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Dev kavitt savaiya class 11 antra poem

📘 पाठ 11 – देव के कवित्त-सवैये | कक्षा 11 हिंदी (अंतरा भाग 1, काव्य खंड) | GPN

📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: अंतरा भाग 1 (काव्य खंड) | ✍️ कवि: देव | 📝 प्रकार: रीतिकालीन कवित्त-सवैया | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]


📌 अनुक्रमणिका

इस विषय को बेहतर समझने के लिए छात्र कक्षा 11 हिंदी साहित्य (कोर) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवि परिचय - देव

पूरा नाम: देवदत्त मिश्र

जन्म: लगभग 1673, इटावा (उत्तर प्रदेश)

मृत्यु: लगभग 1760

आश्रयदाता: बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल, ओरछा नरेश, अवध के नवाब सआदत खाँ

भाषा: ब्रजभाषा

प्रमुख रचनाएँ: भाषा-भूषण, प्रेमचंद्रिका, रस-विलास, काव्य-रसायन, भक्ति-प्रकाश

देव रीतिकाल के प्रमुख कवियों में गिने जाते हैं। उनका समय रीतिकाल का उत्कर्ष काल था। इस काल के कवि शास्त्रीयता और अलंकारों पर अधिक जोर देते थे। देव ने भी श्रृंगार रस, नायिका-भेद, ऋतु वर्णन और अलंकारों से युक्त रचनाएँ कीं। उनके काव्य में चमत्कार और वक्रता है, लेकिन साथ ही भावपक्ष भी कमजोर नहीं है।

देव की विशेषता है कि वे केवल रीति का निर्वाह नहीं करते, बल्कि अपनी प्रतिभा से उसमें निखार भी लाते हैं। उनके कवित्त-सवैयों में शब्दों का अद्भुत खेल है। वे कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। उनके काव्य में श्रृंगार रस की प्रधानता है, लेकिन भक्ति और नीति के भी पद मिल जाते हैं।

📖 काव्य की पृष्ठभूमि

देव का समय 17वीं-18वीं सदी का उत्तरार्ध था। यह मुगल साम्राज्य के पतन का समय था। छोटे-छोटे राज्य स्वतंत्र हो रहे थे। राजाओं-नवाबों में कवियों को संरक्षण देने की होड़ लगी थी। देव को भी कई राजाओं-नवाबों का संरक्षण मिला।

इस समय काव्य में श्रृंगार रस की प्रधानता थी। नायिका-भेद, ऋतु वर्णन, प्रेम के विभिन्न पक्षों का चित्रण होता था। अलंकारों का प्रयोग बहुत होता था। कवि अपनी विद्वता और चमत्कार का प्रदर्शन करना चाहते थे। देव ने भी इसी परंपरा में लिखा।

कक्षा 11 के पाठ्यक्रम में देव के जो कवित्त-सवैये शामिल हैं, उनमें मुख्य रूप से श्रृंगार रस के पद हैं। नायिका के सौंदर्य का वर्णन, प्रेमी-प्रेमिका के बीच के भाव, विरह की वेदना - इन सबको उन्होंने बड़े ही चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।

🎯 अध्याय का महत्व

कक्षा 11 की परीक्षा में देव के कवित्त-सवैये महत्वपूर्ण हैं। उनके काव्य की विशेषताएँ, श्रृंगार रस का वर्णन, नायिका-भेद, अलंकारों का प्रयोग, भाषा-शैली - इन सब पर प्रश्न पूछे जाते हैं। कवित्त-सवैयों की व्याख्या करना, उनका भावार्थ लिखना, उनमें निहित सौंदर्य को स्पष्ट करना - ये सब परीक्षा में पूछा जाता है।

2. सरल सारांश

देव के कवित्त-सवैयों में मुख्य रूप से श्रृंगार रस का वर्णन है। उन्होंने नायिका के सौंदर्य, उसकी चाल, उसकी मुस्कान, उसकी चितवन का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है। प्रेमी-प्रेमिका के मिलन और विरह के भाव भी उनके काव्य में मिलते हैं।

पहले कवित्त में देव ने किसी सुंदरी की चाल का वर्णन किया है। उसकी चाल में मदिरा का नशा है, मोर की सी शोभा है, हाथी की सी गरिमा है। वह जब चलती है तो ऐसा लगता है मानो कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो।

दूसरे कवित्त में उन्होंने नायिका के नेत्रों का वर्णन किया है। उनके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं, लेकिन उनमें मदिरा का सा नशा है। वे जब देखते हैं, तो प्रेमी का मन चुरा लेते हैं। वे बड़े चंचल हैं, कभी इधर, कभी उधर।

पहले सवैये में देव ने विरह की वेदना का वर्णन किया है। प्रेमी अपनी प्रेमिका से दूर है। उसे उसकी याद सता रही है। रात नहीं कटती, दिन नहीं बीतता। उसका मन बेचैन है। वह बावला-सा हो गया है।

दूसरे सवैये में उन्होंने प्रेमी-प्रेमिका के मिलन का वर्णन किया है। दोनों मिले हैं। उनके मन में अपार आनंद है। वे एक-दूसरे को निहार रहे हैं। उनकी आँखें ही बोल रही हैं। शब्दों की जरूरत नहीं।

तीसरे कवित्त में देव ने प्रकृति का सुंदर वर्णन किया है। बरसात का मौसम है। बादल छाए हैं, बिजली चमक रही है, मोर नाच रहे हैं। प्रेमी को अपनी प्रेमिका की याद आती है। वह उससे मिलने को व्याकुल है।

3. विस्तृत व्याख्या

📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण

  • श्रृंगार रस की प्रधानता: देव के काव्य में श्रृंगार रस की प्रधानता है। उन्होंने नायिका के सौंदर्य, उसकी चाल-ढाल, उसकी चितवन, उसके नेत्रों का बड़ा ही सुंदर वर्णन किया है। उनके वर्णन में संयोग और वियोग दोनों पक्ष मिलते हैं।
  • नायिका-भेद: देव ने नायिका के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया है। कहीं वह स्वाधीन भर्तृका है, कहीं परकीया, कहीं खंडिता, कहीं प्रोषितभर्तृका। हर प्रकार की नायिका के मनोभावों को उन्होंने बड़े चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।
  • अलंकारों का प्रयोग: देव के काव्य में अलंकारों की भरमार है। वे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, अनुप्रास का बड़ा सुंदर प्रयोग करते हैं। उनके कवित्त-सवैये अलंकारों से जड़े हुए हैं।
  • चित्रात्मकता: देव के वर्णन में चित्रात्मकता है। वे शब्दों से चित्र खींचते हैं। नायिका की चाल का वर्णन पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो वह साक्षात् सामने घूम रही हो।
  • चमत्कार और वक्रता: देव की शैली में चमत्कार और वक्रता है। वे सीधे-सीधे बात नहीं कहते, बल्कि कुछ घुमाकर, कुछ चमत्कार के साथ कहते हैं। इससे उनकी रचनाओं में एक विशेष प्रकार का आकर्षण पैदा होता है।
  • प्रकृति का चित्रण: देव ने प्रकृति का भी सुंदर चित्रण किया है। बरसात, बसंत, ग्रीष्म - हर ऋतु का वर्णन उनके काव्य में मिलता है। प्रकृति के वर्णन में भी उनका श्रृंगार ही प्रधान है।

📌 विषय / Theme

देव के कवित्त-सवैयों के कई विषय हैं। पहला विषय है - नायिका का सौंदर्य और उसकी चाल-ढाल। दूसरा विषय है - प्रेमी-प्रेमिका के मिलन और विरह के भाव। तीसरा विषय है - नायिका-भेद और उनके मनोभाव। चौथा विषय है - प्रकृति का चित्रण। पाँचवाँ विषय है - अलंकारों और चमत्कार का प्रदर्शन।

📌 सामाजिक संदेश

देव के काव्य में कोई सीधा सामाजिक संदेश नहीं है। लेकिन उनके माध्यम से हम उस समय के सामाजिक मूल्यों, नारी के प्रति दृष्टिकोण, प्रेम के स्वरूप को समझ सकते हैं। उनके काव्य से पता चलता है कि उस समय श्रृंगार और प्रेम को कितना महत्व दिया जाता था।

📌 नैतिक शिक्षा

  • सौंदर्य की सराहना करो: देव के काव्य से हम सीखते हैं कि सौंदर्य की सराहना करनी चाहिए, उसका आनंद लेना चाहिए।
  • प्रेम का सम्मान करो: प्रेम एक पवित्र भाव है। उसका सम्मान करना चाहिए।
  • कला की कद्र करो: देव की रचनाएँ हमें कला की कद्र करना सिखाती हैं।
  • प्रकृति से प्रेम करो: प्रकृति का वर्णन हमें प्रकृति से प्रेम करना सिखाता है।

4. पात्र चित्रण

🧑 नायिका

स्वभाव: देव के काव्य में नायिका एक सुंदरी है। उसकी चाल में मदिरा का नशा है, उसकी चितवन में जादू है, उसके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं। वह चंचल है, शरारती है। कभी वह प्रेमी से मिलने को व्याकुल रहती है, कभी उससे रूठ जाती है। कभी वह स्वाधीन भर्तृका है, कभी परकीया। उसके मनोभावों में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। देव ने उसके सौंदर्य और उसके मनोभावों का बड़ा ही चमत्कारपूर्ण वर्णन किया है।

भूमिका: नायिका देव के काव्य की केंद्रीय पात्र है। उसके इर्द-गिर्द पूरा काव्य घूमता है। उसके माध्यम से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति होती है।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: नायिका - सुंदर, चंचल, श्रृंगारमयी, विभिन्न मनोभावों वाली।

🧑 नायक (प्रेमी)

स्वभाव: नायक प्रेमी है। वह नायिका से अगाध प्रेम करता है। उसके विरह में वह व्याकुल हो जाता है। रात नहीं कटती, दिन नहीं बीतता। नायिका से मिलकर उसे अपार आनंद मिलता है। वह उसे निहारता रहता है। उसकी आँखें ही बोलती हैं। देव ने नायक के मनोभावों को भी बड़े चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।

भूमिका: नायक नायिका के पूरक के रूप में है। उसके माध्यम से प्रेम के विभिन्न पक्ष उभरते हैं।

परीक्षा उपयोगी बिंदु: नायक - प्रेमी, विरही, नायिका के प्रति समर्पित।

विषय की व्यापक समझ विकसित करने के लिए छात्र कक्षा 12 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 12 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

5. शब्दार्थ

शब्द अर्थ वाक्य प्रयोग
कवित्तहिंदी काव्य का एक छंद, a poetic meterदेव के कवित्त बहुत प्रसिद्ध हैं।
सवैयाहिंदी काव्य का एक छंद, another poetic meterसवैये में गेयता होती है।
श्रृंगार रसप्रेम रस, romantic moodदेव के काव्य में श्रृंगार रस की प्रधानता है।
नायिका-भेदनायिका के प्रकार, classification of heroinesरीतिकाल में नायिका-भेद बहुत प्रचलित था।
अलंकारornaments of poetryदेव के काव्य में अलंकारों की भरमार है।
उपमासमानता, simileउनके नेत्र कमल के समान हैं - यह उपमा है।
रूपकअभेद सम्बन्ध, metaphorमुख चंद्र है - यह रूपक है।
उत्प्रेक्षासंभावना, poetic fancyमानो चाँद उतर आया हो - यह उत्प्रेक्षा है।
विरहवियोग, separationविरह की वेदना असह्य होती है।
संयोगमिलन, unionसंयोग में आनंद होता है।
चितवनदृष्टि, नज़र, glanceउसकी चितवन में जादू है।
चंचलचंचल, restlessउसके नेत्र चंचल हैं।
रीतिकालहिंदी साहित्य का एक काल (1700-1900)देव रीतिकाल के कवि हैं।
ब्रजभाषामथुरा-वृन्दावन की भाषादेव ने ब्रजभाषा में लिखा।

6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)

प्रश्न 1: देव के काव्य की मुख्य विशेषताएँ बताइए। [CBSE 2023]

देव के काव्य की मुख्य विशेषताएँ हैं - श्रृंगार रस की प्रधानता, नायिका-भेद का विस्तृत वर्णन, अलंकारों का बहुतायत से प्रयोग, चित्रात्मकता, चमत्कार और वक्रता। उनके कवित्त-सवैयों में शब्दों का अद्भुत खेल है। वे कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। उनके काव्य में संयोग और वियोग दोनों पक्षों का सुंदर वर्णन मिलता है। प्रकृति का चित्रण भी उनके काव्य की विशेषता है।

प्रश्न 2: देव ने नायिका के सौंदर्य का कैसा वर्णन किया है? [CBSE 2022]

देव ने नायिका के सौंदर्य का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है। उन्होंने उसकी चाल, उसकी चितवन, उसके नेत्रों का बड़ा ही चमत्कारपूर्ण वर्णन किया है। उसकी चाल में मदिरा का नशा है, मोर की सी शोभा है। उसके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं, लेकिन उनमें नशा भी है। उसकी चितवन में जादू है। वह जब चलती है तो ऐसा लगता है मानो कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो।

प्रश्न 3: देव के काव्य में अलंकारों का क्या महत्व है? [CBSE 2021]

देव के काव्य में अलंकारों का विशेष महत्व है। वे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, अनुप्रास का बड़ा सुंदर प्रयोग करते हैं। उनके कवित्त-सवैये अलंकारों से जड़े हुए हैं। अलंकारों के प्रयोग से उनके काव्य में सौंदर्य आता है, चमत्कार पैदा होता है। वे साधारण बात को भी असाधारण बना देते हैं। अलंकारों के माध्यम से ही वे नायिका के सौंदर्य को अभिव्यक्त करते हैं।

प्रश्न 4: देव के कवित्त-सवैयों में विरह का वर्णन कैसे हुआ है? [CBSE 2023, 2020]

देव ने विरह का बड़ा मार्मिक वर्णन किया है। उनके अनुसार विरह में प्रेमी व्याकुल हो जाता है। रात नहीं कटती, दिन नहीं बीतता। उसका मन बेचैन है। वह बावला-सा हो जाता है। उसे नींद नहीं आती, खाना नहीं भाता। प्रकृति का हर दृश्य उसे अपनी प्रेमिका की याद दिलाता है। बरसात में बादल, बिजली, मोर - सब उसे व्याकुल कर देते हैं। विरह की यह वेदना असह्य है।

प्रश्न 5: देव के काव्य में प्रकृति का कैसा चित्रण मिलता है? [CBSE 2021]

देव ने प्रकृति का भी सुंदर चित्रण किया है। उन्होंने बरसात, बसंत, ग्रीष्म - हर ऋतु का वर्णन किया है। बरसात के वर्णन में बादलों की गर्जना, बिजली की चमक, मोर के नाच का बड़ा मनोहारी वर्णन है। प्रकृति के वर्णन में भी उनका श्रृंगार ही प्रधान है। प्रकृति के दृश्य प्रेमी को अपनी प्रेमिका की याद दिलाते हैं। इस प्रकार प्रकृति का वर्णन भी उनके काव्य का एक महत्वपूर्ण अंग है।

7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)

प्रश्न 1: देव के कवित्त-सवैयों के आधार पर उनके काव्य में निहित श्रृंगार रस का विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2023, 2021]

  • संयोग श्रृंगार: देव ने संयोग श्रृंगार का भी सुंदर वर्णन किया है। प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के समय के भाव, उनकी आँखों की बातचीत, उनका एक-दूसरे को निहारना - सब कुछ बड़े चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त किया गया है।
  • वियोग श्रृंगार: विरह का वर्णन और भी मार्मिक है। प्रेमी अपनी प्रेमिका से दूर है, उसे उसकी याद सता रही है। रात नहीं कटती, दिन नहीं बीतता। उसका मन बेचैन है। वह बावला-सा हो गया है।
  • नायिका का सौंदर्य: श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए नायिका के सौंदर्य का वर्णन आवश्यक है। देव ने उसकी चाल, उसकी चितवन, उसके नेत्रों का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।
  • नायिका-भेद: देव ने नायिका के विभिन्न प्रकारों का वर्णन करके श्रृंगार रस को और समृद्ध किया है। स्वाधीन भर्तृका, परकीया, खंडिता, प्रोषितभर्तृका - सबके मनोभावों को उन्होंने बड़ी बारीकी से चित्रित किया है।
  • प्रकृति का सहयोग: श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति में प्रकृति का भी सहयोग है। बरसात का मौसम, बसंत की बहार - सब प्रेमी-प्रेमिका के भावों को तीव्र करते हैं।
  • अलंकारों का प्रयोग: श्रृंगार रस को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए देव ने अलंकारों का बहुतायत से प्रयोग किया है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास - सब कुछ मिलकर श्रृंगार रस को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाते हैं।

प्रश्न 2: देव के काव्य की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2022]

  • भाषा - ब्रजभाषा: देव ने ब्रजभाषा में रचना की है। उनकी भाषा में मधुरता है, प्रवाह है। वे ब्रजभाषा के प्रसिद्ध कवियों में गिने जाते हैं।
  • चित्रात्मक शैली: देव की शैली चित्रात्मक है। वे शब्दों से चित्र खींचते हैं। उनके वर्णन में ऐसी जीवंतता है कि पाठक सब कुछ अपनी आँखों से देखने लगता है।
  • चमत्कार और वक्रता: उनकी शैली में चमत्कार और वक्रता है। वे सीधे-सीधे बात नहीं कहते, बल्कि कुछ घुमाकर, कुछ चमत्कार के साथ कहते हैं। इससे उनकी रचनाओं में एक विशेष प्रकार का आकर्षण पैदा होता है।
  • अलंकारों की भरमार: उनके काव्य में अलंकारों की भरमार है। वे उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, श्लेष, यमक, अनुप्रास का बड़ा सुंदर प्रयोग करते हैं।
  • संक्षिप्तता और गहराई: वे कम शब्दों में गहरी बात कह जाते हैं। उनके कवित्त-सवैये छोटे होते हैं, लेकिन उनमें गहरा अर्थ भरा होता है।
  • गेयता: उनके कवित्त-सवैयों में गेयता है। वे गाए जाने के लिए बने हैं। इसलिए उनमें संगीतात्मकता है, लय है, प्रवाह है।

प्रश्न 3: देव के काव्य में नायिका-भेद की अवधारणा को स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2021]

  • स्वाधीन भर्तृका: यह वह नायिका है जो अपने पति को वश में करके रखती है। वह अपने प्रेमी पर पूरा अधिकार रखती है।
  • परकीया: यह वह नायिका है जो दूसरे की पत्नी है, लेकिन किसी अन्य से प्रेम करती है। देव ने इस प्रकार की नायिका के मनोभावों को बड़े चमत्कारपूर्ण ढंग से व्यक्त किया है।
  • खंडिता: यह वह नायिका है जिसे अपने प्रेमी द्वारा धोखा मिला हो। उसका मन क्षुब्ध है, आहत है। वह प्रेमी पर क्रोधित भी है, लेकिन प्रेम भी करती है।
  • प्रोषितभर्तृका: यह वह नायिका है जिसका पति या प्रेमी दूर देश गया हुआ है। वह विरह में व्याकुल है। उसे उसकी याद सता रही है।
  • अभिसारिका: यह वह नायिका है जो अपने प्रेमी से मिलने के लिए अकेली रात में निकल पड़ती है। उसे किसी भी बाधा की परवाह नहीं।
  • विप्रलब्धा: यह वह नायिका है जिससे प्रेमी ने मिलने का वादा किया था, लेकिन वह नहीं आया। वह निराश है, दुखी है।

प्रश्न 4: देव के कवित्त-सवैयों की तुलना बिहारी के दोहों से कीजिए। [CBSE 2020]

  • समानताएँ: दोनों रीतिकाल के कवि हैं। दोनों में श्रृंगार रस की प्रधानता है। दोनों ने नायिका-भेद का वर्णन किया है। दोनों के काव्य में अलंकारों की भरमार है। दोनों की भाषा ब्रजभाषा है।
  • शैली में अंतर: बिहारी दोहाकार हैं, देव कवित्त-सवैये के कवि हैं। बिहारी के दोहे छोटे होते हैं, लेकिन उनमें गहरा अर्थ भरा होता है। देव के कवित्त-सवैये लंबे होते हैं, उनमें वर्णन विस्तार से होता है।
  • चमत्कार और वक्रता: दोनों में चमत्कार और वक्रता है, लेकिन देव में यह अधिक है। बिहारी सीधे-सीधे बात कहते हैं, देव कुछ घुमाकर कहते हैं।
  • भाव पक्ष: बिहारी में भाव पक्ष प्रबल है, देव में शिल्प पक्ष। बिहारी के दोहे पढ़कर भाव गहरे उतरते हैं, देव के कवित्त-सवैये पढ़कर चमत्कार का आनंद मिलता है।
  • प्रकृति का चित्रण: दोनों ने प्रकृति का चित्रण किया है, लेकिन देव का प्रकृति-चित्रण अधिक विस्तृत और चित्रात्मक है।
  • निष्कर्ष: दोनों अपने-अपने ढंग से महान हैं। दोनों ने रीतिकाल को समृद्ध किया। दोनों की रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

प्रश्न 5: देव के कवित्त-सवैयों में निहित सौंदर्य-बोध पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2019]

  • नायिका का सौंदर्य: देव का सौंदर्य-बोध नायिका के सौंदर्य के वर्णन में प्रकट होता है। उनकी चाल, उनके नेत्र, उनकी चितवन - सब में एक अलौकिक सौंदर्य है। वे उस सौंदर्य को विभिन्न अलंकारों के माध्यम से अभिव्यक्त करते हैं।
  • चाल का सौंदर्य: नायिका की चाल में मदिरा का नशा है, मोर की सी शोभा है, हाथी की सी गरिमा है। यह चाल का अद्भु� सौंदर्य है।
  • नेत्रों का सौंदर्य: उनके नेत्र कमल के समान सुंदर हैं, लेकिन उनमें नशा भी है। वे चंचल हैं, कभी इधर, कभी उधर। उनकी चितवन में जादू है।
  • प्रकृति का सौंदर्य: देव ने प्रकृति का भी सौंदर्य देखा है। बरसात के बादल, बिजली की चमक, मोर का नाच - सब में एक अलग ही सौंदर्य है।
  • शब्दों का सौंदर्य: उनके काव्य में शब्दों का भी सौंदर्य है। वे शब्दों का ऐसा चयन करते हैं कि पढ़ते ही चित्र आँखों के सामने खिंच जाता है।
  • अलंकारों का सौंदर्य: अलंकारों के माध्यम से वे साधारण को भी असाधारण बना देते हैं। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा से उनका काव्य और भी सुंदर हो जाता है।

8. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न

  • देव के काव्य की विशेषताएँ - 2023, 2022
  • श्रृंगार रस का वर्णन - 2023, 2021
  • नायिका-भेद की अवधारणा - 2022, 2020
  • अलंकारों का प्रयोग - 2023, 2021
  • भाषा-शैली की विशेषताएँ - 2022, 2021
  • विरह का वर्णन - 2021, 2020
  • बिहारी और देव की तुलना - 2020, 2019

📈 बोर्ड ट्रेंड

पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस काव्य पाठ से प्रतिवर्ष 6-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में देव के काव्य की विशेषताएँ, नायिका के सौंदर्य का वर्णन, अलंकारों का महत्व, विरह का वर्णन पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में श्रृंगार रस का विश्लेषण, भाषा-शैली, नायिका-भेद, बिहारी से तुलना और सौंदर्य-बोध पर प्रश्न आते हैं।

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवि - देव (देवदत्त मिश्र)
  • समय - 17वीं-18वीं सदी (लगभग 1673-1760)
  • भाषा - ब्रजभाषा
  • प्रमुख रचनाएँ - भाषा-भूषण, प्रेमचंद्रिका, रस-विलास
  • मुख्य रस - श्रृंगार रस
  • मुख्य विषय - नायिका-भेद, नायिका का सौंदर्य, संयोग-वियोग, प्रकृति-चित्रण
  • प्रमुख अलंकार - उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, यमक

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"चाल में मदिरा का नशा, मोर की सी शोभा।"

"नेत्र कमल सम सुंदर, पर नशीले।"

"विरह में रैन न कटै, दिन न बीते।"

"बरसात के बादल, बिजली की चमक, मोर का नाच।"

9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)

एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। तथ्यात्मक जानकारी पर आधारित प्रश्न होते हैं। उदाहरण: प्रश्न - देव किस काल के कवि हैं? उत्तर - रीतिकाल के।

📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)

परिचय (1-2 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु को देव के कवित्त-सवैयों के प्रसंगों से स्पष्ट करें। उदाहरण: प्रश्न - देव ने नायिका के सौंदर्य का वर्णन कैसे किया है? उत्तर - परिचय में बताएँ कि देव ने नायिका के सौंदर्य का अद्भुत वर्णन किया है। फिर चाल का वर्णन, नेत्रों का वर्णन, चितवन का वर्णन - इन बिंदुओं पर व्याख्या करें। निष्कर्ष में कहें कि उनका वर्णन चमत्कारपूर्ण है।

📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)

विचारात्मक प्रश्नों के लिए: प्रस्तावना + विषय की व्याख्या (कम से कम 4-5 बिंदु, हर बिंदु को देव के कवित्त-सवैयों से उदाहरण सहित स्पष्ट करें) + निष्कर्ष।

तुलनात्मक प्रश्नों के लिए: दोनों का संक्षिप्त परिचय + समानताएँ + असमानताएँ + निष्कर्ष।

भाषा-शैली पर प्रश्न के लिए: कवि का परिचय + उनकी भाषा-शैली की विशेषताएँ + कवित्त-सवैयों में इन विशेषताओं के उदाहरण + निष्कर्ष।

10. हब लिंक



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