कक्षा 10 – आत्मत्राण – रवींद्रनाथ ठाकुर (स्पर्श) – ईश्वर से शक्ति और साहस माँगने की प्रार्थनामय काव्य भावना | GPN
📘 पाठ – आत्मत्राण | कक्षा 10 हिंदी (स्पर्श) | GPN
📚 कक्षा: 10 | 📖 पुस्तक: स्पर्श भाग 2 | ✍️ कवि: रवींद्रनाथ ठाकुर | 📝 प्रकार: प्रार्थना गीत | ⭐⭐⭐ महत्वपूर्ण
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. पद्यांश व्याख्या
- 4. शब्दार्थ
- 5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)
- 6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)
- 7. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 9. हब लिंक
1. परिचय
📝 कवि परिचय
रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941): जन्म: 7 मई 1861, कोलकाता। निधन: 7 अगस्त 1941। वे बांग्ला साहित्य के महानतम कवि, लेखक, दार्शनिक और चित्रकार थे। उन्हें उनकी कविता संग्रह 'गीतांजलि' के लिए 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। यह पुरस्कार पाने वाले वे पहले एशियाई थे। प्रमुख रचनाएँ: 'गीतांजलि', 'गोरा', 'घरे बाइरे', 'योगायोग' (उपन्यास); 'बालाक', 'सोनार तरी', 'चित्रा' (काव्य); 'डाकघर', 'राजा' (नाटक)। भारत के राष्ट्रगान 'जन गण मन' और बांग्लादेश के राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' उन्हीं की रचनाएँ हैं।
📖 पाठ की पृष्ठभूमि
'आत्मत्राण' कविता रवींद्रनाथ ठाकुर की विख्यात कृति 'गीतांजलि' से ली गई है। यह एक प्रार्थना गीत है जिसमें कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे कष्टों से मुक्ति न दे, बल्कि कष्टों का सामना करने की शक्ति दे। वह दुखों के निवारण की नहीं, बल्कि उन्हें सहने की शक्ति माँगता है। यह कविता मानव के आत्मविश्वास, साहस और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास को दर्शाती है।
🎯 पाठ का महत्व
बोर्ड परीक्षा में इस पाठ से कवि परिचय, प्रार्थना की भावना, साहस और आत्मविश्वास का संदेश, पद्यांशों की व्याख्या, और कवि की भाषा शैली पर प्रश्न पूछे जाते हैं।
2. सरल सारांश
यह कविता एक प्रार्थना गीत है। कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे दुखों से मुक्ति न दे, बल्कि दुखों को सहने की शक्ति दे। वह यह नहीं माँगता कि संकट टल जाएँ, बल्कि यह माँगता है कि संकटों का सामना करने का साहस दे। वह यह नहीं चाहता कि उसकी रक्षा हो, बल्कि यह चाहता है कि उसमें आत्मविश्वास हो। कवि कहता है कि उसे ऐसी शक्ति चाहिए जो उसे हर परिस्थिति में डटे रहने का बल दे। यह कविता मनुष्य के अटूट साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है।
3. पद्यांश व्याख्या
📌 पद्यांश 1
पद्यांश: हे परम दयालु, मुझको इतना बल दे कि मैं
विषम वेदना से विचलित न होऊँ कभी।
व्याख्या: कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे इतना बल दे कि वह कठिन से कठिन पीड़ा में भी विचलित न हो। वह यह नहीं माँगता कि पीड़ा दूर हो जाए, बल्कि यह माँगता है कि उसे सहने की शक्ति मिले। यह कविता की केंद्रीय भावना है - कष्टों से मुक्ति नहीं, कष्ट सहने की शक्ति।
📌 पद्यांश 2
पद्यांश: दुख को दूर करने का वरदान नहीं माँगता,
दुख सहने की शक्ति चाहता हूँ ईश्वर।
व्याख्या: कवि स्पष्ट करता है कि वह ईश्वर से दुखों को दूर करने का वरदान नहीं माँगता। वह तो यह चाहता है कि उसे दुखों को सहने की शक्ति मिले। यह एक गहन दार्शनिक भाव है - दुख तो जीवन का अभिन्न अंग हैं, उनसे भागना नहीं है, बल्कि उनका सामना करना है।
📌 पद्यांश 3
पद्यांश: मैं संकट-काल में रक्षा नहीं चाहता,
संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता हूँ।
व्याख्या: कवि कहता है कि वह संकट के समय में किसी रक्षा की याचना नहीं करता। वह तो संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता है। यह आत्मविश्वास और साहस की पराकाष्ठा है। वह नहीं चाहता कि कोई उसे बचाए, बल्कि वह स्वयं संकटों से लड़ना चाहता है।
📌 पद्यांश 4
पद्यांश: मैं यह नहीं माँगता कि मेरी पुकार सुनकर,
मेरे आँसू पोंछ दिए जाएँ किसी के कर से।
व्याख्या: कवि कहता है कि वह यह नहीं माँगता कि उसकी पुकार सुनकर कोई उसके आँसू पोंछ दे। वह स्वयं अपने आँसू पोंछने का साहस चाहता है। यह आत्मनिर्भरता की भावना को दर्शाता है।
📌 पद्यांश 5
पद्यांश: मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं,
निज दुख से न होऊँ कभी नत-शिर।
व्याख्या: कवि अंत में यह वरदान माँगता है कि वह अपने दुखों से कभी नतमस्तक (हारा हुआ) न हो। चाहे कितने भी दुख आएँ, उसका सिर झुकना नहीं चाहिए। यह अटूट आत्मविश्वास और साहस का प्रतीक है।
4. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आत्मत्राण | आत्मा को शक्ति देने की प्रार्थना |
| विषम | कठिन, विकट |
| वेदना | पीड़ा, दर्द |
| विचलित | डगमग, विचलित |
| वरदान | आशीर्वाद, देन |
| संकट-काल | मुसीबत का समय |
| विजय | जीत |
| साहस | हिम्मत |
| नत-शिर | झुका हुआ सिर, हारा हुआ |
| दयालु | कृपालु, दया करने वाला |
| परम | सर्वोच्च |
| प्रार्थना | विनती, याचना |
| आत्मविश्वास | आत्मा पर विश्वास |
| धैर्य | सब्र, संयम |
| सामर्थ्य | क्षमता, ताकत |
5. लघु उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 2 अंक)
प्रश्न 1. 'आत्मत्राण' कविता के कवि कौन हैं? [2020]
'आत्मत्राण' कविता के कवि रवींद्रनाथ ठाकुर हैं, जिन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।
प्रश्न 2. रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म और निधन कब हुआ था? [2019]
रवींद्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था और निधन 7 अगस्त 1941 को हुआ था।
प्रश्न 3. रवींद्रनाथ ठाकुर को किस रचना के लिए नोबेल पुरस्कार मिला? [2021]
रवींद्रनाथ ठाकुर को उनकी प्रसिद्ध कृति 'गीतांजलि' के लिए 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था।
प्रश्न 4. रवींद्रनाथ ठाकुर की प्रमुख रचनाओं के नाम लिखिए। [2018]
उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं - 'गीतांजलि', 'गोरा', 'घरे बाइरे', 'बालाक', 'सोनार तरी', 'चित्रा', 'डाकघर', 'राजा' आदि।
प्रश्न 5. कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना करता है? [2020]
कवि ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वह उसे दुख सहने की शक्ति दे, संकटों पर विजय पाने का साहस दे, न कि दुखों से मुक्ति दे।
प्रश्न 6. कवि क्या वरदान नहीं माँगता? [2019]
कवि दुखों को दूर करने का वरदान नहीं माँगता। वह दुख सहने की शक्ति माँगता है।
प्रश्न 7. 'संकटों पर विजय पाने का साहस' से कवि का क्या आशय है? [2021]
इससे कवि का आशय है कि वह संकटों से बचना नहीं चाहता, बल्कि उनका सामना करना और उन्हें हराना चाहता है।
प्रश्न 8. 'नत-शिर' शब्द का क्या अर्थ है? [2018]
'नत-शिर' का अर्थ है - झुका हुआ सिर। यह हार और पराजय का प्रतीक है।
प्रश्न 9. कवि अपने आँसुओं के बारे में क्या कहता है? [2020]
कवि कहता है कि वह यह नहीं माँगता कि कोई उसके आँसू पोंछ दे, बल्कि वह स्वयं अपने आँसू पोंछने का साहस चाहता है।
प्रश्न 10. 'आत्मत्राण' शीर्षक का क्या अर्थ है? [2019]
'आत्मत्राण' का अर्थ है - आत्मा को शक्ति देने की प्रार्थना। यह स्वयं को मजबूत बनाने की प्रार्थना है।
6. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 प्रश्न, 4-5 अंक)
प्रश्न 1. 'आत्मत्राण' कविता में कवि की क्या प्रार्थना है? [2020]
रवींद्रनाथ ठाकुर की 'आत्मत्राण' कविता में कवि की प्रार्थना बहुत ही अनूठी है:
1. दुख सहने की शक्ति: कवि ईश्वर से यह नहीं माँगता कि उसके दुख दूर हो जाएँ। वह तो दुखों को सहने की शक्ति माँगता है। वह कहता है - 'दुख को दूर करने का वरदान नहीं माँगता, दुख सहने की शक्ति चाहता हूँ।'
2. विचलित न होने का बल: कवि प्रार्थना करता है कि उसे इतना बल मिले कि वह कठिन से कठिन वेदना में भी विचलित न हो। 'हे परम दयालु, मुझको इतना बल दे कि मैं विषम वेदना से विचलित न होऊँ कभी।'
3. संकटों पर विजय का साहस: वह संकट-काल में रक्षा नहीं चाहता, बल्कि संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता है। वह स्वयं संकटों से लड़ना चाहता है।
4. आत्मनिर्भरता: कवि यह नहीं चाहता कि कोई उसके आँसू पोंछे। वह स्वयं अपने आँसू पोंछने की शक्ति चाहता है।
5. अविचलित रहने का वरदान: अंत में कवि यह वरदान माँगता है कि वह अपने दुखों से कभी नत-शिर (हारा हुआ) न हो।
इस प्रकार, कवि की प्रार्थना दुखों से मुक्ति की नहीं, बल्कि दुखों का सामना करने की शक्ति की है।
प्रश्न 2. 'दुख को दूर करने का वरदान नहीं माँगता, दुख सहने की शक्ति चाहता हूँ' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [2019]
यह पंक्ति कविता की केंद्रीय भावना को व्यक्त करती है:
1. शाब्दिक अर्थ: कवि कहता है कि वह ईश्वर से दुखों को दूर करने का वरदान नहीं माँगता, बल्कि दुखों को सहने की शक्ति चाहता है।
2. दुख जीवन का अभिन्न अंग: कवि मानता है कि दुख जीवन का अभिन्न अंग है। उनसे भागना संभव नहीं। इसलिए वह दुखों के निवारण की नहीं, उन्हें सहने की शक्ति माँगता है।
3. साहस और धैर्य की प्रार्थना: यह पंक्ति साहस और धैर्य की प्रार्थना है। कवि चाहता है कि उसमें इतना धैर्य हो कि वह हर कठिनाई को सह सके।
4. आत्मविश्वास का प्रतीक: यह आत्मविश्वास का प्रतीक है। कवि को विश्वास है कि यदि उसमें सहने की शक्ति होगी, तो वह हर कठिनाई को पार कर लेगा।
5. गहन दार्शनिकता: इस पंक्ति में गहन दार्शनिकता है। यह बताती है कि सच्ची शक्ति दुखों को टालने में नहीं, उन्हें सहने में है।
6. जीवन का यथार्थ: यह पंक्ति जीवन के यथार्थ को स्वीकार करती है। जीवन में सुख-दुख का चक्र चलता रहता है। इससे भागा नहीं जा सकता।
इस प्रकार, यह पंक्ति गहन दार्शनिक अर्थ रखती है।
प्रश्न 3. 'मैं संकट-काल में रक्षा नहीं चाहता, संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता हूँ' - व्याख्या कीजिए। [2021]
इस पंक्ति की व्याख्या निम्नलिखित है:
1. शाब्दिक अर्थ: कवि कहता है कि वह संकट के समय में किसी रक्षा की याचना नहीं करता। वह तो संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता है।
2. आत्मनिर्भरता का भाव: यह पंक्ति आत्मनिर्भरता की भावना को दर्शाती है। कवि नहीं चाहता कि कोई उसे बचाए। वह स्वयं संकटों से लड़ना चाहता है।
3. साहस की पराकाष्ठा: यह साहस की पराकाष्ठा है। आमतौर पर लोग संकट में रक्षा की कामना करते हैं, लेकिन कवि तो संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता है।
4. आत्मविश्वास: इस पंक्ति में अपार आत्मविश्वास है। कवि को विश्वास है कि यदि उसमें साहस होगा, तो वह किसी भी संकट को हरा सकता है।
5. योद्धा की मानसिकता: यह पंक्ति एक योद्धा की मानसिकता को दर्शाती है। योद्धा रक्षा की नहीं, युद्ध की कामना करता है।
6. सकारात्मक दृष्टिकोण: यह जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है। संकटों को अवसर के रूप में देखना।
इस प्रकार, यह पंक्ति साहस, आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की प्रतीक है।
प्रश्न 4. 'मैं यह नहीं माँगता कि मेरी पुकार सुनकर, मेरे आँसू पोंछ दिए जाएँ किसी के कर से' - भाव स्पष्ट कीजिए। [2018]
इस पंक्ति का भाव निम्नलिखित है:
1. शाब्दिक अर्थ: कवि कहता है कि वह यह नहीं माँगता कि उसकी पुकार सुनकर कोई उसके आँसू पोंछ दे।
2. आत्मनिर्भरता: यह पंक्ति आत्मनिर्भरता की पराकाष्ठा है। कवि किसी और पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह स्वयं अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहता है।
3. शिकायत नहीं, संघर्ष: कवि शिकायत नहीं करता, संघर्ष करना चाहता है। वह नहीं चाहता कि कोई उसके लिए रोए या उसके आँसू पोंछे।
4. आत्मसम्मान: यह पंक्ति आत्मसम्मान की भावना को दर्शाती है। कवि किसी के सामने हाथ फैलाना नहीं चाहता, भले ही वह दुखी हो।
5. मजबूत चरित्र: यह मजबूत चरित्र की निशानी है। कवि दुख में भी मजबूत है, टूटा नहीं है।
6. वास्तविक सहायता: कवि का तर्क है कि आँसू पोंछने से क्या होगा? उसे तो आँसू न आने देने की शक्ति चाहिए। आँसू पोंछना तो बाद की बात है।
इस प्रकार, यह पंक्ति आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान की भावना को दर्शाती है।
प्रश्न 5. 'आत्मत्राण' कविता में निहित आत्मविश्वास और साहस का वर्णन कीजिए। [2020]
इस कविता में आत्मविश्वास और साहस की अद्भुत अभिव्यक्ति हुई है:
1. दुख सहने का साहस: कवि दुखों को दूर करने का नहीं, उन्हें सहने का साहस चाहता है। यह असीम साहस की माँग है।
2. संकटों पर विजय का आत्मविश्वास: कवि को पूरा विश्वास है कि यदि उसमें साहस होगा, तो वह किसी भी संकट को हरा सकता है। 'संकटों पर विजय पाने का साहस' यही आत्मविश्वास है।
3. आत्मनिर्भरता का विश्वास: कवि को अपने ऊपर इतना विश्वास है कि वह किसी से रक्षा की आशा नहीं रखता। वह स्वयं अपनी रक्षा कर सकता है।
4. स्वयं के आँसू स्वयं पोंछने का साहस: कवि यह नहीं चाहता कि कोई उसके आँसू पोंछे। वह स्वयं अपने आँसू पोंछने का साहस रखता है।
5. कभी न झुकने का आत्मविश्वास: कवि का आत्मविश्वास इतना प्रबल है कि वह मानता है - चाहे कितने भी दुख आएँ, उसका सिर कभी नहीं झुकेगा। 'निज दुख से न होऊँ कभी नत-शिर' यही आत्मविश्वास है।
6. विचलित न होने का बल: कवि ईश्वर से इतना बल चाहता है कि वह विषम वेदना में भी विचलित न हो। यह साहस की चरम सीमा है।
इस प्रकार, यह कविता आत्मविश्वास और साहस का प्रतीक है।
प्रश्न 6. रवींद्रनाथ ठाकुर की भाषा शैली की विशेषताएँ बताइए। [2019]
रवींद्रनाथ ठाकुर की भाषा शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
भाषा:
1. सरल और सहज भाषा: उनकी भाषा बहुत सरल और सहज है। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते। 'आत्मत्राण' में भी भाषा सरल है।
2. प्रवाहपूर्णता: उनकी भाषा में स्वाभाविक प्रवाह है। पढ़ते समय रुकावट महसूस नहीं होती।
3. भावानुकूल भाषा: उनकी भाषा भावों के अनुकूल है - प्रार्थना में विनम्र, आत्मविश्वास में दृढ़।
4. संगीतात्मकता: उनकी भाषा में संगीत है, क्योंकि वे मूलतः गीतकार हैं। 'गीतांजलि' के सभी गीत संगीतमय हैं।
शैली:
1. प्रार्थना शैली: यह कविता प्रार्थना के रूप में है। कवि सीधे ईश्वर से संवाद करता है।
2. दार्शनिक शैली: उनकी शैली में गहन दार्शनिकता है। जीवन, मृत्यु, दुख, सुख जैसे विषयों पर गहन चिंतन।
3. आत्मालाप शैली: कहीं-कहीं वे स्वयं से भी संवाद करते हैं।
4. प्रतीकात्मकता: उनकी रचनाओं में प्रतीकों का सुंदर प्रयोग मिलता है।
5. गीति शैली: उनकी अधिकांश रचनाएँ गीति शैली में हैं, जो गाए जाने के लिए उपयुक्त हैं।
6. मानवतावादी दृष्टि: उनकी शैली में मानवतावादी दृष्टि है, मनुष्य के प्रति गहरी संवेदना।
इस प्रकार, रवींद्रनाथ ठाकुर की भाषा शैली अत्यंत प्रभावशाली है।
प्रश्न 7. 'आत्मत्राण' कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए। [2021]
'आत्मत्राण' कविता का मूलभाव बहुआयामी है:
1. आत्मशक्ति की प्रार्थना: इस कविता का प्रमुख भाव आत्मशक्ति की प्रार्थना है। कवि बाहरी शक्ति से मदद नहीं माँगता, बल्कि अपनी आंतरिक शक्ति बढ़ाने की प्रार्थना करता है।
2. दुखों का स्वागत: यह कविता हमें सिखाती है कि दुखों से भागना नहीं है, बल्कि उनका स्वागत करना है और उनका सामना करना है।
3. आत्मनिर्भरता: कविता आत्मनिर्भरता का संदेश देती है। कवि किसी पर निर्भर नहीं रहना चाहता, स्वयं अपनी समस्याओं का समाधान करना चाहता है।
4. साहस और आत्मविश्वास: यह कविता साहस और आत्मविश्वास का प्रतीक है। कवि में इतना साहस है कि वह संकटों पर विजय पाने की बात सोचता है।
5. जीवन के यथार्थ को स्वीकार करना: यह कविता जीवन के यथार्थ को स्वीकार करने का संदेश देती है। जीवन में सुख-दुख का चक्र चलता रहता है, इसे स्वीकार करो।
6. ईश्वर के प्रति विश्वास: कवि ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास रखता है। वह मानता है कि ईश्वर उसे आवश्यक शक्ति दे सकता है।
7. कभी न हारने का संकल्प: 'निज दुख से न होऊँ कभी नत-शिर' - यह कभी न हारने का संकल्प है।
इस प्रकार, यह कविता आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है।
प्रश्न 8. सामान्य प्रार्थना और 'आत्मत्राण' की प्रार्थना में क्या अंतर है? [2018]
सामान्य प्रार्थना और 'आत्मत्राण' की प्रार्थना में मौलिक अंतर है:
सामान्य प्रार्थना:
1. सामान्यतः लोग ईश्वर से सुख-सुविधाएँ माँगते हैं - धन, स्वास्थ्य, सफलता आदि।
2. लोग ईश्वर से दुखों को दूर करने की प्रार्थना करते हैं।
3. लोग संकट में रक्षा की प्रार्थना करते हैं।
4. लोग ईश्वर से सहायता की आशा रखते हैं।
5. लोग अपनी कमजोरी दिखाते हैं कि वे स्वयं कुछ नहीं कर सकते।
6. यह प्रार्थना बाहरी शक्ति पर निर्भरता दर्शाती है।
'आत्मत्राण' की प्रार्थना:
1. कवि सुख-सुविधाएँ नहीं, शक्ति माँगता है।
2. कवि दुखों को दूर करने का नहीं, उन्हें सहने की शक्ति माँगता है।
3. कवि संकट में रक्षा नहीं, संकटों पर विजय का साहस माँगता है।
4. कवि सहायता नहीं, आत्मबल माँगता है।
5. कवि अपने सामर्थ्य पर विश्वास दर्शाता है - बस थोड़ा और बल चाहिए।
6. यह प्रार्थना आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास का प्रतीक है।
इस प्रकार, 'आत्मत्राण' की प्रार्थना अनूठी और उच्च स्तर की है।
प्रश्न 9. 'आत्मत्राण' कविता का शीर्षक कितना सार्थक है? [2020]
'आत्मत्राण' शीर्षक अत्यंत सार्थक है:
1. शीर्षक का अर्थ: 'आत्मत्राण' का अर्थ है - आत्मा को शक्ति देने की प्रार्थना। यह शीर्षक कविता के केंद्रीय भाव को सटीक रूप से व्यक्त करता है।
2. आत्मा की मजबूती: कवि आत्मा की मजबूती के लिए प्रार्थना करता है। वह बाहरी चीजें नहीं, आंतरिक शक्ति माँगता है। शीर्षक इसी ओर संकेत करता है।
3. त्राण का भाव: 'त्राण' का अर्थ है रक्षा या मुक्ति। लेकिन कवि दुखों से मुक्ति नहीं, आत्मा को मजबूत करने की प्रार्थना करता है। यह विरोधाभास शीर्षक में ही दिखता है।
4. स्वयं पर विश्वास: 'आत्म' शब्द स्वयं पर विश्वास को दर्शाता है। कवि बाहरी शक्तियों पर नहीं, अपनी आत्मा पर भरोसा करता है।
5. अनूठी प्रार्थना: यह शीर्षक बताता है कि यह कोई सामान्य प्रार्थना नहीं, बल्कि अनूठी प्रार्थना है - आत्मा के बल की प्रार्थना।
6. संक्षिप्त और प्रभावशाली: 'आत्मत्राण' संक्षिप्त लेकिन अत्यंत प्रभावशाली शीर्षक है। यह पूरी कविता के सार को एक शब्द में समेटता है।
इस प्रकार, 'आत्मत्राण' शीर्षक पूर्णतः सार्थक है।
प्रश्न 10. 'आत्मत्राण' कविता की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिए। [2019]
'आत्मत्राण' कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है:
1. आज के तनावपूर्ण जीवन में: आज का जीवन अत्यंत तनावपूर्ण है। हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में यह कविता हमें दुख सहने और संकटों से लड़ने की शक्ति देती है।
2. आत्मनिर्भरता का संदेश: आज देश आत्मनिर्भरता पर बल दे रहा है। यह कविता आत्मनिर्भरता का संदेश देती है - किसी पर निर्भर न रहो, स्वयं लड़ो।
3. मानसिक स्वास्थ्य के लिए: आज मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी समस्या है। यह कविता मानसिक रूप से मजबूत बनने की प्रेरणा देती है।
4. युवाओं के लिए प्रेरणा: आज के युवाओं को साहस और आत्मविश्वास की सबसे अधिक आवश्यकता है। यह कविता उन्हें प्रेरित करती है।
5. जीवन के यथार्थ का सामना करना: जीवन में सुख-दुख तो आते ही रहेंगे। यह कविता हमें उनका सामना करना सिखाती है, न कि उनसे भागना।
6. सकारात्मक सोच: यह कविता सकारात्मक सोच विकसित करती है। यह बताती है कि कठिनाइयाँ अवसर हैं, चुनौतियाँ हैं।
7. सार्वभौमिक संदेश: इस कविता का संदेश सार्वभौमिक है - हर युग में, हर समाज में, हर व्यक्ति के लिए उपयोगी।
इस प्रकार, यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
7. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे जाने वाले विषय
- कवि परिचय: रवींद्रनाथ ठाकुर का जीवन, रचनाएँ, नोबेल पुरस्कार [2020]
- पद्यांशों की व्याख्या: सभी प्रमुख पंक्तियों का भावार्थ [2018, 2019, 2020, 2021]
- कवि की प्रार्थना: कवि क्या माँगता है और क्या नहीं [2020]
- दुखों के प्रति दृष्टिकोण: दुख सहने की शक्ति बनाम दुखों से मुक्ति [2019]
- आत्मविश्वास और साहस: कविता में निहित साहस का वर्णन [2020]
- शीर्षक की सार्थकता: 'आत्मत्राण' शीर्षक का महत्व [2020]
- मूलभाव: कविता का केंद्रीय भाव [2021]
- प्रासंगिकता: आज के समय में कविता की प्रासंगिकता [2019]
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- कवि: रवींद्रनाथ ठाकुर (1861-1941), कोलकाता
- पुरस्कार: 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार (गीतांजलि के लिए)
- रचनाएँ: गीतांजलि, गोरा, घरे बाइरे, डाकघर, राजा
- राष्ट्रगान: 'जन गण मन' के रचयिता
- पुस्तक: 'गीतांजलि' से ली गई है
- मुख्य भाव: दुख सहने की शक्ति, आत्मविश्वास, साहस, आत्मनिर्भरता
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"हे परम दयालु, मुझको इतना बल दे कि मैं विषम वेदना से विचलित न होऊँ कभी।"
"दुख को दूर करने का वरदान नहीं माँगता, दुख सहने की शक्ति चाहता हूँ।"
"मैं संकट-काल में रक्षा नहीं चाहता, संकटों पर विजय पाने का साहस चाहता हूँ।"
"मैं यह वरदान माँगता हूँ कि मैं निज दुख से न होऊँ कभी नत-शिर।"
8. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न
टिप्स: सीधा और सटीक उत्तर दें। केवल मुख्य बिंदु लिखें। 2-3 वाक्यों में उत्तर पूरा करें।
उदाहरण: प्रश्न: 'आत्मत्राण' कविता के कवि कौन हैं?
उत्तर: 'आत्मत्राण' कविता के कवि रवींद्रनाथ ठाकुर हैं, जिन्हें 'गीतांजलि' के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था।
📝 4-5 अंक प्रश्न
टिप्स: उत्तर को तीन भागों में बाँटें - परिचय, मुख्य भाग, निष्कर्ष। पंक्ति की व्याख्या में पहले शाब्दिक अर्थ, फिर गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें। आत्मविश्वास के भाव पर विशेष ध्यान दें।
उदाहरण: प्रश्न: 'दुख को दूर करने का वरदान नहीं माँगता, दुख सहने की शक्ति चाहता हूँ' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: [जैसा ऊपर दीर्घ प्रश्न 2 में दिया गया है]
9. हब लिंक
संबंधित अध्ययन सामग्री के लिए नीचे दिए गए विषय हब देखें: