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स्वर संधि (Vowel Sandhi) | Hindi Grammar | GPN

स्वर संधि भाषा का वह नाजुक ताना-बाना है जहाँ दो स्वर मिलकर एक नया स्वर बुनते हैं। जब "देव" और "आलय" आपस में मिलते हैं तो "देवालय" का मधुर स्वर गूँज उठता है - यह कोई यांत्रिक नियम नहीं, बल्कि भाषा का संगीत है। कक्षा 7-8 के विद्यार्थियों के लिए यह विषय भाषा की लय और ताल को समझने का सुनहरा अवसर है।

✅ उपयुक्त कक्षाएँ: कक्षा 7–8 (प्रारंभिक स्तर) | कक्षा 9–10 (मध्यम स्तर) | कक्षा 11–12 (उन्नत स्तर)


1. स्वर संधि का काव्यमय परिचय

स्वर संधि को भाषा का "स्वर-संगीत" कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। जैसे संगीत में दो सुर मिलकर एक नया सुर बनाते हैं, वैसे ही स्वर संधि में दो स्वर मिलकर एक नया स्वर रचते हैं। "महा" और "आत्मा" के मिलन से "महात्मा" का जन्म होता है - एक ऐसा शब्द जो न सिर्फ उच्चारण में मधुर है बल्कि अर्थ में भी गहरा। यह भाषा की प्राकृतिक लय है, न कि कोई कठिन नियम।

सोचिए, दो मित्र स्वर मिल रहे हैं। 'अ' और 'इ' हाथ मिलाते हैं तो 'ए' बन जाता है। 'अ' और 'उ' गले लगते हैं तो 'ओ' बन जाता है। यह मिलन इतना सहज है कि हम अनजाने ही इसका प्रयोग करते हैं। "इति" और "आदि" को अलग-अलग बोलने की बजाय "इत्यादि" कहना कितना सहज लगता है! कक्षा 7-8 में हम इसी स्वर संगीत के नियमों को समझेंगे - कब कौन-सा स्वर किससे मिलकर क्या बनता है।

2. स्वर संधि की स्पष्ट परिभाषा

परिभाषा: स्वर संधि वह संधि प्रक्रिया है जिसमें दो निकटवर्ती स्वरों के मिलने से एक नया स्वर, यण (य, र, ल, व) या अयादि संधि उत्पन्न होती है। यह परिवर्तन विशेष नियमों के अनुसार होता है और भाषा को प्रवाहमय एवं मधुर बनाता है।

3. स्वर संधि की विशेष पहचान

स्वर संधि को पहचानना सीखना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह संधि का सबसे सामान्य और प्रचलित रूप है। नीचे दिए बिंदु आपको बताएँगे कि कैसे किसी शब्द में स्वर संधि की उपस्थिति जानें।

  • स्वर-स्वर मिलन: स्वर संधि केवल दो स्वरों के बीच होती है, व्यंजनों के बीच नहीं।
  • निकटता आवश्यक: संधि केवल निकटवर्ती स्वरों में होती है, बीच में व्यंजन हो तो नहीं।
  • स्वर परिवर्तन: परिणामस्वरूप नया स्वर, यण या अयादि बनता है।
  • उच्चारण सुविधा: मुख्य उद्देश्य उच्चारण को सरल और प्रवाहमय बनाना है।
  • नियमबद्धता: स्वर संधि विशेष नियमों के अनुसार होती है, यादृच्छिक नहीं।

4. स्वर संधि के प्रमुख भेद

स्वर संधि के मुख्यतः पाँच प्रकार हैं जो स्वरों के मिलने के ढंग पर आधारित हैं। यह वर्गीकरण आपको समझने में मदद करेगा कि किन स्वरों के मिलने से कौन-सी संधि होती है।

क्रम संधि प्रकार स्वर मिलन परिणाम उदाहरण
1 दीर्घ संधि समान स्वर + समान स्वर दीर्घ स्वर महा + आत्मा = महात्मा
2 गुण संधि अ/आ + इ/ई या उ/ऊ ए या ओ देव + इंद्र = देवेंद्र
3 वृद्धि संधि अ/आ + ऋ/ॠ या ए/ऐ/ओ/औ आ, ऐ, औ एक + एक = एकैक
4 यण संधि इ/ई/उ/ऊ/ऋ + भिन्न स्वर य, व, र, ल इति + आदि = इत्यादि
5 अयादि संधि ए/ऐ/ओ/औ + भिन्न स्वर अय्, आय्, अव्, आव् ने + अन = नयन

5. स्वर संधि के प्रकारानुसार उदाहरण

नीचे प्रत्येक प्रकार की स्वर संधि के स्पष्ट उदाहरण दिए गए हैं। ये उदाहरण कक्षा 7-8 के स्तर के अनुरूप हैं और परीक्षा में भी इसी प्रकार के प्रश्न पूछे जाते हैं।

1. दीर्घ संधि के उदाहरण:
• देव + आलय = देवालय (आ + आ = आ)
• महा + आत्मा = महात्मा (आ + आ = आ)
• गंगा + उदक = गंगोदक (आ + उ = ओ) - यह गुण संधि है, ध्यान दें
• विद्या + अर्थी = विद्यार्थी (आ + अ = आ) - दीर्घ संधि

2. गुण संधि के उदाहरण:
• राम + उवाच = रामोवाच (अ + उ = ओ)
• देव + इंद्र = देवेंद्र (अ + इ = ए)
• गज + इंद्र = गजेंद्र (अ + इ = ए)
• मुनि + इंद्र = मुनींद्र (इ + इ = ई - यह दीर्घ संधि है)

3. वृद्धि संधि के उदाहरण:
• एक + एक = एकैक (ए + ए = ऐ)
• तथैव = तथ + एव (अ + ए = ऐ)
• अ + ऐश्वर्य = ऐश्वर्य (अ + ऐ = ऐ)
• सम + औषध = सौषध (अ + औ = औ)

6. स्वर संधि का व्यावहारिक प्रयोग

स्वर संधि का सही प्रयोग जानना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भाषा की शुद्धता और प्रवाहमयता को बनाए रखती है। स्वर संधि का प्रयोग करते समय ध्यान रखें कि यह स्वाभाविक लगे, जबरन न लगाई जाए।

प्रयोग की विधि: स्वर संधि लगाते समय सबसे पहले पहचानें कि कौन-से दो स्वर निकट हैं। फिर उनके प्रकार के अनुसार संधि नियम लागू करें। याद रखें कि संधि उच्चारण की सुविधा के लिए है, इसलिए यदि अलग-अलग उच्चारण करना आसान हो तो संधि न करें।

वाक्यों में प्रयोग:
1. हम देवालय में पूजा करते हैं। (देव + आलय = देवालय - दीर्घ संधि)
2. महात्मा गांधी अहिंसा के पुजारी थे। (महा + आत्मा = महात्मा - दीर्घ संधि)
3. रामोवाच - राम ने कहा। (राम + उवाच = रामोवाच - गुण संधि)
4. पुस्तक, कॉपी इत्यादि ले आओ। (इति + आदि = इत्यादि - यण संधि)
5. एकैक व्यक्ति ने उत्तर दिया। (एक + एक = एकैक - वृद्धि संधि)
6. नयन सुंदर हैं। (ने + अन = नयन - अयादि संधि)
7. विद्यार्थी का कर्तव्य पढ़ना है। (विद्या + अर्थी = विद्यार्थी - दीर्घ संधि)

7. स्वर संधि में सामान्य गलतियाँ एवं सावधानियाँ

कक्षा 7-8 के छात्र स्वर संधि सीखते समय कुछ सामान्य गलतियाँ करते हैं। इन गलतियों से बचने के लिए नीचे दिए बिंदुओं को ध्यान से पढ़ें।

  • संधि प्रकार भ्रम: दीर्घ, गुण, वृद्धि संधि में भ्रम होना। याद रखें: समान स्वर = दीर्घ, अ/आ + इ/उ = गुण, अ/आ + ए/ऐ/ओ/औ = वृद्धि।
  • यण संधि भूल: यण संधि (इ/ई → य, उ/ऊ → व, ऋ → र) के नियम भूल जाना।
  • अनावश्यक संधि: जहाँ संधि की आवश्यकता न हो, वहाँ जबरन संधि लगाना।
  • विशेष नियम भूल: कुछ विशेष शब्दों में विशेष संधि होती है (जैसे "गंगा + उदक = गंगोदक" न कि "गंगाउदक")।
  • उच्चारण अनदेखा: संधि करते समय उच्चारण की सुविधा को नज़रअंदाज करना।

8. परीक्षा उपयोगी तथ्य

  • MCQ हेतु: "अ/आ + इ/ई = ए" और "अ/आ + उ/ऊ = ओ" यह गुण संधि का सूत्र याद रखें।
  • रिक्त स्थान हेतु: "_____ गांधी को कहते हैं" - यहाँ "महात्मा" (महा + आत्मा) संधि युक्त शब्द उचित रहेगा।
  • एक-शब्द उत्तर: "देव और इंद्र का मिलन" = "देवेंद्र" (देव + इंद्र - गुण संधि)।
  • विशेष तथ्य: "विद्यालय" और "विद्यार्थी" दोनों में "विद्या" मूल शब्द है, पर अलग-अलग संधियाँ हैं।
  • तुलना हेतु: संस्कृत में स्वर संधि के 10+ प्रकार हैं, हिंदी में मुख्यतः 5 प्रकार ही पढ़ाए जाते हैं।

9. 🎯 स्वर संधि - समझ की जाँच

नीचे दिए गए 10 प्रश्न स्वर संधि की आपकी समझ को परखेंगे। ये प्रश्न सीधे परीक्षा पैटर्न पर आधारित हैं।

1. "सदैव" में कौन-सी स्वर संधि है और किन दो शब्दों के मिलने से बना है?

उत्तर:
- मूल शब्द: सदा + एव
- संधि: सदा + एव = सदैव
- संधि प्रकार: वृद्धि संधि
- परिवर्तन: आ + ए = ऐ
- नियम: अ/आ + ए/ऐ/ओ/औ = वृद्धि संधि

"सदैव" = सदा + एव = हमेशा के लिए
यह एक सुंदर उदाहरण है जो दिखाता है कि कैसे दो शब्द मिलकर एक नया, प्रवाहमय शब्द बनाते हैं।

2. "गंगोदक" में कौन-सी संधि है? क्या यह "गंगा + उदक" का मेल है?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल सही!

- मूल शब्द: गंगा + उदक
- संधि: गंगा + उदक = गंगोदक
- संधि प्रकार: गुण संधि
- परिवर्तन: आ + उ = ओ
- नियम: अ/आ + उ/ऊ = ओ (गुण संधि)

विशेष बात:
"गंगोदक" = गंगा का जल
यह एक पवित्र शब्द है और धार्मिक संदर्भों में प्रयुक्त होता है।

ध्यान दें:
कुछ लोग "गंगाउदक" लिखने की गलती करते हैं, पर सही रूप "गंगोदक" ही है क्योंकि संधि के नियमानुसार आ + उ = ओ बनता है।

3. "नयन" और "नेत्र" में क्या संबंध है? क्या "नयन" में कोई संधि है?

उत्तर:
"नयन" में संधि:
- मूल शब्द: ने + अन
- संधि: ने + अन = नयन
- संधि प्रकार: अयादि संधि
- परिवर्तन: ए + अ = अय्
- नियम: ए/ऐ/ओ/औ + भिन्न स्वर = अयादि संधि

"नयन" vs "नेत्र":
1. नयन: ने + अन = नयन (आँख) - अधिक काव्यात्मक
2. नेत्र: मूल शब्द है (आँख) - सामान्य

दोनों का अर्थ "आँख" है, पर "नयन" अधिक साहित्यिक और काव्यात्मक है।
"नयन" संधि का सुंदर उदाहरण है जो भाषा को काव्यमय बनाता है।

4. "परोपकार" में कौन-सी स्वर संधि है? क्या इसका अर्थ "दूसरों का उपकार" ही है?

उत्तर:
संधि विश्लेषण:
- मूल शब्द: पर + उपकार
- संधि: पर + उपकार = परोपकार
- संधि प्रकार: गुण संधि
- परिवर्तन: र (अंत में अकार) + उ = रो
- नियम: अ + उ = ओ (गुण संधि)

अर्थ विस्तार:
शाब्दिक अर्थ: "पर का उपकार" (दूसरों का भला)
वास्तविक अर्थ: दूसरों की भलाई करना, निस्वार्थ सेवा, परहित

हाँ, इसका मूल अर्थ "दूसरों का उपकार" ही है, पर समय के साथ इसका अर्थ विस्तारित होकर एक महान मानवीय मूल्य बन गया है।
"परोपकार" संधि का एक श्रेष्ठ उदाहरण है जो न सिर्फ व्याकरणिक रूप से सही है बल्कि नैतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है।

5. "सूर्योदय" और "सूर्यास्त" में कौन-सी संधियाँ हैं? दोनों में क्या अंतर है?

उत्तर:
सूर्योदय में संधि:
- मूल शब्द: सूर्य + उदय
- संधि: सूर्य + उदय = सूर्योदय
- संधि प्रकार: गुण संधि
- परिवर्तन: य (अंत में अकार) + उ = यो
- अर्थ: सूर्य का उदय होना

सूर्यास्त में संधि:
- मूल शब्द: सूर्य + अस्त
- संधि: सूर्य + अस्त = सूर्यास्त
- संधि प्रकार: दीर्घ संधि
- परिवर्तन: य (अंत में अकार) + अ = या
- अर्थ: सूर्य का अस्त होना

अंतर:
1. संधि प्रकार: सूर्योदय - गुण संधि, सूर्यास्त - दीर्घ संधि
2. परिवर्तन: य + उ = यो vs य + अ = या
3. अर्थ: उदय vs अस्त (विपरीत अर्थ)

दोनों प्रकृति के महत्वपूर्ण कालों को दर्शाते हैं और संधि के सुंदर उदाहरण हैं।

6. "व्योम" में क्या संधि है? क्या यह "वि" और "ओम" का मेल है?

उत्तर: नहीं, "व्योम" की संधि अलग है:

संधि विश्लेषण:
- मूल शब्द: वि + ओम (नहीं)
सही विश्लेषण:
- मूल शब्द: वि + याम (अधिक सटीक)
या
- मूल शब्द: व्योमन् (संस्कृत मूल शब्द)

वास्तविकता:
"व्योम" संस्कृत का मूल शब्द है जिसका अर्थ है "आकाश"।
हिंदी में यह सीधे प्रयुक्त होता है और इसमें कोई संधि नहीं है।

ध्यान दें:
कभी-कभी छात्र "वि + ओम = व्योम" सोचते हैं, पर यह गलत है।
"व्योम" एक मूल शब्द है जिसका अर्थ आकाश/गगन है।

7. "अत्यंत" में कौन-सी संधि है? क्या यह "अति" और "अंत" का मेल है?

उत्तर: हाँ, बिल्कुल सही!

संधि विश्लेषण:
- मूल शब्द: अति + अंत
- संधि: अति + अंत = अत्यंत
- संधि प्रकार: यण संधि
- परिवर्तन: इ + अ = य
- नियम: इ/ई + भिन्न स्वर = य (यण संधि)

अर्थ: अत्यंत = अति + अंत = बहुत अधिक, अंत तक

विशेष बात:
1. यह एक बहुप्रचलित शब्द है
2. इसका प्रयोग विशेषण के रूप में होता है
3. उदाहरण: "यह अत्यंत सुंदर दृश्य है"

"अत्यंत" यण संधि का उत्कृष्ट उदाहरण है जो दिखाता है कि कैसे इ + अ = य बनता है।

8. "स्वागत" में कौन-सी संधि है? क्या यह "सु" और "आगत" का मेल है?

उत्तर: हाँ, सही पहचान!

संधि विश्लेषण:
- मूल शब्द: सु + आगत
- संधि: सु + आगत = स्वागत
- संधि प्रकार: यण संधि
- परिवर्तन: उ + आ = वा
- नियम: उ/ऊ + भिन्न स्वर = व (यण संधि)

अर्थ: स्वागत = सु + आगत = अच्छे से आगमन, स्वीकार

विशेष बात:
1. यह एक अत्यंत प्रचलित शब्द है
2. इसका प्रयोग अभिवादन और सम्मान में होता है
3. उदाहरण: "आपका स्वागत है"

ध्यान दें:
कुछ लोग "सु + आगत = सु+आगत" लिखने की गलती करते हैं, पर सही रूप "स्वागत" ही है क्योंकि यण संधि के नियमानुसार उ + आ = वा बनता है।

9. "ऐक्य" और "एकता" में क्या संबंध है? क्या "ऐक्य" में कोई संधि है?

उत्तर:
"ऐक्य" में संधि:
- मूल शब्द: एक + य (प्रत्यय)
- संधि: एक + य = ऐक्य
- संधि प्रकार: वृद्धि संधि
- परिवर्तन: एक (ए स्वर) + य = ऐक्य
- तकनीकी रूप: एक + ता (प्रत्यय) से "एकता" और एक + य से "ऐक्य"

"ऐक्य" vs "एकता":
1. ऐक्य: एक + य = ऐक्य (एकत्व, मेल) - अधिक साहित्यिक
2. एकता: एक + ता = एकता (एक होने का भाव) - सामान्य

अर्थ समानता:
दोनों का अर्थ "एक होने की अवस्था या भाव" है, पर "ऐक्य" अधिक गहरा और साहित्यिक अर्थ रखता है।

प्रयोग:
- "राष्ट्रीय एकता" (सामान्य)
- "मन-वचन-कर्म का ऐक्य" (गहरा, दार्शनिक)

10. स्वर संधि के पाँच प्रकारों के नाम और एक-एक उदाहरण बताइए।

उत्तर: स्वर संधि के पाँच प्रकार और उदाहरण:

1. दीर्घ संधि: समान स्वरों का मिलन → दीर्घ स्वर
उदाहरण: महा + आत्मा = महात्मा (आ + आ = आ)

2. गुण संधि: अ/आ + इ/ई या उ/ऊ = ए या ओ
उदाहरण: देव + इंद्र = देवेंद्र (अ + इ = ए)

3. वृद्धि संधि: अ/आ + ए/ऐ/ओ/औ = आ, ऐ, औ
उदाहरण: एक + एक = एकैक (ए + ए = ऐ)

4. यण संधि: इ/ई/उ/ऊ/ऋ + भिन्न स्वर = य, व, र, ल
उदाहरण: इति + आदि = इत्यादि (इ + आ = य)

5. अयादि संधि: ए/ऐ/ओ/औ + भिन्न स्वर = अय्, आय्, अव्, आव्
उदाहरण: ने + अन = नयन (ए + अ = अय्)

याद रखने की ट्रिक:
"दीर्घ-गुण-वृद्धि, यण-अयादि पाँच प्रकार,
स्वरों के मिलन से, बनता नया स्वर सार।"

10. सारांश

स्वर संधि हिंदी व्याकरण का वह मधुर पक्ष है जो भाषा को संगीतमय और प्रवाहमय बनाता है। हमने सीखा कि स्वर संधि के पाँच मुख्य प्रकार हैं: दीर्घ संधि, गुण संधि, वृद्धि संधि, यण संधि और अयादि संधि। प्रत्येक संधि के अपने विशेष नियम हैं जिनके अनुसार दो स्वर मिलकर नया स्वर, यण या अयादि बनाते हैं। कक्षा 7-8 के स्तर पर इन नियमों को समझना, उदाहरणों के माध्यम से उनकी पहचान करना और सही संधि करना सीखना ही पर्याप्त है। स्वर संधि का ज्ञान न सिर्फ हमारी भाषाई क्षमता को निखारता है बल्कि हमें भाषा के सौंदर्य और वैज्ञानिक आधार से भी परिचित कराता है।

11. संबंधित विषय संकेत

स्वर संधि का ज्ञान प्राप्त करने के बाद अब अगला तार्किक कदम है: व्यंजन संधि

📝 स्वर संधि - अभ्यास कार्यपत्रक

इस विषय से संबंधित वर्कशीट में आपको स्वर संधि पहचानने, संधि करने और संधि विच्छेद के अभ्यास मिलेंगे।

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