📘 पाठ – हम तौ एक एक करि जाना | कक्षा 11 हिंदी (आरोह) | GPN
📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: आरोह भाग 1 | ✍️ कवि: कबीरदास | 📝 प्रकार: पद (भक्तिकालीन साखी) | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. काव्य सौंदर्य
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न (5)
- 7. दीर्घ प्रश्न (5)
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 10. हब लिंक
1. परिचय
📝 कवि परिचय - कबीरदास
जन्म: लगभग 1398, वाराणसी (मान्यता)
मृत्यु: लगभग 1518, मगहर
गुरु: स्वामी रामानंद (मान्यता)
प्रमुख रचनाएँ: बीजक, साखी, सबद, रमैनी
कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल के निर्गुण भक्ति धारा के सबसे प्रमुख कवि हैं। वे एक सामाजिक क्रांतिकारी, दार्शनिक, संत और कवि थे। उनकी वाणी में सीधा-सादा, सहज और व्यावहारिक ज्ञान मिलता है। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, जाति-पाति के भेदभाव, पाखंड और आडंबर पर करारा व्यंग्य किया है। उनकी भाषा सधुक्कड़ी है - जिसमें हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी के शब्द मिलते हैं। वे कबीर निराकार ईश्वर में विश्वास करते थे और उन्हें 'राम' कहकर पुकारते थे, लेकिन उनका राम किसी अवतार विशेष के राम नहीं थे। 'हम तौ एक एक करि जाना' में उन्होंने ईश्वर की एकता और अद्वितीयता का बड़े ही सीधे-सादे ढंग से वर्णन किया है।
📖 पद पृष्ठभूमि
'हम तौ एक एक करि जाना' कबीर का एक प्रसिद्ध पद है। इसमें कबीर ने ईश्वर की एकता और अद्वितीयता का वर्णन किया है। वे कहते हैं कि वे ईश्वर को एक ही मानते हैं। उनके लिए ईश्वर दो नहीं, अनेक नहीं, बस एक है। लेकिन यह एक ही इतना विराट है कि वह सब कुछ है - वह ब्रह्मा है, विष्णु है, शिव है, वह हर जगह है, हर रूप में है।
कबीर इस पद में उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो ईश्वर को अलग-अलग नामों और रूपों में बाँटते हैं। वे कहते हैं कि तुम जिसे राम कहते हो, वही रहीम है। तुम जिसे हरि कहते हो, वही करीम है। ईश्वर एक ही है, बस नाम अलग-अलग हैं। यह कबीर की समन्वयवादी दृष्टि को दर्शाता है।
यह पद कबीर की गहरी आध्यात्मिक समझ और उनके व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक है। वे कहते हैं कि ईश्वर को बाँटना मूर्खता है। वह एक है और एक ही है।
🎯 अध्याय का महत्व
कक्षा 11 की बोर्ड परीक्षा में यह पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष इससे 5-8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। कबीर के दार्शनिक विचार, ईश्वर की एकता पर उनका दृष्टिकोण, उनकी भाषा-शैली, सामाजिक संदेश आदि पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि कबीर ने ईश्वर की एकता को किस प्रकार स्पष्ट किया है? 'एक एक करि जाना' से क्या तात्पर्य है? कबीर के इस पद का मुख्य संदेश क्या है?
2. सरल सारांश
कबीर के इस पद में वे ईश्वर की एकता और अद्वितीयता पर बल देते हैं। वे कहते हैं - मैं तो ईश्वर को एक ही मानता हूँ। वह एक ही है, दो नहीं।
फिर वे उस एक के विराट रूप का वर्णन करते हैं। वह एक ही ब्रह्मा है, विष्णु है और शिव भी। वही सबमें व्याप्त है। वही इस संसार का रचयिता, पालनहार और संहारक है।
वे आगे कहते हैं कि लोग अलग-अलग नामों से ईश्वर को पुकारते हैं - कोई राम कहता है, कोई रहीम, कोई हरि, कोई करीम। लेकिन यह सब एक ही ईश्वर के नाम हैं। तुम जिसे राम कहते हो, वही रहीम है। तुम जिसे हरि कहते हो, वही करीम है।
कबीर कहते हैं कि जो लोग ईश्वर को अलग-अलग नामों और रूपों में बाँटते हैं, वे उसकी एकता को नहीं समझते। सच्चा ज्ञान यह है कि ईश्वर एक है और एक ही है। वह अद्वितीय है, अद्वैत है।
इस पद में कबीर की समन्वयवादी दृष्टि स्पष्ट दिखती है। वे हिंदू और मुस्लिम, दोनों धर्मों के ईश्वर को एक मानते हैं। उनके लिए राम और रहीम, हरि और करीम - सब एक ही परमात्मा के अलग-अलग नाम हैं।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 पद की पंक्तियाँ और व्याख्या
पंक्ति 1: हम तौ एक एक करि जाना।
कबीर कहते हैं - मैं तो ईश्वर को एक ही मानता हूँ। वह एक है, दो नहीं। यह कबीर के अद्वैतवादी दृष्टिकोण को दर्शाता है। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते हैं।
पंक्ति 2: दोइ कहैं तिन्ही दोजग जाना॥
जो लोग ईश्वर को दो या अनेक मानते हैं, वे नरक के भागी होते हैं। कबीर के अनुसार, ईश्वर को अलग-अलग रूपों में बाँटना मूर्खता है और इससे आत्मा का पतन होता है।
पंक्ति 3: एकहि ब्रह्मा एकहि विष्नू एकहि शिवा करारा।
वह एक ही ब्रह्मा है, वही एक विष्णु है, वही एक शिव है। कबीर कहते हैं कि त्रिदेव - ब्रह्मा, विष्णु, शिव - कोई अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि उस एक परमात्मा के ही अलग-अलग रूप हैं।
पंक्ति 4: एकही गंगा एकही गोदी एकही गंगा धारा॥
वही एक गंगा है, वही एक गोदावरी है, वही एक गंगा की धारा है। कबीर ने यहाँ नदियों के उदाहरण से समझाया है। सभी पवित्र नदियाँ उसी एक परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं।
पंक्ति 5: एकहि राम एकहि रहीम एकहि करीम कहावा।
वही एक राम है, वही एक रहीम है, वही करीम कहलाता है। यहाँ कबीर ने हिंदू और मुस्लिम - दोनों धर्मों के ईश्वर के नामों को एक किया है। उनके लिए राम और रहीम एक ही हैं।
पंक्ति 6: एकही गीता एकही कुरआन एकही पुरान सुनावा॥
वही एक गीता है, वही एक कुरआन है, वही एक पुराण सुनाता है। कबीर ने यहाँ धर्मग्रंथों की एकता पर बल दिया है। सभी धर्मग्रंथ उसी एक परमात्मा का संदेश देते हैं।
पंक्ति 7: एकही रूप एकही रंग एकही सब संसारा॥
वही एक रूप है, वही एक रंग है, वही सारा संसार है। कबीर कहते हैं कि यह पूरा संसार उसी एक परमात्मा की अभिव्यक्ति है। वही सबमें व्याप्त है।
पंक्ति 8: कहैं कबीर सुनो भई साधो एकहि नाम अधारा॥
कबीर कहते हैं - हे साधो! सुनो, मैं तो उस एक ही नाम का सहारा लेता हूँ। अंत में कबीर ने अपना नाम लेते हुए कहा कि वे उस एक परमात्मा के एकमात्र नाम पर आश्रित हैं।
📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण
- ईश्वर की एकता: इस पद का केंद्रीय विषय ईश्वर की एकता है। कबीर बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि ईश्वर एक है। वह अद्वितीय है, अद्वैत है।
- धार्मिक समन्वय: कबीर हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच समन्वय स्थापित करते हैं। वे राम और रहीम, गीता और कुरआन को एक मानते हैं।
- निर्गुण भक्ति: कबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं। वे निराकार ईश्वर में विश्वास करते हैं। यह पद उसी दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।
- आडंबर विरोध: कबीर धार्मिक आडंबर और पाखंड के विरोधी थे। वे उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो ईश्वर को अलग-अलग नामों और रूपों में बाँटते हैं।
- सर्वव्यापकता: कबीर ईश्वर की सर्वव्यापकता पर बल देते हैं। वह ब्रह्मा, विष्णु, शिव में है, गंगा-गोदावरी में है, हर जगह है।
📌 विषय / Theme
इस पद का मुख्य विषय ईश्वर की एकता और अद्वितीयता है। कबीर बताते हैं कि ईश्वर एक है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए। दूसरा महत्वपूर्ण विषय है धार्मिक समन्वय - हिंदू और मुस्लिम धर्म में कोई अंतर नहीं है, दोनों एक ही ईश्वर की उपासना करते हैं।
📌 सामाजिक संदेश
कबीर इस पद के माध्यम से समाज को यह संदेश देते हैं कि धर्म के नाम पर मत बँटो। ईश्वर एक है, चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारो। हिंदू और मुस्लिम में भेद मत करो। राम और रहीम एक हैं, गीता और कुरआन एक हैं।
📌 नैतिक शिक्षा
- एकता में विश्वास करो: ईश्वर एक है। उसे अलग-अलग नामों और रूपों में मत बाँटो।
- धार्मिक सहिष्णुता: सभी धर्मों का सम्मान करो। सब एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं।
- आडंबर से बचो: बाहरी आडंबर और पाखंड से बचो। सच्ची भक्ति अंतरात्मा से होती है।
- सर्वव्यापकता को पहचानो: ईश्वर हर जगह है। उसे हर रूप में देखो।
- नाम का जप करो: उस एक नाम का सहारा लो, जो सबका आधार है।
4. काव्य सौंदर्य
📌 भाषा-शैली
- सधुक्कड़ी भाषा: कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है - जिसमें हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी के शब्द मिलते हैं। 'एक करि जाना', 'दोजग', 'करीम', 'कहावा' जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं।
- सरलता और सहजता: कबीर की भाषा बहुत सरल और सहज है। वे गूढ़ से गूढ़ बात को भी सरल शब्दों में कह देते हैं।
- प्रभावशाली शैली: उनकी शैली सीधी और प्रभावशाली है। वे बिना किसी अलंकार के सीधे दिल पर चोट करते हैं।
📌 अलंकार
- अनुप्रास अलंकार: 'एकहि ब्रह्मा एकहि विष्नू एकहि शिवा' में 'एकहि' शब्द की आवृत्ति से अनुप्रास अलंकार है।
- पुनरुक्ति प्रकाश: 'एकहि' शब्द की बार-बार आवृत्ति से पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
- दृष्टांत अलंकार: गंगा-गोदावरी, गीता-कुरआन, राम-रहीम के उदाहरणों से दृष्टांत अलंकार है।
📌 छंद
यह पद 'दोहा' और 'चौपाई' के मिश्रित रूप में है। इसमें 24 मात्राओं का छंद है, जो गेय और प्रवाहपूर्ण है।
📌 रस
इस पद में 'शांत रस' की प्रधानता है। ईश्वर की एकता और अद्वितीयता के ज्ञान से मन को शांति मिलती है। साथ ही, पाखंडियों पर व्यंग्य के कारण 'व्यंग्य रस' का भी पुट है।
📌 काव्यगत विशेषताएँ
- उपदेशात्मकता: कबीर के पद उपदेशात्मक होते हैं। वे सीधे-सीधे जीवन का सत्य बताते हैं।
- व्यंग्य: वे पाखंडियों पर गहरा व्यंग्य करते हैं।
- समन्वयवादिता: वे हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच समन्वय स्थापित करते हैं।
- सार्वभौमिकता: उनके विचार सार्वभौमिक हैं, हर युग में प्रासंगिक।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| एक करि जाना | एक ही मानना, एक मानकर चलना | कबीर ईश्वर को एक करि जानते थे। |
| दोजग | नरक, hell | दो कहने वाले दोजग जाते हैं। |
| ब्रह्मा | सृष्टि के रचयिता | ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं। |
| विष्नू | पालनहार, विष्णु | विष्णु जगत के पालनहार हैं। |
| शिवा | संहारक, शिव | शिव संहार के देवता हैं। |
| करारा | कहलाता है, जाना जाता है | वही शिवा करारा है। |
| गोदी | गोदावरी नदी | गंगा और गोदी दोनों पवित्र हैं। |
| रहीम | दयालु, अल्लाह का एक नाम | रहीम दयालु होता है। |
| करीम | उदार, अल्लाह का एक नाम | करीम उदार ईश्वर है। |
| गीता | हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ | गीता कर्म का उपदेश देती है। |
| कुरआन | मुसलमानों का पवित्र ग्रंथ | कुरआन अल्लाह का संदेश है। |
| पुरान | पुराण, प्राचीन धर्मग्रंथ | पुराणों में कथाएँ हैं। |
| सुनावा | सुनाता है | वही पुरान सुनावा। |
| अधारा | सहारा, आधार | एकहि नाम अधारा। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)
प्रश्न 1: कबीर ने 'हम तौ एक एक करि जाना' में ईश्वर की एकता को किस प्रकार स्पष्ट किया है? [CBSE 2023, 2021]
कबीर ने 'हम तौ एक एक करि जाना' में ईश्वर की एकता को अनेक उदाहरणों से स्पष्ट किया है। वे कहते हैं कि जो ईश्वर को दो या अनेक मानता है, वह नरक के भागी होता है। फिर वे बताते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव - ये तीन अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि उसी एक परमात्मा के अलग-अलग रूप हैं। गंगा और गोदावरी जैसी नदियाँ भी उसी एक की अभिव्यक्ति हैं। राम और रहीम, हरि और करीम - ये सब उसी एक ईश्वर के अलग-अलग नाम हैं। गीता, कुरआन और पुराण - ये सब उसी एक का संदेश देते हैं। इस प्रकार, कबीर ने हर स्तर पर ईश्वर की एकता को स्थापित किया है।
प्रश्न 2: कबीर के इस पद में धार्मिक समन्वय का संदेश कैसे मिलता है? [CBSE 2022, 2020]
कबीर के इस पद में धार्मिक समन्वय का गहरा संदेश मिलता है। वे हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच की दीवार को तोड़ते हैं। वे कहते हैं - 'एकही राम एकही रहीम एकही करीम कहावा'। यानी जिसे हिंदू राम कहते हैं, वही मुसलमानों का रहीम और करीम है। दोनों एक ही ईश्वर के अलग-अलग नाम हैं। वे आगे कहते हैं - 'एकही गीता एकही कुरआन एकही पुरान सुनावा'। यानी गीता और कुरआन, दोनों एक ही परमात्मा का संदेश देते हैं। इस प्रकार, कबीर ने हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच समन्वय स्थापित किया है और एकता का संदेश दिया है।
प्रश्न 3: 'दोइ कहैं तिन्ही दोजग जाना' का क्या अर्थ है? कबीर ऐसा क्यों कहते हैं? [CBSE 2023, 2019]
'दोइ कहैं तिन्ही दोजग जाना' का अर्थ है - जो लोग ईश्वर को दो या अनेक मानते हैं, वे नरक के भागी होते हैं। कबीर ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वे ईश्वर की एकता में गहरी आस्था रखते थे। उनके अनुसार, ईश्वर एक है। वह अद्वितीय है। उसे अलग-अलग नामों और रूपों में बाँटना मूर्खता है। जो लोग ऐसा करते हैं, वे सत्य से दूर हो जाते हैं और आत्मिक पतन का शिकार होते हैं। कबीर ने यहाँ 'दोजग' (नरक) शब्द का प्रयोग आध्यात्मिक पतन के लिए किया है। उनके अनुसार, ईश्वर की एकता को न मानना सबसे बड़ा पाप है।
प्रश्न 4: कबीर की भाषा-शैली की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? 'हम तौ एक एक करि जाना' के आधार पर बताइए। [CBSE 2021, 2020]
कबीर की भाषा-शैली की अनेक विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है उनकी सधुक्कड़ी भाषा - जिसमें हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी के शब्द मिलते हैं। 'दोजग', 'करीम', 'कहावा' जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं। दूसरी विशेषता है सरलता और सहजता। वे गूढ़ से गूढ़ बात को भी सरल शब्दों में कह देते हैं। तीसरी विशेषता है उपदेशात्मकता - वे सीधे-सीधे जीवन का सत्य बताते हैं। चौथी विशेषता है व्यंग्य - वे पाखंडियों पर गहरा व्यंग्य करते हैं। पाँचवीं विशेषता है समन्वयवादिता - वे हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच समन्वय स्थापित करते हैं।
प्रश्न 5: 'एकही रूप एकही रंग एकही सब संसारा' का क्या आशय है? [CBSE 2022]
'एकही रूप एकही रंग एकही सब संसारा' का अर्थ है - वही एक रूप है, वही एक रंग है, वही सारा संसार है। कबीर यहाँ ईश्वर की सर्वव्यापकता का वर्णन कर रहे हैं। उनके अनुसार, यह पूरा संसार उसी एक परमात्मा की अभिव्यक्ति है। वही हर रूप में है, वही हर रंग में है। चाहे कितने भी अलग-अलग रूप और रंग दिखें, सबमें वही एक बसा है। यह अद्वैतवाद का सिद्धांत है - ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या। सब कुछ उसी एक का विस्तार है।
7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)
प्रश्न 1: कबीर के 'हम तौ एक एक करि जाना' पद के माध्यम से उनके दार्शनिक विचारों का विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2023, 2021, 2019]
कबीर के 'हम तौ एक एक करि जाना' पद में उनके गहरे दार्शनिक विचार अभिव्यक्त हुए हैं।
- अद्वैतवाद: कबीर अद्वैतवादी हैं। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते हैं। उनके लिए ईश्वर एक है, अद्वितीय है। वह दो नहीं, अनेक नहीं। यह अद्वैतवाद का मूल सिद्धांत है।
- निर्गुण ब्रह्म: कबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं। वे निराकार ईश्वर में विश्वास करते हैं। उनका ईश्वर किसी विशेष रूप या अवतार में सीमित नहीं है। वह सबमें व्याप्त है।
- सर्वव्यापकता: कबीर ईश्वर की सर्वव्यापकता पर बल देते हैं। वह ब्रह्मा, विष्णु, शिव में है, गंगा-गोदावरी में है, राम-रहीम में है, गीता-कुरआन में है। वह हर जगह है, हर रूप में है।
- धार्मिक एकता: कबीर के दर्शन का एक महत्वपूर्ण पहलू धार्मिक एकता है। वे हिंदू और मुस्लिम धर्म के बीच कोई अंतर नहीं मानते। दोनों एक ही ईश्वर की उपासना करते हैं, बस नाम अलग-अलग हैं।
- आडंबर विरोध: कबीर धार्मिक आडंबर और पाखंड के विरोधी हैं। वे उन लोगों पर व्यंग्य करते हैं जो ईश्वर को अलग-अलग नामों और रूपों में बाँटते हैं और इसी बहाने परस्पर लड़ते हैं।
- सच्ची भक्ति: कबीर के अनुसार, सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं, बल्कि अंतरात्मा में है। उस एक नाम का स्मरण ही सच्ची भक्ति है।
इस प्रकार, इस पद में कबीर के अद्वैतवाद, निर्गुण ब्रह्म, सर्वव्यापकता, धार्मिक एकता, आडंबर विरोध और सच्ची भक्ति के दार्शनिक विचार स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुए हैं।
प्रश्न 2: कबीर के 'हम तौ एक एक करि जाना' पद की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2022, 2020]
कबीर के 'हम तौ एक एक करि जाना' पद में अनेक काव्यगत विशेषताएँ हैं।
- भाषा: कबीर की भाषा सधुक्कड़ी है - जिसमें हिंदी, उर्दू, अरबी, फारसी के शब्द मिलते हैं। 'दोजग', 'करीम', 'कहावा' जैसे शब्द इसके उदाहरण हैं। यह भाषा जन-साधारण की भाषा है, जिसे कोई भी आसानी से समझ सकता है।
- शैली: उनकी शैली उपदेशात्मक है। वे सीधे-सीधे जीवन का सत्य बताते हैं। उनकी शैली में व्यंग्य का भी गहरा पुट है। वे पाखंडियों पर करारा व्यंग्य करते हैं।
- अलंकार: इस पद में अनुप्रास अलंकार है - 'एकहि' शब्द की बार-बार आवृत्ति से। पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार भी है। गंगा-गोदावरी, गीता-कुरआन, राम-रहीम के उदाहरणों से दृष्टांत अलंकार है।
- छंद: यह पद दोहा और चौपाई के मिश्रित रूप में है। इसमें 24 मात्राओं का छंद है, जो गेय और प्रवाहपूर्ण है।
- रस: इस पद में शांत रस की प्रधानता है। ईश्वर की एकता के ज्ञान से मन को शांति मिलती है। साथ ही, पाखंडियों पर व्यंग्य के कारण व्यंग्य रस का भी पुट है।
- प्रतीक: कबीर ने गंगा, गोदावरी, राम, रहीम, गीता, कुरआन जैसे प्रतीकों का प्रयोग किया है, जो सामान्य जन की समझ में आने वाले हैं।
- सौंदर्य: इस पद का सबसे बड़ा सौंदर्य है उसकी सरलता। बिना किसी अलंकार के, बिना किसी जटिलता के, कबीर ने गहरे दार्शनिक सत्य को इतने सरल शब्दों में कह दिया है कि कोई भी समझ सकता है।
इस प्रकार, कबीर का यह पद काव्यगत दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है। सरल भाषा, उपदेशात्मक शैली, प्रभावशाली अलंकार और गहरा दार्शनिक सत्य - यह सब मिलकर इसे एक अमर रचना बनाते हैं।
प्रश्न 3: कबीर के 'हम तौ एक एक करि जाना' पद की आज के समाज में क्या प्रासंगिकता है? विस्तार से चर्चा कीजिए। [CBSE 2021, 2019]
कबीर का 'हम तौ एक एक करि जाना' पद आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
- धार्मिक कट्टरता के विरुद्ध: आज के समाज में धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है। हिंदू और मुस्लिम के बीच दूरियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे में कबीर का यह पद हमें याद दिलाता है कि राम और रहीम एक हैं, गीता और कुरआन एक हैं। धर्म के नाम पर बँटना मूर्खता है।
- सांप्रदायिक सद्भाव: यह पद सांप्रदायिक सद्भाव का संदेश देता है। यह हमें सिखाता है कि सभी धर्मों का सम्मान करो। सब एक ही ईश्वर तक ले जाते हैं।
- आडंबर और पाखंड के विरुद्ध: आज भी धर्म के नाम पर बहुत आडंबर और पाखंड होता है। लोग बाहरी दिखावे में लगे रहते हैं। कबीर का यह पद हमें आंतरिक सच्चाई पर ध्यान देने की सीख देता है।
- एकता का संदेश: आज जब समाज कई तरह से बँटा हुआ है, कबीर का एकता का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है। वे कहते हैं कि सबमें वही एक है। इसलिए सबसे प्रेम करो।
- सहिष्णुता की सीख: यह पद हमें सहिष्णुता की सीख देता है। दूसरों के धर्म, विचार और मत का सम्मान करना सिखाता है।
- मानवता का संदेश: कबीर का यह पद अंततः मानवता का संदेश देता है। सब इंसान हैं, सब एक हैं। धर्म, जाति, भाषा के नाम पर बँटना नहीं चाहिए।
इस प्रकार, कबीर का यह पद आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 600 साल पहले था। यह हमें धार्मिक कट्टरता से दूर रहने, सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने और मानवता का पाठ पढ़ाने का काम करता है।
प्रश्न 4: कबीर ने 'हम तौ एक एक करि जाना' में जिन उदाहरणों के माध्यम से ईश्वर की एकता स्थापित की है, उनका विस्तार से वर्णन कीजिए। [CBSE 2020]
कबीर ने 'हम तौ एक एक करि जाना' में अनेक उदाहरणों के माध्यम से ईश्वर की एकता स्थापित की है।
- त्रिदेव के उदाहरण से: कबीर कहते हैं - 'एकहि ब्रह्मा एकहि विष्नू एकहि शिवा करारा'। ब्रह्मा, विष्णु और शिव - ये तीन अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि उसी एक परमात्मा के अलग-अलग रूप हैं। वही सृष्टि का रचयिता है, पालनहार है और संहारक भी।
- नदियों के उदाहरण से: 'एकही गंगा एकही गोदी एकही गंगा धारा'। गंगा और गोदावरी जैसी पवित्र नदियाँ भी उसी एक की अभिव्यक्ति हैं। वे अलग-अलग नहीं हैं।
- ईश्वर के नामों के उदाहरण से: 'एकही राम एकही रहीम एकही करीम कहावा'। राम और रहीम - ये दो अलग-अलग ईश्वर नहीं हैं। जिसे हिंदू राम कहता है, वही मुसलमानों का रहीम और करीम है।
- धर्मग्रंथों के उदाहरण से: 'एकही गीता एकही कुरआन एकही पुरान सुनावा'। गीता, कुरआन और पुराण - ये सब अलग-अलग धर्मग्रंथ नहीं हैं। ये सब उसी एक परमात्मा का संदेश देते हैं।
- रूप-रंग के उदाहरण से: 'एकही रूप एकही रंग एकही सब संसारा'। यह सारा संसार उसी एक का रूप है। चाहे कितने भी अलग-अलग रूप और रंग दिखें, सबमें वही एक बसा है।
इन सभी उदाहरणों के माध्यम से कबीर ने यह स्थापित किया है कि ईश्वर एक है। वह अद्वितीय है। चाहे उसे किसी भी रूप में देखो, किसी भी नाम से पुकारो, वह एक ही है।
प्रश्न 5: 'कहैं कबीर सुनो भई साधो एकहि नाम अधारा' - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट करते हुए बताइए कि कबीर ने 'एक नाम' से क्या तात्पर्य लिया है? [CBSE 2021]
'कहैं कबीर सुनो भई साधो एकहि नाम अधारा' - यह कबीर के इस पद की अंतिम पंक्ति है, जिसमें उन्होंने अपने संदेश का सार प्रस्तुत किया है।
आशय: कबीर कहते हैं - हे साधो! सुनो, मैं तो उस एक ही नाम का सहारा लेता हूँ। यानी मैं किसी बाहरी आडंबर, पाखंड या रीति-रिवाज का सहारा नहीं लेता। मेरा एकमात्र सहारा उस एक परमात्मा का नाम है।
'एक नाम' से तात्पर्य: कबीर ने 'एक नाम' से क्या तात्पर्य लिया है -
- राम नहीं, रहीम नहीं, बस 'नाम': कबीर के लिए 'एक नाम' का अर्थ राम या रहीम नाम विशेष नहीं है। उनके लिए 'नाम' का अर्थ है - परमात्मा की सत्ता का स्मरण, उसकी महिमा का गान।
- निराकार ब्रह्म का स्मरण: कबीर निर्गुण भक्ति के कवि हैं। वे निराकार ईश्वर में विश्वास करते हैं। उनके लिए 'नाम' का अर्थ है उस निराकार ब्रह्म का स्मरण।
- सच्ची भक्ति: कबीर के अनुसार, सच्ची भक्ति बाहरी आडंबरों में नहीं है। सच्ची भक्ति है - उस एक नाम का स्मरण, उस एक के प्रति प्रेम और समर्पण।
- आधार: 'अधारा' का अर्थ है सहारा। कबीर कहते हैं कि उनका एकमात्र सहारा उस एक नाम का स्मरण है। उन्हें किसी और चीज की जरूरत नहीं।
इस प्रकार, इस पंक्ति में कबीर ने अपने संपूर्ण दर्शन का सार प्रस्तुत किया है। उनके लिए एकमात्र सत्य है - उस एक परमात्मा का नाम। बाकी सब मिथ्या है।
8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न
- ईश्वर की एकता का प्रतिपादन - 2023, 2021, 2019
- धार्मिक समन्वय का संदेश - 2022, 2020, 2018
- 'दोइ कहैं तिन्ही दोजग जाना' का अर्थ - 2022, 2020, 2019
- कबीर की भाषा-शैली की विशेषताएँ - 2021, 2019
- पद में प्रयुक्त उदाहरणों का महत्व - 2020, 2018
- 'एक नाम' से तात्पर्य - 2021, 2020
📈 बोर्ड ट्रेंड
पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस पद से प्रतिवर्ष 5-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में ईश्वर की एकता, धार्मिक समन्वय और प्रमुख पंक्तियों के अर्थ पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में कबीर के दार्शनिक विचार, काव्यगत विशेषताएँ और पद की प्रासंगिकता पर प्रश्न आते हैं।
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- कवि - कबीरदास
- जन्म - 1398 (लगभग), मृत्यु - 1518 (लगभग)
- गुरु - स्वामी रामानंद (मान्यता)
- प्रमुख रचनाएँ - बीजक, साखी, सबद, रमैनी
- भाषा - सधुक्कड़ी
- पुस्तक - आरोह भाग 1
- पद का नाम - हम तौ एक एक करि जाना
- मुख्य विषय - ईश्वर की एकता, धार्मिक समन्वय
- धारा - निर्गुण भक्ति धारा
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"हम तौ एक एक करि जाना।"
"एकही राम एकही रहीम एकही करीम कहावा।"
"एकही नाम अधारा।"
9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)
एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।
उदाहरण: प्रश्न - 'हम तौ एक एक करि जाना' पद के कवि कौन हैं? उत्तर - कबीरदास।
📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)
परिचय (1 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु का उदाहरण सहित वर्णन।
उदाहरण: प्रश्न - कबीर ने ईश्वर की एकता कैसे स्थापित की है? उत्तर - परिचय में बताएँ कि कबीर ईश्वर की एकता में विश्वास करते हैं। फिर त्रिदेव के उदाहरण से, नदियों के उदाहरण से, ईश्वर के नामों के उदाहरण से, धर्मग्रंथों के उदाहरण से - चार बिंदुओं में समझाएँ। निष्कर्ष में कहें कि इस प्रकार कबीर ने हर स्तर पर ईश्वर की एकता स्थापित की है।
📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)
दार्शनिक विश्लेषण के लिए: प्रस्तावना + कवि का परिचय + पद का मूलभाव + दार्शनिक विचारों का विश्लेषण + निष्कर्ष। जैसे कबीर के दार्शनिक विचारों पर प्रश्न - पहले कबीर का परिचय दें, फिर पद का मूलभाव समझाएँ, फिर उनके अद्वैतवाद, निर्गुण ब्रह्म, सर्वव्यापकता, धार्मिक समन्वय आदि विचारों का विश्लेषण करें, अंत में निष्कर्ष दें।
10. हब लिंक
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