'
📌 मूलभाव / Theme
इस रिपोर्ताज के माध्यम से फणीश्वरनाथ रेणु ने प्राकृतिक आपदा के समय मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक व्यवहारों का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया है। एक ओर जहाँ लोगों में भय, चिंता और सुरक्षा की भावना है, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों में उत्सुकता, बेफिक्री और आपदा को मनोरंजन की तरह देखने की प्रवृत्ति भी है। लेखक ने 1947, 1949 और 1967 की बाढ़ की घटनाओं के माध्यम से यह दिखाया है कि संकट के समय मनुष्य में परोपकार, आत्मीयता और सामूहिकता की भावना भी जागृत होती है, तो कहीं स्वार्थ और उदासीनता भी देखने को मिलती है। अंत में लेखक का कैमरे और कलम न होने का अफसोस इस बात को रेखांकित करता है कि कभी-कभी घटनाओं को शब्दों या चित्रों में कैद करने की चाह हमें उन्हें जीने के वास्तविक अनुभव से वंचित कर सकती है।
4. पात्र चित्रण
✍️ लेखक (फणीश्वरनाथ रेणु)
चारित्रिक विशेषताएँ:
- संवेदनशील: बाढ़-पीड़ितों की पीड़ा को समझता है और उनकी मदद के लिए हमेशा तत्पर रहता है। बचपन से ही राहत कार्यों में जुटा रहा।
- जिज्ञासु: बाढ़ के प्रति गहरी जिज्ञासा रखता है। वह प्रत्यक्ष रूप से देखना चाहता है कि बाढ़ कैसे आती है और लोगों पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है।
- भयभीत और साहसी: बाढ़ के पानी को देखकर वह डर जाता है और उसे 'मृत्यु का तरल दूत' कहता है। फिर भी वह बाढ़ का दृश्य देखने के लिए निकल पड़ता है।
- भावुक और संवेदनशील: 1947, 1949 की बाढ़ की घटनाएँ उसके हृदय में आज भी जीवित हैं। वह उन्हें याद करता है और उनसे प्रेरणा लेता है।
- व्यवहारिक: बाढ़ की संभावना को देखते हुए आवश्यक वस्तुओं का प्रबंध करता है – गैस, कोयला, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी, कंपोज की गोलियाँ आदि।
- लेखकीय चेतना: बाढ़ के दृश्य को अपने कैमरे या कलम से कैद करना चाहता है, किंतु बाद में उसे लगता है कि शायद अच्छा हुआ कि उसके पास कुछ नहीं था, वरना वह उस अनुभव को पूरी तरह न जी पाता।
👨 रिक्शावाला
वह साहसी और हँसमुख है। बाढ़ के तेज बहाव के बावजूद वह आगे बढ़ना चाहता है। वह लेखक को आगे चलने का उत्साह देता है।
👤 आम आदमी (भीड़ में से एक)
वह दानापुर और पटना के लोगों की तुलना करते हुए पटना के लोगों की स्वार्थपरता और संवेदनहीनता पर व्यंग्य करता है। उसके इस कथन के माध्यम से लेखक ने समाज की कुंठित मानसिकता पर चोट की है।
🩺 डॉक्टर (1949 की बाढ़ के प्रसंग में)
वह कुत्ते से डरता है और उसे नाव से उतारने का आदेश देता है। उसका यह व्यवहार मनुष्य और पशु के बीच की दूरी को दर्शाता है।
🐶 कुत्ता (1949 की बाढ़ के प्रसंग में)
अपने मालिक के प्रति अगाध प्रेम और स्वामिभक्ति का प्रतीक है। वह बिना किसी हिचक के अपने बीमार मालिक के पीछे पानी में कूद जाता है।
👬 बीमार नौजवान (1949 की बाढ़ के प्रसंग में)
अपने कुत्ते के प्रति असीम प्रेम रखता है। डॉक्टर के कुत्ते को भगाने के आदेश पर वह नाव से उतर जाता है, यह दर्शाता है कि उसके लिए उसके पशु का साथ उसकी जान से भी अधिक महत्वपूर्ण है।
👨🦱 नटुआ (1949 की बाढ़ के प्रसंग में)
वह बाढ़ के बीच भी 'बलवाही' नाच का आयोजन करता है और लोगों के चेहरे पर हँसी लाता है। वह मानवीय संवेदनाओं और जीवटता का प्रतीक है।
🧑🤝🧑 युवक-युवतियाँ (1967 की बाढ़ के प्रसंग में)
वे बाढ़ को एक अवसर की तरह देखते हैं और जल-विहार का आनंद लेना चाहते हैं। उनका यह व्यवहार आपदा के प्रति उनकी बेफिक्री और संवेदनहीनता को दर्शाता है।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| परती | वह जमीन जो जोती-बोई न जाती हो, बंजर भूमि | सावन-भादों में परती जमीन पर हजारों पशु चरते दिखते थे। |
| प्लावित | जिस पर बाढ़ का पानी चढ़ आया हो, डूबा हुआ | भारी वर्षा के कारण राजभवन भी प्लावित हो गया। |
| अनवरत | निरंतर, लगातार | अठारह घंटे की अनवरत वर्षा ने शहर को जलमग्न कर दिया। |
| स्वगतोक्ति | अपने आप में कुछ बोलना, एकालाप | लेखक की स्वगतोक्ति से उसके मन की व्यथा प्रकट होती है। |
| आसन्न | पास आया हुआ, निकट | आसन्न संकट के बावजूद लोगों में कोई घबराहट नहीं थी। |
| बुजदिल | डरपोक, कायर | लेखक स्वयं को बुजदिल कहता है, पर उसके कर्म साहसी हैं। |
| प्रलय | विनाश, कयामत | प्रलयकारी बाढ़ ने सब कुछ तहस-नहस कर दिया था। |
| पकाही घाव | पानी में पैर की उँगलियाँ सड़ने से होने वाला घाव | बाढ़ के समय पकाही घाव एक आम समस्या बन जाती है। |
| बलवाही नाच | एक प्रकार का लोक नृत्य | मुसहरी बस्ती में बाढ़ के बीच भी बलवाही नाच का आयोजन हुआ। |
| फूहड़ | अश्लील, बेढंगा | युवकों के फूहड़ व्यवहार ने युवतियों को लज्जित कर दिया। |
| कयामती | प्रलयकारी, भयंकर | दिल्ली में कयामती बारिश के बाद सब ठप्प हो गया। |
| इसरार | आग्रह, जिद | लेखक ने बिशप के सामने स्कूल खोलने का इसरार जारी रखा। |
| मुहर्रमी | शोकाकुल, दुखी | पानवाले के आईने में लेखक की सूरत मुहर्रमी नजर आ रही थी। |
| खिलखिलाहट | खुलकर हँसी | भूखे-प्यासे लोगों के बीच खिलखिलाहट लहरें लेने लगी। |
| ट्रांजिस्टर | छोटा रेडियो | नाव पर ट्रांजिस्टर पर फिल्मी गाना बज रहा था। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
प्रश्न 1: बाढ़ की खबर सुनकर लोग किस तरह की तैयारी करने लगे?
बाढ़ की खबर सुनकर लोग परेशान हो उठे और अपनी सुरक्षा के प्रबंध करने लगे। वे नीचे की मंजिलों से सामान ऊपर पहुँचाने लगे। दुकानदार रिक्शा, टमटम, ट्रक, टेम्पो आदि में सामान लादकर उसे सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगे। कई लोग घरों में ईंधन, आलू, मोमबत्ती, दियासलाई, पीने का पानी और कंपोज की गोलियाँ जैसी आवश्यक चीजें एकत्र करने लगे ताकि बाढ़ से घिर जाने पर कुछ दिनों तक उनका गुजारा चल सके।
प्रश्न 2: बाढ़ की सही जानकारी लेने और बाढ़ का रूप देखने के लिए लेखक क्यों उत्सुक था?
लेखक उस क्षेत्र का रहने वाला था जहाँ बाढ़ ग्रस्त लोग शरण लेते थे। वह बचपन से बाढ़ पीड़ितों की मदद करता आ रहा था और उसने बाढ़ पर लेख भी लिखे थे, लेकिन उसने स्वयं कभी बाढ़ को भोगा नहीं था। सन् 1967 में पटना में आई बाढ़ ने उसे प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव करने का अवसर दिया कि बाढ़ कैसे आती है, कैसे बढ़ती है और लोग कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। वह इस अनुभव को अपनी आँखों से देखना और समझना चाहता था।
प्रश्न 3: सबकी जुबान पर एक ही जिज्ञासा-‘पानी कहाँ तक आ गया है?’-इस कथन से जनसमूह की कौन-सी भावनाएँ व्यक्त होती हैं?
इस कथन से जनसमूह की उत्सुकता, कौतुहल, भय, सुरक्षा की भावना और आश्चर्य जैसी कई भावनाएँ व्यक्त होती हैं। लोग बाढ़ की वास्तविक स्थिति जानना चाहते हैं कि पानी कहाँ तक पहुँच गया है, उनके इलाके में कब तक पहुँचेगा और उन्हें कितना सतर्क रहने की आवश्यकता है। यह जिज्ञासा जीवन-मृत्यु के खेल को देखने के मोह को भी दर्शाती है।
प्रश्न 4: ‘मृत्यु का तरल दूत’ किसे कहा गया है और क्यों?
‘मृत्यु का तरल दूत’ बाढ़ के उस पानी को कहा गया है जो गेरुआ-झाग-फेन वाली मोटी डोरी की शक्ल में निरंतर बढ़ता आ रहा था। इसे ‘मृत्यु का तरल दूत’ इसलिए कहा गया क्योंकि बाढ़ का पानी अपने साथ विनाश का संदेश लाता है। यह फसलों, जानवरों, मकानों और न जाने कितनी जिंदगियों को निगल जाता है। यह लोगों के मन में भय उत्पन्न करता है और मृत्यु का प्रतीक बनकर आता है।
प्रश्न 5: आपदाओं से निपटने के लिए अपनी तरफ़ से कुछ सुझाव दीजिए।
आपदाओं से निपटने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिए – (1) सरकार को एक सशक्त आपदा प्रबंधन तंत्र विकसित करना चाहिए और आवश्यक उपकरणों का उचित रख-रखाव होना चाहिए। (2) नदी-नालों के किनारे तटबंध बनाने चाहिए और नालों की नियमित सफाई होनी चाहिए। (3) लोगों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि संकट के समय वे सूझ-बूझ और धैर्य से काम ले सकें। (4) स्वयंसेवी संस्थाओं को सरकार के साथ मिलकर राहत कार्यों में बढ़-चढ़कर भाग लेना चाहिए। (5) लोगों में परस्पर सहयोग और संवेदनशीलता की भावना जागृत करनी चाहिए।
प्रश्न 6: ‘ईह! जब दानापुर डूब रहा था तो पटनियाँ बाबू लोग उलटकर देखने भी नहीं गए...अब बूझो!’-इस कथन द्वारा लोगों की किस मानसिकता पर चोट की गई है?
इस कथन द्वारा लोगों की स्वार्थपरता, संवेदनहीनता, संकुचित क्षेत्रीय मानसिकता और आत्मकेंद्रियता पर चोट की गई है। जब दानापुर बाढ़ से पीड़ित था, तब पटना के लोगों ने उनकी सहायता नहीं की थी, बल्कि उनकी पीड़ा को देखने या समझने की भी जहमत नहीं उठाई। अब जब खुद पटना पर संकट आया है, तो लोगों को अपनी पीड़ा का अहसास हो रहा है। यह टिप्पणी मानवीय संवेदनाओं की कमी और दूसरों के दुख के प्रति उदासीनता पर तीखा व्यंग्य है।
प्रश्न 7: खरीद-बिक्री बंद हो चुकने पर भी पान की बिक्री अचानक क्यों बढ़ गई थी?
खरीद-बिक्री बंद होने पर भी पान की बिक्री अचानक बढ़ गई थी क्योंकि बाढ़ की खबर सुनकर लोगों में बेचैनी और हलचल बढ़ गई थी। हालाँकि उन्होंने अन्य सामान खरीदना बंद कर दिया था, पर वे बाढ़ के बारे में जानने के लिए अत्यंत उत्सुक थे। पान की दुकान के पास खड़े होकर वे बाढ़ को लेकर तरह-तरह की बातें कर रहे थे और पान खा रहे थे। उनके लिए पान समय गुजारने का साधन बन गया था।
प्रश्न 8: जब लेखक को यह अहसास हुआ कि उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है तो उसने क्या-क्या प्रबंध किए?
जब लेखक को यह अहसास हुआ कि उसके इलाके में भी पानी घुसने की संभावना है, तो उसने सबसे पहले गैस के विषय में अपनी पत्नी से पूछा। गैस की कमी जानकर उसने कोयला और केरोसिन का प्रबंध किया। उसने आलू, मोमबत्ती, माचिस, पीने का पानी, कंपोज की गोलियाँ आदि एकत्रित कर लीं। इसके अलावा, उसने एक सप्ताह तक पढ़ने के लिए हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी की फिल्मी पत्रिकाएँ भी खरीद लीं, ताकि बाढ़ के समय अपना समय व्यतीत कर सके।
प्रश्न 9: बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में कौन-कौन सी बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है?
बाढ़ पीड़ित क्षेत्रों में कई प्रकार की बीमारियों के फैलने की आशंका रहती है। गंदे और सड़े हुए पानी के कारण ‘पकाही घाव’ हो जाता है, जिसमें पैर की उँगलियाँ सड़ जाती हैं और तलवों में घाव हो जाते हैं। इसके अलावा, मलेरिया, डेंगू, टाइफाइड, उल्टी-दस्त, अतिसार और हैजा जैसी बीमारियाँ फैलने का खतरा रहता है, क्योंकि बाढ़ के पानी में मच्छर अत्यधिक मात्रा में पनपते हैं।
प्रश्न 10: नौजवान के पानी में उतरते ही कुत्ता भी पानी में कूद गया। दोनों ने किन भावनाओं के वशीभूत होकर ऐसा किया?
नौजवान और कुत्ता दोनों ने आत्मीयता, गहरे प्रेम और सच्ची मित्रता की भावना के वशीभूत होकर ऐसा किया। नौजवान डॉक्टर के आदेश पर कुत्ते को नाव से उतारे जाने से बचाने के लिए स्वयं पानी में उतर गया। उसके लिए उसके सच्चे साथी का साथ उसकी जान से भी अधिक महत्वपूर्ण था। दूसरी ओर, कुत्ते ने अपने मालिक के प्रति स्वामिभक्ति और अगाध प्रेम के कारण उसका पीछा किया। उनके बीच पशु और मनुष्य का कोई भेदभाव नहीं था।
प्रश्न 11: ‘अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं-मेरे पास।’-मूवी कैमरा, टेप रिकॉर्डर आदि की तीव्र उत्कंठा होते हुए भी लेखक ने अंत में उपर्युक्त कथन क्यों कहा?
लेखक ने यह कथन इसलिए कहा क्योंकि उसे लगा कि यदि उसके पास कैमरा या टेप रिकॉर्डर होता, तो वह बाढ़ के दृश्य को कैद करने में व्यस्त हो जाता और उस भयानक त्रासदी को पूरी तरह से जी नहीं पाता, उसे आत्मसात नहीं कर पाता। उसकी कलम भी चोरी चली गई थी, इसलिए वह लिख भी नहीं सकता था। शायद यही अच्छा हुआ, क्योंकि अब वह बिना किसी माध्यम के इस अनुभव को सीधे और गहराई से महसूस कर सका।
प्रश्न 12: आपने भी देखा होगा कि मीडिया द्वारा प्रस्तुत की गई घटनाएँ कई बार समस्याएँ बन जाती हैं, ऐसी किसी घटना का उल्लेख कीजिए।
यह प्रश्न व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। छात्र अपने आस-पास की किसी घटना का उल्लेख कर सकते हैं। उदाहरण के लिए – कुछ वर्ष पूर्व एक समाचार चैनल ने एक प्रसिद्ध अभिनेता के निधन की झूठी खबर प्रसारित कर दी, जिससे उनके प्रशंसकों और परिवार में अफरा-तफरी मच गई। बाद में पता चला कि वह खबर झूठी थी। इस तरह मीडिया द्वारा बिना पुष्टि के प्रसारित की गई खबरों से अनावश्यक समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं।
प्रश्न 13: अपनी देखी-सुनी किसी आपदा का वर्णन कीजिए।
यह प्रश्न व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित है। छात्र अपने आस-पास की किसी बाढ़, भूकंप, चक्रवात या अन्य आपदा का वर्णन कर सकते हैं। उदाहरण के लिए – पिछले वर्ष हमारे शहर में भीषण बाढ़ आई थी। लगातार तीन दिनों की मूसलाधार बारिश के कारण नदी का जलस्तर बढ़ गया और बाढ़ का पानी शहर के निचले इलाकों में घुस गया। लोग अपने घरों की छतों पर चढ़ गए। बिजली गुल हो गई। खाने-पीने की चीजों की किल्लत हो गई। राहत टीमों ने नावों के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया। कई दिनों बाद पानी घटा, लेकिन उसके पीछे गाद, बीमारियाँ और तबाही का लंबा सिलसिला छूट गया।
7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (4-5 अंक)
प्रश्न 14: पाठ के आधार पर बताइए कि लेखक ने बाढ़ से जुड़ी किन-किन पुरानी यादों को ताज़ा किया है और उनका क्या महत्व है?
लेखक ने बाढ़ से जुड़ी तीन महत्वपूर्ण पुरानी घटनाओं को याद किया है – 1947, 1949 और 1967 की बाढ़ की।
1947 की बाढ़ (मनिहारी): लेखक अपने गुरु सतीनाथ भादुड़ी के साथ नाव पर राहत सामग्री लेकर गया था। उसने देखा कि बाढ़ से बचे एक टीले पर चींटी-चींटे से लेकर साँप-बिच्छू और लोमड़ी-सियार तक सभी जीव एक साथ शरण लिए हुए थे। यह दृश्य संकट के समय जीवों में भी आत्मरक्षा की प्रवृत्ति और एकजुटता को दर्शाता है।
1949 की बाढ़ (महानंदा): पहली घटना में एक बीमार नौजवान और उसके कुत्ते की अटूट आत्मीयता देखने को मिली। डॉक्टर ने कुत्ते को नाव से उतारने को कहा तो नौजवान पानी में उतर गया और कुत्ता भी उसके पीछे कूद पड़ा। यह मनुष्य और पशु के अटूट प्रेम और सच्ची मित्रता का प्रतीक है। दूसरी घटना मुसहरी बस्ती की थी, जहाँ भूखे-प्यासे लोग बाढ़ के बीच 'बलवाही' नाच का आयोजन कर खिलखिला रहे थे। यह दृश्य मानवीय संवेदनाओं और जीवटता का प्रतीक है, यह दर्शाता है कि दुख के बीच भी खुशी के क्षण जीने की ताकत मनुष्य में होती है।
1967 की बाढ़ (पुनपुन): इस बाढ़ के दौरान कुछ युवक-युवतियाँ नाव पर स्टोव, केतली, बिस्कुट लेकर जल-विहार करने निकले थे। राजेंद्रनगर के लड़कों ने उनकी खिल्ली उड़ाई। यह घटना बाढ़ जैसी आपदा को भी मनोरंजन का अवसर बना लेने वाली संवेदनहीनता को दर्शाती है।
इन सभी यादों का महत्व यह है कि ये लेखक को बाढ़ के विभिन्न आयामों – विनाश, संवेदना, प्रेम, सामूहिकता, जीवटता और संवेदनहीनता – को समझने में मदद करती हैं।
प्रश्न 15: पटना की बाढ़ में पिकनिक मनाने आए युवक-युवतियों के साथ कैसा बर्ताव हुआ और क्यों? इस घटना के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है?
सन् 1967 में पटना में भीषण बाढ़ आई थी और पुनपुन का पानी राजेंद्रनगर में घुस गया था। इस भयावह स्थिति में कुछ मनचले युवक-युवतियों की टोली सज-धज कर नाव पर सवार होकर जल-विहार करने निकली। नाव पर स्टोव जल रहा था, केतली चढ़ी थी, बिस्कुट के डिब्बे खुले थे, एक युवती नेस्कैफे बना रही थी, दूसरी रंगीन पत्रिका पढ़ रही थी और एक युवक डायलॉग बोल रहा था। ट्रांजिस्टर पर फिल्मी गाना बज रहा था – 'हवा में उड़ता जाए, मेरा लाल दुपट्टा मलमल का'।
जैसे ही उनकी नाव गोलंबर पहुँची, चारों ब्लॉकों की छतों पर खड़े लड़कों ने उन पर किलकारियों, सीटियों और फब्तियों की बौछार कर दी। गोलंबर में किसी भी आवाज़ की प्रतिध्वनि गूँजती है, इसलिए यह शोर और भी भयानक हो गया। युवक-युवतियाँ लज्जित होकर तुरंत वहाँ से चले गए। उनके लाल होंठ और गाल काले पड़ गए।
इस घटना के माध्यम से लेखक कई संदेश देना चाहता है – (1) आपदा के समय मनोरंजन और बेफिक्री अनुचित है, इससे पीड़ितों की भावनाओं को ठेस पहुँचती है। (2) समाज में आपदा को लेकर गंभीरता की कमी है, कुछ लोग इसे तमाशा समझते हैं। (3) राजेंद्रनगर के लड़कों के व्यवहार से पता चलता है कि आम जनता भी बाढ़ की भयावहता को समझती है और ऐसे बेफिक्र लोगों को पसंद नहीं करती। (4) यह घटना बाढ़ की त्रासदी के बीच मानवीय संवेदनाओं की विडंबना को उजागर करती है।
8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय
- बाढ़ की सूचना पर लोगों की प्रतिक्रियाएँ और तैयारियाँ
- लेखक की बाढ़ देखने की उत्सुकता के कारण
- ‘मृत्यु का तरल दूत’ किसे और क्यों कहा गया है?
- आपदा प्रबंधन के उपाय और सुझाव
- दानापुर और पटना के संदर्भ में व्यंग्य का आशय
- बाढ़ के बावजूद पान की दुकान पर बढ़ती बिक्री के कारण
- लेखक द्वारा बाढ़ के लिए किए गए प्रबंध
- बाढ़ में फैलने वाली बीमारियाँ
- 1947, 1949 और 1967 की बाढ़ की घटनाओं का वर्णन
- बीमार नौजवान और कुत्ते की आत्मीयता
- युवक-युवतियों के जल-विहार की घटना और उसका महत्व
- अंतिम कथन 'अच्छा है, कुछ भी नहीं' का आशय
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- लेखक – फणीश्वरनाथ रेणु (जन्म 1921, निधन 1977)
- विधा – रिपोर्ताज (आँखों देखा हाल)
- मुख्य घटना वर्ष – 1975 (पटना की बाढ़)
- अन्य वर्ष – 1947 (मनिहारी), 1949 (महानंदा), 1967 (पुनपुन)
- प्रमुख स्थान – पटना, राजेंद्रनगर, गांधी मैदान, कॉफी हाउस, गोलंबर
- पत्रिका – 'मैगजीन कॉर्नर' से फिल्मी पत्रिकाएँ खरीदना
- प्रतीक – 'मृत्यु का तरल दूत' (बाढ़ का पानी)
- मुख्य बीमारी – पकाही घाव, मलेरिया, टाइफाइड
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
“आतंक के मारे मेरे दोनों हाथ बरबस जुड़ गए और सभय प्रणाम-निवेदन में मेरे मुँह से कुछ अंकुटा शब्द निकले।”
“वो देखिए-आ रहा है...मृत्यु का तरल दूत!”
“हमारा कुकुर नहीं जाएगा तो हम हुँ नहीं जाएगा।”
“एक लोटे से पानी पीकर हम माँ-बेटे हुए। अब बेटा, चाहे तो तू चोरी कर, चाहे खेती।”
“अच्छा है, कुछ भी नहीं। कलम थी, वह भी चोरी चली गई। अच्छा है, कुछ भी नहीं – मेरे पास।”
9. हब लिंक
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