📘 पाठ – गजल | कक्षा 11 हिंदी (आरोह) | GPN
📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: आरोह भाग 1 | ✍️ कवि: दुष्यंत कुमार | 📝 प्रकार: गजल (आधुनिक गजल) | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]
📌 अनुक्रमणिका
- 1. परिचय
- 2. सारांश
- 3. विस्तृत व्याख्या
- 4. काव्य सौंदर्य
- 5. शब्दार्थ
- 6. लघु प्रश्न (5)
- 7. दीर्घ प्रश्न (5)
- 8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
- 9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
- 10. हब लिंक
1. परिचय
📝 कवि परिचय - दुष्यंत कुमार
जन्म: 1 सितंबर 1933, बिजनौर (उत्तर प्रदेश)
मृत्यु: 30 दिसंबर 1975
प्रमुख रचनाएँ: सूर्य का स्वागत करो, आकाश के किनारे पर, आवाज़ों के घेरे में, छोटे-छोटे सवाल, जलती हुई नदी में, एक कंठ विषपायी, आदि
सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार (मरणोपरांत)
दुष्यंत कुमार हिंदी साहित्य के उन प्रमुख कवियों में हैं जिन्होंने आधुनिक गजल को नई ऊँचाई दी। वे मूलतः व्यंग्यकार कवि हैं। उनकी गजलों में समकालीन राजनीति, सामाजिक विसंगतियों, मध्यवर्गीय जीवन के द्वंद्व और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए' आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। उनकी गजलों में सादगी, संगीतात्मकता और गहरा व्यंग्य एक साथ मिलता है।
📖 गजल का परिचय
गजल उर्दू और फारसी कविता की एक प्रमुख विधा है। इसमें कई शेर (दो पंक्तियाँ) होते हैं। हर शेर एक स्वतंत्र इकाई होता है, लेकिन सभी शेर एक ही भाव या विचार से जुड़े होते हैं। पहले शेर के दोनों मिसरे और फिर हर शेर का दूसरा मिसरा एक ही तुक और रदीफ (आवर्ती शब्द) में होता है।
दुष्यंत कुमार की यह गजल आधुनिक हिंदी गजल का बेहतरीन उदाहरण है। इसमें पारंपरिक गजल की बंदिशें तो हैं, लेकिन विषय आधुनिक है। यह गजल समकालीन राजनीति, समाज और मानवीय स्थितियों पर गहरा व्यंग्य करती है।
इस गजल में दुष्यंत जी ने उस स्थिति पर व्यंग्य किया है जहाँ सपने तो बहुत हैं, लेक�न उन्हें पूरा करने के साधन नहीं हैं। वे आशा और निराशा के बीच के द्वंद्व को बड़ी खूबसूरती से उकेरते हैं।
🎯 अध्याय का महत्व
कक्षा 11 की बोर्ड परीक्षा में यह गजल अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष इससे 5-8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। गजल के विभिन्न शेरों की व्याख्या, उनके व्यंग्यात्मक अर्थ, गजल के माध्यम से दिए गए सामाजिक-राजनीतिक संदेश, दुष्यंत कुमार की शैली, गजल विधा की विशेषताएँ आदि पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि 'कहाँ तो तय था' वाले शेर का क्या अर्थ है? गजल का मुख्य संदेश क्या है? दुष्यंत कुमार की गजलों की क्या विशेषताएँ हैं?
2. सरल सारांश
दुष्यंत कुमार की यह गजल समकालीन राजनीति, समाज और मानवीय स्थितियों पर गहरा व्यंग्य करती है।
कवि कहते हैं - कहाँ तो यह तय हुआ था कि हर घर में रोशनी होगी, लेकिन अब पूरे शहर के लिए भी एक चराग (दीया) मयस्सर नहीं है। यानी सपने तो बहुत थे, लेकिन उन्हें पूरा करने के साधन नहीं हैं।
वे कहते हैं कि सियासत (राजनीति) के नाम पर लोगों ने हमारे घर जला दिए, और अब वही लोग शहर में चराग जलाने की बात करते हैं। यह बड़ी विडंबना है।
एक शेर में वे कहते हैं - तुम किसी और के बारे में सोचते हो, हम किसी और के बारे में सोचते हैं, लेकिन हमारी बातचीत का सिलसिला कुछ और ही है। यानी हमारे इरादे और हमारी बातें मेल नहीं खातीं।
अंत में वे कहते हैं - मत पूछो कि दुष्यंत पर क्या बीती। वह तो अभी-अभी इस शहर में आया है, और शहर वालों ने उसे क्या-क्या दिया, वह बयान नहीं कर सकता।
यह गजल आशा और निराशा, सपने और उनकी असफलता, राजनीतिक विडंबनाओं और सामाजिक यथार्थ का मार्मिक चित्रण करती है।
3. विस्तृत व्याख्या
📌 गजल के शेर और व्याख्या
शेर 1: कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
यह दुष्यंत कुमार का सबसे प्रसिद्ध शेर है। 'चरागाँ' का अर्थ है रोशनी, उजाला। कवि कहते हैं कि एक समय था जब यह तय हुआ था कि हर घर में रोशनी होगी, हर व्यक्ति सुखी होगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि पूरे शहर के लिए भी एक चराग (दीया) नहीं है। यहाँ 'चराग' आशा, सुख, संसाधन आदि का प्रतीक है। यह शेर सपनों और वास्तविकता के बीच की खाई को दर्शाता है।
शेर 2: ये कैसे लोग थे जिनके लिए चरागाँ था, कि अब चराग से भी दूर हैं शहर के लिए।
कवि सवाल उठाते हैं कि वे कैसे लोग थे जिनके लिए रोशनी का वादा किया गया था, और आज वही लोग चराग से भी दूर हैं? यह उन नेताओं और शासकों पर व्यंग्य है जो चुनावों में झूठे वादे करते हैं और सत्ता में आने के बाद उन्हें भूल जाते हैं।
शेर 3: सियासत के नए खिलाड़ियों ने या न जाने क्या सोचा, जलाए घर हमारे और किए चरागाँ शहर के लिए।
कवि कहते हैं कि राजनीति के नए खिलाड़ियों ने क्या सोचा, हम नहीं जानते। उन्होंने हमारे घर जला दिए और अब वे शहर में रोशनी करने की बात करते हैं। यह विडंबना है कि जिन लोगों ने हमें बर्बाद किया, वही हमारे कल्याण की बात करते हैं।
शेर 4: तुम्हारा ज़िक्र कुछ और है हमारा ज़िक्र कुछ और है, मगर ये बातचीत का सिलसिला शहर के लिए।
कवि कहते हैं कि तुम कुछ और सोचते हो, हम कुछ और सोचते हैं, लेकिन हमारी बातचीत का सिलसिला कुछ और ही है। यानी हमारे इरादे, हमारी सोच और हमारी बातें मेल नहीं खातीं। यह दोहरेपन और पाखंड पर व्यंग्य है।
शेर 5: न पूछो दुष्यंत कि क्या गुज़री उस पर, वो अभी-अभी तो आया है, ये क्या-क्या दिया शहर ने उसे, वो क्या बयान करे शहर के लिए।
अंतिम शेर में कवि अपनी बात कहते हैं। वे कहते हैं कि मत पूछो कि दुष्यंत पर क्या बीती। वह तो अभी-अभी इस शहर में आया है। शहर ने उसे क्या-क्या दिया (दुख, निराशा, संघर्ष), वह बयान नहीं कर सकता।
📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण
- सपने और वास्तविकता का द्वंद्व: गजल का केंद्रीय विषय सपनों और वास्तविकता का द्वंद्व है। 'चरागाँ' के सपने थे, लेकिन 'चराग' भी मयस्सर नहीं।
- राजनीतिक व्यंग्य: यह गजल राजनीति पर गहरा व्यंग्य है। नेता वादे करते हैं, लेकिन पूरे नहीं करते। वे जनता के घर जलाते हैं और फिर रोशनी की बात करते हैं।
- दोहरापन और पाखंड: 'तुम्हारा ज़िक्र कुछ और है, हमारा ज़िक्र कुछ और है' - यह समाज के दोहरेपन और पाखंड को दर्शाता है।
- विसंगतियों का चित्रण: गजल समाज की विसंगतियों का चित्रण करती है - जहाँ जिनके लिए रोशनी का वादा किया गया, वही रोशनी से दूर हैं।
- व्यक्तिगत अनुभव: अंतिम शेर में कवि का व्यक्तिगत अनुभव झलकता है - एक कवि के रूप में समाज से उन्हें जो मिला, उसकी पीड़ा।
📌 विषय / Theme
इस गजल का मुख्य विषय समकालीन राजनीति और समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य है। यह दर्शाती है कि कैसे राजनेता झूठे वादे करते हैं, कैसे सपने टूटते हैं, कैसे समाज में दोहरापन है। दूसरा महत्वपूर्ण विषय है आशा और निराशा का द्वंद्व।
📌 सामाजिक संदेश
दुष्यंत कुमार इस गजल के माध्यम से समाज को यह संदेश देते हैं कि झूठे वादों पर विश्वास मत करो। नेता अपने वादे भूल जाते हैं। जनता को सचेत रहना चाहिए। यह गजल राजनीतिक जागरूकता का संदेश देती है और समाज के दोहरेपन को उजागर करती है।
📌 नैतिक शिक्षा
- सपने जरूरी हैं, लेकिन हकीकत से आँख मत मिलाओ: सपने देखना अच्छा है, लेकिन हकीकत को नजरअंदाज मत करो।
- नेताओं के वादों पर आँख बंद करके भरोसा मत करो: राजनीतिक वादे अक्सर झूठे होते हैं।
- दोहरापन छोड़ो: समाज में दोहरापन और पाखंड बहुत है। उससे बचो।
- जागरूक बनो: राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक बनो।
4. काव्य सौंदर्य
📌 गजल विधा की विशेषताएँ
- मतला: गजल का पहला शेर मतला कहलाता है, जिसके दोनों मिसरे एक ही तुक और रदीफ में होते हैं। इस गजल में 'चरागाँ हर एक घर के लिए' और 'नहीं शहर के लिए' - यह मतला है।
- मक़ता: गजल के अंतिम शेर में कवि अपना नाम लेता है। इसे मक़ता कहते हैं। इस गजल का अंतिम शेर 'न पूछो दुष्यंत...' मक़ता है।
- रदीफ और काफिया: रदीफ वह शब्द है जो हर शेर के अंत में दोहराया जाता है - 'के लिए'। काफिया तुक है - 'चरागाँ', 'मयस्सर', 'शहर' आदि।
📌 भाषा-शैली
- उर्दू शब्दावली: दुष्यंत की गजल में उर्दू के शब्दों का प्रयोग है - 'चरागाँ', 'मयस्सर', 'सियासत', 'ज़िक्र' आदि।
- सरलता और संगीतात्मकता: उनकी भाषा सरल और संगीतात्मक है। गजल पढ़ते समय एक लय का अनुभव होता है।
- व्यंग्यात्मकता: उनकी भाषा में गहरा व्यंग्य है। वे बहुत ही सीधे-सादे शब्दों में गहरा व्यंग्य करते हैं।
📌 अलंकार
- अनुप्रास अलंकार: 'कहाँ तो तय था', 'चराग मयस्सर' में अनुप्रास अलंकार है।
- प्रश्न अलंकार: 'ये कैसे लोग थे' में प्रश्न अलंकार है।
- विरोधाभास: 'जलाए घर हमारे और किए चरागाँ शहर के लिए' में विरोधाभास है।
📌 रस
इस गजल में 'व्यंग्य रस' की प्रधानता है। साथ ही, निराशा और पीड़ा के भावों से 'करुण रस' का भी पुट है।
📌 काव्यगत विशेषताएँ
- व्यंग्यात्मकता: इस गजल की सबसे बड़ी काव्यगत विशेषता है इसकी व्यंग्यात्मकता। कवि ने राजनीति और समाज पर गहरा व्यंग्य किया है।
- प्रतीक योजना: 'चरागाँ', 'चराग', 'घर', 'शहर' - ये सब प्रतीक हैं। चराग आशा और सुख का, घर व्यक्ति का, शहर समाज का प्रतीक है।
- संक्षिप्तता: गजल के हर शेर में बहुत कम शब्दों में गहरा अर्थ भरा है।
- संगीतात्मकता: गजल में संगीतात्मकता है, जो इसे और प्रभावशाली बनाती है।
- सार्वभौमिकता: यह गजल हर युग में प्रासंगिक है, क्योंकि राजनीतिक पाखंड और सामाजिक विसंगतियाँ हर समय रही हैं।
5. शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ | वाक्य प्रयोग |
|---|---|---|
| गजल | उर्दू-फारसी काव्य विधा | दुष्यंत की गजल प्रसिद्ध है। |
| चरागाँ | रोशनी, उजाला, दीपमाला | चरागाँ हर एक घर के लिए। |
| चराग | दीया, lamp | चराग मयस्सर नहीं। |
| मयस्सर | प्राप्त होना, मिलना | चराग मयस्सर नहीं। |
| सियासत | राजनीति | सियासत के नए खिलाड़ी। |
| जलाए घर | घर जला दिए | जलाए घर हमारे। |
| ज़िक्र | चर्चा, mention | तुम्हारा ज़िक्र कुछ और है। |
| सिलसिला | क्रम, series | बातचीत का सिलसिला। |
| दुष्यंत | कवि का नाम | न पूछो दुष्यंत। |
| गुज़री | बीती, passed | क्या गुज़री उस पर। |
| मतला | गजल का पहला शेर | यह मतला है। |
| मक़ता | गजल का अंतिम शेर | यह मक़ता है। |
| रदीफ | आवर्ती शब्द | 'के लिए' रदीफ है। |
| काफिया | तुक | चरागाँ, मयस्सर काफिया हैं। |
6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)
प्रश्न 1: 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए' - इस शेर का क्या आशय है? [CBSE 2023, 2021]
यह दुष्यंत कुमार का सबसे प्रसिद्ध शेर है। 'चरागाँ' का अर्थ है रोशनी, उजाला। कवि कहते हैं कि एक समय था जब यह तय हुआ था कि हर घर में रोशनी होगी, हर व्यक्ति सुखी होगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि पूरे शहर के लिए भी एक चराग (दीया) नहीं है। यहाँ 'चराग' आशा, सुख, संसाधन आदि का प्रतीक है। यह शेर सपनों और वास्तविकता के बीच की खाई को दर्शाता है। यह उन नेताओं पर व्यंग्य भी है जो चुनावों में झूठे वादे करते हैं और सत्ता में आने के बाद उन्हें भूल जाते हैं।
प्रश्न 2: 'सियासत के नए खिलाड़ियों ने या न जाने क्या सोचा, जलाए घर हमारे और किए चरागाँ शहर के लिए' - इस शेर में कवि ने किस विडंबना की ओर संकेत किया है? [CBSE 2022, 2020]
इस शेर में कवि ने एक गहरी राजनीतिक विडंबना की ओर संकेत किया है। कवि कहते हैं कि राजनीति के नए खिलाड़ियों ने हमारे घर जला दिए - यानी उन्होंने हमारे सुख-चैन को नष्ट कर दिया, हमें बर्बाद कर दिया। और अब वही लोग शहर में रोशनी करने की बात करते हैं, हमारे कल्याण की बात करते हैं। यह विडंबना है कि जिन लोगों ने हमें बर्बाद किया, वही हमारे कल्याण का दावा करते हैं। कवि यहाँ उन नेताओं पर व्यंग्य कर रहे हैं जो जनता का शोषण करते हैं और फिर जनता के हितैषी बनते हैं।
प्रश्न 3: 'तुम्हारा ज़िक्र कुछ और है हमारा ज़िक्र कुछ और है, मगर ये बातचीत का सिलसिला शहर के लिए' - इस शेर का क्या तात्पर्य है? [CBSE 2023, 2019]
इस शेर में कवि ने समाज के दोहरेपन और पाखंड पर व्यंग्य किया है। कवि कहते हैं कि तुम्हारी सोच कुछ और है, तुम किसी और के बारे में सोचते हो। हमारी सोच कुछ और है, हम किसी और के बारे में सोचते हैं। लेकिन हमारी बातचीत का सिलसिला कुछ और ही है। यानी हमारे इरादे, हमारी सोच और हमारी बातें मेल नहीं खातीं। हम वह नहीं कहते जो सोचते हैं, और वह नहीं करते जो कहते हैं। यह समाज में व्याप्त दोहरेपन और पाखंड को उजागर करता है।
प्रश्न 4: 'न पूछो दुष्यंत कि क्या गुज़री उस पर' - यहाँ 'दुष्यंत' कौन है और उस पर क्या गुज़री? [CBSE 2021, 2020]
इस शेर में 'दुष्यंत' स्वयं कवि दुष्यंत कुमार हैं। यह गजल का मक़ता (अंतिम शेर) है, जिसमें कवि अपना नाम लेता है। कवि कहते हैं कि मत पूछो कि दुष्यंत पर क्या बीती। वह तो अभी-अभी इस शहर में आया है। शहर ने उसे जो कुछ दिया - दुख, निराशा, संघर्ष, उपेक्षा - वह बयान नहीं कर सकता। यह शेर एक कवि के रूप में समाज से मिले अनुभवों की पीड़ा को दर्शाता है। यह उस अकेलेपन और निराशा को भी दर्शाता है जो एक संवेदनशील कवि समाज में महसूस करता है।
प्रश्न 5: दुष्यंत कुमार की गजल की मुख्य विशेषताएँ क्या हैं? [CBSE 2022]
दुष्यंत कुमार की गजलों की अनेक विशेषताएँ हैं। पहली विशेषता है उनका व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण। वे राजनीति और समाज की विसंगतियों पर गहरा व्यंग्य करते हैं। दूसरी विशेषता है उनकी भाषा की सरलता। वे उर्दू मिश्रित सरल हिंदी में लिखते हैं। तीसरी विशेषता है उनकी गजलों की संगीतात्मकता। उनकी गजलें पढ़ने में जितनी सुंदर हैं, सुनने में उतनी ही मधुर। चौथी विशेषता है उनके प्रतीकों का सशक्त प्रयोग - 'चराग', 'घर', 'शहर' जैसे प्रतीक गहरे अर्थ रखते हैं। पाँचवीं विशेषता है उनकी सार्वभौमिकता - उनकी गजलें हर युग में प्रासंगिक हैं।
7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)
प्रश्न 1: दुष्यंत कुमार की इस गजल के माध्यम से समकालीन राजनीति पर किया गया व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2023, 2021, 2019]
दुष्यंत कुमार की इस गजल में समकालीन राजनीति पर गहरा व्यंग्य किया गया है।
- झूठे वादों पर व्यंग्य: पहले शेर में कवि कहते हैं - 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए'। यह उन नेताओं के झूठे वादों पर व्यंग्य है जो चुनावों में हर घर में रोशनी, हर व्यक्ति को सुख देने का वादा करते हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद वे अपने वादे भूल जाते हैं - 'कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए'।
- जनता से दूरी पर व्यंग्य: दूसरे शेर में कवि कहते हैं - 'ये कैसे लोग थे जिनके लिए चरागाँ था, कि अब चराग से भी दूर हैं शहर के लिए'। यह उन नेताओं पर व्यंग्य है जिनके लिए जनता ने वोट दिया, लेकिन सत्ता में आने के बाद वे जनता से दूर हो गए।
- विनाश और निर्माण की विडंबना: तीसरे शेर में कवि कहते हैं - 'जलाए घर हमारे और किए चरागाँ शहर के लिए'। यह बड़ी विडंबना है कि जिन नेताओं ने जनता के घर जलाए, उन्होंने ही जनता को बर्बाद किया, वही आज शहर में रोशनी की बात करते हैं।
- दोहरा चरित्र पर व्यंग्य: चौथा शेर राजनेताओं के दोहरे चरित्र पर व्यंग्य है। वे एक बात सोचते हैं, दूसरी कहते हैं और तीसरी करते हैं।
इस प्रकार, इस गजल में दुष्यंत कुमार ने राजनीति के हर पहलू - झूठे वादों, जनता से दूरी, विनाश और निर्माण की विडंबना, दोहरे चरित्र - पर गहरा व्यंग्य किया है। यह गजल आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में थी।
प्रश्न 2: इस गजल में प्रयुक्त प्रतीकों और बिंबों की व्याख्या कीजिए। [CBSE 2022, 2020]
दुष्यंत कुमार की इस गजल में अनेक प्रतीकों और बिंबों का सशक्त प्रयोग हुआ है।
- चराग (दीया): 'चराग' इस गजल का केंद्रीय प्रतीक है। यह आशा, सुख, समृद्धि, ज्ञान, रोशनी - सब कुछ का प्रतीक है। 'चराग मयस्सर नहीं' का अर्थ है कि आशा भी नहीं बची, सुख भी नहीं है।
- चरागाँ (दीपमाला): 'चरागाँ' बहुत सारे दीयों का समूह है। यह उस समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक है जिसका वादा किया गया था।
- घर: 'घर' व्यक्ति, परिवार और व्यक्तिगत जीवन का प्रतीक है। 'जलाए घर हमारे' का अर्थ है हमारे व्यक्तिगत जीवन को तबाह कर दिया।
- शहर: 'शहर' समाज, राष्ट्र और सार्वजनिक जीवन का प्रतीक है। गजल में 'शहर के लिए' का अर्थ है समाज के लिए, सबके लिए।
- सियासत के खिलाड़ी: यह नेताओं और शासकों का प्रतीक है। 'नए खिलाड़ी' से तात्पर्य है नई सरकारें, नए नेता जो आते हैं और जाते रहते हैं।
- बातचीत का सिलसिला: यह सार्वजनिक बहस, भाषण और राजनीतिक चर्चाओं का प्रतीक है।
इन प्रतीकों के माध्यम से कवि ने गहरी बातें कही हैं। 'चराग' और 'चरागाँ' के अंतर से सपनों और वास्तविकता के अंतर को दर्शाया है। 'घर' और 'शहर' के अंतर से व्यक्ति और समाज के अंतर को दिखाया है। ये प्रतीक गजल को कई स्तरों पर पढ़ने का अवसर देते हैं।
प्रश्न 3: दुष्यंत कुमार की इस गजल की काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2021, 2019]
दुष्यंत कुमार की यह गजल काव्यगत दृष्टि से अत्यंत समृद्ध है।
- गजल विधा का निर्वाह: इस गजल में गजल विधा की सभी बंदिशों का पालन किया गया है। इसमें मतला है, मक़ता है, रदीफ ('के लिए') है और काफिया है। हर शेर स्वतंत्र है, लेकिन सभी एक ही भाव से जुड़े हैं।
- व्यंग्यात्मकता: इस गजल की सबसे बड़ी काव्यगत विशेषता है इसकी व्यंग्यात्मकता। कवि ने राजनीति और समाज पर गहरा व्यंग्य किया है। यह व्यंग्य बहुत ही सीधे-सादे शब्दों में किया गया है, लेकिन उतना ही गहरा है।
- प्रतीक योजना: गजल में 'चराग', 'चरागाँ', 'घर', 'शहर', 'सियासत के खिलाड़ी' जैसे सशक्त प्रतीकों का प्रयोग हुआ है।
- भाषा की सरलता: दुष्यंत की भाषा सरल और सहज है। वे उर्दू मिश्रित हिंदी का प्रयोग करते हैं, जो आम आदमी की समझ में आती है।
- संगीतात्मकता: गजल में संगीतात्मकता है। रदीफ और काफिया के कारण इसमें एक लय है, जो इसे गेय बनाती है।
- संक्षिप्तता: हर शेर बहुत संक्षिप्त है, लेकिन उसमें गहरा अर्थ भरा है। 'कहाँ तो तय था...' शेर में कितना कुछ कह दिया है।
- सार्वभौमिकता: यह गजल हर युग में प्रासंगिक है। राजनीतिक पाखंड और सामाजिक विसंगतियाँ हर समय रही हैं, इसलिए यह गजल कभी पुरानी नहीं होती।
इस प्रकार, दुष्यंत कुमार की यह गजल काव्यगत दृष्टि से एक उत्कृष्ट रचना है। इसमें गजल विधा का निर्वाह, व्यंग्य, प्रतीक, सरल भाषा, संगीतात्मकता, संक्षिप्तता और सार्वभौमिकता - सभी का सुंदर समन्वय है।
प्रश्न 4: 'कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए' - इस शेर की आज के समाज में क्या प्रासंगिकता है? [CBSE 2020]
दुष्यंत कुमार का यह प्रसिद्ध शेर आज के समाज में अत्यंत प्रासंगिक है।
- चुनावी वादे: हर चुनाव में नेता तरह-तरह के वादे करते हैं - रोजगार, विकास, सुविधाएँ। लेकिन चुनाव जीतने के बाद वे अपने वादे भूल जाते हैं। यह शेर उसी स्थिति को दर्शाता है - 'तय था चरागाँ' यानी वादे थे, लेकिन 'चराग मयस्सर नहीं' यानी कुछ नहीं मिला।
- विकास का दावा: आज हर सरकार विकास का दावा करती है। लेकिन आम आदमी की स्थिति नहीं बदलती। बुनियादी सुविधाओं के लिए लोग तरसते हैं। यह शेर उसी विडंबना को दर्शाता है।
- आशा और निराशा का द्वंद्व: आज का आम आदमी आशा और निराशा के बीच झूल रहा है। एक तरफ सपने हैं, दूसरी तरफ हकीकत। यह शेर उसी द्वंद्व को दर्शाता है।
- भ्रष्टाचार: आज भी भ्रष्टाचार का बोलबाला है। विकास की योजनाओं का पैसा कुछ लोग हड़प लेते हैं। यह शेर उसी स्थिति पर व्यंग्य है - सबके लिए रोशनी का वादा, लेकिन किसी को कुछ नहीं मिला।
- सामाजिक असमानता: आज भी सामाजिक असमानता बहुत है। कुछ लोगों के पास सब कुछ है, कुछ के पास कुछ नहीं। यह शेर उसी असमानता को दर्शाता है।
इस प्रकार, यह शेर 50 साल पहले लिखा गया था, लेकिन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। यह हर उस व्यक्ति की आवाज है जिसके साथ वादे किए गए और वे वादे पूरे नहीं हुए।
प्रश्न 5: इस गजल की तुलना किसी अन्य कवि की गजल से करते हुए दुष्यंत कुमार की विशिष्टता स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2021]
दुष्यंत कुमार की इस गजल की तुलना पारंपरिक उर्दू गजलों से करें तो उनकी विशिष्टता स्पष्ट होती है।
पारंपरिक गजल: पारंपरिक उर्दू गजल में प्रेम, सौंदर्य, शराब, साकी, बुलबुल-गुलाब जैसे विषय होते थे। यह गजल व्यक्तिगत अनुभवों और रोमांटिक भावनाओं पर केंद्रित होती थी।
दुष्यंत की गजल की विशिष्टता:
- सामाजिक-राजनीतिक विषय: दुष्यंत ने गजल को पारंपरिक विषयों से निकालकर सामाजिक-राजनीतिक विषयों से जोड़ा। उनकी गजल में प्रेमी-प्रेमिका नहीं, बल्कि नेता-जनता का रिश्ता है।
- व्यंग्यात्मकता: पारंपरिक गजल में व्यंग्य का प्रयोग कम होता था। दुष्यंत की गजल में व्यंग्य ही मुख्य अस्त्र है। वे राजनीति और समाज पर गहरा व्यंग्य करते हैं।
- आम आदमी का दर्द: दुष्यंत की गजल आम आदमी के दर्द को आवाज देती है। वे उन लोगों की बात करते हैं जिनके साथ वादे किए गए और वे वादे पूरे नहीं हुए।
- प्रासंगिकता: पारंपरिक गजलें समय-समय पर पुरानी हो जाती हैं। दुष्यंत की गजल हर युग में प्रासंगिक है क्योंकि राजनीतिक पाखंड और सामाजिक विसंगतियाँ हमेशा रही हैं।
- भाषा: पारंपरिक गजल में फारसी-उर्दू की जटिल भाषा होती थी। दुष्यंत की भाषा सरल और सहज है, जो आम आदमी की समझ में आती है।
इस प्रकार, दुष्यंत कुमार ने गजल विधा में क्रांति ला दी। उन्होंने गजल को महलों से निकालकर गलियों में ला दिया। उन्होंने गजल को आम आदमी की भाषा दी और उसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा। यही उनकी विशिष्टता है।
8. परीक्षा दृष्टि बिंदु
📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न
- 'कहाँ तो तय था...' शेर की व्याख्या - 2023, 2021, 2019
- राजनीति पर व्यंग्य का विश्लेषण - 2022, 2020, 2018
- 'सियासत के नए खिलाड़ियों' से क्या तात्पर्य - 2022, 2021, 2020
- गजल में प्रयुक्त प्रतीक - 2021, 2019
- मक़ता का महत्व - 2020, 2018
- गजल की काव्यगत विशेषताएँ - 2021, 2020
📈 बोर्ड ट्रेंड
पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस गजल से प्रतिवर्ष 5-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में प्रमुख शेरों की व्याख्या, राजनीतिक व्यंग्य और प्रतीकों के अर्थ पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में राजनीति पर व्यंग्य का विश्लेषण, प्रतीक-बिंब विधान, गजल की काव्यगत विशेषताएँ और उसकी प्रासंगिकता पर प्रश्न आते हैं।
💡 याद रखने योग्य तथ्य
- कवि - दुष्यंत कुमार
- जन्म - 1933, मृत्यु - 1975
- प्रमुख रचनाएँ - सूर्य का स्वागत करो, आकाश के किनारे पर, आवाज़ों के घेरे में
- सम्मान - साहित्य अकादमी पुरस्कार (मरणोपरांत)
- विधा - गजल (आधुनिक गजल)
- भाषा - उर्दू मिश्रित सरल हिंदी
- पुस्तक - आरोह भाग 1
- गजल का नाम - गजल (कहाँ तो तय था...)
- मुख्य विषय - राजनीतिक व्यंग्य, सामाजिक विसंगतियाँ
- रदीफ - 'के लिए'
📌 महत्वपूर्ण उद्धरण
"कहाँ तो तय था चरागाँ हर एक घर के लिए, कहाँ चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।"
"जलाए घर हमारे और किए चरागाँ शहर के लिए।"
"न पूछो दुष्यंत कि क्या गुज़री उस पर।"
9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन
📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)
एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।
उदाहरण: प्रश्न - इस गजल के कवि कौन हैं? उत्तर - दुष्यंत कुमार।
📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)
परिचय (1 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु का उदाहरण सहित वर्णन।
उदाहरण: प्रश्न - 'कहाँ तो तय था...' शेर का क्या अर्थ है? उत्तर - परिचय में बताएँ कि यह दुष्यंत का सबसे प्रसिद्ध शेर है। फिर 'चरागाँ' का अर्थ, 'चराग' का अर्थ, सपनों और वास्तविकता का अंतर, राजनीतिक व्यंग्य - चार बिंदुओं में समझाएँ। निष्कर्ष में कहें कि यह शेर आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)
गजल के विश्लेषण के लिए: प्रस्तावना + कवि का परिचय + गजल का मूलभाव + प्रत्येक शेर की व्याख्या + काव्यगत विशेषताएँ + निष्कर्ष। जैसे गजल के विश्लेषण पर प्रश्न - पहले दुष्यंत का परिचय दें, फिर गजल का मूलभाव समझाएँ, फिर प्रत्येक शेर की व्याख्या करें, फिर गजल की काव्यगत विशेषताएँ बताएँ, अंत में निष्कर्ष दें।
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