📘 पाठ – टार्च बेचनेवाले | कक्षा 11 हिंदी (अंतरा भाग 1, गद्य खंड) | GPN
📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: अंतरा भाग 1 (गद्य खंड) | ✍️ लेखक: हरिशंकर परसाई | 📝 प्रकार: व्यंग्य निबंध | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. पात्र चित्रण
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न (5)
- 7. दीर्घ प्रश्न (5)
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 10. हब लिंक
1. परिचय
📝 लेखक परिचय - हरिशंकर परसाई
जन्म: 22 अगस्त 1924, जमानी (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश)
मृत्यु: 10 अगस्त 1995
प्रमुख रचनाएँ: तब की बात और थी, विकलांग श्रद्धा का दौर, शिकायत मुझे भी है, टार्च बेचनेवाले, पगडंडियों का जमाना, रानी नागफनी की कहानी
हरिशंकर परसाई हिंदी के सबसे सशक्त व्यंग्यकार माने जाते हैं। उन्होंने अपने व्यंग्य के माध्यम से समाज की विसंगतियों, राजनीतिक भ्रष्टाचार, मध्यवर्गीय दंभ और धार्मिक पाखंड पर करारा प्रहार किया। उनका व्यंग्य कटु नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक होता है। वे हँसाते-हँसाते गहरी चोट कर जाते हैं।
'टार्च बेचनेवाले' परसाई जी का एक महत्वपूर्ण व्यंग्य निबंध है। इसमें उन्होंने एक टार्च बेचने वाले के माध्यम से समाज की उस प्रवृत्ति पर व्यंग्य किया है जहाँ लोग दिखावे और झूठी चमक पर विश्वास कर लेते हैं। टार्च की रोशनी और असली ज्ञान की रोशनी के बीच का अंतर उन्होंने बड़े ही रोचक अंदाज़ में दिखाया है।
📖 निबंध की पृष्ठभूमि
यह निबंध उस दौर में लिखा गया जब बाजारवाद और दिखावा तेजी से बढ़ रहा था। लोग असली चीज़ से ज़्यादा दिखावे पर ध्यान देने लगे थे। परसाई जी ने टार्च को एक प्रतीक के रूप में लिया है। टार्च थोड़ी देर रोशनी देती है, फिर उसकी बैटरी खत्म हो जाती है। ठीक वैसे ही आज के लोग थोड़ी देर की चकाचौंध में आकर असली ज्ञान, असली मूल्यों को भूलते जा रहे हैं।
निबंध में एक टार्च बेचनेवाला आता है, जो अपने उत्पाद के गुण गढ़-गढ़ कर बताता है। लोग उसकी बातों में आ जाते हैं, टार्च खरीद लेते हैं। लेकिन जब टार्च काम नहीं करती, तब उन्हें एहसास होता है कि उन्हें धोखा हुआ। परसाई जी यह दिखाना चाहते हैं कि आज का समाज ऐसे ही टार्च बेचनेवालों से भरा पड़ा है। नेता, अध्यापक, संत, समाजसेवी - सब अपनी-अपनी टार्च बेच रहे हैं।
🎯 अध्याय का महत्व
कक्षा 11 की परीक्षा में यह निबंध बहुत महत्वपूर्ण है। व्यंग्य की शैली, प्रतीकों का प्रयोग, समाज पर चोट, परसाई जी की विशेषताएँ - इन सब पर प्रश्न पूछे जाते हैं। टार्च का प्रतीकात्मक अर्थ, टार्च बेचनेवाला कौन है, लेखक का क्या संदेश है - ये प्रश्न अक्सर आते हैं। बोर्ड परीक्षा में व्यंग्य निबंध पर आधारित प्रश्न नियमित रूप में पूछे जाते हैं।
2. सरल सारांश
यह व्यंग्य निबंध एक टार्च बेचनेवाले के इर्द-गिर्द घूमता है। लेखक बताता है कि एक बार उसने सड़क पर एक टार्च बेचनेवाले को देखा। वह जोर-जोर से अपने टार्च के गुण गा रहा था। उसका कहना था कि यह टार्च इतनी तेज रोशनी देती है कि सूरज भी फेल। यह पानी में भी काम करती है, गिरने से नहीं टूटती, एक बार बैटरी लगाओ तो सालों चलती है। लोग उसकी बातों में आकर टार्च खरीदने लगे।
लेखक भी उसकी बातों में आ गया। उसने भी एक टार्च खरीद ली। लेकिन घर लाकर जब उसे इस्तेमाल किया, तो पता चला कि टार्च में वह सब कुछ नहीं है, जो बेचनेवाला बता रहा था। रोशनी बहुत कमजोर थी, बैटरी जल्दी खत्म हो गई। लेखक को धोखा महसूस हुआ।
फिर लेखक सोचने लगता है - यह सिर्फ एक टार्च बेचनेवाला नहीं है। हमारे समाज में हर जगह ऐसे टार्च बेचनेवाले हैं। नेता वोटों के लिए झूठे वादे करते हैं - यह एक तरह की टार्च है। अध्यापक किताबी ज्ञान पढ़ाते हैं, असली ज्ञान नहीं देते - यह भी टार्च है। संत लोग चमत्कार दिखाते हैं, लोगों को ठगते हैं - वे भी टार्च बेच रहे हैं। समाजसेवी दान-पुण्य के नाम पर अपनी जेब भरते हैं - वे भी टार्च बेचनेवाले हैं।
परसाई जी कहते हैं कि असली रोशनी तो ज्ञान की है, विवेक की है। लेकिन लोगों को असली रोशनी नहीं चाहिए। उन्हें तो चकाचौंध चाहिए, दिखावा चाहिए। इसलिए टार्च बेचनेवाले फलते-फूलते हैं। अंत में वे व्यंग्य करते हैं कि शायद हम सब टार्च बेच रहे हैं और टार्च खरीद रहे हैं।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण
- टार्च का प्रतीकात्मक अर्थ: टार्च सिर्फ एक उपकरण नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। यह उन सब चीज़ों का प्रतीक है जो थोड़ी देर की चमक देती हैं, लेकिन असली रोशनी नहीं देतीं। नेताओं के वादे, अध्यापकों का किताबी ज्ञान, संतों के चमत्कार, समाजसेवियों का दिखावा - सब टार्च की तरह हैं।
- टार्च बेचनेवाला कौन? टार्च बेचनेवाला कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है। वह हर वह व्यक्ति है जो झूठे आश्वासन देकर, दिखावा करके, लोगों को ठगता है। वह चालाक है, वाक्पटु है, लोगों की कमजोरियों को जानता है।
- खरीददार कौन? खरीददार आम आदमी है। वह चमक-दमक पर विश्वास कर लेता है। वह असली और नकली में फर्क नहीं कर पाता। उसे जल्दी में चमक चाहिए, असली रोशनी की परवाह नहीं।
- समाज का यथार्थ: परसाई जी समाज का यथार्थ दिखाते हैं। हर क्षेत्र में टार्च बेचनेवाले मौजूद हैं। राजनीति में, शिक्षा में, धर्म में, समाजसेवा में। और लोग उनसे टार्च खरीद रहे हैं।
- दिखावे की प्रवृत्ति: आज का मनुष्य दिखावे का भूखा है। उसे असली चीज़ से मतलब नहीं। उसे तो चकाचौंध चाहिए। टार्च बेचनेवाले इसी कमजोरी का फायदा उठाते हैं।
- व्यंग्य की गहराई: परसाई का व्यंग्य सतही नहीं है। वे टार्च बेचनेवाले के माध्यम से पूरे सामाजिक तंत्र पर चोट करते हैं। अंत में वे कहते हैं कि शायद हम सब टार्च बेच रहे हैं और टार्च खरीद रहे हैं। यह आत्म-व्यंग्य उनकी लेखनी की गहराई दिखाता है।
📌 विषय / Theme
इस निबंध के कई विषय हैं। पहला विषय है - दिखावे और वास्तविकता का अंतर। दूसरा विषय है - बाजारवाद और उपभोक्तावाद की आलोचना। तीसरा विषय है - भोले-भाले लोगों का शोषण। चौथा विषय है - हर क्षेत्र में व्याप्त पाखंड और भ्रष्टाचार। पाँचवाँ विषय है - आत्म-विश्लेषण की आवश्यकता।
📌 सामाजिक संदेश
परसाई जी समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि सतही चमक-दमक पर विश्वास मत करो। असली चीज़ को पहचानो। नेताओं के झूठे वादों पर मत जाओ। अध्यापकों के किताबी ज्ञान से संतुष्ट मत हो जाओ। संतों के चमत्कारों पर मत फिसलो। अपनी आँखें खोलो, विवेक से काम लो। और सबसे बड़ी बात - खुद भी टार्च बेचनेवाला मत बनो।
📌 नैतिक शिक्षा
- विवेक से काम लो: किसी भी बात पर आँख मूंदकर विश्वास मत करो। सोचो, समझो, परखो।
- दिखावे से बचो: दिखावा क्षणिक होता है। असली चीज़ की पहचान करो।
- ज्ञान की रोशनी पाओ: टार्च की रोशनी से कुछ नहीं होता। असली रोशनी ज्ञान की है, विवेक की है।
- दूसरों को मत ठगो: टार्च बेचनेवाला मत बनो। दूसरों को झूठे आश्वासन देकर मत ठगो।
- आत्म-विश्लेषण करो: देखो कि कहीं तुम भी तो टार्च बेचनेवाले नहीं हो?
4. पात्र चित्रण
🧑 टार्च बेचनेवाला
स्वभाव: टार्च बेचनेवाला एक चालाक, वाक्पटु और चतुर व्यक्ति है। वह जानता है कि लोगों को कैसे फुसलाना है। वह अपने उत्पाद के ऐसे-ऐसे गुण गढ़ता है जो सुनने में भले लगें, लेकिन हैं झूठे। वह जोर-जोर से चिल्लाता है ताकि भीड़ इकट्ठी हो जाए। उसकी बातों में एक लय है, एक आकर्षण है। लोग उसकी बातों में बंधते चले जाते हैं। वह कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है। वह नेता भी हो सकता है, अध्यापक भी, संत भी, समाजसेवी भी।
भूमिका: टार्च बेचनेवाला समाज के उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो दिखावे और झूठे वादों से लोगों को ठगते हैं।
प्रमुख घटनाएँ: टार्च के गुण गढ़-गढ़ कर बताना, भीड़ इकट्ठा करना, लोगों को टार्च बेचना।
परीक्षा उपयोगी बिंदु: टार्च बेचनेवाला चालाक, वाक्पटु, चतुर, प्रवृत्ति का प्रतिनिधि।
🧑 खरीददार (आम आदमी)
स्वभाव: खरीददार आम आदमी है। वह भोला है, सीधा है। वह चमक-दमक पर विश्वास कर लेता है। उसे असली और नकली में फर्क नहीं मालूम। वह जल्दी में है। उसे तुरंत चमक चाहिए। वह टार्च बेचनेवाले की बातों में आ जाता है। टार्च खरीद लेता है। बाद में पछताता है। लेकिन अगली बार भी वही गलती करता है। वह समाज का वह वर्ग है जो नेताओं के झूठे वादों पर विश्वास कर लेता है, अध्यापकों के किताबी ज्ञान से संतुष्ट हो जाता है, संतों के चमत्कारों पर फिसल जाता है।
भूमिका: खरीददार उन लाखों लोगों का प्रतिनिधित्व करता है जो दिखावे में आकर ठगे जाते हैं और फिर पछताते हैं।
प्रमुख घटनाएँ: टार्च बेचनेवाले की बातों में आना, टार्च खरीदना, बाद में धोखा महसूस करना।
परीक्षा उपयोगी बिंदु: खरीददार भोला, सीधा, दिखावे पर विश्वास करने वाला, शोषित वर्ग का प्रतिनिधि।
🧑 लेखक (हरिशंकर परसाई)
स्वभाव: लेखक स्वयं इस निबंध में एक पात्र की तरह उपस्थित है। वह एक जिज्ञासु, विवेकशील और संवेदनशील व्यक्ति है। वह टार्च बेचनेवाले को देखता है, उसकी बातें सुनता है, लेकिन तुरंत खरीद नहीं लेता। वह थोड़ा सोचता है, लेकिन अंत में उसके झांसे में आ ही जाता है। बाद में जब उसे धोखा महसूस होता है, तो वह इस घटना पर गहराई से विचार करता है। वह इस एक घटना से जोड़कर पूरे समाज को देखता है। उसकी सोच विश्लेषणात्मक है। उसके पास व्यंग्य की गहरी समझ है।
भूमिका: लेखक हमारा प्रतिनिधि है। वह हमारी तरह सोचता है, हमारी तरह गलतियाँ करता है, लेकिन उससे सीखता भी है।
प्रमुख घटनाएँ: टार्च बेचनेवाले को देखना, टार्च खरीदना, धोखा महसूस करना, समाज पर टिप्पणी करना।
परीक्षा उपयोगी बिंदु: लेखक जिज्ञासु, विवेकशील, विश्लेषणात्मक, व्यंग्य की गहरी समझ रखने वाला।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| टार्च | बैटरी से चलने वाली रोशनी, torch | उसने सड़क पर टार्च बेची। |
| व्यंग्य | कटाक्ष, satire | परसाई जी के व्यंग्य बहुत गहरे होते हैं। |
| प्रतीक | संकेत, symbol | टार्च दिखावे का प्रतीक है। |
| वाक्पटु | बातूनी, वक्ता, eloquent | टार्च बेचनेवाला बहुत वाक्पटु था। |
| चकाचौंध | तेज रोशनी से दंग रह जाना, glare | लोग उसकी चकाचौंध में आ गए। |
| दिखावा | दिखाने की क्रिया, pretence | आज के समाज में दिखावा बढ़ गया है। |
| पाखंड | दिखावा, ढोंग, hypocrisy | धार्मिक पाखंड पर परसाई ने चोट की है। |
| भ्रष्टाचार | रिश्वतखोरी, corruption | राजनीति में भ्रष्टाचार व्याप्त है। |
| विवेक | समझ-बूझ, discretion | विवेक से काम लेना चाहिए। |
| आत्म-व्यंग्य | स्वयं पर कटाक्ष, self-satire | अंत में लेखक आत्म-व्यंग्य करता है। |
| उपभोक्तावाद | consumerism | बाजारवाद और उपभोक्तावाद बढ़ रहा है। |
| शोषण | exploitation | गरीबों का शोषण हो रहा है। |
| विसंगति | असंगति, anomaly | समाज में कई विसंगतियाँ हैं। |
| चमत्कार | जादू, miracle | लोग झूठे चमत्कारों पर विश्वास कर लेते हैं। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)
प्रश्न 1: 'टार्च बेचनेवाले' निबंध में टार्च किसका प्रतीक है? [CBSE 2023]
इस निबंध में टार्च दिखावे और झूठी चमक का प्रतीक है। यह उन सभी चीज़ों का प्रतीक है जो थोड़ी देर की रोशनी तो देती हैं, लेकिन असली रोशनी नहीं देतीं। नेताओं के झूठे वादे, अध्यापकों का किताबी ज्ञान, संतों के चमत्कार, समाजसेवियों का दिखावा - सब टार्च की तरह हैं। ये थोड़ी देर की चकाचौंध पैदा करते हैं, लेकिन इनसे कोई स्थायी समाधान नहीं मिलता। टार्च का प्रतीक परसाई जी ने बहुत सटीक चुना है।
प्रश्न 2: टार्च बेचनेवाले की क्या विशेषताएँ हैं? [CBSE 2022]
टार्च बेचनेवाला एक चालाक, वाक्पटु और चतुर व्यक्ति है। वह जानता है कि लोगों को कैसे फुसलाना है। वह अपने उत्पाद के गुण गढ़-गढ़ कर बताता है। वह जोर-जोर से चिल्लाता है, भीड़ इकट्ठा करता है, लोगों की कमजोरियों को भुनाता है। वह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक प्रवृत्ति है। वह नेता, अध्यापक, संत, समाजसेवी - किसी भी रूप में हो सकता है। उसका एक ही लक्ष्य है - लोगों को ठगना, अपना माल बेचना।
प्रश्न 3: लेखक ने किन-किन क्षेत्रों में टार्च बेचनेवालों की उपस्थिति बताई है? [CBSE 2021]
लेखक ने बताया है कि समाज के हर क्षेत्र में टार्च बेचनेवाले मौजूद हैं। राजनीति में नेता टार्च बेच रहे हैं - वे वोटों के लिए झूठे वादे करते हैं। शिक्षा में अध्यापक टार्च बेच रहे हैं - वे किताबी ज्ञान देते हैं, असली ज्ञान नहीं। धर्म में संत टार्च बेच रहे हैं - वे चमत्कार दिखाते हैं, लोगों को ठगते हैं। समाजसेवा में समाजसेवी टार्च बेच रहे हैं - वे दान-पुण्य के नाम पर अपनी जेब भरते हैं। हर जगह टार्च बेचनेवालों का बोलबाला है।
प्रश्न 4: लोग टार्च बेचनेवालों के झांसे में क्यों आ जाते हैं? [CBSE 2023, 2020]
लोग टार्च बेचनेवालों के झांसे में इसलिए आ जाते हैं क्योंकि वे दिखावे और चमक-दमक पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। उनमें विवेक की कमी है। वे असली और नकली में फर्क नहीं कर पाते। उन्हें तुरंत चमक चाहिए, जल्दी में रिजल्ट चाहिए। इसलिए वे बिना सोचे-समझे टार्च बेचनेवाले की बातों में आ जाते हैं। वे भोले हैं, सीधे हैं। टार्च बेचनेवाला उनकी इसी कमजोरी का फायदा उठाता है।
प्रश्न 5: 'टार्च बेचनेवाले' निबंध का अंत आत्म-व्यंग्य के रूप में क्यों कहा गया है? [CBSE 2021]
निबंध के अंत में लेखक कहता है कि शायद हम सब टार्च बेच रहे हैं और टार्च खरीद रहे हैं। यह आत्म-व्यंग्य है क्योंकि लेखक खुद को भी इससे अलग नहीं मानता। वह यह स्वीकार करता है कि वह भी कभी टार्च बेचनेवाला बन जाता है, कभी खरीददार। वह समाज से ऊपर उठकर नहीं सोचता, बल्कि खुद को भी उसी समाज का हिस्सा मानता है। यह आत्म-व्यंग्य उनकी लेखनी की गहराई और विनम्रता को दर्शाता है।
7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)
प्रश्न 1: 'टार्च बेचनेवाले' निबंध को एक सफल व्यंग्य निबंध के रूप में विश्लेषित कीजिए। [CBSE 2023, 2021]
- प्रतीक का सटीक चयन: व्यंग्य के लिए प्रतीक का सटीक चुनाव बहुत जरूरी है। परसाई जी ने टार्च जैसी साधारण वस्तु को प्रतीक बनाकर दिखा दिया कि आज का समाज कैसे दिखावे और झूठी चमक पर चल रहा है। टार्च का प्रतीक पूरे निबंध में एक समान बना हुआ है।
- सीधी-सीधी बात, गहरा व्यंग्य: परसाई जी सीधी-सीधी बात कहते हैं, लेकिन उसमें गहरा व्यंग्य छिपा होता है। टार्च बेचनेवाला कोई साधारण फेरीवाला नहीं, बल्कि हमारे समाज के नेता, अध्यापक, संत हैं - यह बात वे सीधे नहीं कहते, लेकिन पाठक समझ जाता है।
- हास्य के माध्यम से आलोचना: व्यंग्य हास्य के माध्यम से आलोचना करता है। इस निबंध में हल्का-हल्का हास्य है, लेकिन यह हास्य गहरी चोट करता है। टार्च बेचनेवाले के गढ़े हुए गुणों को पढ़कर हँसी आती है, लेकिन साथ ही यह सोचने पर मजबूर करता है कि हम ऐसे लोगों पर क्यों विश्वास कर लेते हैं।
- व्यापक दृष्टिकोण: परसाई का व्यंग्य सिर्फ एक व्यक्ति या एक घटना पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर होता है। उन्होंने इस निबंध में राजनीति, शिक्षा, धर्म, समाजसेवा - सभी क्षेत्रों पर चोट की है।
- आत्म-व्यंग्य: सफल व्यंग्यकार आत्म-व्यंग्य से नहीं कतराता। परसाई जी ने अंत में खुद को भी टार्च बेचनेवाला और खरीददार बताकर यह साबित किया कि वे समाज से अलग नहीं हैं। इससे उनका व्यंग्य और प्रभावी हो गया है।
- भाषा की सादगी: परसाई जी की भाषा सरल और सहज है। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते। उनकी भाषा में प्रवाह है, जो पाठक को बाँधे रखता है। यह सादगी उनके व्यंग्य को और घातक बनाती है।
प्रश्न 2: परसाई जी ने 'टार्च बेचनेवाले' निबंध के माध्यम से समाज की किन-किन विसंगतियों को उजागर किया है? [CBSE 2022]
- राजनीतिक विसंगति: नेता वोटों के लिए झूठे वादे करते हैं। वे टार्च बेचनेवालों की तरह हैं जो अपने उत्पाद के गुण गढ़-गढ़ कर बताते हैं। जनता उनके झांसे में आ जाती है, लेकिन बाद में पछताती है।
- शैक्षिक विसंगति: अध्यापक किताबी ज्ञान देते हैं, रट्टा लगवाते हैं। वे असली ज्ञान, असली समझ नहीं देते। यह भी टार्च बेचने जैसा है - थोड़ी देर की चमक, लेकिन असली रोशनी नहीं।
- धार्मिक विसंगति: संत-महात्मा चमत्कार दिखाते हैं, लोगों को ठगते हैं। वे टार्च बेचनेवालों से भी बदतर हैं। लोग उनके पीछे पागल होते हैं, लेकिन उन्हें सच्चा धर्म, सच्चा ज्ञान नहीं मिल पाता।
- सामाजिक विसंगति: समाजसेवी दान-पुण्य के नाम पर अपनी जेब भरते हैं। वे भी टार्च बेच रहे हैं। समाज के गरीब, जरूरतमंद लोग उनके झांसे में आकर और गरीब हो जाते हैं।
- उपभोक्तावादी विसंगति: बाजारवाद ने लोगों को दिखावे का भूखा बना दिया है। लोग असली चीज़ से ज्यादा दिखावे पर ध्यान देते हैं। टार्च बेचनेवाले इसी दिखावे की प्रवृत्ति का फायदा उठाते हैं।
- बौद्धिक विसंगति: बुद्धिजीवी वर्ग भी टार्च बेचने से बाज नहीं आता। वे तरह-तरह के सिद्धांत गढ़ते हैं, लोगों को भ्रमित करते हैं। परसाई जी ने इन सभी विसंगतियों पर करारा व्यंग्य किया है।
प्रश्न 3: 'टार्च बेचनेवाले' निबंध में परसाई जी की शैली की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2021]
- व्यंग्य शैली: परसाई जी की शैली की सबसे बड़ी विशेषता व्यंग्य है। वे हँसाते-हँसाते गहरी चोट करते हैं। उनका व्यंग्य कटु नहीं, बल्कि विचारोत्तेजक होता है। वे सीधे आलोचना न करके प्रतीकों और संकेतों के माध्यम से बात कहते हैं।
- प्रतीकों का प्रयोग: वे साधारण वस्तुओं को प्रतीक बनाकर बड़ी बातें कह जाते हैं। इस निबंध में टार्च एक सशक्त प्रतीक बनकर उभरा है। यह प्रतीक पूरे निबंध में एक समान बना हुआ है।
- सहज भाषा: परसाई जी की भाषा बहुत सहज और सरल है। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते। उनकी भाषा में प्रवाह है, जो पाठक को बाँधे रखता है। वे हिंदी के साथ-साथ उर्दू के शब्दों का भी खूबसूरत प्रयोग करते हैं।
- संवादात्मक शैली: उनका लेखन संवादात्मक होता है। वे पाठक से सीधे बात करते हैं, उससे प्रश्न पूछते हैं, उसे सोचने पर मजबूर करते हैं। इससे पाठक उनसे जुड़ाव महसूस करता है।
- व्यापक दृष्टिकोण: वे किसी एक घटना या व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे समाज पर व्यंग्य करते हैं। उनका दृष्टिकोण बहुत व्यापक होता है। एक छोटी-सी घटना को लेकर वे पूरे समाज की विसंगतियों पर चोट करते हैं।
- आत्म-व्यंग्य: वे खुद को भी व्यंग्य से अलग नहीं रखते। अंत में वे कहते हैं कि शायद हम सब टार्च बेच रहे हैं और टार्च खरीद रहे हैं। यह आत्म-व्यंग्य उनकी शैली को और प्रभावी बनाता है।
प्रश्न 4: 'टार्च बेचनेवाले' निबंध आज के समाज में किस प्रकार प्रासंगिक है? समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2020]
- राजनीति में टार्च बेचनेवाले: आज भी नेता वोटों के लिए झूठे वादे करते हैं। वे टार्च बेचनेवालों की तरह हैं। चुनाव के समय वे तरह-तरह के गुण गढ़ते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद सब भूल जाते हैं। जनता हर बार उनके झांसे में आ जाती है।
- शिक्षा में टार्च बेचनेवाले: आज के शिक्षा व्यवस्था में भी टार्च बेचनेवालों की भरमार है। कोचिंग संस्थान, बड़े-बड़े विज्ञापन, अच्छे अंकों का वादा - लेकिन असली शिक्षा कहीं नहीं। छात्र रटंत ज्ञान के सहारे परीक्षा पास कर लेते हैं, लेकिन उनमें समझ विकसित नहीं होती।
- धर्म में टार्च बेचनेवाले: आज धर्म के नाम पर खूब टार्च बिक रही है। झूठे बाबा, चमत्कारी संत, धार्मिक चैनल - सब टार्च बेच रहे हैं। लोग उनके पीछे पागल हो रहे हैं, लेकिन सच्चा धर्म, सच्ची आस्था कहीं खो गई है।
- मीडिया में टार्च बेचनेवाले: आज मीडिया भी टार्च बेच रहा है। सनसनीखेज खबरें, झूठी बहसें, भ्रामक विज्ञापन - सब टार्च हैं। लोग उनके झांसे में आकर अपना समय और पैसा बर्बाद कर रहे हैं।
- सोशल मीडिया पर टार्च बेचनेवाले: आज सोशल मीडिया पर हर कोई टार्च बेच रहा है। फिल्टर लगी तस्वीरें, दिखावे की पोस्ट, झूठी खुशियाँ - सब टार्च हैं। लोग इस चकाचौंध में आकर अपनी असली पहचान खो रहे हैं।
- उपभोक्तावाद का बढ़ना: आज बाजारवाद चरम पर है। हर चीज़ को पैकेजिंग में बेचा जाता है। असली चीज़ से ज्यादा पैकेजिंग पर ध्यान दिया जाता है। यह भी टार्च बेचने जैसा है। परसाई जी का यह निबंध आज और भी प्रासंगिक हो गया है।
प्रश्न 5: 'टार्च बेचनेवाले' और 'रीढ़ की हड्डी' निबंधों की तुलना कीजिए। दोनों में व्यंग्य की क्या भूमिका है? [CBSE 2019]
- समानताएँ: दोनों ही निबंध व्यंग्य विधा में लिखे गए हैं। दोनों में समाज की विसंगतियों पर चोट की गई है। दोनों लेखकों ने प्रतीकों का सहारा लिया है। 'रीढ़ की हड्डी' में रीढ़ प्रतीक है, 'टार्च बेचनेवाले' में टार्च। दोनों में सामाजिक आलोचना है, दोनों में सुधार का संदेश है।
- असमानताएँ: प्रसाद जी का व्यंग्य गंभीर और दार्शनिक है। वे आत्मसम्मान के महत्व पर बल देते हैं। परसाई जी का व्यंग्य हास्य के माध्यम से है। वे दिखावे और पाखंड पर चोट करते हैं। प्रसाद जी का व्यंग्य व्यक्ति को केंद्र में रखता है, परसाई का व्यंग्य पूरे समाज पर है।
- प्रतीकों का प्रयोग: प्रसाद जी ने रीढ़ की हड्डी को आत्मसम्मान का प्रतीक बनाया। परसाई जी ने टार्च को दिखावे का प्रतीक बनाया। दोनों प्रतीक अपने-अपने संदर्भ में सटीक हैं।
- व्यंग्य की भूमिका: दोनों निबंधों में व्यंग्य समाज को जगाने का काम करता है। प्रसाद जी लोगों को उनके आत्मसम्मान की कमी के प्रति सचेत करते हैं। परसाई जी लोगों को दिखावे और पाखंड के प्रति आगाह करते हैं। दोनों का उद्देश्य समाज सुधार है।
- भाषा शैली: प्रसाद जी की भाषा संस्कृतनिष्ठ और गंभीर है। परसाई जी की भाषा सरल, सहज और हास्यपूर्ण है। दोनों की अपनी-अपनी शैली है, दोनों प्रभावी हैं।
- निष्कर्ष: दोनों निबंध हिंदी साहित्य के महत्वपूर्ण व्यंग्य निबंध हैं। दोनों अलग-अलग तरीके से समाज की विसंगतियों को उजागर करते हैं। दोनों पाठक को सोचने पर मजबूर करते हैं।
8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न
- टार्च का प्रतीकात्मक अर्थ - 2023, 2021
- टार्च बेचनेवाले की विशेषताएँ - 2022, 2020
- समाज के विभिन्न क्षेत्रों में टार्च बेचनेवाले - 2023, 2021
- लोगों के झांसे में आने के कारण - 2022, 2020
- आत्म-व्यंग्य का महत्व - 2021, 2019
- परसाई जी की शैली - 2020, 2019
📈 बोर्ड ट्रेंड
पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस निबंध से प्रतिवर्ष 6-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में टार्च के प्रतीकात्मक अर्थ, टार्च बेचनेवाले की विशेषताओं और लोगों के झांसे में आने के कारणों पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में व्यंग्य की शैली, परसाई जी की विशेषताओं और निबंध की प्रासंगिकता पर प्रश्न आते हैं।
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- लेखक - हरिशंकर परसाई (प्रमुख व्यंग्यकार)
- पुस्तक - अंतरा भाग 1 (गद्य खंड)
- विधा - व्यंग्य निबंध
- केंद्रीय प्रतीक - टार्च (दिखावे और झूठी चमक का प्रतीक)
- मुख्य विषय - समाज में व्याप्त पाखंड, दिखावा, भ्रष्टाचार
- महत्वपूर्ण बिंदु - टार्च बेचनेवाला कोई एक नहीं, एक प्रवृत्ति है
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"टार्च थोड़ी देर रोशनी देती है, फिर उसकी बैटरी खत्म हो जाती है।"
"हमारे समाज में हर जगह टार्च बेचनेवाले हैं।"
"शायद हम सब टार्च बेच रहे हैं और टार्च खरीद रहे हैं।"
"असली रोशनी तो ज्ञान की है, विवेक की है।"
9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)
एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। तथ्यात्मक जानकारी पर आधारित प्रश्न होते हैं। उदाहरण: प्रश्न - टार्च किसका प्रतीक है? उत्तर - दिखावे और झूठी चमक का।
📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)
परिचय (1-2 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु को निबंध के प्रसंगों से स्पष्ट करें। उदाहरण: प्रश्न - टार्च बेचनेवाले की विशेषताएँ बताइए। उत्तर - परिचय में बताएँ कि टार्च बेचनेवाला एक चालाक व्यक्ति है। फिर उसकी वाक्पटुता, चालाकी, लोगों की कमजोरियों का फायदा उठाना, झूठे गुण गढ़ना - इन बिंदुओं पर व्याख्या करें। निष्कर्ष में कहें कि वह एक प्रवृत्ति का प्रतिनिधि है।
📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)
व्यंग्य निबंध के विश्लेषण के लिए: प्रस्तावना + व्यंग्य का स्वरूप + प्रतीकों का महत्व + सामाजिक आलोचना + निष्कर्ष।
विचारात्मक प्रश्नों के लिए: प्रस्तावना + विषय की व्याख्या (कम से कम 4-5 बिंदु, हर बिंदु को निबंध के प्रसंगों से स्पष्ट करें) + निष्कर्ष। जैसे समाज की विसंगतियों पर प्रश्न - पहले समाज की विसंगतियों का परिचय, फिर राजनीति, शिक्षा, धर्म आदि क्षेत्रों में विसंगतियों का वर्णन, फिर निष्कर्ष।
लेखक की शैली पर प्रश्न के लिए: लेखक का परिचय + उनकी शैली की विशेषताएँ + निबंध में इन विशेषताओं के उदाहरण + निष्कर्ष।
10. हब लिंक
संबंधित अध्ययन सामग्री के लिए नीचे दिए गए विषय हब देखें:
- हिंदी व्याकरण नोट्स, नियम और अभ्यास (कक्षा 3 से 12, सीबीएसई एवं यूपी बोर्ड)– हिंदी ग्रामर हब
- हिंदी साहित्य पाठ, सारांश और व्याख्या – हिंदी लिटरेचर हब (कक्षा 9 से 12 की सभी पुस्तकें)
- English Literature Summaries, Explanations and Notes – इंग्लिश लिटरेचर हब (क्लास 9 तो 12 all books covered)
- English Grammar Hub, Class 3 to 12 Complete CBSE & UP Board Syllabus Covered – इंग्लिश ग्रामर हब
- सभी विषयों की प्रैक्टिस शीट और अभ्यास प्रश्न – मास्टर वर्कशीट हब