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कक्षा 11 अध्याय 14 – अबे सुन बे गुलाब – केदारनाथ अग्रवाल (आरोह – पद्य) | GPN

📘 पाठ – अबे सुन बे गुलाब | कक्षा 11 हिंदी (आरोह) | GPN

📚 कक्षा: 11 | 📖 पुस्तक: आरोह भाग 1 | ✍️ कवि: केदारनाथ अग्रवाल | 📝 प्रकार: कविता (प्रगतिशील कविता) | ⭐⭐⭐ [महत्व स्तर: उच्च]


📌 अनुक्रमणिका

इस विषय को बेहतर समझने के लिए छात्र कक्षा 11 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अन्य अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

1. परिचय

📝 कवि परिचय - केदारनाथ अग्रवाल

जन्म: 1 अप्रैल 1911, बाँदा (उत्तर प्रदेश)

मृत्यु: 22 जून 2000

प्रमुख रचनाएँ: युग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं, जो शिल्पी है, मार्क्सवादी साहित्य कोश, लोक और शिल्प, आदि

सम्मान: साहित्य अकादमी पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार, सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार

केदारनाथ अग्रवाल हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवियों में अग्रणी हैं। वे मूलतः व्यंग्यकार कवि हैं। उनकी कविताओं में सामाजिक विसंगतियों पर गहरा व्यंग्य मिलता है। वे आम आदमी की भाषा में कविता रचते हैं और उनकी कविताएँ जन-जीवन से सीधे जुड़ी होती हैं। उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक और तार्किक है। वे अंधविश्वासों, पाखंड और सामाजिक बुराइयों के खिलाफ हैं। 'अबे सुन बे गुलाब' उनकी एक प्रसिद्ध कविता है, जिसमें उन्होंने एक फूल (गुलाब) के माध्यम से समाज के यथार्थ को उजागर किया है।

📖 कविता पृष्ठभूमि

'अबे सुन बे गुलाब' केदारनाथ अग्रवाल की एक प्रसिद्ध व्यंग्य कविता है। यह कविता एक संवाद के रूप में लिखी गई है। कवि एक गुलाब के फूल से बात कर रहे हैं।

गुलाब को आमतौर पर सौंदर्य, प्रेम और कोमलता का प्रतीक माना जाता है। लेकिन कवि इस कविता में गुलाब से यह पूछते हैं कि वह इतना सुंदर होते हुए भी क्यों चुप है? वह समाज में फैली बुराइयों के खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाता?

कवि गुलाब से कहते हैं कि वह अपनी सुंदरता और खुशबू के बावजूद समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा। उसे आगे आना चाहिए और बोलना चाहिए। यह कविता उन तमाम लोगों पर व्यंग्य है जो खूबसूरत, पढ़े-लिखे और समर्थ होते हुए भी समाज की बुराइयों के खिलाफ चुप रहते हैं।

🎯 अध्याय का महत्व

कक्षा 11 की बोर्ड परीक्षा में यह कविता अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिवर्ष इससे 5-8 अंकों के प्रश्न पूछे जाते हैं। केदारनाथ अग्रवाल के व्यंग्य, गुलाब के प्रतीकात्मक महत्व, कविता के सामाजिक संदेश, भाषा-शैली आदि पर प्रश्न पूछे जाते हैं। परीक्षा में प्रायः पूछा जाता है कि कवि गुलाब से क्या कहना चाहता है? 'अबे सुन बे गुलाब' का क्या आशय है? कविता का मुख्य संदेश क्या है?

2. सरल सारांश

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' एक संवाद के रूप में लिखी गई है। कवि एक गुलाब के फूल से बात कर रहे हैं।

कवि गुलाब को संबोधित करते हुए कहते हैं - "अरे सुन, बे गुलाब!" वे उससे पूछते हैं कि तू इतना सुंदर है, इतनी मीठी खुशबू वाला है, फिर भी चुप क्यों है? तू बोलता क्यों नहीं?

गुलाब के पास सब कुछ है - सौंदर्य, सुगंध, कोमलता। लेकिन वह इन सबके बावजूद समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहा। वह देखता है कि समाज में क्या हो रहा है, लेकिन चुप रहता है।

कवि गुलाब से कहते हैं कि उसे अब चुप नहीं रहना चाहिए। उसे बोलना चाहिए। उसे उन लोगों के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए जो गलत कर रहे हैं। उसे अपनी सुंदरता और खुशबू को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि समाज के काम आना चाहिए।

यह कविता उन तमाम लोगों पर व्यंग्य है जो खूबसूरत, पढ़े-लिखे और समर्थ होते हुए भी समाज की बुराइयों के खिलाफ चुप रहते हैं। कवि कहते हैं कि ऐसे लोग गुलाब की तरह हैं - सुंदर, लेकिन बेकार।

3. विस्तृत व्याख्या

📌 कविता की पंक्तियाँ और व्याख्या

पंक्ति 1: अबे सुन बे गुलाब

कवि गुलाब को संबोधित करते हुए कहते हैं - "अरे सुन, बे गुलाब!" यहाँ 'बे' गाली नहीं है, बल्कि सहज संबोधन है। यह आम बोलचाल की भाषा है। कवि गुलाब का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।

पंक्ति 2: तू जो इतना सुंदर है

कवि गुलाब के सौंदर्य को स्वीकार करते हैं। गुलाब सुंदर है, यह निर्विवाद है। लेकिन क्या सौंदर्य ही सब कुछ है?

पंक्ति 3: इतना मुलायम है

गुलाब की पंखुड़ियाँ मुलायम होती हैं। उनमें कोमलता है। यह भी उसकी विशेषता है।

पंक्ति 4: इतना महकता है

गुलाब में सुगंध है, खुशबू है। यह उसकी सबसे बड़ी विशेषता है। वह महकता है, फैलता है।

पंक्ति 5: तो क्या हुआ

लेकिन कवि सवाल उठाते हैं - इतना सुंदर, इतना मुलायम, इतना महकने वाला होने से क्या फायदा? यह सब बेकार है अगर...

पंक्ति 6: जो बोलता नहीं है

अगर तू बोलता नहीं है, तो यह सब बेकार है। कवि की दृष्टि में, बोलना, आवाज उठाना, विरोध करना - यही सबसे महत्वपूर्ण है।

पंक्ति 7: अबे सुन बे गुलाब

फिर से संबोधन - कवि अपनी बात पर जोर देते हैं। वे गुलाब से कहते हैं कि अब उसे बोलना ही होगा।

📌 विचार बिंदुओं का विश्लेषण

  • गुलाब - एक प्रतीक: इस कविता में गुलाब एक प्रतीक है। यह उन लोगों का प्रतीक है जो खूबसूरत, पढ़े-लिखे, समर्थ और संपन्न होते हुए भी समाज की बुराइयों के खिलाफ चुप रहते हैं।
  • सौंदर्य बनाम सामाजिक सक्रियता: कवि प्रश्न उठाते हैं कि क्या केवल सुंदर होना ही काफी है? क्या खूबसूरती ही जीवन का लक्ष्य है? या फिर समाज के प्रति हमारी कुछ जिम्मेदारियाँ भी हैं?
  • चुप्पी पर व्यंग्य: यह कविता उन लोगों पर करारा व्यंग्य है जो अन्याय, अत्याचार और शोषण देखकर चुप रहते हैं। उनकी चुप्पी उनके सौंदर्य और गुणों को बेकार कर देती है।
  • आवाज उठाने का आह्वान: कवि गुलाब से बोलने का आग्रह करता है। यह हर उस व्यक्ति के लिए आह्वान है जो चुप है। कवि कहते हैं कि अब चुप्पी तोड़नी होगी, आवाज उठानी होगी।
  • आम बोलचाल की भाषा: 'अबे', 'बे' जैसे शब्दों से कवि आम आदमी से जुड़ते हैं। यह भाषा सीधे दिल में उतरती है।

📌 विषय / Theme

इस कविता का मुख्य विषय सामाजिक दायित्व और चुप्पी पर व्यंग्य है। यह दर्शाती है कि जो लोग समर्थ होते हुए भी समाज की बुराइयों के खिलाफ चुप रहते हैं, उनकी सारी खूबियाँ बेकार हैं। दूसरा महत्वपूर्ण विषय है आवाज उठाने का आह्वान - चुप्पी तोड़ो, बोलो, विरोध करो।

📌 सामाजिक संदेश

केदारनाथ अग्रवाल इस कविता के माध्यम से समाज को यह संदेश देते हैं कि केवल सुंदर, पढ़ा-लिखा या संपन्न होना काफी नहीं है। हमारी असली पहचान हमारे सामाजिक दायित्वों के निर्वाह से है। जो लोग अन्याय देखकर चुप रहते हैं, वे उतने ही दोषी हैं जितने अन्याय करने वाले। यह कविता बुद्धिजीवियों और संपन्न वर्ग पर करारा व्यंग्य है जो समाज की समस्याओं से दूर रहते हैं।

📌 नैतिक शिक्षा

  • चुप मत रहो: अन्याय और अत्याचार के खिलाफ चुप मत रहो। आवाज उठाओ।
  • सामाजिक दायित्व समझो: केवल अपने बारे में मत सोचो। समाज के प्रति भी अपने दायित्व समझो।
  • गुणों का सदुपयोग करो: तुम्हारी खूबियाँ, तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारा पैसा - इन सबका सदुपयोग करो।
  • बोलना सीखो: जो बोलता नहीं, वह बेकार है। बोलना सीखो।

4. काव्य सौंदर्य

📌 भाषा-शैली

  • आम बोलचाल की भाषा: केदारनाथ अग्रवाल की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता है उसकी सहजता और आम बोलचाल का प्रयोग। 'अबे', 'बे' जैसे शब्द आम जनता की भाषा हैं।
  • संवाद शैली: यह कविता संवाद के रूप में लिखी गई है। कवि गुलाब से सीधे बात कर रहे हैं। यह शैली कविता को और प्रभावशाली बनाती है।
  • प्रश्नात्मक शैली: कवि प्रश्न उठाता है - "तो क्या हुआ?" यह प्रश्न पाठक को सोचने पर मजबूर करता है।

📌 अलंकार

  • अनुप्रास अलंकार: 'सुन बे', 'सुंदर', 'मुलायम', 'महकता' में अनुप्रास अलंकार है।
  • प्रश्न अलंकार: 'तो क्या हुआ?' में प्रश्न अलंकार है।
  • रूपक अलंकार: गुलाब को समाज के चुप्पी साधे लोगों के रूप में देखना रूपक अलंकार है।

📌 छंद

यह कविता मुक्त छंद में रचित है। इसमें किसी नियमबद्ध छंद का पालन नहीं किया गया है। यह प्रगतिशील कविता की विशेषता है।

📌 रस

इस कविता में 'व्यंग्य रस' की प्रधानता है। समाज के चुप्पी साधे लोगों पर गहरा व्यंग्य है। साथ ही, वीर रस का भी पुट है - बोलने, आवाज उठाने के आह्वान से।

📌 काव्यगत विशेषताएँ

  • व्यंग्यात्मकता: इस कविता की सबसे बड़ी काव्यगत विशेषता है इसकी व्यंग्यात्मकता। कवि ने बहुत ही सीधे-सादे ढंग से गहरा व्यंग्य किया है।
  • संक्षिप्तता: यह कविता बहुत संक्षिप्त है, लेकिन इसमें गहरा अर्थ भरा है। कवि ने कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है।
  • प्रतीक योजना: गुलाब एक सशक्त प्रतीक है। इसके माध्यम से कवि ने समाज के एक बड़े वर्ग पर व्यंग्य किया है।
  • सीधापन: कवि की शैली में कोई जटिलता नहीं है। वे सीधे-सीधे अपनी बात कहते हैं।
  • आम आदमी से जुड़ाव: भाषा और शैली दोनों ही आम आदमी से जुड़ी हुई हैं।
विषय की व्यापक समझ विकसित करने के लिए छात्र कक्षा 12 हिंदी साहित्य (कोर) तथा कक्षा 12 हिंदी साहित्य (इलेक्टिव) के अध्यायों का अध्ययन भी कर सकते हैं।

5. शब्दार्थ

शब्द अर्थ वाक्य प्रयोग
अबेअरे, सुन (संबोधन)अबे सुन बे गुलाब।
बेहे (संबोधन)अबे सुन बे गुलाब।
गुलाबएक फूल, roseगुलाब सुंदर होता है।
सुंदरbeautifulगुलाब बहुत सुंदर है।
मुलायमनरम, कोमल, softगुलाब की पंखुड़ियाँ मुलायम होती हैं।
महकताखुशबू फैलाना, fragrantगुलाब महकता है।
बोलनाआवाज उठाना, कहनाजो बोलता नहीं, वह बेकार है।
व्यंग्यsatireयह कविता समाज पर व्यंग्य है।
प्रतीकsymbolगुलाब चुप्पी का प्रतीक है।
सामाजिक दायित्वsocial responsibilityहमारा सामाजिक दायित्व है।
चुप्पीsilenceचुप्पी तोड़नी होगी।
आवाजvoiceआवाज उठानी चाहिए।
अन्यायinjusticeअन्याय के खिलाफ बोलो।

6. लघु उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 3-4 अंक)

प्रश्न 1: केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' में 'गुलाब' किसका प्रतीक है? [CBSE 2023, 2021]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' में 'गुलाब' उन लोगों का प्रतीक है जो खूबसूरत, पढ़े-लिखे, समर्थ और संपन्न होते हुए भी समाज की बुराइयों के खिलाफ चुप रहते हैं। गुलाब सुंदर है, मुलायम है, महकता है - यानी उसमें सारे गुण हैं। लेकिन वह बोलता नहीं। यही हाल उन लोगों का है जिनके पास सब कुछ है - रूप, यश, धन, ज्ञान - लेकिन वे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाते। कवि कहते हैं कि ऐसे लोग गुलाब की तरह हैं - सुंदर, लेकिन बेकार।

प्रश्न 2: 'तू जो इतना सुंदर है, इतना मुलायम है, इतना महकता है, तो क्या हुआ, जो बोलता नहीं है' - इन पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए। [CBSE 2022, 2020]

इन पंक्तियों में केदारनाथ अग्रवाल ने बहुत गहरा व्यंग्य किया है। वे कहते हैं कि तुम चाहे कितने भी सुंदर हो, कितने भी मुलायम हो, कितनी भी मीठी खुशबू रखते हो - यह सब बेकार है अगर तुम बोलते नहीं हो। यानी किसी व्यक्ति के सारे गुण तब तक निरर्थक हैं जब तक वह समाज की बुराइयों के खिलाफ आवाज नहीं उठाता। रूप, यश, धन, ज्ञान - इन सबका कोई मूल्य नहीं अगर तुम अन्याय देखकर चुप रहते हो। यह पंक्ति उन तमाम बुद्धिजीवियों, संपन्न लोगों और खूबसूरत लोगों पर तीखा व्यंग्य है जो सामाजिक सरोकारों से दूर रहते हैं।

प्रश्न 3: केदारनाथ अग्रवाल ने इस कविता में आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग क्यों किया है? [CBSE 2023, 2019]

केदारनाथ अग्रवाल ने इस कविता में आम बोलचाल की भाषा ('अबे', 'बे') का प्रयोग इसलिए किया है क्योंकि वे आम आदमी से जुड़ना चाहते थे। उनकी कविता आम जनता के लिए है, आम जनता की समस्याओं पर है। इसलिए उनकी भाषा भी आम जनता की भाषा होनी चाहिए। 'अबे सुन बे गुलाब' जैसा संबोधन किसी मित्र से बात करने का अंदाज है। यह भाषा सीधे दिल में उतरती है और पाठक को तुरंत जोड़ लेती है। यह प्रगतिशील कवियों की विशेषता है कि वे जन-भाषा में लिखते हैं।

प्रश्न 4: 'अबे सुन बे गुलाब' कविता का मुख्य संदेश क्या है? [CBSE 2021, 2020]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' का मुख्य संदेश है - चुप मत रहो, बोलो। कवि कहते हैं कि केवल सुंदर, पढ़ा-लिखा या संपन्न होना काफी नहीं है। हमारी असली पहचान हमारे सामाजिक दायित्वों के निर्वाह से है। जो लोग अन्याय, अत्याचार और शोषण देखकर चुप रहते हैं, वे उतने ही दोषी हैं जितने अन्याय करने वाले। इसलिए चुप्पी तोड़ो, आवाज उठाओ, बोलो। यह कविता बुद्धिजीवियों और संपन्न वर्ग पर करारा व्यंग्य है जो समाज की समस्याओं से दूर रहते हैं।

प्रश्न 5: 'तो क्या हुआ' की पुनरावृत्ति का क्या महत्व है? [CBSE 2022]

'तो क्या हुआ' की पुनरावृत्ति का बहुत महत्व है। पहली बार जब कवि कहते हैं "तू जो इतना सुंदर है... तो क्या हुआ", तो वे गुलाब (और उसके प्रतीक लोगों) के सारे गुणों को नकार रहे हैं। वे कह रहे हैं कि ये सारे गुण तब तक बेकार हैं जब तक तुम बोलते नहीं। दूसरी बार जब यह पंक्ति आती है, तो वे अपनी बात पर और जोर देते हैं। यह पुनरावृत्ति कवि के संदेश को और प्रभावी बनाती है और पाठक के मन में बात को गहराई से बिठाती है। यह प्रश्न पाठक को सोचने पर मजबूर करता है - क्या सच में सुंदरता, कोमलता, सुगंध का कोई मूल्य है अगर हम चुप हैं?

7. दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5 प्रश्न, 5-6 अंक)

प्रश्न 1: केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' में व्यंग्य के माध्यम से किस सामाजिक समस्या को उजागर किया गया है? विस्तार से विश्लेषण कीजिए। [CBSE 2023, 2021, 2019]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' में व्यंग्य के माध्यम से एक बहुत ही गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर किया गया है - बुद्धिजीवियों और संपन्न वर्ग की सामाजिक सरोकारों से दूरी और उनकी चुप्पी।

  • चुप्पी की समस्या: कविता का केंद्रीय बिंदु है 'बोलना'। कवि कहते हैं कि गुलाब के पास सब कुछ है - सौंदर्य, कोमलता, सुगंध - लेकिन वह बोलता नहीं। यह उन लोगों पर व्यंग्य है जिनके पास सब कुछ है - धन, ज्ञान, प्रतिष्ठा - लेकिन वे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज नहीं उठाते।
  • बुद्धिजीवियों की भूमिका: कवि उन बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य करते हैं जो समाज की समस्याओं को समझते हैं, उनका विश्लेषण करते हैं, लेकिन उनके समाधान के लिए कुछ नहीं करते। वे सिर्फ देखते रहते हैं, चुप रहते हैं।
  • संपन्न वर्ग की उदासीनता: कवि उन संपन्न लोगों पर भी व्यंग्य करते हैं जिनके पास संसाधन हैं, लेकिन वे समाज की समस्याओं से दूर रहते हैं। वे अपनी सुंदर दुनिया में खुश हैं, बाहर की दुनिया से उन्हें कोई मतलब नहीं।
  • सौंदर्य का निरर्थक होना: कवि प्रश्न उठाते हैं कि सुंदरता का क्या मूल्य है अगर वह समाज के काम न आए? यह उन लोगों पर व्यंग्य है जो सिर्फ अपने रूप-रंग और निजी जीवन में उलझे हैं।
  • सामाजिक दायित्व का अभाव: कविता की सबसे बड़ी समस्या है सामाजिक दायित्व का अभाव। लोग अपने निजी हितों में इतने उलझे हैं कि वे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल गए हैं।

इस प्रकार, केदारनाथ अग्रवाल ने इस कविता में बहुत ही सीधे और सरल ढंग से एक गंभीर सामाजिक समस्या को उजागर किया है और व्यंग्य के माध्यम से लोगों को जगाने का प्रयास किया है।

प्रश्न 2: 'अबे सुन बे गुलाब' कविता की भाषा-शैली की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [CBSE 2022, 2020]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' भाषा-शैली की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

  • आम बोलचाल की भाषा: इस कविता की सबसे बड़ी विशेषता है इसकी आम बोलचाल की भाषा। 'अबे', 'बे' जैसे शब्द आम जनता की बोली के शब्द हैं। यह भाषा कृत्रिम नहीं है, बल्कि सीधे जन-जीवन से ली गई है।
  • संवाद शैली: यह कविता संवाद के रूप में लिखी गई है। कवि गुलाब से सीधे बात कर रहे हैं। यह शैली कविता को और प्रभावशाली बनाती है। पाठक को लगता है जैसे कवि उससे बात कर रहा हो।
  • सरलता और सहजता: कवि की भाषा में कोई जटिलता नहीं है। वे बहुत सरल और सहज ढंग से अपनी बात कहते हैं। इसमें कोई संस्कृतनिष्ठ शब्द नहीं हैं, कोई कठिन मुहावरे नहीं हैं।
  • पुनरावृत्ति: कवि ने 'तो क्या हुआ' की पुनरावृत्ति की है। यह पुनरावृत्ति कवि के संदेश को और प्रभावी बनाती है और पाठक के मन में बात को गहराई से बिठाती है।
  • प्रश्नात्मक शैली: कवि प्रश्न उठाता है - "तो क्या हुआ?" यह प्रश्न पाठक को सोचने पर मजबूर करता है। यह एक अलंकारिक प्रश्न है जिसका उत्तर पाठक को स्वयं देना होता है।
  • व्यंग्यात्मकता: भाषा में व्यंग्य का गहरा पुट है। बहुत ही सीधे-सादे शब्दों में गहरा व्यंग्य किया गया है।
  • संक्षिप्तता: कविता बहुत संक्षिप्त है, लेकिन इसमें गहरा अर्थ भरा है। कवि ने कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया है।

इस प्रकार, केदारनाथ अग्रवाल की भाषा-शैली सरल, सहज, व्यंग्यात्मक और प्रभावशाली है। वे आम आदमी की भाषा में आम आदमी की बात करते हैं।

प्रश्न 3: 'अबे सुन बे गुलाब' कविता को प्रगतिशील कविता की विशेषताओं के आलोक में विश्लेषित कीजिए। [CBSE 2021, 2019]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' प्रगतिशील कविता की सभी प्रमुख विशेषताओं से परिपूर्ण है।

  • सामाजिक सरोकार: प्रगतिशील कविता की सबसे बड़ी विशेषता है उसका सामाजिक सरोकार। यह कविता समाज की एक गंभीर समस्या - चुप्पी और सामाजिक दायित्व के अभाव - को उजागर करती है।
  • व्यंग्य: प्रगतिशील कवि समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य करते हैं। इस कविता में बुद्धिजीवियों और संपन्न वर्ग पर गहरा व्यंग्य है।
  • आम आदमी की भाषा: प्रगतिशील कवि आम आदमी की भाषा में लिखते हैं। इस कविता में 'अबे', 'बे' जैसे शब्द इसका उदाहरण हैं।
  • जन-जीवन से जुड़ाव: प्रगतिशील कविता जन-जीवन से जुड़ी होती है। यह कविता भी उन लोगों से जुड़ी है जो चुप हैं, जो आवाज नहीं उठाते।
  • जागरूकता का संदेश: प्रगतिशील कविता का उद्देश्य समाज में जागरूकता फैलाना है। यह कविता लोगों को चुप्पी तोड़ने और आवाज उठाने का संदेश देती है।
  • सरलता: प्रगतिशील कविता सरल होती है, ताकि आम आदमी उसे समझ सके। यह कविता अत्यंत सरल है।
  • संक्षिप्तता: प्रगतिशील कविता में संक्षिप्तता होती है। यह कविता बहुत संक्षिप्त है, लेकिन गहरे अर्थ से भरी है।

इस प्रकार, 'अबे सुन बे गुलाब' कविता प्रगतिशील कविता की एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें प्रगतिशील कविता की सभी विशेषताएँ मौजूद हैं।

प्रश्न 4: 'अबे सुन बे गुलाब' कविता की आज के समाज में क्या प्रासंगिकता है? [CBSE 2020]

केदारनाथ अग्रवाल की कविता 'अबे सुन बे गुलाब' आज के समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

  • बुद्धिजीवियों की चुप्पी: आज भी बुद्धिजीवी वर्ग समाज की समस्याओं पर चुप है। वे सब कुछ देखते हैं, समझते हैं, लेकिन आवाज नहीं उठाते। यह कविता उन पर तीखा व्यंग्य है।
  • सोशल मीडिया का दौर: आज सोशल मीडिया पर लोग केवल अपनी तस्वीरें और निजी बातें पोस्ट करते हैं। वे गुलाब की तरह सुंदर दिखना चाहते हैं, लेकिन सामाजिक मुद्दों पर चुप रहते हैं।
  • अन्याय के खिलाफ चुप्पी: आज भी जब अन्याय होता है, तो ज्यादातर लोग चुप रहते हैं। 'हमें क्या' का रवैया आम है। यह कविता उसी रवैये पर व्यंग्य है।
  • संपन्न वर्ग की उदासीनता: आज का संपन्न वर्ग अपनी सुख-सुविधाओं में इतना उलझा है कि उसे समाज की समस्याओं से कोई मतलब नहीं। यह कविता उन्हें उनके दायित्वों की याद दिलाती है।
  • युवा पीढ़ी के लिए संदेश: आज की युवा पीढ़ी के पास ऊर्जा है, उत्साह है, लेकिन वे सही मुद्दों पर आवाज नहीं उठाते। यह कविता उन्हें प्रेरित करती है कि वे बोलें।
  • लोकतंत्र की मजबूती: लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब नागरिक जागरूक हों और अपनी आवाज उठाएँ। यह कविता उसी जागरूकता का संदेश देती है।

इस प्रकार, यह कविता आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी अपने समय में थी। यह हमें याद दिलाती है कि सुंदर होना, पढ़ा-लिखा होना, संपन्न होना काफी नहीं है - हमें बोलना भी होगा।

प्रश्न 5: 'अबे सुन बे गुलाब' कविता में 'गुलाब' के माध्यम से कवि ने जो व्यंग्य किया है, उसे अपने शब्दों में समझाइए। [CBSE 2021]

केदारनाथ अग्रवाल ने 'अबे सुन बे गुलाब' कविता में 'गुलाब' के माध्यम से बहुत ही तीखा और गहरा व्यंग्य किया है।

गुलाब क्या है? गुलाब सुंदर है, मुलायम है, महकता है। यह सब उसकी विशेषताएँ हैं। लेकिन इन सबके बावजूद वह बोलता नहीं। वह चुप है।

व्यंग्य किस पर है? यह व्यंग्य उन लोगों पर है जो गुलाब की तरह हैं - सुंदर, पढ़े-लिखे, संपन्न, समर्थ - लेकिन चुप हैं। वे समाज की बुराइयों को देखते हैं, अन्याय को देखते हैं, शोषण को देखते हैं, लेकिन कुछ नहीं बोलते।

व्यंग्य की गहराई: कवि कहते हैं कि तुम चाहे कितने भी सुंदर हो, कितने भी मुलायम हो, कितनी भी मीठी खुशबू रखते हो - यह सब बेकार है अगर तुम बोलते नहीं। यानी किसी व्यक्ति के सारे गुण तब तक निरर्थक हैं जब तक वह समाज के लिए कुछ नहीं करता।

व्यंग्य का लक्ष्य: इस व्यंग्य का मुख्य लक्ष्य है - बुद्धिजीवी वर्ग, संपन्न वर्ग, और वे सभी लोग जिनके पास संसाधन हैं लेकिन वे सामाजिक सरोकारों से दूर हैं।

व्यंग्य का तरीका: कवि ने बहुत ही सीधे-सादे ढंग से यह व्यंग्य किया है। कोई जटिलता नहीं, कोई कठिन शब्द नहीं। 'अबे सुन बे गुलाब' - इसी एक संबोधन में सारा व्यंग्य समा गया है।

इस प्रकार, केदारनाथ अग्रवाल ने गुलाब के माध्यम से समाज के उस तबके पर बहुत ही करारा व्यंग्य किया है जो खूबसूरत और समर्थ होते हुए भी चुप है, बेअसर है, बेकार है।

8. परीक्षा दृष्टि बिंदु

📊 बार-बार पूछे गए प्रश्न

  • गुलाब के प्रतीकात्मक महत्व पर प्रश्न - 2023, 2021, 2019
  • 'तो क्या हुआ' पंक्ति की व्याख्या - 2022, 2020, 2018
  • कविता का मुख्य संदेश - 2022, 2021, 2020
  • भाषा-शैली की विशेषताएँ - 2021, 2019
  • व्यंग्य के माध्यम से उजागर सामाजिक समस्या - 2020, 2018
  • कविता की प्रासंगिकता - 2021, 2020

📈 बोर्ड ट्रेंड

पिछले 5 वर्षों के विश्लेषण से पता चलता है कि इस कविता से प्रतिवर्ष 5-8 अंकों के प्रश्न आते हैं। लघु उत्तरीय प्रश्न में गुलाब के प्रतीकात्मक महत्व, प्रमुख पंक्तियों के अर्थ और भाषा-शैली पर प्रश्न पूछे जाते हैं। दीर्घ उत्तरीय प्रश्न में व्यंग्य के माध्यम से उजागर सामाजिक समस्या, प्रगतिशील कविता की विशेषताओं के आलोक में विश्लेषण और कविता की प्रासंगिकता पर प्रश्न आते हैं।

💡 याद रखने योग्य तथ्य

  • कवि - केदारनाथ अग्रवाल
  • जन्म - 1911, मृत्यु - 2000
  • प्रमुख रचनाएँ - युग की गंगा, फूल नहीं रंग बोलते हैं, जो शिल्पी है
  • सम्मान - साहित्य अकादमी पुरस्कार
  • भाषा - आम बोलचाल की, सरल, सहज
  • विचारधारा - प्रगतिशील, जनवादी
  • पुस्तक - आरोह भाग 1
  • कविता का नाम - अबे सुन बे गुलाब
  • मुख्य विषय - चुप्पी पर व्यंग्य, सामाजिक दायित्व का आह्वान

📌 महत्वपूर्ण उद्धरण

"अबे सुन बे गुलाब।"

"तू जो इतना सुंदर है... तो क्या हुआ, जो बोलता नहीं है।"

"जो बोलता नहीं है, वह बेकार है।"

9. उत्तर लेखन मार्गदर्शन

📝 2 अंक प्रश्न (अति लघु उत्तरीय)

एक शब्द या एक वाक्य में उत्तर दें। संक्षिप्त और सटीक होना चाहिए।

उदाहरण: प्रश्न - 'अबे सुन बे गुलाब' कविता के कवि कौन हैं? उत्तर - केदारनाथ अग्रवाल।

📝 3-4 अंक प्रश्न (लघु उत्तरीय)

परिचय (1 वाक्य) + मुख्य भाग (3-4 बिंदु) + निष्कर्ष (1 वाक्य)। प्रत्येक बिंदु का उदाहरण सहित वर्णन।

उदाहरण: प्रश्न - गुलाब किसका प्रतीक है? उत्तर - परिचय में बताएँ कि केदारनाथ अग्रवाल ने गुलाब को एक प्रतीक के रूप में प्रयोग किया है। फिर सुंदर लोगों का प्रतीक, पढ़े-लिखे लोगों का प्रतीक, संपन्न लोगों का प्रतीक, चुप रहने वालों का प्रतीक - चार बिंदुओं में समझाएँ। निष्कर्ष में कहें कि इस प्रकार गुलाब के माध्यम से कवि ने गहरा व्यंग्य किया है।

📝 5-6 अंक प्रश्न (दीर्घ उत्तरीय)

व्यंग्य के विश्लेषण के लिए: प्रस्तावना + कवि का परिचय + कविता का मूलभाव + व्यंग्य का विश्लेषण + निष्कर्ष। जैसे व्यंग्य पर प्रश्न - पहले केदारनाथ अग्रवाल का परिचय दें, फिर कविता का मूलभाव समझाएँ, फिर गुलाब के प्रतीकात्मक महत्व और उसके माध्यम से किए गए व्यंग्य का विस्तार से विश्लेषण करें, अंत में निष्कर्ष दें।

10. हब लिंक



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