📘 पाठ – मेरे तो गिरधर गोपाल | कक्षा 11 हिंदी (आरोह) | GPN
📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: आरोह भाग 1 | ✍️ कवयित्री: मीराबाई | 📝 प्रकार: पद (भक्तिकालीन सगुण भक्ति) | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. काव्य सौंदर्य
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न (5)
- 7. दीर्घ प्रश्न (5)
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 10. हब लिंक
1. परिचय
📝 कवयित्री परिचय - मीराबाई
जन्म: लगभग 1498, मेड़ता (राजस्थान)
मृत्यु: लगभग 1546, द्वारका
पति: राजकुमार भोजराज (मेवाड़)
आराध्य: श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल)
प्रमुख रचनाएँ: मीरा की पदावली, गीत गोविंद की टीका, राग गोविंद, आदि
मीराबाई हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सबसे प्रसिद्ध कवयित्री हैं। वे कृष्ण भक्ति की सगुण धारा की प्रमुख कवियत्री हैं। राजस्थान के मेड़ता में जन्मी मीरा बचपन से ही श्रीकृष्ण की भक्ति में लीन रहती थीं। उनका विवाह मेवाड़ के राजकुमार भोजराज से हुआ, लेकिन उनके पति का शीघ्र ही निधन हो गया। इसके बाद मीरा ने अपना पूरा जीवन श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया। उनके पदों में कृष्ण के प्रति गहरी प्रेम-भक्ति, विरह-वेदना और समर्पण का अद्भुत चित्रण मिलता है। 'मेरे तो गिरधर गोपाल' उनका सबसे प्रसिद्ध पद है, जिसमें उन्होंने अपने पूर्ण समर्पण और सामाजिक बंधनों से मुक्ति का संदेश दिया है।
📖 पद पृष्ठभूमि
'मेरे तो गिरधर गोपाल' मीराबाई का सबसे प्रसिद्ध और प्रिय पद है। यह पद उनके जीवन-दर्शन और कृष्ण भक्ति का सार है। इसमें मीरा ने घोषणा की है कि उनके तो केवल गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) ही हैं - बाकी दुनिया से उनका कोई लेना-देना नहीं है।
यह पद उस समय की पृष्ठभूमि में लिखा गया जब मीरा के ससुराल वालों ने उनके कृष्ण-भक्ति के मार्ग का विरोध किया। राजपूताना की रूढ़िवादी सोच में राजघराने की बहू का सार्वजनिक रूप से भजन-कीर्तन करना और मंदिरों में जाना अच्छा नहीं माना जाता था। मीरा के ससुराल वालों ने उन्हें कई बार समझाया, धमकाया और यहाँ तक कि जान लेने का प्रयास भी किया। लेकिन मीरा अपनी भक्ति से डिगीं नहीं।
इस पद में मीरा ने स्पष्ट कर दिया है कि उनका सब कुछ केवल गिरधर गोपाल हैं। उन्हें संसार की किसी वस्तु या रिश्ते से कोई मतलब नहीं। उन्होंने संसार के तमाम बंधनों को तोड़ दिया है और केवल कृष्ण की शरण में हैं।
🎯 अध्याय का महत्व
कक्षा 11 की बोर्ड परीक्षा में यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष इससे 5-8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। मीरा की कृष्ण-भक्ति, उनके समर्पण की भावना, सामाजिक बंधनों से मुक्ति का संदेश, उनकी भाषा-शैली और काव्यगत विशेषताओं पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि मीरा ने 'मेरे तो गिरधर गोपाल' में अपनी भक्ति-भावना को कैसे अभिव्यक्त किया है? मीरा के समर्पण की क्या विशेषताएँ हैं? 'दूसरो न कोई' का क्या आशय है?
2. सरल सारांश
मीराबाई के इस प्रसिद्ध पद में वे अपनी कृष्ण-भक्ति और पूर्ण समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करती हैं।
मीरा कहती हैं - मेरे तो केवल गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) ही हैं। उनके अलावा मेरा कोई और नहीं है। मैंने इस संसार के सभी बंधनों को तोड़ दिया है और केवल कृष्ण की शरण में हूँ।
वे आगे कहती हैं - मुझे न कोई अपना है, न कोई बेगाना। न कोई मेरा मोह है, न कोई माया। न कोई मेरा पिता है, न माता। न कोई मेरा भाई है, न बंधु-बांधव। न कोई मेरा पति है, न पुत्र।
मीरा कहती हैं - मैंने सारे सांसारिक रिश्तों और बंधनों को त्याग दिया है। केवल कृष्ण ही मेरे सब कुछ हैं। वे मेरे पिता हैं, माता हैं, भाई हैं, पति हैं, पुत्र हैं - सब कुछ हैं।
वे कहती हैं - मुझे किसी के आने से कोई मतलब नहीं, किसी के जाने से कोई फर्क नहीं पड़ता। न कोई मेरा है, न मैं किसी की हूँ। केवल कृष्ण ही मेरे हैं, और मैं केवल कृष्ण की हूँ।
इस पद में मीरा ने अपने पूर्ण समर्पण और वैराग्य की भावना को बड़ी ही मार्मिकता से अभिव्यक्त किया है। उनका कृष्ण के प्रति प्रेम इतना गहरा है कि उनके लिए संसार की कोई वस्तु महत्वपूर्ण नहीं रह गई है।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 पद की पंक्तियाँ और व्याख्या
पंक्ति 1: मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।
मीरा कहती हैं - मेरे लिए केवल गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) हैं। उनके अलावा मेरा कोई और नहीं है। यह पंक्ति मीरा के पूर्ण समर्पण और एकनिष्ठ भक्ति को दर्शाती है। उनके जीवन का केंद्र केवल कृष्ण हैं।
पंक्ति 2: जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई।
जिसके सिर पर मोर-मुकुट है (श्रीकृष्ण), वही मेरा पति है। मीरा कृष्ण को अपना पति मानती हैं। यहाँ उन्होंने दाम्पत्य प्रेम के रूप में अपनी भक्ति को अभिव्यक्त किया है।
पंक्ति 3: तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई।
अब न कोई मेरा पिता है, न माता, न भाई, न बंधु-बांधव। मीरा कहती हैं कि उन्होंने सभी सांसारिक रिश्तों को त्याग दिया है। कोई भी उनका अपना नहीं रहा।
पंक्ति 4: छांड़ि दई कुल की कानि, कहा करिहै कोई।
मैंने अपने कुल-कबीले की मर्यादा और लोक-लाज को त्याग दिया है। अब कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है? मीरा ने सामाजिक बंधनों से मुक्त होने की घोषणा की है।
पंक्ति 5: संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोई।
संतों के पास बैठ-बैठकर (उनकी संगति में) मैंने अपनी लोक-लाज (सामाजिक मर्यादा) खो दी है। यानी संतों की संगति ने उन्हें सामाजिक बंधनों से मुक्त कर दिया।
पंक्ति 6: अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई।
मैंने अपने आँसुओं के जल से प्रेम-रूपी बेल को सींचा है। यहाँ मीरा ने विरह-वेदना और प्रेम के साधना-पक्ष को चित्रित किया है।
पंक्ति 7: अब तो बेल फैल गई, आण गई खोई।
अब यह प्रेम-बेल फैल गई है और मेरी आन-बान (अहंकार) खो गई है। प्रेम की साधना पूरी होने पर अहंकार का नाश हो जाता है।
पंक्ति 8: फूल गोकुल के द्वारे, खड़ी मीरा होई।
अब मीरा गोकुल के द्वार पर खड़ी है और फूल रही है (खिल रही है)। यहाँ गोकुल कृष्ण की नगरी है। मीरा अपने आराध्य के द्वार पर खड़ी होकर प्रसन्न है।
📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण
- पूर्ण समर्पण: मीरा की भक्ति की सबसे बड़ी विशेषता है उनका पूर्ण समर्पण। वे कहती हैं - 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'। उनके जीवन में कृष्ण के अलावा कुछ भी नहीं है।
- सांसारिक बंधनों का त्याग: मीरा ने पिता, माता, भाई, पति, पुत्र सभी सांसारिक रिश्तों को त्याग दिया है। उनके लिए अब केवल कृष्ण ही सब कुछ हैं।
- लोक-लाज का त्याग: मीरा ने समाज की मर्यादा और लोक-लाज को भी त्याग दिया है। वे कहती हैं - 'कहा करिहै कोई' - अब कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है।
- प्रेम-साधना: मीरा ने अपनी प्रेम-साधना का वर्णन किया है। उन्होंने अपने आँसुओं से प्रेम-बेल को सींचा है। यह विरह-वेदना और तपस्या का प्रतीक है।
- अहंकार का नाश: प्रेम-साधना के फलस्वरूप मीरा का अहंकार नष्ट हो गया है। 'आण गई खोई' - उनकी आन-बान (अहंकार) खो गई है।
- आध्यात्मिक उपलब्धि: अंत में मीरा कृष्ण के द्वार पर खड़ी हैं और खिल रही हैं। यह उनकी आध्यात्मिक उपलब्धि का प्रतीक है।
📌 विषय / Theme
इस पद का मुख्य विषय कृष्ण के प्रति मीरा का पूर्ण समर्पण और एकनिष्ठ भक्ति है। यह दर्शाता है कि सच्ची भक्ति के लिए सांसारिक बंधनों और सामाजिक मर्यादाओं को त्यागना पड़ता है। दूसरा महत्वपूर्ण विषय है प्रेम-साधना और विरह-वेदना। तीसरा विषय है अहंकार का नाश और आध्यात्मिक उपलब्धि।
📌 सामाजिक संदेश
मीरा का यह पद समाज को यह संदेश देता है कि सच्ची भक्ति के लिए सामाजिक बंधनों और मर्यादाओं से ऊपर उठना पड़ता है। यह उन रूढ़ियों और परंपराओं पर व्यंग्य है जो व्यक्ति की आध्यात्मिक यात्रा में बाधक बनती हैं। मीरा ने यह भी दिखाया है कि एक महिला भी पुरुषों की तरह ही उच्च कोटि की आध्यात्मिक साधना कर सकती है।
📌 नैतिक शिक्षा
- पूर्ण समर्पण: सच्ची भक्ति के लिए पूर्ण समर्पण आवश्यक है।
- बंधनों से मुक्ति: आध्यात्मिक यात्रा के लिए सांसारिक बंधनों से मुक्त होना आवश्यक है।
- लोक-लाज का त्याग: सत्य के मार्ग पर चलने के लिए लोक-लाज का त्याग करना पड़ सकता है।
- प्रेम की साधना: सच्चा प्रेम साधना माँगता है, उसमें आँसू भी हैं, तपस्या भी।
- अहंकार का नाश: सच्ची भक्ति से अहंकार का नाश होता है।
4. काव्य सौंदर्य
📌 भाषा-शैली
- राजस्थानी भाषा का मिश्रण: मीरा की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। 'छांड़ि दई', 'कहा करिहै', 'आण' जैसे शब्द राजस्थानी के हैं।
- सरलता और सहजता: मीरा की भाषा बहुत सरल और सहज है। वे अपने भावों को बिना किसी जटिलता के अभिव्यक्त करती हैं।
- भावुकता: उनकी भाषा में गहरी भावुकता है। प्रेम, समर्पण, विरह-वेदना सभी भाव सहज रूप से अभिव्यक्त हुए हैं।
📌 अलंकार
- अनुप्रास अलंकार: 'बैठि-बैठि', 'सींचि-सींचि' में पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
- रूपक अलंकार: 'प्रेम-बेलि' में प्रेम को बेल (लता) के रूप में चित्रित किया गया है।
- उपमा अलंकार: 'अँसुवन जल' में आँसुओं की तुलना जल से की गई है।
📌 छंद
यह पद 'गीतिका' छंद में रचित है। इसमें 24 मात्राओं का छंद है जो गेय और प्रवाहपूर्ण है। मीरा के पद गाने के लिए ही रचे गए थे।
📌 रस
इस पद में 'माधुर्य भक्ति रस' की प्रधानता है। कृष्ण के प्रति प्रेम और समर्पण से माधुर्य भक्ति रस का संचार होता है। साथ ही, विरह-वेदना के कारण 'करुण रस' का भी पुट है।
📌 काव्यगत विशेषताएँ
- आत्मनिवेदन: यह पद मीरा का आत्मनिवेदन है। वे अपने मन की बात कह रही हैं।
- दाम्पत्य प्रेम की अभिव्यक्ति: मीरा ने कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को पति-पत्नी के रूप में अभिव्यक्त किया है।
- विरह-वेदना: उनके पदों में विरह-वेदना की गहरी अभिव्यक्ति है।
- समर्पण की भावना: हर पंक्ति में कृष्ण के प्रति उनके पूर्ण समर्पण की भावना दिखती है।
- सामाजिक बंधनों का विरोध: उन्होंने सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों का खुलकर विरोध किया है।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| गिरधर गोपाल | गोवर्धन पर्वत धारण करने वाले कृष्ण | मीरा के आराध्य गिरधर गोपाल हैं। |
| दूसरो | दूसरा, अन्य | दूसरो न कोई - कोई और नहीं। |
| जाके | जिसके | जाके सिर - जिसके सिर पर। |
| मोर-मुकुट | मोर पंखों का मुकुट | कृष्ण के सिर पर मोर-मुकुट है। |
| तात | पिता | तात मात - पिता और माता। |
| भ्रात | भाई | भ्रात बंधु - भाई और संबंधी। |
| कानि | लाज, मर्यादा | कुल की कानि - कुल की मर्यादा। |
| कहा करिहै | क्या करेगा | कहा करिहै कोई - कोई क्या करेगा। |
| संतन | संतों के | संतन ढिग - संतों के पास। |
| ढिग | पास, समीप | संतन ढिग बैठि - संतों के पास बैठकर। |
| लोक-लाज | समाज की लाज, मर्यादा | लोक-लाज खोई - समाज की मर्यादा त्याग दी। |
| अँसुवन | आँसुओं | अँसुवन जल - आँसुओं का जल। |
| बेलि | बेल, लता | प्रेम-बेलि - प्रेम रूपी बेल। |
| आण | आन, प्रतिष्ठा, अहंकार | आण गई खोई - अहंकार नष्ट हो गया। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)
प्रश्न 1: 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई' - इस पंक्ति में मीरा के किन भावों की अभिव्यक्ति हुई है? [CBSE 2023, 2021]
'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई' - इस एक पंक्ति में मीरा के अनेक भाव अभिव्यक्त हुए हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण भाव है उनका पूर्ण समर्पण। वे कहती हैं कि उनके जीवन में केवल गिरधर गोपाल (श्रीकृष्ण) हैं। दूसरा भाव है एकनिष्ठता। उनके लिए कृष्ण के अलावा कोई और नहीं है। तीसरा भाव है सांसारिक बंधनों से मुक्ति। उन्होंने सभी रिश्तों को त्याग दिया है और केवल कृष्ण की शरण में हैं। चौथा भाव है उनका साहस। वे निडर होकर यह घोषणा कर रही हैं, चाहे समाज उनका कितना भी विरोध करे। यह पंक्ति मीरा की भक्ति का सार है।
प्रश्न 2: मीरा ने किन-किन सांसारिक बंधनों को त्याग दिया है? उनका त्याग क्यों महत्वपूर्ण है? [CBSE 2022, 2020]
मीरा ने इस पद में अनेक सांसारिक बंधनों को त्यागने की बात कही है। वे कहती हैं - 'तात मात भ्रात बंधु, आपनो न कोई' यानी अब न कोई उनका पिता है, न माता, न भाई, न बंधु-बांधव। उन्होंने कुल-की कानि (कुल की मर्यादा) और लोक-लाज (समाज की लाज) को भी त्याग दिया है। यह त्याग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके समय में राजघराने की बहू के लिए यह सब त्यागना बहुत बड़ी बात थी। उन्होंने दिखाया कि सच्ची भक्ति के लिए सामाजिक बंधनों से ऊपर उठना पड़ता है। उनका यह त्याग आध्यात्मिक यात्रा का एक आवश्यक चरण था।
प्रश्न 3: 'अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई' - इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2023, 2019]
'अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई' का अर्थ है - मैंने अपने आँसुओं के जल से प्रेम-रूपी बेल (लता) को सींचा है। इस पंक्ति में मीरा ने अपनी प्रेम-साधना का वर्णन किया है। 'आँसुओं' से उनका तात्पर्य विरह-वेदना से है। वे कहती हैं कि उनके प्रेम की यह बेल उनके विरह के आँसुओं से सींची गई है। यानी उनकी प्रेम-साधना में बहुत विरह और वेदना है। 'बेल' का अर्थ है कि उनका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ा है, जैसे बेल बढ़ती है। यह पंक्ति मीरा की गहरी विरह-वेदना और उनकी तपस्या को दर्शाती है।
प्रश्न 4: 'आण गई खोई' का क्या आशय है? मीरा के इस कथन का क्या महत्व है? [CBSE 2021, 2020]
'आण गई खोई' का अर्थ है - मेरी आन-बान (अहंकार) खो गई है। मीरा कहती हैं कि उनके प्रेम-साधना के फलस्वरूप उनका अहंकार नष्ट हो गया है। यह एक आध्यात्मिक उपलब्धि है। भक्ति के क्षेत्र में अहंकार का नाश होना सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जाती है। जब तक अहंकार रहता है, तब तक ईश्वर से पूर्ण मिलन संभव नहीं है। मीरा का यह कथन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दर्शाता है कि वे उच्च कोटि की आध्यात्मिक अवस्था में पहुँच चुकी हैं, जहाँ अहंकार का सर्वथा नाश हो जाता है।
प्रश्न 5: मीरा के इस पद में संतों की संगति का क्या महत्व बताया गया है? [CBSE 2022]
मीरा ने इस पद में संतों की संगति का बहुत महत्व बताया है। वे कहती हैं - 'संतन ढिग बैठि-बैठि, लोक-लाज खोई'। यानी संतों के पास बैठ-बैठकर उन्होंने अपनी लोक-लाज खो दी। संतों की संगति ने उन्हें सामाजिक बंधनों और मर्यादाओं से मुक्त किया। संतों के सान्निध्य में रहकर उन्हें यह समझ में आया कि सच्ची भक्ति के लिए लोक-लाज का त्याग करना पड़ता है। संतों की संगति ने उनके भीतर का डर समाप्त किया और उन्हें निडर बनाया। यहाँ मीरा ने संत-समागम या सत्संग के महत्व को रेखांकित किया है।
7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)
प्रश्न 1: मीरा के 'मेरे तो गिरधर गोपाल' पद में उनकी भक्ति-भावना के विविध रूपों का विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2023, 2021, 2019]
मीरा के 'मेरे तो गिरधर गोपाल' पद में उनकी भक्ति-भावना के अनेक रूप अभिव्यक्त हुए हैं।
- दाम्पत्य प्रेम के रूप में भक्ति: मीरा ने कृष्ण के प्रति अपनी भक्ति को पति-पत्नी के प्रेम के रूप में अभिव्यक्त किया है। वे कहती हैं - 'जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई'। उनके लिए कृष्उनके पति हैं। यह माधुर्य भाव की भक्ति है।
- समर्पण के रूप में भक्ति: उनकी भक्ति का सबसे बड़ा रूप है पूर्ण समर्पण। वे कहती हैं - 'मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई'। उनके जीवन में कृष्ण के अलावा कुछ भी नहीं है।
- वैराग्य के रूप में भक्ति: उन्होंने सभी सांसारिक रिश्तों - पिता, माता, भाई, बंधु - को त्याग दिया है। यह वैराग्य भक्ति का एक आवश्यक अंग है।
- विरह-वेदना के रूप में भक्ति: 'अँसुवन जल सींचि-सींचि' से उनकी विरह-वेदना का पता चलता है। उनकी भक्ति में विरह की गहरी पीड़ा है।
- साधना के रूप में भक्ति: उन्होंने अपनी भक्ति को एक साधना के रूप में चित्रित किया है। उन्होंने अपने आँसुओं से प्रेम-बेल को सींचा है।
- आनंद के रूप में भक्ति: अंत में जब अहंकार नष्ट हो जाता है और वे गोकुल के द्वार पर खड़ी होती हैं, तो वहाँ आनंद है, प्रसन्नता है।
इस प्रकार, मीरा के इस एक पद में उनकी भक्ति के अनेक रूप - दाम्पत्य प्रेम, समर्पण, वैराग्य, विरह-वेदना, साधना और आनंद - सभी का सुंदर चित्रण हुआ है।
प्रश्न 2: मीरा के इस पद को सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों के विरोध के रूप में देखा जा सकता है। स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2022, 2020]
मीरा का यह पद सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों के विरोध का एक सशक्त दस्तावेज है।
- राजघराने की बहू का विद्रोह: मीरा एक राजघराने की बहू थीं। उनसे अपेक्षा थी कि वे राज-मर्यादा का पालन करें, लोक-लाज का ध्यान रखें। लेकिन उन्होंने यह सब त्याग दिया। यह एक बड़ा सामाजिक विद्रोह था।
- पारिवारिक बंधनों का त्याग: उन्होंने पिता, माता, भाई, बंधु सभी को त्याग दिया। एक विवाहिता स्त्री के लिए यह सबसे बड़ा विद्रोह था।
- लोक-लाज का त्याग: 'लोक-लाज खोई' कहकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें समाज की मर्यादा से कोई मतलब नहीं है। यह समाज के प्रति एक चुनौती थी।
- निडरता: 'कहा करिहै कोई' - यह पंक्ति उनकी निडरता को दर्शाती है। वे कहती हैं कि अब कोई उनका क्या बिगाड़ सकता है।
- संतों की संगति: उन्होंने संतों की संगति को महत्व दिया, न कि राज-दरबार की मर्यादा को। यह भी एक विद्रोह था।
- स्त्री-स्वातंत्र्य: उन्होंने दिखाया कि एक स्त्री भी अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुन सकती है, चाहे समाज कितना भी विरोध करे।
इस प्रकार, मीरा का यह पद उस समय की सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध एक सशक्त विद्रोह है। उन्होंने साबित किया कि सच्ची भक्ति के लिए सामाजिक बंधनों से ऊपर उठना पड़ता है।
प्रश्न 3: मीरा के इस पद की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2021, 2019]
मीरा के इस पद में अनेक काव्यगत विशेषताएँ हैं।
- भाषा: मीरा की भाषा में राजस्थानी, ब्रज और गुजराती का मिश्रण है। यह भाषा सरल, सहज और भावपूर्ण है। 'छांड़ि दई', 'कहा करिहै', 'आण' जैसे शब्द राजस्थानी के हैं।
- शैली: उनकी शैली आत्मनिवेदनात्मक है। वे अपने मन की बात सीधे-सीधे कहती हैं। उनके पदों में संगीतात्मकता है, वे गाने के लिए ही रचे गए हैं।
- अलंकार: इस पद में अनुप्रास ('बैठि-बैठि', 'सींचि-सींचि'), रूपक ('प्रेम-बेलि'), उपमा ('अँसुवन जल') जैसे अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
- भाव-पक्ष: भाव-पक्ष की दृष्टि से यह पद अत्यंत समृद्ध है। इसमें समर्पण, वैराग्य, विरह-वेदना, साधना और आनंद - सभी भावों का सुंदर चित्रण है।
- माधुर्य भक्ति रस: इस पद में माधुर्य भक्ति रस की प्रधानता है। कृष्ण को पति के रूप में देखना माधुर्य भाव की भक्ति है।
- सहज अभिव्यक्ति: मीरा की सबसे बड़ी विशेषता है उनकी सहज अभिव्यक्ति। वे बिना किसी जटिलता के अपने भावों को अभिव्यक्त करती हैं।
- प्रतीक योजना: 'प्रेम-बेलि', 'अँसुवन जल', 'गोकुल के द्वार' जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
इस प्रकार, काव्यगत दृष्टि से मीरा का यह पद अत्यंत समृद्ध है। सरल भाषा, सहज शैली, सुंदर अलंकार और गहरे भाव - सब कुछ मिलकर इसे एक अमर रचना बनाते हैं।
प्रश्न 4: 'अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई' और 'अब तो बेल फैल गई, आण गई खोई' - इन पंक्तियों के माध्यम से मीरा ने अपनी प्रेम-साधना के विभिन्न चरणों का वर्णन किया है। विस्तार से समझाइए। [CBSE 2020]
मीरा ने 'अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई' और 'अब तो बेल फैल गई, आण गई खोई' पंक्तियों के माध्यम से अपनी प्रेम-साधना के विभिन्न चरणों का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।
प्रथम चरण - बीज बोना: 'प्रेम-बेलि बोई' - उन्होंने प्रेम-रूपी बेल का बीज बोया। यह उनकी भक्ति का आरंभिक चरण है, जब उनके हृदय में कृष्ण के प्रति प्रेम का उदय हुआ।
द्वितीय चरण - सींचना (साधना): 'अँसुवन जल सींचि-सींचि' - उन्होंने इस प्रेम-बेल को अपने आँसुओं के जल से सींचा। यहाँ 'आँसू' विरह-वेदना और तपस्या के प्रतीक हैं। यह उनकी भक्ति का साधना-चरण है। इस चरण में बहुत विरह है, बहुत पीड़ा है, बहुत तपस्या है।
तृतीय चरण - विस्तार: 'अब तो बेल फैल गई' - अब यह प्रेम-बेल फैल गई है। यानी उनका प्रेम अब पूर्ण रूप से विकसित हो गया है। यह उनकी भक्ति के परिपक्व होने का चरण है।
चतुर्थ चरण - अहंकार का नाश: 'आण गई खोई' - इस प्रेम-साधना के फलस्वरूप उनका अहंकार नष्ट हो गया है। यह साधना की सबसे बड़ी उपलब्धि है। जब तक अहंकार रहता है, तब तक ईश्वर से पूर्ण मिलन संभव नहीं है।
पंचम चरण - मिलन: 'फूल गोकुल के द्वारे, खड़ी मीरा होई' - अब मीरा कृष्ण की नगरी गोकुल के द्वार पर खड़ी हैं और फूल रही हैं। यह मिलन का चरण है, आनंद का चरण है।
इस प्रकार, इन पंक्तियों में मीरा ने अपनी प्रेम-साधना के सभी चरणों - बीज बोना, सींचना, विस्तार, अहंकार-नाश और मिलन - का सुंदर चित्रण किया है। यह एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा है।
प्रश्न 5: मीरा के इस पद की आज के समाज में क्या प्रासंगिकता है? विस्तार से चर्चा कीजिए। [CBSE 2021]
मीरा का यह पद आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
- स्त्री-स्वातंत्र्य का संदेश: आज भी समाज में स्त्रियों पर अनेक बंधन हैं। मीरा का यह पद स्त्रियों को अपने जीवन का मार्ग स्वयं चुनने का साहस देता है। वह उन्हें सिखाती है कि समाज की मर्यादा से बढ़कर अपनी आत्मा की आवाज है।
- आध्यात्मिक स्वतंत्रता: आज के भौतिकवादी युग में आध्यात्मिक स्वतंत्रता का महत्व और बढ़ गया है। मीरा हमें याद दिलाती हैं कि सच्चा सुख बाहरी वस्तुओं में नहीं, आंतरिक शांति में है।
- सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज: आज भी समाज में कई रूढ़ियाँ हैं जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को बाँधती हैं। मीरा का यह पद उन रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाने का साहस देता है।
- समर्पण का महत्व: आज के प्रतिस्पर्धा के युग में, जहाँ हर कोई पाने की होड़ में है, मीरा का समर्पण हमें सिखाता है कि जीवन में किसी न किसी के प्रति पूर्ण समर्पण भी आवश्यक है।
- साधना का महत्व: आज के त्वरित परिणाम के युग में, मीरा की लंबी साधना हमें धैर्य और लगन का महत्व सिखाती है।
- निडरता: 'कहा करिहै कोई' - यह निडरता का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है। हमें निडर होकर अपने सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए।
इस प्रकार, मीरा का यह पद 500 साल पहले लिखा गया था, लेकिन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह हमें साहस, समर्पण, साधना और स्वतंत्रता का संदेश देता है।
8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न
- मीरा के समर्पण और एकनिष्ठ भक्ति का वर्णन - 2023, 2021, 2019
- सांसारिक बंधनों और लोक-लाज के त्याग का महत्व - 2022, 2020, 2018
- 'अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई' की व्याख्या - 2023, 2021, 2019
- 'आण गई खोई' का आशय - 2022, 2020
- मीरा की भक्ति-भावना के विविध रूप - 2021, 2020, 2019
- काव्यगत विशेषताएँ - 2022, 2021
📈 बोर्ड ट्रेंड
पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस पद से प्रतिवर्ष 5-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में प्रमुख पंक्तियों के अर्थ, मीरा के समर्पण और सांसारिक बंधनों के त्याग पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में मीरा की भक्ति-भावना का विश्लेषण, सामाजिक बंधनों के विरोध के रूप में पद की व्याख्या और काव्यगत विशेषताओं पर प्रश्न आते हैं।
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- कवयित्री - मीराबाई
- जन्म - 1498 (लगभग), मृत्यु - 1546 (लगभग)
- पति - राजकुमार भोजराज
- आराध्य - श्रीकृष्ण (गिरधर गोपाल)
- प्रमुख रचनाएँ - मीरा की पदावली, गीत गोविंद की टीका
- भाषा - राजस्थानी, ब्रज, गुजराती का मिश्रण
- पुस्तक - आरोह भाग 1
- पद का नाम - मेरे तो गिरधर गोपाल
- मुख्य विषय - कृष्ण भक्ति, पूर्ण समर्पण, सामाजिक बंधनों का त्याग
- धारा - सगुण भक्ति धारा (माधुर्य भाव)
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।"
"जाके सिर मोर-मुकुट, मेरो पति सोई।"
"अँसुवन जल सींचि-सींचि, प्रेम-बेलि बोई।"
9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)
एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।
उदाहरण: प्रश्न - 'मेरे तो गिरधर गोपाल' पद की कवयित्री कौन हैं? उत्तर - मीराबाई।
📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)
परिचय (1 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु का उदाहरण सहित वर्णन।
उदाहरण: प्रश्न - मीरा ने किन-किन सांसारिक बंधनों को त्याग दिया है? उत्तर - परिचय में बताएँ कि मीरा ने अपने पद में सांसारिक बंधनों के त्याग की बात कही है। फिर पारिवारिक बंधनों (पिता, माता, भाई), कुल की मर्यादा, लोक-लाज - तीन बिंदुओं में समझाएँ। निष्कर्ष में कहें कि यह त्याग उनकी भक्ति-यात्रा का आवश्यक चरण था।
📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)
भक्ति-भावना के विश्लेषण के लिए: प्रस्तावना + मीरा का परिचय + पद का मूलभाव + भक्ति के विविध रूपों का विश्लेषण + निष्कर्ष। जैसे मीरा की भक्ति-भावना पर प्रश्न - पहले मीरा का परिचय दें, फिर पद का मूलभाव समझाएँ, फिर दाम्पत्य प्रेम, समर्पण, वैराग्य, विरह-वेदना, साधना और आनंद के रूप में भक्ति का विश्लेषण करें, अंत में निष्कर्ष दें।
10. हब लिंक
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