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कक्षा 11 अध्याय 1 – पद – कबीर (अंतरा भाग 1 – काव्य) | GPN

📘 पाठ – कबीर के पद | कक्षा 11 हिंदी (अंतरा भाग 1, काव्य खंड) | GPN

📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: अंतरा भाग 1 (काव्य खंड) | ✍️ कवि: कबीरदास | 📝 प्रकार: भक्तिकालीन पद | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: बहुत उच्च]


📌 अनुक्रमणिका

इस विषय को बेहतर समझने के लिए छात्र कक्षा 11 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवि परिचय - कबीरदास

जन्म: लगभग 1398, काशी (वाराणसी)

मृत्यु: लगभग 1518, मगहर (संत कबीर नगर, उत्तर प्रदेश)

गुरु: स्वामी रामानंद (मान्यता)

भाषा: सधुक्कड़ी (हिंदी, अवधी, ब्रज, पंजाबी, उर्दू का मिश्रण)

प्रमुख रचनाएँ: बीजक (साखी, सबद, रमैनी)

कबीरदास भक्तिकाल की निर्गुण भक्ति धारा के प्रमुख कवि हैं। वे समाज में व्याप्त धार्मिक पाखंड, जाति-पाति, ऊँच-नीच, मूर्तिपूजा, कर्मकांड के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और वह हर जगह विद्यमान है। उसे पाने के लिए किसी मंदिर-मस्जिद की जरूरत नहीं, किसी गुरु-पीर की जरूरत नहीं। सच्चे मन से प्रेम करो, वह मिल जाएगा।

कबीर जी की वाणी सीधी-सपाट है। वे किसी लाग-लपेट में नहीं पड़ते। उनकी भाषा में तीखापन है, पर गहरी संवेदना भी। वे चोट करते हैं, तो दिल पर करते हैं। उनके दोहे और पद आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 600 साल पहले थे।

📖 काव्य की पृष्ठभूमि

कबीर का समय 15वीं-16वीं सदी का भारत था। उस समय समाज में धार्मिक आडंबर चरम पर था। हिंदू और मुसलमान दोनों ही बाहरी दिखावे में लगे थे। हिंदू मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा में व्यस्त थे। मुसलमान रोजा, नमाज, हज में। कोई असली ईश्वर की तलाश नहीं कर रहा था। जाति-पाति का भेदभाव अपने चरम पर था। ऊँची जाति वाले निचली जातियों को छूना तक गुनाह समझते थे।

ऐसे समय में कबीर ने आवाज उठाई। वे खुद जुलाहा थे, नीची जाति के माने जाते थे। उन्होंने सबसे पहले इस जाति-व्यवस्था पर ही प्रहार किया। उन्होंने कहा - जाति पूछो ना कोई, सब एक समान हैं। उन्होंने हिंदू-मुसलमान के बीच की दीवार तोड़ने की कोशिश की। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान एक ही ईश्वर की संतान हैं, फिर यह झगड़ा कैसा?

कबीर के पदों में यही सब कुछ झलकता है। वे कहीं बाहरी आडंबर पर चोट करते हैं, कहीं जाति-पाति पर, कहीं प्रेम की महिमा गाते हैं, कहीं ईश्वर की व्यापकता बताते हैं। उनकी वाणी में एक गहरा दार्शनिक पक्ष है और एक सीधा-सादा व्यवहारिक पक्ष भी।

🎯 अध्याय का महत्व

कक्षा 11 की परीक्षा में कबीर के पद अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनके दार्शनिक विचार, समाज सुधार के विचार, ईश्वर की अवधारणा, भाषा-शैली - इन सब पर प्रश्न पूछे जाते हैं। कबीर के पदों की व्याख्या करना, उनका भावार्थ लिखना, उनमें निहित संदेश को स्पष्ट करना - ये सब परीक्षा में पूछा जाता है।

2. सरल सारांश

कबीर के पदों में मुख्य रूप से तीन बातें कही गई हैं - पहली, ईश्वर एक है और वह सर्वत्र व्याप्त है। दूसरी, बाहरी आडंबरों से कुछ नहीं होता, सच्चे मन से प्रेम करो तो वह मिल जाएगा। तीसरी, जाति-पाति का भेदभाव मिटाओ, सब एक समान हैं।

पहले पद में कबीर कहते हैं - मन में सच्ची भक्ति होनी चाहिए। बाहरी दिखावे से कुछ नहीं होता। जैसे माला फेरने से, तिलक लगाने से, मूर्ति पूजने से क्या होता है? असली चीज है मन का मैल दूर करना। मन साफ हो, तो ईश्वर मिल जाता है।

दूसरे पद में वे कहते हैं - हिंदू और मुसलमान में भेद मत करो। सब एक ही ईश्वर की संतान हैं। कोई हिंदू बड़ा नहीं, कोई मुसलमान छोटा नहीं। सब एक समान हैं। जाति-पाति का यह भेद झूठा है।

तीसरे पद में वे कहते हैं - ईश्वर कहीं दूर नहीं है। वह तो तुम्हारे भीतर ही है। तुम उसे मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ते फिर रहे हो, वह तो तुम्हारे दिल में बसता है। अपने भीतर झाँको, वह मिल जाएगा।

चौथे पद में वे कहते हैं - प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। प्रेम से बड़ा कोई मंदिर नहीं, कोई मस्जिद नहीं। प्रेम से बड़ा कोई तीर्थ नहीं। प्रेम करो, प्रेम में डूबो, वह मिल जाएगा।

पाँचवें पद में वे कहते हैं - मन को वश में करो। मन ही सब कुछ है। मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति। मन को समझाओ, उसे सही रास्ते पर लगाओ।

3. विस्तृत व्याख्या

📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण

  • निर्गुण भक्ति: कबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं। वे ईश्वर को निराकार, निर्गुण मानते हैं। उनके लिए ईश्वर का कोई रूप नहीं, कोई आकार नहीं। वह तो सर्वत्र व्याप्त है।
  • बाहरी आडंबर का विरोध: वे मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा, रोजा-नमाज, हज-उम्रा जैसे बाहरी आडंबरों के घोर विरोधी हैं। उनका कहना है कि इन सबसे कुछ नहीं होता। असली चीज है मन की पवित्रता और प्रेम।
  • जाति-व्यवस्था का विरोध: वे जाति-पाति के भेदभाव को नहीं मानते। उनका कहना है कि सब एक समान हैं। जाति तो मिट्टी के ढेले की होती है, इंसान की नहीं।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: वे हिंदू और मुसलमान के बीच की दीवार तोड़ना चाहते हैं। उनका कहना है कि दोनों एक ही ईश्वर की संतान हैं, दोनों का ईश्वर एक ही है। फिर यह झगड़ा कैसा?
  • प्रेम की महिमा: कबीर के लिए प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। प्रेम से बड़ा कोई मंदिर नहीं, कोई मस्जिद नहीं। प्रेम में डूबो, वह मिल जाएगा।
  • मन की साधना: वे मन को वश में करने पर जोर देते हैं। मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति। मन को समझाओ, उसे सही रास्ते पर लगाओ।
  • गुरु का महत्व: हालाँकि वे बाहरी आडंबर के विरोधी हैं, लेकिन गुरु के महत्व को स्वीकार करते हैं। सच्चा गुरु ही राह दिखा सकता है।

📌 विषय / Theme

कबीर के पदों के कई विषय हैं। पहला विषय है - निर्गुण ईश्वर की अवधारणा। दूसरा विषय है - बाहरी आडंबरों का विरोध। तीसरा विषय है - सामाजिक समानता और जाति-व्यवस्था का विरोध। चौथा विषय है - हिंदू-मुस्लिम एकता। पाँचवाँ विषय है - प्रेम की महिमा। छठा विषय है - मन की साधना।

📌 सामाजिक संदेश

कबीर समाज को यह संदेश देना चाहते हैं कि धर्म के नाम पर मत बँटो। हिंदू-मुसलमान, ऊँच-नीच, जाति-पाति - यह सब झूठा है। सब इंसान एक समान हैं। असली धर्म है - प्रेम, करुणा, मानवता। बाहरी आडंबरों में मत पड़ो। अपने भीतर झाँको, वह मिल जाएगा।

📌 नैतिक शिक्षा

  • प्रेम करो: प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। प्रेम से बड़ा कुछ नहीं।
  • भेदभाव मिटाओ: जाति, धर्म, भाषा के आधार पर भेदभाव मत करो। सब एक समान हैं।
  • बाहरी दिखावे से बचो: माला फेरने, तिलक लगाने से कुछ नहीं होता। असली चीज है मन की पवित्रता।
  • अपने भीतर झाँको: ईश्वर बाहर नहीं, भीतर है। उसे पाने के लिए बाहर मत भटको।
  • मन को वश में करो: मन ही सब कुछ है। उसे समझाओ, उसे सही रास्ते पर लगाओ।

4. पात्र चित्रण

इस काव्य पाठ में कोई पात्र नहीं हैं। यह कवि के विचारों और दर्शन की अभिव्यक्ति है। इसलिए पात्र चित्रण का कोई प्रश्न नहीं बनता।

नोट: चूँकि यह काव्य पाठ है, इसमें कोई पात्र नहीं हैं। इसलिए पात्र चित्रण का कोई प्रश्न परीक्षा में नहीं पूछा जाता। लेकिन छात्रों को कवि के विचारों और उनके दार्शनिक पक्ष को समझना चाहिए।

विषय की व्यापक समझ विकसित करने के लिए छात्र कक्षा 12 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 12 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

5. शब्दार्थ

शब्द अर्थ वाक्य प्रयोग
निर्गुणबिना गुण वाला, निराकार, formlessकबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं।
सगुणगुणों सहित, साकार, with formसगुण भक्ति में राम-कृष्ण की पूजा होती है।
आडंबरदिखावा, पाखंड, hypocrisyधार्मिक आडंबरों का विरोध किया।
मायाभ्रम, illusionमाया के बंधन में इंसान फँसा है।
जाति-पातिcaste systemजाति-पाति का भेदभाव मिटाना चाहिए।
हिंदू-मुस्लिमदो धर्मों के अनुयायीहिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश दिया।
प्रेमloveप्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है।
मनmindमन को वश में करना बहुत कठिन है।
गुरुteacher, masterगुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता।
साखीकबीर के दोहे, coupletsकबीर की साखियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं।
सबदपद, शब्द, hymnsकबीर के सबद में गहरा अर्थ होता है।
रमैनीकबीर की एक रचनाबीजक में साखी, सबद और रमैनी हैं।
सधुक्कड़ीकबीर की भाषा, मिश्रित भाषाकबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में लिखा।
बीजककबीर की रचनाओं का संग्रहबीजक कबीर का मुख्य ग्रंथ है।

6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)

प्रश्न 1: कबीर ने बाहरी धार्मिक आडंबरों का विरोध क्यों किया? [CBSE 2023]

कबीर ने बाहरी धार्मिक आडंबरों का विरोध किया क्योंकि वे इन्हें ईश्वर प्राप्ति में बाधा मानते थे। उनके समय में लोग मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा, रोजा-नमाज, हज-उम्रा जैसे बाहरी कर्मकांडों में इतने व्यस्त थे कि असली भक्ति भूल गए थे। कबीर का कहना था कि इन सबसे कुछ नहीं होता। असली चीज है मन की पवित्रता और सच्चा प्रेम। मन साफ हो, तो ईश्वर मिल जाता है। मन में मैल हो, तो कुछ नहीं मिलता।

प्रश्न 2: कबीर ने जाति-पाति के भेदभाव पर क्या विचार व्यक्त किए हैं? [CBSE 2022]

कबीर ने जाति-पाति के भेदभाव का घोर विरोध किया। उनका कहना था कि सब इंसान एक समान हैं। जाति तो मिट्टी के ढेले की होती है, इंसान की नहीं। कोई ब्राह्मण बड़ा नहीं, कोई शूद्र छोटा नहीं। सब एक ही ईश्वर की संतान हैं। उन्होंने इस भेदभाव को समाज की सबसे बड़ी बुराई बताया। वे खुद जुलाहा थे, जिन्हें नीची जाति का माना जाता था। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखाया कि जाति से कोई छोटा-बड़ा नहीं होता।

प्रश्न 3: कबीर के अनुसार ईश्वर कहाँ निवास करता है? [CBSE 2021]

कबीर के अनुसार ईश्वर कहीं दूर नहीं, बल्कि हमारे भीतर ही निवास करता है। वे कहते हैं कि लोग उसे मंदिर-मस्जिद में ढूँढ़ते फिरते हैं, पर वह तो हमारे दिल में बसता है। उसे पाने के लिए बाहर भटकने की जरूरत नहीं। अपने भीतर झाँको, वह मिल जाएगा। वे कहते हैं कि जैसे सुगंध फूल में छिपी है, वैसे ही ईश्वर हमारे भीतर छिपा है। जैसे तेल तिल में है, वैसे ही वह हममें है।

प्रश्न 4: कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर क्या कहा है? [CBSE 2023, 2020]

कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बहुत जोर दिया। उनका कहना था कि हिंदू और मुसलमान दोनों एक ही ईश्वर की संतान हैं, दोनों का ईश्वर एक ही है। फिर यह झगड़ा कैसा? वे कहते हैं कि हिंदू काशी में ढूँढ़ता है, मुसलमान काबा में। पर वह तो कहीं नहीं है, वह तो दिल में है। उन्होंने हिंदू-मुसलमान के बीच की दीवार तोड़ने की कोशिश की और दोनों को एक साथ लाने का प्रयास किया।

प्रश्न 5: कबीर ने 'मन' को क्यों महत्वपूर्ण बताया है? [CBSE 2021]

कबीर ने 'मन' को बहुत महत्वपूर्ण बताया है। उनके अनुसार मन ही सब कुछ है। मन ही बंधन है और मन ही मुक्ति। अगर मन सही रास्ते पर हो, तो इंसान सब कुछ पा सकता है। अगर मन भटका हुआ हो, तो कुछ नहीं मिलता। इसलिए सबसे पहले मन को वश में करना चाहिए। मन को समझाना चाहिए, उसे सही रास्ते पर लगाना चाहिए। मन ही ईश्वर तक पहुँचने का रास्ता है।

7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)

प्रश्न 1: कबीर के पदों के आधार पर उनके धार्मिक और सामाजिक विचारों का विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2023, 2021]

  • निर्गुण ईश्वर की अवधारणा: कबीर ईश्वर को निराकार, निर्गुण मानते हैं। वे मूर्ति पूजा के विरोधी हैं। उनके लिए ईश्वर का कोई रूप नहीं, कोई आकार नहीं। वह तो सर्वत्र व्याप्त है।
  • बाहरी आडंबरों का विरोध: वे मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा, रोजा-नमाज, हज-उम्रा जैसे बाहरी आडंबरों के घोर विरोधी हैं। उनका कहना है कि इन सबसे कुछ नहीं होता। असली चीज है मन की पवित्रता और सच्चा प्रेम।
  • जाति-व्यवस्था का विरोध: वे जाति-पाति के भेदभाव को नहीं मानते। उनका कहना है कि सब एक समान हैं। जाति तो मिट्टी के ढेले की होती है, इंसान की नहीं।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: वे हिंदू और मुसलमान के बीच की दीवार तोड़ना चाहते हैं। उनका कहना है कि दोनों एक ही ईश्वर की संतान हैं, दोनों का ईश्वर एक ही है।
  • प्रेम की महिमा: कबीर के लिए प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। प्रेम से बड़ा कोई मंदिर नहीं, कोई मस्जिद नहीं। प्रेम में डूबो, वह मिल जाएगा।
  • गुरु का महत्व: वे गुरु के महत्व को स्वीकार करते हैं। सच्चा गुरु ही राह दिखा सकता है। गुरु के बिना ज्ञान नहीं मिलता।

प्रश्न 2: कबीर की भाषा-शैली की मुख्य विशेषताएँ बताइए। [CBSE 2022]

  • सधुक्कड़ी भाषा: कबीर ने सधुक्कड़ी भाषा में रचना की। यह हिंदी, अवधी, ब्रज, पंजाबी, उर्दू का मिश्रण है। यह आम बोलचाल की भाषा थी, जिसे हर कोई समझ सकता था।
  • सीधी-सपाट शैली: उनकी शैली में कोई लाग-लपेट नहीं है। वे सीधे-सीधे बात कहते हैं। उनकी भाषा में तीखापन है, पर गहरी संवेदना भी।
  • व्यंग्य और चोट: वे समाज की बुराइयों पर व्यंग्य करते हैं, पर इतनी गहरी चोट करते हैं कि सामने वाले को सोचना पड़ता है। उनका व्यंग्य कटु नहीं, बल्कि जागरूक करने वाला होता है।
  • दोहा और पद शैली: उन्होंने मुख्य रूप से दोहा और पद शैली में लिखा। दोहे छोटे होते हैं, पर उनमें गहरा अर्थ भरा होता है।
  • प्रतीकों और उदाहरणों का प्रयोग: वे अपनी बात समझाने के लिए साधारण प्रतीकों और उदाहरणों का प्रयोग करते हैं - जैसे फूल और सुगंध, तिल और तेल, पानी और लहर।
  • संगीतात्मकता: उनकी रचनाओं में संगीतात्मकता है। वे गाए जाने के लिए बनी हैं। इसलिए आज भी लोग उन्हें भक्ति में गाते हैं।

प्रश्न 3: कबीर के पदों में निहित दार्शनिकता पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2021]

  • ईश्वर की व्यापकता: कबीर के दर्शन में ईश्वर सर्वत्र व्याप्त है। वह कण-कण में बसा है। उसे पाने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं।
  • अद्वैत का भाव: उनका दर्शन अद्वैत पर आधारित है। जीव और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं। जो भीतर है, वही बाहर है।
  • माया और मोह: वे माया और मोह को बंधन मानते हैं। माया में फँसकर इंसान ईश्वर से दूर हो जाता है। इसलिए माया से दूर रहना चाहिए।
  • मन की साधना: उनके दर्शन में मन की साधना पर जोर है। मन ही बंधन है, मन ही मुक्ति। मन को वश में करना ही सबसे बड़ी साधना है।
  • प्रेम का दर्शन: उनके लिए प्रेम ही सबसे बड़ा दर्शन है। प्रेम से बड़ा कोई धर्म नहीं, कोई दर्शन नहीं। प्रेम में डूबो, वह मिल जाएगा।
  • सत्-असत् का विवेक: वे सत् (सच) और असत् (झूठ) में अंतर करना सिखाते हैं। जो बाहरी आडंबर है, वह असत् है। जो भीतर का प्रेम है, वह सत् है।

प्रश्न 4: कबीर के पदों की तुलना सूरदास के पदों से कीजिए। [CBSE 2020]

  • भक्ति का प्रकार: कबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं, सूरदास सगुण भक्ति के। कबीर निराकार ईश्वर में विश्वास करते हैं, सूरदास साकार (कृष्ण) में।
  • विषय: कबीर के पदों का विषय समाज सुधार, धार्मिक पाखंड का विरोध, हिंदू-मुस्लिम एकता है। सूरदास के पदों का विषय कृष्ण की बाल-लीला, उनके सौंदर्य और प्रेम से संबंधित है।
  • भाषा: कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है, जो आम बोलचाल की भाषा है। सूरदास की भाषा ब्रजभाषा है, जो परिष्कृत और साहित्यिक है।
  • शैली: कबीर की शैली में तीखापन, व्यंग्य और चोट है। सूरदास की शैली में माधुर्य, कोमलता और भावुकता है।
  • दर्शन: कबीर का दर्शन ज्ञानाश्रयी है, ज्ञान और विवेक पर आधारित है। सूरदास का दर्शन प्रेमाश्रयी है, प्रेम और भक्ति पर आधारित है।
  • समानताएँ: दोनों ही भक्तिकाल के महान कवि हैं। दोनों ने समाज पर गहरा प्रभाव डाला। दोनों की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

प्रश्न 5: 'कबीर के पदों में सामाजिक क्रांति का स्वर' - इस कथन की विवेचना कीजिए। [CBSE 2019]

  • जाति-व्यवस्था पर चोट: कबीर ने जाति-व्यवस्था पर जोरदार चोट की। उन्होंने ऊँच-नीच के भेदभाव को खारिज किया। उनके अनुसार जाति से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। यह अपने आप में एक क्रांतिकारी विचार था।
  • धार्मिक आडंबर का विरोध: उन्होंने धार्मिक आडंबरों, मूर्ति पूजा, व्रत-उपवास, तीर्थ-यात्रा का विरोध किया। यह धार्मिक क्षेत्र में क्रांति थी।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता: उन्होंने हिंदू और मुसलमान के बीच की दीवार तोड़ने की कोशिश की। उनके अनुसार दोनों एक ही ईश्वर की संतान हैं। यह सांप्रदायिक सद्भाव का क्रांतिकारी विचार था।
  • स्त्रियों के प्रति दृष्टिकोण: उन्होंने स्त्रियों के प्रति भी सकारात्मक दृष्टिकोण रखा। उनके अनुसार स्त्री और पुरुष में कोई भेद नहीं।
  • समाज के निचले तबके का उत्थान: वे खुद जुलाहा थे, निचली जाति से आते थे। उन्होंने अपने उदाहरण से दिखाया कि जाति से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता। इससे निचले तबके में आत्मविश्वास आया।
  • आम आदमी की भाषा: उन्होंने आम आदमी की भाषा में लिखा, जिससे उनके विचार हर तबके तक पहुँचे। यह भी एक तरह की क्रांति ही थी।

8. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न

  • कबीर के धार्मिक विचार - 2023, 2022
  • जाति-पाति पर कबीर के विचार - 2023, 2021
  • बाहरी आडंबरों का विरोध - 2022, 2020
  • हिंदू-मुस्लिम एकता - 2023, 2021
  • ईश्वर की अवधारणा - 2022, 2021
  • कबीर की भाषा-शैली - 2021, 2020, 2019
  • प्रेम का महत्व - 2020, 2019

📈 बोर्ड ट्रेंड

पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस काव्य पाठ से प्रतिवर्ष 6-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में कबीर के विचार, जाति-पाति, बाहरी आडंबर, हिंदू-मुस्लिम एकता पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में कबीर के धार्मिक और सामाजिक विचारों का विश्लेषण, उनकी भाषा-शैली, दार्शनिकता और सामाजिक क्रांति के स्वर पर प्रश्न आते हैं।

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवि - कबीरदास (निर्गुण भक्ति धारा)
  • समय - 15वीं-16वीं सदी
  • भाषा - सधुक्कड़ी (मिश्रित भाषा)
  • प्रमुख रचना - बीजक (साखी, सबद, रमैनी)
  • गुरु - स्वामी रामानंद (मान्यता)
  • मुख्य विचार - निर्गुण ईश्वर, जाति-व्यवस्था का विरोध, हिंदू-मुस्लिम एकता, बाहरी आडंबर का विरोध, प्रेम की महिमा, मन की साधना

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"माला फेरत जुग गया, गया न मन का फेर।"

"जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।"

"हिंदू कहै मोहि राम पियारा, तुरक कहै रहमाना। आपस में दोउ लरि लरि मूए, मरम न काहू जाना।"

"मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जानि।"

9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)

एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। तथ्यात्मक जानकारी पर आधारित प्रश्न होते हैं। उदाहरण: प्रश्न - कबीर किस भक्ति धारा के कवि हैं? उत्तर - निर्गुण भक्ति धारा के।

📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)

परिचय (1-2 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु को कबीर के पदों के प्रसंगों से स्पष्ट करें। उदाहरण: प्रश्न - कबीर ने जाति-पाति के भेदभाव पर क्या विचार व्यक्त किए हैं? उत्तर - परिचय में बताएँ कि कबीर जाति-व्यवस्था के घोर विरोधी थे। फिर जाति को मिट्टी का ढेला बताना, सबको समान समझना, ब्राह्मण-शूद्र में भेद न मानना - इन बिंदुओं पर व्याख्या करें। निष्कर्ष में कहें कि यह उनके सामाजिक क्रांति के स्वर को दिखाता है।

📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)

विचारात्मक प्रश्नों के लिए: प्रस्तावना + विषय की व्याख्या (कम से कम 4-5 बिंदु, हर बिंदु को कबीर के पदों से उदाहरण सहित स्पष्ट करें) + निष्कर्ष।

तुलनात्मक प्रश्नों के लिए: दोनों का संक्षिप्त परिचय + समानताएँ + असमानताएँ + निष्कर्ष।

काव्य-शैली पर प्रश्न के लिए: कवि का परिचय + उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ + पदों में इन विशेषताओं के उदाहरण + निष्कर्ष।

10. हब लिंक



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