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कक्षा 11 अध्याय 6 – खानाबदोश – ओमप्रकाश वाल्मीकि (अंतरा भाग 1 – गद्य) | GPN

📘 पाठ – खानाबदोश | कक्षा 11 हिंदी (अंतरा भाग 1, गद्य खंड) | GPN

📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: अंतरा भाग 1 (गद्य खंड) | ✍️ लेखक: ओमप्रकाश वाल्मीकि | 📝 प्रकार: आत्मकथात्मक संस्मरण | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: बहुत उच्च]


📌 अनुक्रमणिका

इस विषय को बेहतर समझने के लिए छात्र कक्षा 11 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 लेखक परिचय - ओमप्रकाश वाल्मीकि

जन्म: 30 जून 1950, बरला (मुजफ्फरनगर, उत्तर प्रदेश)

मृत्यु: 17 नवंबर 2013

प्रमुख रचनाएँ: जूठन, सदियों का संताप, सलाम, बस! बहुत हो चुका, अब और नहीं, घुसपैठिए

ओमप्रकाश वाल्मीकि दलित साहित्य के सबसे प्रमुख हस्ताक्षरों में से एक हैं। उन्होंने अपने लेखन में दलित जीवन की वास्तविकता, संघर्ष, पीड़ा और अस्मिता की तलाश को बड़ी गहराई से उकेरा। उनकी रचनाओं में व्यवस्था के खिलाफ गहरा आक्रोश है, लेकिन साथ ही संवेदनशीलता और मानवीयता भी।

'खानाबदोश' उनकी चर्चित आत्मकथात्मक कृति है। इसमें उन्होंने अपने जीवन के उस दौर को याद किया है जब उनका परिवार गाँव छोड़कर शहर आया था। एक खानाबदोश की तरह जीवन जीना, जगह-जगह भटकना, नौकरी की तलाश करना, छुआछूत का सामना करना, संघर्ष करना - इन सबका बड़ा ही मार्मिक चित्रण है इस पाठ में।

📖 पाठ की पृष्ठभूमि

यह पाठ ओमप्रकाश वाल्मीकि के जीवन के संघर्षों पर आधारित है। वे एक दलित परिवार में पैदा हुए। बचपन से ही उन्होंने जाति के आधार पर भेदभाव झेला। छुआछूत की वह घटना जिसमें उन्हें अपनी ही बस्ती के कुएँ से पानी नहीं भरने दिया गया, उनके जीवन की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है। इस घटना ने उनके मन पर गहरी चोट की।

इस पाठ में वे अपने गाँव से शहर आने की कहानी कहते हैं। गाँव में उनकी स्थिति अच्छी नहीं थी। जमीन-जायदाद कुछ नहीं था। खेती-बाड़ी से कोई मतलब नहीं था। काम की तलाश में उनके पिता शहर चले गए थे। फिर धीरे-धीरे पूरा परिवार शहर आ गया। शहर में भी संघर्ष कम नहीं था। रहने को जगह नहीं, खाने को भरपेट खाना नहीं, काम की तलाश, ऊँची जातियों का तिरस्कार - यह सब उन्हें झेलना पड़ा।

लेखक ने इस पाठ में खानाबदोश शब्द का इस्तेमाल अपने परिवार की उस स्थिति के लिए किया है जो एक जगह टिककर नहीं रह सकते। वे हमेशा भटकते रहते हैं, जगह-जगह ठिकाना बदलते रहते हैं। यह उन गरीब और दलित परिवारों की कहानी है जो रोजी-रोटी की तलाश में अपना घर-बार छोड़कर शहरों की ओर भागते हैं, लेकिन शहर उन्हें अपना नहीं लेते।

🎯 अध्याय का महत्व

कक्षा 11 की परीक्षा में यह पाठ अत्यंत महत्वपूर्ण है। दलित जीवन का यथार्थ, संघर्ष, छुआछूत की समस्या, शहरों की ओर पलायन, पहचान की तलाश - इन सब पर प्रश्न पूछे जाते हैं। लेखक की आत्मकथात्मक शैली, भाषा की सादगी और मार्मिकता भी परीक्षा की दृष्टि से उपयोगी है। यह पाठ सामाजिक न्याय की अवधारणा को समझने में भी मदद करता है।

2. सरल सारांश

यह पाठ ओमप्रकाश वाल्मीकि के जीवन के संघर्षों की कहानी है। वे बताते हैं कि उनका परिवार गाँव में बहुत गरीब था। उनके पिता काम की तलाश में शहर चले गए थे। कुछ दिन बाद वे लौटे और पूरे परिवार को शहर ले गए। लेखक उस समय छोटे थे। उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। बस इतना पता था कि वे अपना गाँव छोड़ रहे हैं।

शहर पहुँचकर उन्होंने देखा कि जीवन और भी कठिन है। रहने के लिए एक छोटी-सी झुग्गी मिली। चारों तरफ गंदगी, बदबू, भीड़। पिता को मजदूरी मिल जाती, तो घर में खाना बनता, नहीं तो भूखे रहना पड़ता। लेखक को स्कूल भेजा गया। स्कूल में भी उन्हें जाति का भेदभाव झेलना पड़ा। ऊँची जाति के बच्चे उनसे दूर रहते। अध्यापक भी उनसे अलग व्यवहार करते।

एक घटना लेखक ने बड़ी मार्मिकता से लिखी है। उनकी बस्ती में एक कुआँ था। सब लोग उसी से पानी भरते थे। एक दिन वे भी पानी भरने गए। तभी एक ऊँची जाति के व्यक्ति ने उन्हें रोक दिया। बोला - "तू काहे का है?" लेखक ने बताया - "वाल्मीकि"। सुनते ही वह भड़क गया - "अच्छा, चूहा-मार! यहाँ से भाग जा, नहीं तो खोपड़ी फोड़ दूँगा।" लेखक के मन पर यह घटना गहरी चोट कर गई। उसे समझ में आया कि उसकी जाति के कारण उसे कितना कुछ सहना पड़ेगा।

इस घटना के बाद लेखक के मन में पढ़ाई के प्रति और गहरी ललक पैदा हुई। उसने ठान लिया कि वह पढ़ेगा और कुछ बनेगा। उसने देखा कि उसके आसपास के लोग कैसे संघर्ष कर रहे हैं। उनके पास न कोई सहारा है, न कोई सुनने वाला। वे सब खानाबदोशों की तरह जी रहे हैं - एक जगह टिक नहीं पा रहे, हमेशा भटक रहे हैं।

लेखक कहता है कि उसका परिवार और उसके जैसे हज़ारों परिवार खानाबदोश हैं। उनका कोई ठिकाना नहीं, कोई पहचान नहीं। वे रोजी-रोटी के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं। समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। वे हाशिए पर जीने को मजबूर हैं।

3. विस्तृत व्याख्या

📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण

  • खानाबदोश का अर्थ: खानाबदोश शब्द का शाब्दिक अर्थ है - बिना ठिकाने वाला, एक जगह न रहने वाला। लेखक ने इस शब्द का इस्तेमाल अपने परिवार और अपने जैसे गरीब, दलित परिवारों के लिए किया है जो रोजी-रोटी की तलाश में इधर-उधर भटकते हैं, लेकिन कहीं टिक नहीं पाते।
  • गाँव से शहर की ओर पलायन: लेखक का परिवार गाँव छोड़कर शहर आ गया। यह उन लाखों परिवारों की कहानी है जो रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करते हैं। गाँव में उनके पास कुछ नहीं था, शहर में भी कुछ नहीं मिला।
  • जाति का भेदभाव: पाठ में जाति के भेदभाव को बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया गया है। कुएँ वाली घटना इस भेदभाव की चरम अभिव्यक्ति है। एक इंसान को सिर्फ इसलिए पानी नहीं भरने दिया जाता क्योंकि वह किसी खास जाति का है।
  • शिक्षा की ललक: भेदभाव और संघर्ष के बावजूद लेखक के मन में पढ़ने की गहरी ललक थी। वह जानता था कि शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जो उसे इस जीवन से बाहर निकाल सकता है।
  • पहचान की तलाश: लेखक और उसके जैसे लोगों की सबसे बड़ी समस्या है - पहचान की तलाश। समाज उन्हें पहचानता नहीं, स्वीकार नहीं करता। वे नाम से जाने जाते हैं, लेकिन उनकी कोई असली पहचान नहीं है।
  • हाशियाकरण: यह पाठ उन लोगों की कहानी है जो समाज के हाशिए पर जीने को मजबूर हैं। उनकी कोई आवाज नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। वे चुपचाप अपना जीवन जीते हैं और मर जाते हैं।

📌 विषय / Theme

इस पाठ के कई विषय हैं। पहला विषय है - दलित जीवन का यथार्थ। दूसरा विषय है - जाति-व्यवस्था और भेदभाव। तीसरा विषय है - गरीबी और पलायन। चौथा विषय है - शिक्षा का महत्व। पाँचवाँ विषय है - पहचान की तलाश। छठा विषय है - हाशियाकरण और मूक पीड़ा।

📌 सामाजिक संदेश

ओमप्रकाश वाल्मीकि समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि जाति के आधार पर भेदभाव करना सबसे बड़ा पाप है। एक इंसान को सिर्फ इसलिए नीचा नहीं दिखाया जा सकता क्योंकि वह किसी खास जाति में पैदा हुआ है। समाज को हाशिए पर पड़े लोगों की पीड़ा समझनी चाहिए। उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयास करने चाहिए। शिक्षा ही एकमात्र ऐसा हथियार है जो इस व्यवस्था को बदल सकता है।

📌 नैतिक शिक्षा

  • भेदभाव मत करो: किसी भी व्यक्ति के साथ जाति, धर्म, भाषा के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।
  • संघर्ष से मत डरो: लेखक ने कितने संघर्ष झेले, लेकिन हार नहीं मानी। संघर्ष से डरना नहीं चाहिए।
  • शिक्षा का महत्व: शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जो जीवन बदल सकता है। इसलिए पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।
  • मानवता सबसे बड़ी: जाति-पाति से बड़ी मानवता है। इंसान को इंसान की पीड़ा समझनी चाहिए।
  • आवाज उठाओ: गलत हो रहा है, तो चुप मत रहो। आवाज उठाओ।

4. पात्र चित्रण

🧑 ओमप्रकाश वाल्मीकि (लेखक बालक)

स्वभाव: लेखक इस पाठ में स्वयं एक बालक के रूप में उपस्थित हैं। वे बहुत संवेदनशील हैं। उनके मन पर जातिगत भेदभाव की घटनाएँ गहरी चोट करती हैं। वे सवाल करते हैं, लेकिन डर भी लगता है। उनमें पढ़ने की गहरी ललक है। वे जानते हैं कि शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जो उन्हें इस जीवन से बाहर निकाल सकती है। वे चुप रहकर सब कुछ सहने वाले नहीं हैं, लेकिन विरोध करने की ताकत भी नहीं है। उनकी चुप्पी में एक गहरी पीड़ा है, एक गहरा आक्रोश है।

भूमिका: यह बालक उन लाखों दलित बच्चों का प्रतिनिधित्व करता है जो भेदभाव झेलते हैं, संघर्ष करते हैं, लेकिन फिर भी आगे बढ़ने की कोशिश करते हैं।

प्रमुख घटनाएँ: गाँव से शहर आना, झुग्गी में रहना, कुएँ से पानी भरने की घटना, पढ़ाई के प्रति ललक, संघर्षों को देखना।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: लेखक बालक - संवेदनशील, जिज्ञासु, पीड़ित, शिक्षा की ललक रखने वाला, हाशिए के समाज का प्रतिनिधि।

🧑 लेखक के पिता

स्वभाव: लेखक के पिता एक गरीब मजदूर हैं। वे परिवार के लिए रोजी-रोटी कमाने के लिए संघर्ष करते हैं। गाँव में काम न मिलने पर वे शहर चले गए। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनें। लेकिन उनके पास साधन नहीं हैं। वे चुप रहकर सब कुछ सह लेते हैं। उनमें कोई विद्रोह नहीं है, बस जीवन यापन की जद्दोजहद है।

भूमिका: वे उन लाखों गरीब मजदूरों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अपने परिवार के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन फिर भी गरीबी से बाहर नहीं निकल पाते।

प्रमुख घटनाएँ: गाँव से शहर जाना, मजदूरी करना, परिवार का पेट पालना।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: पिता - संघर्षशील, चुप, जिम्मेदार, गरीबी से लड़ने वाला।

🧑 ऊँची जाति का व्यक्ति (कुएँ वाला)

स्वभाव: यह व्यक्ति उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जो जाति के आधार पर भेदभाव करती है। वह लेखक को कुएँ से पानी भरने से रोकता है। उसकी भाषा में गुस्सा है, तिरस्कार है, घृणा है। वह लेखक को 'चूहा-मार' कहता है। वह उसे धमकाता है। यह घटना दिखाती है कि ऊँची जाति के लोग निचली जातियों को कितना नीचा देखते हैं।

भूमिका: यह व्यक्ति उस सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जो जाति के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देती है।

प्रमुख घटनाएँ: लेखक को कुएँ से पानी भरने से रोकना, उसे 'चूहा-मार' कहना, धमकी देना।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: ऊँची जाति का व्यक्ति - क्रूर, संवेदनहीन, जातिवादी सोच वाला, सामाजिक व्यवस्था का प्रतिनिधि।

🧑 खानाबदोश समाज

स्वभाव: यह कोई एक पात्र नहीं, बल्कि एक समूह है। इसमें वे सभी लोग शामिल हैं जो लेखक की बस्ती में रहते हैं। वे सब गरीब हैं, मजदूर हैं, संघर्षशील हैं। उनका कोई ठिकाना नहीं, कोई पहचान नहीं। वे रोजी-रोटी के लिए एक जगह से दूसरी जगह भटकते हैं। वे समाज के हाशिए पर जीते हैं। उनकी कोई आवाज नहीं, कोई सुनने वाला नहीं।

भूमिका: यह समूह उन लाखों गरीब, दलित, प्रवासी परिवारों का प्रतिनिधित्व करता है जो खानाबदोशों की तरह जीवन जीने को मजबूर हैं।

प्रमुख घटनाएँ: बस्ती में रहना, संघर्ष करना, भटकना।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: खानाबदोश समाज - गरीब, हाशिए पर, संघर्षशील, आवाज़हीन।

विषय की व्यापक समझ विकसित करने के लिए छात्र कक्षा 12 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 12 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

5. शब्दार्थ

शब्द अर्थ वाक्य प्रयोग
खानाबदोशबिना ठिकाने वाला, एक जगह न रहने वाला, nomadउनका परिवार खानाबदोशों की तरह जी रहा था।
दलितकुचला हुआ, शोषित वर्गदलितों के साथ बुरा व्यवहार होता था।
छुआछूतspread by touch, untouchabilityछुआछूत की घटना ने उनके मन पर चोट की।
हाशियाकिनारा, marginवे समाज के हाशिए पर जी रहे थे।
पलायनएक जगह से दूसरी जगह जाना, migrationगाँव से शहर की ओर पलायन आम बात थी।
झुग्गीझोंपड़ी, slumवे एक छोटी-सी झुग्गी में रहते थे।
भेदभावdiscriminationजाति के आधार पर भेदभाव होता था।
तिरस्कारअपमान, निरादर, contemptउसकी बातों में तिरस्कार था।
आक्रोशगुस्सा, क्रोध, रोषउसके मन में गहरा आक्रोश था।
संघर्षstruggleउनका पूरा जीवन संघर्ष में बीता।
आत्मकथाअपने जीवन की कहानी, autobiographyयह पाठ आत्मकथा का अंश है।
अस्मिताअपनी पहचान, identityवे अपनी अस्मिता की तलाश में थे।
मार्मिकहृदयस्पर्शी, touchingकुएँ वाली घटना बहुत मार्मिक है।
प्रवासीपलायन करने वाला, migrantप्रवासी मजदूरों की हालत खराब थी।

6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)

प्रश्न 1: 'खानाबदोश' शीर्षक की सार्थकता स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2023]

'खानाबदोश' शीर्षक बहुत सार्थक है। खानाबदोश उन्हें कहते हैं जिनका कोई ठिकाना नहीं, जो एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं। लेखक ने इस शब्द का इस्तेमाल अपने परिवार और अपने जैसे गरीब, दलित परिवारों के लिए किया है। ये लोग रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से शहर आते हैं, लेकिन शहर में भी इन्हें कोई ठिकाना नहीं मिलता। ये झुग्गियों में रहते हैं, मजदूरी करते हैं, एक जगह से दूसरी जगह भटकते हैं। समाज इन्हें स्वीकार नहीं करता। ये सचमुच खानाबदोशों की तरह जीवन जीने को मजबूर हैं।

प्रश्न 2: कुएँ वाली घटना का वर्णन कीजिए। इस घटना ने लेखक के मन पर क्या प्रभाव डाला? [CBSE 2022]

एक दिन लेखक अपनी बस्ती के कुएँ से पानी भरने गए। वहाँ एक ऊँची जाति के व्यक्ति ने उन्हें रोक दिया और पूछा - "तू काहे का है?" लेखक ने बताया - "वाल्मीकि"। सुनते ही वह भड़क गया - "अच्छा, चूहा-मार! यहाँ से भाग जा, नहीं तो खोपड़ी फोड़ दूँगा।" इस घटना ने लेखक के मन पर गहरी चोट की। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी जाति के कारण उसे कितना भेदभाव झेलना पड़ेगा। इस घटना ने उसके मन में पढ़ने की और भी गहरी ललक पैदा की। उसने ठान लिया कि वह पढ़ेगा और कुछ बनेगा।

प्रश्न 3: लेखक के परिवार के गाँव से शहर आने के क्या कारण थे? [CBSE 2021]

लेखक के परिवार के पास गाँव में कोई जमीन-जायदाद नहीं थी। खेती-बाड़ी से कोई मतलब नहीं था। काम की तलाश में लेखक के पिता पहले ही शहर चले गए थे। गाँव में रहकर परिवार का पेट पालना मुश्किल था। इसलिए पिता ने पूरे परिवार को शहर बुला लिया। यह उन लाखों गरीब परिवारों की कहानी है जो रोजी-रोटी की तलाश में गाँव छोड़कर शहरों की ओर पलायन करते हैं।

प्रश्न 4: लेखक के अनुसार उसके जैसे लोग 'खानाबदोश' क्यों हैं? [CBSE 2023, 2020]

लेखक के अनुसार उसके जैसे लोग खानाबदोश इसलिए हैं क्योंकि उनका कोई ठिकाना नहीं है। वे रोजी-रोटी की तलाश में एक जगह से दूसरी जगह भटकते रहते हैं। गाँव में काम नहीं मिलता, तो शहर आ जाते हैं। शहर में झुग्गियों में रहते हैं। काम मिलता है, तो कुछ दिन रहते हैं, नहीं मिलता, तो आगे निकल जाते हैं। समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता। वे हमेशा हाशिए पर जीते हैं। इसलिए वे खानाबदोश हैं।

प्रश्न 5: लेखक के जीवन में शिक्षा का क्या महत्व था? [CBSE 2021]

लेखक के लिए शिक्षा का बहुत महत्व था। वह जानता था कि शिक्षा ही एकमात्र ऐसा हथियार है जो उसे इस गरीबी, इस भेदभाव, इस संघर्ष से बाहर निकाल सकता है। कुएँ वाली घटना के बाद उसके मन में पढ़ने की ललक और भी गहरी हो गई। उसने ठान लिया कि वह पढ़ेगा और कुछ बनेगा। शिक्षा ने ही उसे लेखक बनाया और उसकी पहचान बनाई।

7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)

प्रश्न 1: 'खानाबदोश' पाठ के माध्यम से ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित जीवन के यथार्थ को किस प्रकार चित्रित किया है? [CBSE 2023, 2021]

  • गरीबी का चित्रण: लेखक ने दलित परिवारों की गरीबी को बड़े यथार्थ के साथ चित्रित किया है। उनके पास न जमीन है, न जायदाद। वे मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। खाने को भरपेट खाना नहीं मिलता।
  • भेदभाव का चित्रण: कुएँ वाली घटना इस भेदभाव की चरम अभिव्यक्ति है। एक इंसान को सिर्फ इसलिए पानी नहीं भरने दिया जाता क्योंकि वह किसी खास जाति का है। यह दलित जीवन की कड़वी सच्चाई है।
  • पलायन का चित्रण: दलित परिवार रोजी-रोटी की तलाश में गाँव से शहरों की ओर पलायन करते हैं। लेखक का परिवार भी इसका उदाहरण है। लेकिन शहर उन्हें अपना नहीं लेते। वे झुग्गियों में रहने को मजबूर हैं।
  • हाशियाकरण का चित्रण: दलित समाज हमेशा हाशिए पर जीता है। उनकी कोई पहचान नहीं, कोई सुनने वाला नहीं। वे चुपचाप अपना जीवन जीते हैं और मर जाते हैं।
  • संघर्ष का चित्रण: लेखक ने अपने परिवार और अपने जैसे लोगों के संघर्ष को बड़े मार्मिक ढंग से चित्रित किया है। वे हर दिन संघर्ष करते हैं - रोटी के लिए, पानी के लिए, इज्जत के लिए, पहचान के लिए।
  • आशा का चित्रण: इन सबके बावजूद लेखक के मन में आशा है। वह पढ़ना चाहता है, कुछ बनना चाहता है। यह आशा ही दलित जीवन को आगे बढ़ाती है।

प्रश्न 2: 'खानाबदोश' पाठ में आई कुएँ वाली घटना का वर्णन कीजिए और बताइए कि इस घटना ने लेखक के व्यक्तित्व को कैसे प्रभावित किया? [CBSE 2022]

  • घटना का वर्णन: एक दिन लेखक अपनी बस्ती के कुएँ से पानी भरने गए। वहाँ पहले से ही कुछ लोग थे। एक ऊँची जाति के व्यक्ति ने उन्हें रोका और पूछा - "तू काहे का है?" लेखक ने बताया - "वाल्मीकि"। सुनते ही वह भड़क गया - "अच्छा, चूहा-मार! यहाँ से भाग जा, नहीं तो खोपड़ी फोड़ दूँगा।" लेखक डर के मारे वहाँ से भाग गया।
  • पहली बार एहसास: यह पहली बार था जब लेखक को अपनी जाति के कारण इतना सीधा भेदभाव झेलना पड़ा। उसने महसूस किया कि समाज उसे किस नज़र से देखता है।
  • मानसिक आघात: इस घटना ने उसके मन पर गहरा आघात किया। वह रातों-रात सोचता रहा कि उसने ऐसा क्या किया जो उसके साथ ऐसा व्यवहार हुआ।
  • पढ़ाई के प्रति ललक: इस घटना ने उसके मन में पढ़ाई के प्रति और गहरी ललक पैदा की। उसने सोचा कि अगर वह पढ़-लिखकर कुछ बन गया, तो शायद उसके साथ ऐसा व्यवहार नहीं होगा।
  • संघर्ष का बीजारोपण: इस घटना ने उसके मन में संघर्ष का बीज बो दिया। उसने ठान लिया कि वह हार नहीं मानेगा, वह पढ़ेगा और कुछ बनेगा।
  • लेखन की प्रेरणा: शायद इसी घटना ने उन्हें लेखक बनने की प्रेरणा दी। उन्होंने अपने लेखन में दलित जीवन के इस यथार्थ को बार-बार उकेरा।

प्रश्न 3: 'खानाबदोश' पाठ के आधार पर बताइए कि गरीबी और जाति-व्यवस्था का आपस में क्या संबंध है? [CBSE 2021]

  • जाति-व्यवस्था और गरीबी: भारत में जाति-व्यवस्था और गरीबी का गहरा संबंध है। निचली जातियाँ सदियों से शोषित रही हैं। उन्हें शिक्षा के अधिकार से वंचित रखा गया। इसलिए वे गरीबी के शिकार हुए।
  • संसाधनों से वंचना: लेखक का परिवार गरीब है क्योंकि उनके पास कोई संसाधन नहीं है। न जमीन, न पूँजी, न शिक्षा। यह वंचना उनकी जाति के कारण है।
  • रोजगार के अवसर: निचली जातियों को रोजगार के अवसर भी कम मिलते हैं। उन्हें ऊँची-ऊँची नौकरियाँ नहीं मिलतीं। वे मजदूरी करने को मजबूर हैं, जिसमें पैसा कम मिलता है।
  • सामाजिक बहिष्कार: जाति के कारण उनका सामाजिक बहिष्कार होता है। कुएँ से पानी नहीं भरने दिया जाता, मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता, ऊँची जातियों के साथ खाना-पीना वर्जित है। यह बहिष्कार उनकी गरीबी को और गहरा करता है।
  • शिक्षा से वंचना: निचली जातियों को शिक्षा से वंचित रखा गया। लेखक पढ़ पाया, लेकिन उसके आसपास के कितने लोग पढ़ नहीं पाए। शिक्षा के बिना गरीबी से बाहर निकलना मुश्किल है।
  • चक्रव्यूह: यह एक चक्रव्यूह की तरह है। जाति के कारण गरीबी, गरीबी के कारण और शोषण, और शोषण के कारण जाति की पकड़ और मजबूत। इस चक्रव्यूह को तोड़ना बहुत मुश्किल है।

प्रश्न 4: 'खानाबदोश' और 'गूँगे' कहानियों में आए मुख्य पात्रों के संघर्षों की तुलना कीजिए। [CBSE 2020]

  • दोनों हाशिए पर: दोनों ही पात्र समाज के हाशिए पर हैं। गूँगा शारीरिक रूप से अक्षम है और निम्न जाति का है। वाल्मीकि दलित है और गरीब। दोनों को समाज ने हाशिए पर धकेल दिया है।
  • भेदभाव का शिकार: दोनों ही भेदभाव के शिकार हैं। गूँगे के साथ उसकी अक्षमता के कारण भेदभाव होता है। वाल्मीकि के साथ उसकी जाति के कारण। दोनों को पानी जैसी मूलभूत सुविधा से भी वंचित रखा जाता है।
  • प्रेम में असफलता: गूँगा रमिया से प्रेम करता है, लेकिन वह असफल हो जाता है। वाल्मीकि के प्रेम के बारे में कुछ नहीं कहा गया है, लेकिन उसकी स्थिति ऐसी है कि प्रेम उसके लिए सपने जैसा है।
  • आवाज़हीन होना: गूँगा शारीरिक रूप से आवाज़हीन है। वाल्मीकि सामाजिक रूप से आवाज़हीन है। उसकी बात कोई सुनने वाला नहीं है। दोनों की चुप्पी में गहरी पीड़ा है।
  • संघर्ष का तरीका: गूँगा अंत में विद्रोह करने की कोशिश करता है, लेकिन असफल रहता है। वाल्मीकि शिक्षा के माध्यम से संघर्ष करता है और सफल होता है। दोनों के संघर्ष के तरीके अलग हैं, लेक� दोनों प्रेरणादायक हैं।
  • निष्कर्ष: दोनों ही पात्र अपने-अपने ढंग से संघर्ष करते हैं। दोनों ही हमें सिखाते हैं कि हाशिए पर होने के बावजूद हार नहीं माननी चाहिए।

प्रश्न 5: 'खानाबदोश' पाठ के आधार पर ओमप्रकाश वाल्मीकि की लेखन शैली की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2019]

  • आत्मकथात्मक शैली: यह पाठ आत्मकथात्मक है। लेखक अपने जीवन की घटनाओं को बड़ी ईमानदारी से प्रस्तुत करता है। वह खुद को केंद्र में रखकर कहानी कहता है, जिससे पाठक उससे जुड़ाव महसूस करता है।
  • सहज और सरल भाषा: वाल्मीकि की भाषा बहुत सहज और सरल है। वे कठिन शब्दों का प्रयोग नहीं करते। उनकी भाषा में प्रवाह है, जो पाठक को बाँधे रखता है। वे बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हैं, जिससे पाठ और भी जीवंत हो जाता है।
  • मार्मिकता: उनके लेखन में गहरी मार्मिकता है। कुएँ वाली घटना पढ़ते समय पाठक की आँखें नम हो जाती हैं। वे घटनाओं को इस तरह प्रस्तुत करते हैं कि वे सजीव हो उठती हैं।
  • यथार्थवादिता: वे दलित जीवन के यथार्थ को बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत करते हैं। गरीबी, भेदभाव, संघर्ष - सब कुछ वैसा ही दिखाते हैं जैसा है। वे कोई अलंकरण नहीं करते।
  • व्यंग्य और आक्रोश: उनके लेखन में हल्का व्यंग्य और गहरा आक्रोश है। वे व्यवस्था पर चोट करते हैं, लेकिन इतने मार्मिक ढंग से कि पाठक उनके साथ खड़ा हो जाता है।
  • संवेदनशीलता: उनकी सबसे बड़ी विशेषता है - संवेदनशीलता। वे दूसरों की पीड़ा को गहराई से महसूस करते हैं और उसे शब्द देते हैं। उनका लेखन हृदय से निकला है, इसलिए हृदय को छू जाता है।

8. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न

  • शीर्षक की सार्थकता - 2023, 2021
  • कुएँ वाली घटना - 2023, 2022, 2020
  • गाँव से शहर पलायन के कारण - 2022, 2021
  • दलित जीवन का यथार्थ - 2023, 2021, 2020
  • लेखक के जीवन में शिक्षा का महत्व - 2022, 2021
  • जाति-व्यवस्था और गरीबी का संबंध - 2021, 2020
  • लेखन शैली की विशेषताएँ - 2020, 2019

📈 बोर्ड ट्रेंड

पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस पाठ से प्रतिवर्ष 6-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में कुएँ वाली घटना, शीर्षक की सार्थकता, पलायन के कारण और शिक्षा के महत्व पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में दलित जीवन के यथार्थ, जाति-व्यवस्था और गरीबी के संबंध, तथा वाल्मीकि की लेखन शैली पर प्रश्न आते हैं। यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है।

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • लेखक - ओमप्रकाश वाल्मीकि (1950-2013)
  • पुस्तक - अंतरा भाग 1 (गद्य खंड)
  • विधा - आत्मकथात्मक संस्मरण
  • केंद्रीय विषय - दलित जीवन, जाति भेदभाव, गरीबी, पलायन
  • महत्वपूर्ण घटना - कुएँ से पानी न भरने देने की घटना
  • प्रमुख प्रतीक - खानाबदोश (हाशिए पर जी रहे लोग)
  • मुख्य संदेश - शिक्षा ही एकमात्र हथियार है

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"खानाबदोश - बिना ठिकाने वाले, एक जगह न रहने वाले।"

"अच्छा, चूहा-मार! यहाँ से भाग जा, नहीं तो खोपड़ी फोड़ दूँगा।"

"उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ कि मेरी जाति के कारण मुझे कितना कुछ सहना पड़ेगा।"

"शिक्षा ही एकमात्र रास्ता है जो हमें इस जीवन से बाहर निकाल सकता है।"

9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)

एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। तथ्यात्मक जानकारी पर आधारित प्रश्न होते हैं। उदाहरण: प्रश्न - लेखक के पिता शहर क्यों गए? उत्तर - काम की तलाश में।

📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)

परिचय (1-2 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु को पाठ के प्रसंगों से स्पष्ट करें। उदाहरण: प्रश्न - कुएँ वाली घटना का वर्णन कीजिए। उत्तर - परिचय में बताएँ कि यह घटना लेखक के बचपन की है। फिर घटना का क्रम - कुएँ पर जाना, जाति पूछना, 'चूहा-मार' कहना, धमकी देना - इन बिंदुओं पर व्याख्या करें। निष्कर्ष में कहें कि इस घटना ने लेखक के मन पर गहरा प्रभाव डाला।

📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)

विचारात्मक प्रश्नों के लिए: प्रस्तावना + विषय की व्याख्या (कम से कम 4-5 बिंदु, हर बिंदु को पाठ के प्रसंगों से स्पष्ट करें) + निष्कर्ष। जैसे दलित जीवन के यथार्थ पर प्रश्न - पहले दलित जीवन का परिचय, फिर गरीबी, भेदभाव, पलायन, संघर्ष, आशा - इन बिंदुओं पर विस्तार से लिखें, अंत में निष्कर्ष।

तुलनात्मक प्रश्नों के लिए: दोनों का संक्षिप्त परिचय + समानताएँ + असमानताएँ + निष्कर्ष।

लेखक की शैली पर प्रश्न के लिए: लेखक का परिचय + उनकी शैली की विशेषताएँ + पाठ में इन विशेषताओं के उदाहरण + निष्कर्ष।

10. हब लिंक



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